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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 628, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 628

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(26) रामभद्र, (27) सिंहेश्वर, (28) तपनाचार्य,
(29) रघुनाथ, (30) नीलाम्बर :-
रामभद्राचार्य, आर ओढ़
तपन आचार्य, आर रघु, नीलाम्बर ॥ 148 ॥
(31) सिङ्गाभट्ट, (32) कामाभट्ट,
(33) शिवानन्द, (34) कमलानन्द :-
सिङ्गाभट्ट, कामाभट्ट, दस्तुर शिवानन्द।
गौड़े पूर्वे भृत्य प्रभुर प्रिय कमलानन्द ॥ 149 ॥
अनुवाद-रामभद्राचार्य, उड़ीसावासी सिंहेश्वर, तपन
आचार्य, रघु, नीलाम्बर, सिङ्गाभट्ट, कामाभट्ट, शिवानन्द
दस्तुर और कमलानन्द महाप्रभुके प्रिय भक्त हैं।
कमलानन्द पहले महाप्रभुके साथ गौड़देशमें थे और
बादमें नीलाचलमें उनके पास आ गये॥ 148-149 ॥
(35) अच्युतानन्द :-
अच्युतानन्द-अद्वैत-आचार्य तनय।
नीलाचले रहे प्रभुर चरण आश्रय ॥ 150 ॥
अनुवाद-अच्युतानन्द श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र हैं। वे
नीलाचलमें महाप्रभुके चरणाश्रयमें रहे॥ 150 ॥
अनुभाष्य-'अच्युतानन्द'-चैःचः आदिलाीला, 12/13
संख्या द्रष्टव्य है॥ 150 ॥
(36) गङ्गादास, (37) विष्णुदास :-
निर्लोम गङ्गादास, आर विष्णुदास।
एइ सबेर प्रभुसङ्गे नीलाचले वास ॥ 151 ॥
अनुवाद-निर्लोम गङ्गादास और विष्णुदास महाप्रभुके
अन्य भक्त थे। ये सब भक्त महाप्रभुके साथ नीलाचलमें
रहे ॥ 151 ॥
काशीप्रवासी—(1) चन्द्रशेखर,
(2) तपनमिश्र, (3) श्रीरघुनाथ भट्ट :-
वाराणसी-मध्ये प्रभुर भक्त तिनजन।
चन्द्रशेखर वैद्य, आर मिश्र तपन ॥ 152 ॥
रघुनाथ भट्टाचार्य-मिश्रेर नन्दन।
प्रभु यबे काशी आइला देखि' वृन्दावन ॥ 153 ॥
चन्द्रशेखर-गृहे कैल दुइमास वास।
तपन-मिश्रेर घरे भिक्षा दुइ मास ॥ 154 ॥
अनुवाद-चन्द्रशेखर वैद्य, तपन मिश्र और उनके
पुत्र रघुनाथ भट्टाचार्य, वाराणसीमें महाप्रभुके ये तीन
भक्त थे। महाप्रभु वृन्दावनके दर्शनके पश्चात् जब
काशी आये थे, तब वे चन्द्रशेखरके घरमें दो महीने
तक रहे और उस कालमें वे तपन मिश्रके घर भिक्षा
(प्रसाद) ग्रहण करते थे ॥ 152-154 ॥
अनुभाष्य-'तपनमिश्र'-महाप्रभु जब (पूर्व) बङ्गाल
(वर्तमान बङ्गलादेश) में गये थे, तब इन्होंने उनसे
साधन और साध्यतत्त्वके विषयमें जिज्ञासा की और
महाप्रभुसे हरिनाम ग्रहण किया। बादमें महाप्रभुकी आज्ञासे
ये काशीमें वास करने लगे। महाप्रभुने काशीवासकालमें
इनके घर भिक्षा करना (प्रसाद सेवन) स्वीकार किया
था ॥ 152 ॥
श्रीरघुनाथ भट्टका विवरण :-
रघुनाथ बाल्ये कैल प्रभुर सेवन।
उच्छिष्ट-मार्जन आर पाद-सम्वाहन ॥ 155 ॥
बड़ हैले नीलाचले गेला प्रभुर स्थाने।
अष्टमास रहिल भिक्षा देन कोन दिने ॥ 156 ॥
प्रभुर आज्ञा पाञा वृन्दावनरे आइला।
आसिया श्रीरूप-गोसाञिर निकटे रहिला ॥ 157 ॥
ताँर स्थाने रूप-गोसाञि शुनेन भागवत।
प्रभुर कृपाय तें'हो कृष्णप्रेमे मत्त ॥ 158 ॥
अनुवाद-जब महाप्रभु तपन मिश्रके घरमें रहे थे,
तब रघुनाथ भट्ट छोटे बालक थे। उन्होंने महाप्रभुके
बर्तन माँजने और उनके पाद सम्वाहन करनेकी सेवा
की थी। बड़े होनेपर वे महाप्रभुके पास नीलाचल गये
और वहाँ आठ महीने रहे। इस समयमें वे कभी-कभी
92 | श्रीचैतन्यचरितामृत