श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 621, कुल 2549 में से
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(5) काशीमिश्र, (6) प्रद्युम्नमिश्र, (7) राय भवानन्द :-
काशीमिश्र, प्रद्युम्नमिश्र, राय भवानन्द।
याँहार मिलने प्रभु पाइला आनन्द ॥ 131 ॥
आलिङ्गन करि' ताँरे बलिल वचन।
तुमि पाण्डु, पञ्चपाण्डव—तोमार नन्दन ॥ 132 ॥
अनुवाद-काशीमिश्र, प्रद्युम्नमिश्र और राय भवानन्द,
जिन्हें मिलकर महाप्रभुको आनन्द हुआ। राय भवानन्दका
आलिङ्गन करके महाप्रभुने कहा कि तुम पाण्डु हो
और तुम्हारे पुत्र पाँच पाण्डव हैं॥ 131-132 ॥
अनुभाष्य-‘काशीमिश्र’-राजपुरोहित थे। नीलाचलमें
श्रीमन्महाप्रभु इनके घरमें ही रहे थे। बादमें यह स्थान
श्रीवक्रेश्वर पण्डितको मिला। उनके शिष्य श्रीगोपालगुरु
गोस्वामीके समयमें वहाँपर 'श्रीराधाकान्त' विग्रहकी स्थापना
हुई थी। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 193वाँ श्लोक)—
“मथुरायां पुरा यासीत् सैरन्ध्री कृष्णवल्लभा।
साद्य नीलाचलावासः काशीमिश्रः प्रभोः प्रियः ॥ 193 ॥”
“पहले मथुरामें जो श्रीकृष्णकी प्रिया सैरन्ध्री
(कुब्जा) थीं, वे ही अब महाप्रभुके प्रियपात्र नीलाचलवासी
काशी मिश्र हैं।”
'प्रद्युम्न मिश्र'-उड़ीसाके निवासी थे। (चैःभाः
अन्त्यखण्ड, पाँचवाँ अध्याय)-
“श्रीप्रद्युम्न मिश्र कृष्णसुखेर सागर।
आत्मपद याँरे दिला श्रीगौरसुन्दर ॥ 211 ॥”
“श्रीकृष्णप्रेमके सागर श्रीप्रद्युम्न मिश्र, जिन्हें
श्रीगौरसुन्दरने आत्म-पद प्रदान किया।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड,
आठवाँ अध्याय)-
“श्रीप्रद्युम्नमिश्र प्रेमभक्तिर प्रधान ॥ 57 ॥”
“प्रेमभक्तिके प्रधान श्रीप्रद्युम्न मिश्र।” (चैःचः मध्य,
10/43)-
“प्रद्युम्नमिश्र इहँ वैष्णव-प्रधान।
जगन्नाथेर 'महासोयार' इहँ 'दास' नाम ॥ 43 ॥”
“प्रद्युम्नमिश्र वैष्णवोंमें प्रधान हैं। वे भगवान् श्रीजगन्नाथके
प्रधान रसोइया हैं। दास इनका नाम है॥”
अशौक्र-ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न महाभागवत श्रीराय
रामानन्दके निकट शौक्र-ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न प्रद्युम्नमिश्रको
हरिकथा-श्रवणरूप शिष्यत्व प्रदानकर महाप्रभुकी कृपाका
प्रसङ्ग-चैःचः अन्त्यलीला, पाँचवाँ अध्याय द्रष्टव्य है।
'भवानन्द राय' - श्रीरामानन्द रायके पिता। पुरीसे
पश्चिमकी ओर छह कोसकी दूरीपर ब्रह्मगिरी अथवा
आलालनाथके निकट इनका वास स्थान था। ये जातिसे
शौक्र-करण थे। इनके पाँच पुत्रोंके सम्बन्धमें 133
संख्या द्रष्टव्य है। ये पहले 'पाण्डुराज' के रूपमें
परिचित थे॥ 131 ॥
(8) श्रीराय-रामानन्दादि पाँच भाई :-
रामानन्द राय, पट्टनायक गोपीनाथ।
कलानिधि, सुधानिधि, नायक वाणीनाथ ॥ 133 ॥
एइ पञ्चपुत्र तोमार—मोर प्रियपात्र।
रामानन्द-सह मोर देह-भेद मात्र ॥ 134 ॥
अनुवाद-यद्यपि तुम्हारे ये पाँचों पुत्र रामानन्द राय,
गोपीनाथ पट्टनायक, कलानिधि, सुधानिधि और नायक
वाणीनाथ, मेरे प्रिय पात्र हैं, किन्तु रामानन्द मेरा ही
स्वरूप है, उसके साथ मेरा केवल देह मात्रका भेद
है॥ 133-134 ॥
अनुभाष्य-‘रामानन्द राय'-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका
120-124वें श्लोक)—
“प्रियनर्मसखः कश्चिदर्जुनः पाण्डवोऽर्जुनः।
मिलित्वा समभूद्रामानन्दरायः प्रभोः प्रियः ॥ 120 ॥
अतो राधाकृष्णभक्तिप्रेमतत्त्वादिकं कृती।
रामानन्दो गौरचन्द्रं प्रत्यवर्णयदन्वहम् ॥ 121 ॥
ललितेत्याहुरेके यत्तदेकेनानुमन्यते।
भवानन्दं प्रति प्राह गौरो यत्त्वं पृथापतिः ॥ 122 ॥
गोप्योऽर्जुनीयया सार्द्धमेकीभूयापि पाण्डवः।
अर्जुनो यद्रायरामानन्द इत्याहुरुत्तमाः ॥ 123 ॥
अर्जुनीयाभवत्तूष्णीमर्जुनोऽपि च पाण्डवः।
इति पाद्मोत्तरे खण्डे व्यक्तमेव विराजते।
तस्मादेतत्त्रयं रामानन्दराय-महाशयः ॥ 124 ॥”
दसवाँ अध्याय | 85