श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 623, कुल 2549 में से
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(चैःचः मध्यलीला, 9/319-335 संख्या), बादमें नीलाचलमें
महाप्रभुके साथ मिलन (चैःचः मध्यलीला, 11/15
संख्या); राजा प्रतापरुद्रको महाप्रभुकी कृपा दिलवानेका
रायका यत्न (चैःचः मध्यलीला, 12/41-57 संख्या),
रथयात्राके दिन कीर्तनके अन्तमें सार्वभौमके साथ
जलकेलि (चैःचः मध्यलीला, 14/82 संख्या); महाप्रभुको
वृन्दावन जाने देनेकी अनिच्छा (चैःचः मध्यलीला,
16/10, 85 संख्या), अन्तमें महाप्रभुके अनुरोधसे बाध्य
होकर उनका अनुमोदन और कटक राजाके साथ
महाप्रभुका मिलन (चैःचः मध्यलीला, 16/105 संख्या);
रेमुणासे रायकी महाप्रभुको विदायी देना (चैःचः मध्यलीला,
16/153 संख्या); वृन्दावन नहीं जाकर महाप्रभुका गौड़देशसे
नीलाचल लौटनेपर रायके साथ मिलन (चैःचः मध्यलीला,
16/254 संख्या); श्रीरूपके साथ रसालोचना और श्रीरूपके
कवित्वकी प्रशंसा (चैःचः अन्त्यलीला, 1/115-196
संख्या); रामराय और श्रीसनातनमें वैराग्यकी समता
(चैःचः अन्त्यलीला, 1/201 संख्या); श्रीराधाकृष्ण-प्रेमरसपात्र
साढ़े तीन जनोंमें एक (चैःचः अन्त्यलीला, 2/106
संख्या); सनातन गोस्वामीके साथ मिलन (चैःचः
अन्त्यलीला, 4/110 संख्या); महाप्रभुके द्वारा प्रेरित
प्रद्युम्न मिश्रको श्रीकृष्णकथा सुनाना, महाप्रभुके द्वारा
रायकी प्रशंसा (चैःचः अन्त्यलीला, 5/4-85 संख्या)।
(चैःचः अन्त्यलीला, 5/9 संख्या)—
“सुबल यैछे पूर्वे कृष्णसुखेर सहाय।
गौरसुख-दानहेतु तैछे राम राय॥”
“सुबल जिस प्रकार पहले श्रीकृष्णके सुखमें सहायक
थे, वैसे ही रामराय गौरसुन्दरको सुख प्रदान करते थे।”
(चैःचः अन्त्यलीला, 7/36 संख्या)—
“कहने ना याय रायरामानन्देर प्रभाव।
राय-प्रसादे जानिलाम ब्रजेर शुद्धभाव॥”
“रायरामानन्दके प्रभावको मैं कह नहीं सकता,
उनकी कृपासे ही मैंने ब्रजके शुद्धभावको जाना है।”
(चैःचः अन्त्यलीला, 7/23 संख्या)—
“रामानन्दराय—कृष्णरसेर निदान।
तेंह जानाइल, कृष्ण स्वयं भगवान्॥”
“रामानन्दराय श्रीकृष्णरसको सम्पूर्ण रूपसे जाननेवाले
हैं, उन्होंने ही मुझे बतलाया है कि श्रीकृष्ण ही स्वयं
भगवान् हैं।”
शेषलीलामें रामराय और श्रीस्वरूपके निकट
श्रीकृष्णविरह-विलापमें रस-गीतका आस्वादन (चैःचः
अन्त्यलीला, चौदहसे बीस अध्याय द्रष्टव्य हैं)।
श्रीरामानन्दरायने ‘श्रीजगन्नाथ-वल्लभ’ नाटककी रचना
की थी॥134॥
(9) राजा प्रतापरुद्र, (10) कृष्णानन्द,
(11) परमानन्द महापात्र, (12) शिवानन्द :—
प्रतापरुद्र राजा, आर ओढ़
परमानन्द महापात्र, ओढ़
अनुवाद—राजा प्रतापरुद्र, उड़िया कृष्णानन्द, परमानन्द
महापात्र, और उड़िसावासी शिवानन्द महाप्रभुके कृपापात्र
हैं॥135॥
अनुभाष्य—‘प्रतापरुद्र’—ये गङ्गावंशीय (गजपति) उत्कल
सम्राट थे। कटक इनकी राजधानी थी। इन्हें महाप्रभुकी
गुणावलीको सुनकर उनके दर्शन और कृपा लाभ
करनेका लोभ हो गया, परन्तु महाप्रभु संन्यासी होनेके
कारण उनसे मिलना नहीं चाहते थे। राजाने दैन्यपूर्वक
उनकी अनेक प्रकारसे सेवा की। उनकी सेवा और
उत्कण्ठाको देखकर रामानन्दराय और सार्वभौमने उनकी
सहायता की। उनके कहनेपर इन्होंने राजवेशका त्यागकर
दीन व्यक्तिके वेशमें महाप्रभुके निकट जाकर उनकी
कृपा प्राप्त की। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 118वाँ श्लोक)—
“इन्द्रद्युम्नो महाराजो जगन्नाथार्चकः पुरा।
जातः प्रतापरुद्रः सन् सम् इन्द्रेण सोऽधुना॥118॥”
“पहले जो श्रीजगन्नाथके अर्चक महाराज इन्द्रद्युम्न
थे, उन्होंने ही इन्द्रके समान वैभवशाली होकर महाराज
प्रतापरुद्रके रूपमें जन्म ग्रहण किया है।” इनकी
दसवाँ अध्याय | 87