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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 622, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 622

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“श्रीकृष्णके प्रियनर्म सखा श्रीअर्जुन और पाण्डव-अर्जुन
मिलकर श्रीगौरप्रिय श्रीरामानन्द राय हुए हैं। इसलिये
रामानन्द प्रतिदिन ही श्रीगौरचन्द्रको राधाकृष्णतत्त्व, भक्तितत्त्व,
प्रेमतत्त्व आदि वर्णन करते थे। कोई उन्हें श्रीललिता
भी कहते हैं, किन्तु अधिकांश महात्मा इस बातको
स्वीकार नहीं करते हैं, क्योंकि श्रीगौरसुन्दरने भवानन्दको
कहा है कि आप कुन्तीपति राजा पाण्डु हैं। विज्ञजन
कहते हैं कि अर्जुनीया नामकी गोपी और पाण्डुपुत्र
अर्जुन एक होकर श्रीरायरामानन्द हुए हैं। पाद्मोत्तर-खण्डमें
कहा गया है कि अर्जुनीया ही अर्जुन हुई थी। इसलिये
श्रीललितादेवी (अथवा प्रियनर्मसखा अर्जुन?), श्रीमती
अर्जुनीया और पाण्डव-अर्जुन, ये तीनोंका मिलित रूप
श्रीरायरामानन्द हैं।”
किसी-किसीके मतमें ये विशाखादेवी हैं (चैःचः
मध्यलीला, नौवाँ और अन्त्य, पाँचवाँ अध्याय द्रष्टव्य
है)। अन्तरङ्ग भक्तोंके बीच इनका बहुत ऊँचा स्थान
है। महाप्रभुका कथन है—
“आमि त' संन्यासी, आपना विरक्त करि' मानि।
दर्शन दूरे, प्रकृतिर नाम यदि शुनि ॥
तबहिँ विकार पाय मोर तनु मन।
प्रकृति-दर्शने स्थिर हय कोन् जन॥
निर्विकार देह-मन काष्ठ-पाषाण सम।
आश्चर्य तरुणी-स्पर्शे निर्विकार मन ॥
एक रामानन्देर हय एइ अधिकार।
ताते जानि, - अप्राकृत देह ताँहार ॥
ताँहार मनेर भाव तिनिइ जाने मात्र।
ताहा जानिवारे आर द्वितीय नाहि पात्र ॥
गृहस्थ हञा नहे राय षड्वर्गेर वशे।
विषयी हञा संन्यासीरे उपदेशे ॥”
“मैं तो संन्यासी हूँ और अपनेको विरक्त मानता
हूँ। परन्तु दर्शन तो दूरकी बात है, स्त्रीका नाम भी
यदि मैं सुनता हूँ, तो मेरे तन-मनमें विकार आ जाता
है। स्त्रीका दर्शन करके कौन स्थिर रह सकता है?
किसका तन और मन काष्ठ-पत्थरके सामान निर्विकार
रह सकता है? यह बहुत आश्चर्यकी बात है कि
तरुणीके स्पर्शसे भी मन निर्विकार रहे। एक रामानन्दका
ही ऐसा अधिकार है। इसलिये यह समझना चाहिये कि
उनकी देह अप्राकृत है। उनके मनके भावोंको केवल
वे ही जान सकते हैं, उनको जाननेवाला कोई दूसरा
नहीं है। गृहस्थ होकर भी राय षड्वर्ग (काम, क्रोध,
मोह, लोभ, मद और मात्सर्य) के वशमें नहीं हैं। बाह्य
दृष्टिसे विषयी दिखनेपर भी वे इतने विरक्त हैं कि वे
विषयोंको त्याग किये हुए निर्गुण संन्यासीको भी जड़
विषयोंका त्यागकर श्रीकृष्णविषयके अनुशीलनमें प्रवृत्त
करानेमें समर्थ हैं।”
श्रीस्वरूप और इनके साथ महाप्रभु शेषलीलामें
निरन्तर श्रीकृष्णविरहिणी राधाके महाभाव-वैचित्र्यका
आस्वादन करते थे (चैःचः मध्यलीला, 2/77संख्या);
इनके शुद्धसख्यके द्वारा महाप्रभु वशीभूत थे (चैःचः
मध्यलीला, 2/78 संख्या)। सार्वभौम भट्टाचार्यका कथन—
“रामानन्द राय आछे गोदावरी तीरे।
अधिकारी हयेन तँहो विद्यानगरे॥
पृथिवीते रसिक भक्त नाहि ताँर सम।
पाण्डित्य आर भक्तिरस, दुँहेर तँहो सीमा ॥”
“रामानन्द राय गोदावरी तटपर विद्यानगरके अधिकारी
हैं। पृथ्वीपर उनके समान और कोई रसिक भक्त नहीं
है। वे पाण्डित्य और भक्तिरसकी सीमा हैं।”
श्रीरामरायके साथ महाप्रभुका मिलन और रायके
मुखसे साध्य-साधन तत्त्वका श्रवण, महाप्रभुका
रसराज-महाभाव-रूपका प्रदर्शन, महाप्रभुकी उक्ति—
“आमि एक बातुल, तुमि द्वितीय बातुल।
अतएव तोमाय आमाय हइ समतुल॥”
“मैं एक पागल हूँ और तुम दूसरे पागल हो।
इसलिये तुम और मैं एक समान हैं।”
रामरायको राजकार्य त्यागकर श्रीक्षेत्र जानेकी आज्ञा
(चैःचः मध्यलीला, आठवाँ अध्याय); महाप्रभुका दक्षिण
भारतमें प्रचारसे लौटनेके बाद रामरायके साथ पुनः
मिलन और उनका महाप्रभुको नीलाचल जानेका आग्रह

86 | श्रीचैतन्यचरितामृत