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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 617, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 617

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जब ये गङ्गामें स्नान करने गये, तो इनके चरणोंको
बहती हुई एक मृत देहने स्पर्श किया। इन्होंने उसे पुनः
जीवन प्रदानकर उसे अपना शिष्य बनाया। उनके
शिष्य 'ठाकुर मुरारि' के नामसे प्रसिद्ध हुए और उनकी
वंश-परम्परा अब भी 'शर्'-नामक ग्राममें वास करती
है। श्रीशार्ङ्गके नामके साथ मुरारिकी कथा जुड़नेके
कारण 'शार्ङ्ग-मुरारि' के नामसे प्रसिद्धि अभी तक भी
सुनी जाती है।
आज भी शार्ङ्गठाकुरकी एक प्राचीन सेवा मामगाछि
ग्राममें है। बादमें श्रीठाकुरके एक और मन्दिरका प्राचीन
बकुल वृक्षके सामने निर्माण किया गया है।
(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 172वाँ श्लोक)—
“व्रजे नान्दीमुखी यासीत् साद्य सारङ्गठक्कुरः।
प्रह्लादो मन्यते कैश्चिन्मत्पिता स न मन्यते॥ 172॥”
“व्रजकी नान्दीमुखी अब सारङ्ग ठाकुर हैं। कोई-कोई
महात्मा इन्हें प्रह्लाद कहते हैं, किन्तु मेरे पिता (श्रीशिवानन्द
सेन) ने इसे स्वीकार नहीं किया।”
'जगन्नाथ तीर्थ'—चैःचः आदिलीला 9/14 (अनुभाष्य)
द्रष्टव्य है।
'वाणीनाथ'—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 195 और 204
श्लोक)—
“वाणीनाथद्विजश्चम्पहट्टवासी प्रभोः प्रियः ॥ 204 ॥”
“चम्पाहट्ट निवासी द्विज वाणीनाथ महाप्रभुके अत्यन्त
प्रिय हैं। व्रजलीलामें ये कामलेखा हैं।” चम्पाहट्ट या
चाँपाहार्टि-वर्धमान जिलामें समुद्रगढ़के अन्तर्गत एक
छोटासा ग्राम है। इस प्राचीन श्रीपाटकी सेवामें अनियन्त्रित
व्यवस्था और अवहेलना देखकर बङ्गाब्द 1328 में
श्रीपरमानन्द ब्रह्मचारी (श्रीभक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुरके
शिष्य) और चैतन्य मठके सेवकोंने उसका संस्कारकर
वहाँ एक नये मन्दिरका निर्माण करवाया। अब वहाँ
श्रीवाणीनाथके द्वारा प्रतिष्ठित नयनाभिराम श्रीगौर-गदाधरके
विग्रहोंकी शास्त्रविधिके अनुसार अर्चा-पूजा हो रही
है ॥ 113-114 ॥
(81) गोविन्द, (82) माधव, (83) वासुदेव :—
गोविन्द, माधव, वासुदेव-तिन भाइ।
याँ-सबार कीर्त्तने नाचे चैतन्य-निताइ ॥ 115 ॥
अनुवाद—गोविन्द, माधव और वासुदेव-ये तीन
भाई वृक्षकी एक और शाखा थे। इनके कीर्त्तनमें
महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु नृत्य करते थे॥115॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'गोविन्द'—अग्रद्वीपमें श्रीगोपीनाथके
स्थापक ॥ 115 ॥
अनुभाष्य—'गोविन्द, माधव और वासुदेव घोष'—इन
तीनों भाइयोंका जन्म उत्तर-राढ़ीय कायस्थकुलमें हुआ
था। (चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय)—
“सुकृति माधवघोष कीर्त्तने तत्पर।
हेन कीर्त्तनीया नाहि पृथिवी-भितर ॥ 257 ॥
याहारे कहेन वृन्दावनर गायन।
नित्यानन्दस्वरूपेर महाप्रियतम ॥ 258 ॥
माधव, गोविन्द, वासुदेव-तिन भाइ।
गाइते लागिला, नाचे ईश्वर निताई ॥ 259 ॥”
“सुकृतिवान् माधव घोष कीर्त्तन करनेमें तत्पर हो
गये। पृथ्वीपर उनके समान कीर्त्तनीया और कोई नहीं
था। उन्हें वृन्दावनके वैभवका गायक कहा जाता था
और वे श्रीनित्यानन्द प्रभुके अतिशय प्रिय थे। जब ये
तीनों भाई मिलकर गान करते थे, तो महाप्रभु और
श्रीनित्यानन्द प्रभु भावावेशमें नृत्य करते थे।”
(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 188वाँ श्लोक)—
“कलावती', 'रसोल्लासा', 'गुणतुङ्गा' व्रजे स्थिता।
श्रीविशाखाकृतं गीतं गायन्ति स्माद्य ता मताः।
गोविन्द-माधवानन्द-वासुदेवा यथाक्रमम् ॥ 188 ॥”
“कलावती, रसोल्लासा और गुणतुङ्गा नामक जो
सखियाँ व्रजमें विशाखा सखीके द्वारा रचित गीतोंको
गाया करती थीं, अब वे यथाक्रमसे गोविन्द, माधवानन्द
और वासुदेव हैं।” श्रीक्षेत्रमें रथको ले जाते समय
महाप्रभुके साथ सात कीर्त्तन सम्प्रदायोंमेंसे एक सम्प्रदायमें
ये तीनों भाई मूल गायक थे और उन्हें साक्षात्
दसवौँ अध्याय | 81