श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 1/188–190 पहला अध्याय 37
अनुभाष्य—
रजोभरः (रजसां गोक्षुरोत्थधूलीनां भरः पुञ्जः समूहः) हरिम्
उद्दिशते (सूचयति), तमः (अन्धकारः) पुरतः अमुं (कृष्णं)
सङ्गमयति (संयोजयति, अतः) व्रजवामदृशां (व्रजाङ्गनानां)
पद्धतिः (रीतिः) सर्वदृशः (सर्वज्ञायाः) श्रुतेः (वेदस्य) अपि
प्रकटा च न (गोचरा न स्यात्)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें।
त्रिगुण-विषयक वेदोंमें गुणातीत कृष्णका निर्देश
और मिलनकी कथा अव्यक्त है। रजोगुणके द्वारा इस
माया जगत्में फेंक दिये जानेके कारण कृष्णविमुख
बद्धजीवोंका कृष्णके विषयमें कोई ज्ञान नहीं होता और
तमोगुणके द्वारा आवरणके कारण उनका कृष्णसे
मिलनका अभाव होता है। किन्तु अप्राकृत वृन्दावनमें
गैयाओंके खुरोंसे उठी धूलिके द्वारा नित्यमुक्ता गोपियोंके
निकट कृष्णका आगमन सूचित होता है एवं तमः
अथवा अन्धकारके द्वारा नित्यमुक्ता गोपियोंका कृष्णसे
सङ्गम सम्पादित होता है। इसलिये शुद्धसत्त्व गोपियाँ
और शुद्धसत्त्व श्रीवृन्दावन, दोनों ही त्रिगुणात्मक वेदोंके
अगोचर हैं,—यही श्लोकका अर्थ है ॥ 188 ॥
वहाँ मुरलीका भ्रमण जैसे :-
ललितमाधव (1/24)में पौर्णमासीके प्रति गार्गीकी उक्ति—
हियमवगृह्य गृहेभ्यः कर्षति राधां वनाय या निपुणा।
सा जयति निसृष्टार्था वरवंशजकाकली दूती ॥ 189 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 189 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—निपुणा, विशेष कार्य-प्राप्त,
श्रेष्ठवंशमें उत्पन्न-वंशीकी मधुर-ध्वनिरूपी दूती जो
श्रीराधाकी लज्जा दूर करवाकर उन्हें उनके गृहसे
वनकी ओर आकर्षित करती है, वह जययुक्त हो ॥ 189 ॥
अनुभाष्य—
या हियं (लज्जाम्) अवगृह्य (विहत्य, हत्वा इत्यर्थः)
गृहेभ्यः वनाय (वनगमन-निमित्ताय इत्यर्थः) राधां कर्षति सा
निपुणा (दक्षा) निसृष्टार्था (विन्यस्त-कर्मभारा) वरवंशजकाकली
(वंशीध्वनिरूपा) दूती जयति (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तते)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें।
निसृष्टार्था,—(उःनीः दूतीभेद प्रकरणमें 7/57 श्लोक)—
“विन्यस्तकार्यभारा स्याद्द्वयोरेकतरेण या।
युक्त्योभौ घटयेदेषा निसृष्टार्था निगद्यते।”
[अर्थात् “नायक अथवा नायिकाके द्वारा किसी
विशेष कार्यका भार प्राप्त होनेपर युक्ति और विचारके
द्वारा दोनोंका मिलन करवानेवाली दूतीको निसृष्टार्था-दूती
कहते हैं।”] ॥ 189 ॥
वहाँ श्रीकृष्ण जैसे :-
ललितमाधव (2/11)में श्रीकृष्णके दर्शनसे
सखीके प्रति श्रीराधाकी उक्ति—
सहचरि निरातङ्कः कोऽयं युवा मुदिरद्युति-
र्व्रजभुवि कुतः प्राप्तो माद्यन्मतङ्गजविभ्रमः।
अहह चटुलैरुत्सर्पद्भिर्दृगञ्चलतस्करै-
र्मम धृतिधनं चेतःकोषाद्विलुण्ठयतीह यः ॥ 190 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 190 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे सहचरि, नवमेघ-कान्तियुक्त,
मदमत्त हाथीकी भाँति लीलाकारी, आशङ्का-रहित यह
युवक कौन है? यह कहाँसे [व्रजभूमिमें] आया है?
आहा, यह चञ्चल गतिके द्वारा और चोरकी भाँति
दृष्टिके द्वारा मेरे हृदयके भण्डारसे चित्तके धैर्यरूपी
धनको लूट रहा है ॥ 190 ॥
अनुभाष्य—
हे सहचरि, अहह इह (वृन्दाविपिने) यः युवा चटुलैः
(चपलैः) उत्सर्पद्भिः (सर्वादिक्षु भ्रमद्भिः) दृगञ्चलतस्करैः
(नयनकटाक्षचौरैः) मम चेतःकोषात् (हृद्-भाण्डारतः) धृतिधनं
(धैर्यरूप-धनं) विलुण्ठयति, मुदिरद्युतिः (मुदिरस्य मेघस्य
द्युतिरिव द्युतिः यस्य सः नवमेघरुचिः) माद्यन्मतङ्गजविभ्रमः
(माद्यन् यः मतङ्गजः तद्वत् विभ्रमः विलासः यस्य सः
महामत्तगजवच्चञ्चलः) निरातङ्कः (निःशङ्कः) अयं युवा कः?
कुतः [च] व्रजभुवि प्राप्तः (समायातः)?
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 190 ॥
38 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/191-197 ]
वहाँ श्रीराधा जैसे :-
ललितमाधव (2/10)में श्रीराधाके
दर्शनसे श्रीकृष्णकी उक्ति-
विहारसुरदीर्घिका मम मनःकरीन्द्रस्य या
विलोचन-चकोरयोः शरदमन्दचन्द्रप्रभा।
उरोऽम्बरतटस्य चाभरणचारुतारावली
मयोन्नतमनोरथैरियमलम्भि सा राधिका॥ 191 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 191 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जो राधिका-मेरे मनरूपी हस्तिके
लिये विहारगङ्गा स्वरूपा है, मेरे चक्षुरूपी चकोरके लिये
शारदीय पूर्णचन्द्रकी अतिशय प्रभास्वरूपा है एवं मेरे
वक्षःस्थलरूपी आकाशके आभूषण-स्वरूप सुन्दर तारावलीकी
भाँति है, आज मैंने उस राधिकाको उन्नत मनोरथके
साथ [बहुत दिनोंकी अभिलाषाके बाद] प्राप्त किया॥ 191 ॥
अनुभाष्य-
या (राधा) मम मनःकरीन्द्रस्य (हृदय-मातङ्गस्य) विहार-
सुरदीर्घिका (स्वर्गङ्गा), या विलोचनचकोरयोः (विलोचने नयने
एव चकोरौ तयोः) शरदमन्दचन्द्रप्रभा (शरदि अमन्दः पूर्णः यः
चन्द्रः तस्य प्रभा), या उरोऽम्बरतटस्य (उरः वक्षः एव अम्बरं
आकाशं तस्य तटे क्षेत्रे) च आभरणचारुतारावली (आभूषणेषु
अलङ्कारेषु चारुतारावली सुन्दरनक्षत्रमण्डली) च, सा इयं
राधिका मया (कृष्णेन) उन्नतमनोरथैः (बहुदिन-मनोवाञ्छितैः
हेतुभूतैः) साम्प्रतम् अलम्भि (प्राप्तवती)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 191 ॥
श्रीरायके द्वारा सहस्त्र मुखोंसे श्रीरूपके
कवित्वकी सतत-प्रशंसा :-
एत शुनि' राय कहे प्रभुर चरणे।
रूपेर कवित्व प्रशिंसे' सहस्र-वदने॥ 192 ॥
“कवित्व ना हय एइ अमृतेर धार।
नाटक-लक्षण सब, सिद्धान्तेर सार ॥ 193 ॥
प्रेम-परिपाटी एइ अद्भुत वर्णन।
शुनि' चित्त-कर्णेर हय आनन्द-घूर्णन ॥ 194 ॥
अनुवाद-यह सुननेके बाद श्रीरायरामानन्द महाप्रभुके
चरणोंमें निवेदन करते हुए श्रीरूपके कवित्वकी मानो
सैंकड़ों मुखोंसे प्रशंसा करते हुए कहने लगे,-“रूपका
कवित्व कवित्व नहीं, अपितु अमृतकी धारा है।
नाटकके समस्त लक्षण सिद्धान्तके सार स्वरूप हैं।
प्रेमकी परिपाटीका ऐसा अद्भुत वर्णन है, जिसे सुनकर
मन और कर्ण आनन्दसे घूमने लगते हैं॥ 192-194 ॥
(प्राचीनकृत श्लोक)-
किं काव्येन कवेस्तस्य किं काण्डेन धनुष्मतः।
परस्य हृदये लग्नः न घूर्णयति यच्छिरः ॥ 195 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 195 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-अन्योंके हृदयको बींधकर यदि
उसके सिरको ही चञ्चल नहीं कर पाये अर्थात् उसके
सिरको ही नहीं घुमा पाये, तब कविके काव्यसे और
धनुर्धारीके बाणसे क्या प्रयोजन ?195 ॥
प्रथम अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य-
तस्य कवेः काव्येन (रसात्मक-वाक्येन) किम्? धनुष्मतः
(धनुर्धरेण) काण्डेन (बाणेन) किं (प्रयोजनम्)?-यत् काव्यं
काण्डञ्च परस्य हृदये लग्नं सत्, तस्य शिरः न घूर्णयति?
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 195 ॥
श्रीरूपके प्रति महाप्रभुकी कृपाका अनुमान :-
तोमार शक्ति बिना जीवेर नहे एइ वाणी।
तुमि शक्ति दिया कहाओ,-हेन अनुमानि ॥”196 ॥
अनुवाद-आपकी कृपाके बिना ऐसा कवित्व
किसी भी जीवके द्वारा सम्भव नहीं है। मेरा ऐसा
अनुमान है कि आप ही शक्ति प्रदान करके रूपके
द्वारा यह सब कुछ कहलवा रहे हैं॥”196 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपके कवित्वकी प्रशंसा :-
प्रभु कहे,-“प्रयागे आमा-सने हइल मिलन।
इहार गुणे इहाते आमार तुष्ट हैल मन ॥ 197 ॥
[ 1/197–204 पहला अध्याय 39
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“प्रयागमें रूपकी मुझसे
भेंट हुई थी। इसके गुणोंके कारण मेरा मन इसके प्रति
सन्तुष्ट हो गया था॥197॥
मधुर प्रसङ्ग इहार काव्य सालङ्कार।
ऐछे कवित्व बिना नहे रसेर प्रचार॥198॥
अनुवाद—रूपके काव्यका प्रसङ्ग अत्यन्त मधुर है
और यह समस्त प्रकारके अलङ्कारोंसे विभूषित है। ऐसे
कवित्वके बिना रसका प्रचार नहीं हो सकता॥198॥
स्वयं महाप्रभुके द्वारा परमस्नेह-कृपाभाजन
श्रीरूपके प्रति भक्तोंकी कृपाकी याचना :–
सबे कृपा करि' इँहारे देह' एइ वर।
व्रजलीला-प्रेमरस येन वर्णे निरन्तर॥199॥
अनुवाद—[महाप्रभुने अपने सभी भक्तोंसे कहा—]
आप सभी कृपा करके इसे यही वर प्रदान करें कि
यह निरन्तर व्रजलीला-प्रेमरसका ही वर्णन करे॥199॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनकी प्रशंसा और
वैराग्ययुक्त प्रेमभक्ति-सिद्धान्तरस-पाण्डित्यके
विषयमें उन्हें श्रीरायके समान मानना :–
इँहार ये ज्येष्ठभ्राता, नाम—‘सनातन’।
पृथिवीते विज्ञवर नाहि ताँर सम॥200॥
अनुवाद—इसके ज्येष्ठ भ्राता जिनका नाम 'सनातन'
है, जगत्में उनके समान सुशिक्षित विद्वान अन्य कोई
नहीं है॥200॥
तोमार यैछे विषयत्याग, तैछे ताँर रीति।
दैन्य-वैराग्य-पाण्डित्ये ताँहातेइ स्थिति॥201॥
अनुवाद—जिस प्रकारसे आपने विषयोंका त्याग
किया है, उन्होंने भी वैसा ही किया है। दैन्य, वैराग्य
और पाण्डित्यकी उनमें ही स्थिति है॥201॥
अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभुने श्रीरामानन्द रायसे कहा,—
तुम समस्त विषय परित्याग करके जिस प्रकारसे
एकान्तिक कृष्णसेवा कर रहे हो, सनातन-गोस्वामी भी
ठीक तुम्हारी ही भाँति कृष्णके अतिरिक्त अन्य
विषयोंको छोड़कर प्रतिक्षण उसी प्रकार 'तृणादपि
सुनीच' अर्थात् निष्किञ्चन भावसे युक्त और कृष्णसे
भिन्न भोगोंका वर्जन अर्थात् कृष्णसे भिन्न विषयोंके
बन्धनसे मुक्त होकर, कृष्णसेवारूपी विषय ग्रहण करके
पराभक्तिकी विद्यामें पारङ्गत हैं। निष्कपट दैन्य, वैराग्य
और पाण्डित्यके आदर्श विग्रह सनातन शुद्ध अर्थात्
युक्त-वैराग्य और प्रेमभक्तिसिद्धान्त-रस-पाण्डित्य आदिमें
ठीक तुम्हारी ही भाँति कुशल और पारदर्शी हैं॥201॥
श्रीरूप-सनातनमें शक्ति सञ्चार करके
व्रजमें भेजनेका वर्णन :–
एइ दुइ भाइये आमि पाठाइलूँ वृन्दावने।
शक्ति दिया भक्तिशास्त्र करिते प्रवर्त्तने॥”202॥
अनुवाद—मैंने इन दोनों भाइयोंको शक्ति प्रदान
करके भक्ति शास्त्रका प्रवर्त्तन करनेके लिये वृन्दावन
भेजा था॥”202॥
श्रीरायके द्वारा महाप्रभुको प्रयोजक-कर्त्ता
मानकर उनकी स्तुति :–
राय कहे,—“ईश्वर तुमि ये चाह करिते।
काठेर पुतली तुमि पार नाचाइते॥203॥
अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“आप ईश्वर
हैं जो चाहे कर सकते हैं। आप तो काठकी पुतली
तकको भी नचा सकते हैं॥203॥
श्रीरायके कीर्तनमें और श्रीरूपके लिखनेमें
एक ही प्रेम-भक्तिरसका प्रचार :–
मोर मुखे ये-सब रस करिला प्रचारणे।
सेइ रस देखि एइ इहार लिखने॥204॥
अनुवाद—आपने मेरे मुखसे जिस रसको प्रकाशित
कराया था, वही रस मैं इसकी (रूपकी) लेखनीमें देख
रहा हूँ॥204॥
40 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/205-213 ]
महाप्रभु अपनी इच्छाके द्वारा चालित भक्तके द्वारा अप्राकृत
व्रजरसके माहात्म्यका प्रचार करनेवाले :-
भक्ते कृपा-हेतु प्रकाशिते चाह व्रज-रस।
यारे कराओ, सेइ करिबे जगत् तोमार वश॥"205॥
अनुवाद-भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही आप
व्रज-रसको प्रकाशित करवाना चाहते हैं। आप जिसके
द्वारा करवायेंगे, वही करेगा, क्योंकि समस्त जगत् ही
आपके वशमें है॥"205॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपको आलिङ्गन, श्रीरूपके
द्वारा भक्तोंके चरणोंकी वन्दना :-
तबे महाप्रभु कैला रूपे आलिङ्गन।
ताँरे कराइला सबार चरण-वन्दन॥206॥
अनुवाद-तब महाप्रभुने श्रीरूपका आलिङ्गन किया
और उन्होंने श्रीरूपसे सभी भक्तोंके चरणोंकी वन्दना
करवायी॥206॥
श्रीनित्यानन्द-अद्वैतादि सभीके
द्वारा श्रीरूपको आलिङ्गन :-
अद्वैत-नित्यानन्दादि सब भक्तगण।
कृपा करि' रूपे सबे कैला आलिङ्गन॥207॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द आदि
सभी भक्तोंने श्रीरूपको आलिङ्गन करके उनके ऊपर
कृपाका वर्षण किया॥207॥
श्रीरूपके प्रति महाप्रभुकी कृपा और श्रीरूपके
कृष्णाकर्षक गुण-दर्शनसे सभीको विस्मय :-
प्रभु-कृपा रूपे, आर रूपेर सद्गुण।
देखि' चमत्कार हैल सबाकार मन॥208॥
अनुवाद-महाप्रभुकी श्रीरूपके प्रति कृपा तथा
श्रीरूपके सद्गुण-इन्हें देखकर सभी भक्तोंके मनमें बड़ा
आश्चर्य हुआ॥208॥
श्रीरूपका ठाकुर-श्रीहरिदासके द्वारा आलिङ्गन :-
तबे महाप्रभु सब भक्त लञा गेला।
हरिदास-ठाकुर रूपे आलिङ्गन कैला॥209॥
अनुवाद-तब महाप्रभु अपने समस्त भक्तोंको
अपने साथ लेकर चले गये। श्रीहरिदास ठाकुरने भी
श्रीरूपको आलिङ्गन किया॥209॥
श्रीहरिदासके द्वारा श्रीरूपके सौभाग्यकी प्रशंसा :-
हरिदास कहे,-"तोमार भाग्येरे नाहि सीमा।
ये-सब वर्णिला, इहार के जाने महिमा?"210॥
अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,-"तुम्हारे
सौभाग्यकी सीमा नहीं है। तुमने जो सब वर्णन किया
है, उसकी महिमाको कौन जान सकता है?"210॥
श्रीरूपके द्वारा दैन्यज्ञापन, स्वयंको
यन्त्री-महाप्रभुका यन्त्र मानना :-
श्रीरूप कहेन,-"आमि किछुइ ना जानि।
येइ महाप्रभु कहान, सेइ कहि वाणी॥"211॥
अनुवाद-श्रीरूप गोस्वामीने कहा,-"मैं कुछ भी
नहीं जानता हूँ। महाप्रभु मुझसे जो कहलवाते हैं, मैं
वही कहता हूँ॥"211॥
भःरःसिः (1/1/2) में-
हृदि यस्य प्रेरणया प्रवर्त्तितोऽहं वराकरूपोऽपि।
तस्य हरेः पदकमलं वन्दे चैतन्यदेवस्य॥212॥
अनुवाद-हृदयमें जिनकी प्रेरणाके द्वारा सामान्य
कङ्गालरूपी मैं भक्तिग्रन्थकी रचनामें प्रवृत्त हुआ हूँ, उन
श्रीचैतन्यदेव हरिके चरणकमलोंकी मैं वन्दना करता
हूँ॥212॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 19/134 संख्या देखें॥212॥
श्रीरूप और श्रीहरिदासका कृष्णकथा-आलाप :-
एइमत दुइजन कृष्णकथारङ्गे।
सुखे काल गोङाय रूप हरिदास-सङ्गे॥213॥
[ 1/213-222 पहला अध्याय 41
अनुवाद—इस प्रकार दोनों कृष्णकथाके आनन्दमें
निमग्न हो रहे थे। श्रीरूपने श्रीहरिदासके साथ सुखपूर्वक
समयको व्यतीत किया ॥ 213 ॥
चातुर्मास्यके अन्तमें गौड़से आये
भक्तोंका गौड़में लौटना :—
चारि मास रहि' सब प्रभुर भक्तगण।
गोसाञि विदाय दिला, गौड़े करिला गमन ॥ 214 ॥
अनुवाद—गौड़देशसे आये महाप्रभुके भक्त चार
मास तक जगन्नाथपुरीमें रहे। तब महाप्रभुने उन्हें विदायी
दी और वे सभी गौड़देशमें लौट गये ॥ 214 ॥
दोलयात्रा तक श्रीरूपका महाप्रभुके
चरणकमलोंमें अवस्थान :—
श्रीरूप प्रभुपदे नीलाद्रि रहिला।
दोलयात्रा प्रभुसङ्गे आनन्दे देखिला ॥ 215 ॥
अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामी महाप्रभुके चरणकमलोंमें
नीलाद्रिमें (श्रीजगन्नाथ पुरीमें) ही रहे और उन्होंने
आनन्दपूर्वक महाप्रभुके साथ दोलयात्राके दर्शन किये ॥ 215 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपमें शक्तिसञ्चार :—
दोलयात्रा रहि' प्रभु रूपे आज्ञा दिला।
अनेक प्रसाद करि' शक्ति सञ्चारिला ॥ 216 ॥
वृन्दावनमें जाकर श्रीसनातनको पुरी भेजनेकी आज्ञा :—
“वृन्दावने याह' तुमि, रहिह वृन्दावने।
एकबार इँहा पाठाइह सनातने ॥ 217 ॥
वृन्दावनमें चार प्रकारकी सेवाका कार्यभार प्रदान—
(1) भक्तिरसशास्त्रकी रचना, (2) लुप्ततीर्थोंका उद्धार,
(3) श्रीविग्रह और मन्दिरमें सेवाका संस्थापन और
(4) अप्राकृत-भक्ति-रसप्रचार :—
व्रजे याइ' रसशास्त्र करिह निरूपण।
लुप्त-तीर्थ सब ताँहा करिह प्रचारण ॥ 218 ॥
कृष्णसेवा, रसभक्ति करिह प्रचार।
आमिह देखिते ताहा याइमु एकबार ॥ "219 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने दोलयात्राके समाप्त हो जानेपर
श्रीरूपपर अनेक प्रकारसे कृपा करके उनमें शक्तिका
सञ्चार किया और उन्हें आज्ञा दी,—“तुम वृन्दावनमें
जाओ और वृन्दावनमें ही रहना। सनातनको एकबार
यहाँ जगन्नाथपुरीमें भेजना। व्रजमें जाकर रसशास्त्रोंका
निरूपण करना। वहाँके समस्त लुप्त-तीर्थोंको प्रकाशित
करना। कृष्णविग्रह-सेवा और रसभक्तिका प्रचार करना।
मैं भी एकबार वृन्दावनका दर्शन करने
जाऊँगा ॥ ”216-219 ॥
अनुभाष्य—महाप्रभुका पुनः वृन्दावन गमन नहीं
सुना जाता ॥ 219 ॥
पहले अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
महाप्रभुका आलिङ्गन, श्रीरूपका प्रणाम :—
एत बलि' प्रभु ताँरे कैला आलिङ्गन।
रूप-गोसाञि शिरे धरे प्रभुर चरण ॥ 220 ॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने श्रीरूपका आलिङ्गन
किया। श्रीरूप गोस्वामीने महाप्रभुके चरणकमलोंको
अपने सिरपर धारण किया ॥ 220 ॥
गौड़देशसे होते हुए श्रीरूपका व्रजमें आगमन :—
प्रभुर भक्तगण-पाशे विदाय लइया।
पुनरपि गौड़पथे वृन्दावने आइला ॥ 221 ॥
अनुवाद—श्रीरूपने महाप्रभुके समस्त भक्तोंसे विदायी
ली और पुनः गौड़देशसे होते हुए वृन्दावन आ
गये ॥ 221 ॥
महाप्रभु-रूप-मिलन-संवादके श्रवणसे अचैतन्य
जीवको श्रीचैतन्य-चरणकमलोंकी प्राप्ति :—
एइ त' कहिलाङ पुनः रूपेर मिलन।
इहा येइ सुने, पाय चैतन्यचरण ॥ 222 ॥
अनुवाद—इस प्रकार मैंने (ग्रन्थकार श्रीकृष्णदास
कविराज गोस्वामीने) महाप्रभुके साथ श्रीरूपके पुनः
42 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/222-223 ]
मिलनका वर्णन किया। जो कोई भी इस प्रसङ्गका अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
श्रवण करता है, उसे श्रीचैतन्यदेवके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
प्राप्ति होती है॥ 222 ॥ वर्णन कर रहा है॥ 223 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 223 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे पुनः श्रीरूपसङ्गोत्सवो श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें पुनः श्रीरूपसङ्गोत्सव
नाम प्रथमः परिच्छेदः। नामक पहले अध्यायका अनुवाद समाप्त।
दूसरा अध्याय
[बायाँ स्तम्भ]
**कथासार—**महाप्रभुका साक्षात्-दर्शन, आवेश और
आविर्भाव जिस-जिस स्थानपर हुआ था, उसका विवरण
बतलाते हुए ग्रन्थकारने नकुल ब्रह्मचारीकी कथा,
नृसिंहानन्दकी महिमा तथा अन्यान्य भक्तोंकी कथाको
लिखा है। भगवान्-आचार्यकी महाप्रभुके प्रति निष्ठा
होनेपर भी श्रील स्वरूप-दामोदरने भगवान्के भाई
गोपाल-भट्टाचार्यके मुखसे मायावादभाष्यको सुननेके लिये
उन्हें निषेध किया। उसके बाद छोटे-हरिदासके द्वारा
भगवान्-आचार्यकी आज्ञासे माधवी देवीके पास जाकर
चावलकी भिक्षा करनेपर महाप्रभुने उन्हें वैरागीके स्त्रीसे
वार्तालापके दोषके कारण (अपने वासस्थानके द्वारमें
प्रवेश करनेके लिये) निषेध किया और वैष्णवोंके
अनुरोध करनेपर भी उन्हें पुनः ग्रहण नहीं किया। एक
वर्षके बाद छोटे-हरिदासने प्रयाग-त्रिवेणीमें डूबकर प्राण
त्याग करनेके बाद अप्राकृत देहसे महाप्रभुको गान
सुनाया। गौड़ीय वैष्णवोंके द्वारा आकर इस संवादको
कहनेपर श्रीस्वरूपादि सभी इससे अवगत हुए।
—(अमृतप्रवाह भाष्य)
छह रूपोंमें विलास करनेवाले आवरण (पार्षद) सहित
श्रीकृष्णचैतन्य-महाप्रभुको और सेवारत प्रेष्ठ सखियोंसे
परिवेष्टित श्रीराधाकृष्णको प्रणाम :—
वन्देऽहं श्रीगुरोः श्रीयुत-पदकमलं श्रीगुरून् वैष्णवांश्च
श्रीरूपं साग्रजातं सहगण-रघुनाथान्वितं तं सजीवम्।
साद्वैतं सावधूतं परिजनसहितं कृष्णचैतन्य-देवं
श्रीराधा-कृष्णपादान् सहगण-ललिता-श्रीविशाखान्वितांश्च॥1॥
**अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥
**अमृतप्रवाह भाष्य—**मैं श्रीगुरुके चरणकमलों एवं
समस्त गुरुओं, समस्त वैष्णवों, श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन
[दायाँ स्तम्भ]
गोस्वामी, गणोंसहित श्रीरघुनाथदास गोस्वामी और श्रीजीव
गोस्वामी, श्रीअद्वैतप्रभु, श्रीनित्यानन्दप्रभु एवं परिजन
सहित श्रीकृष्णचैतन्यदेव, गणोंसहित श्रीललिता-विशाखा
आदिसे युक्त श्रीराधाकृष्णकी वन्दना करता हूँ॥1॥
अनुभाष्य—
अहं श्रीगुरोः (मन्त्रदीक्षागुरोः भजनशिक्षागुरोः वा) श्रीयुतपदकमलं
(श्रीमच्चरणसरोजं) श्रीगुरून् (परम्परात्पर-प्रभृति-गुरुगणान्
श्रीमदानन्दतीर्थ-श्रीमन्माधवेन्द्रपुरी-प्रमुख गुरुवर्गान्) वैष्णवान्
(चतुर्युगोद्भूतान् भागवतान्) च; साग्रजातं (अग्रेजेन श्रीमता
गोस्वामिना सनातनेन सह वर्तमान), सहगणरघुनाथान्वितं (स्वभक्तैः
सह रूपानुगेन श्रीरघुनाथेन दास-गोस्वामिना च सह सहितं)
सजीवं (निजानुकम्पितेन रूपानुगेन श्रीजीवगोस्वामिना सह विद्यमानं)
तं श्रीरूपं, साद्वैतं (अद्वैतप्रभुसहितं) सावधूतं (नित्यानन्दप्रभूसमन्वितं)
परिजनसहितं (सावरण-पार्षदं) कृष्णचैतन्यदेवं (महाप्रभुं);
सहगणललिता-श्रीविशाखान्वितान् (गणेन सखिमञ्जरीभिः सह
वर्त्तमानाभ्यां ललिताविशाखाभ्याम् अन्वितान् युक्तान्)
श्रीराधाकृष्णपादान् च वन्दे।
**श्लोक-भावानुवाद—**मैं श्रीगुरु (मन्त्र-दीक्षागुरु और
भजन-शिक्षागुरुओं) के चरणकमलों एवं समस्त गुरुओं
(परम-परात्पर आदि गुरुवर्ग, श्रीमत् आनन्दतीर्थ-
श्रीमन्माधवेन्द्रपुरी प्रमुख गुरुओं), समस्त वैष्णवों (चतुर्युगोंमें
प्रकटित भागवतों); अग्रज श्रीसनातन गोस्वामी सहित,
निजभक्तोंसहित और श्रीरूपानुग श्रीरघुनाथदास गोस्वामी
एवं निज-अनुकम्पा-पात्र रूपानुग श्रीजीव गोस्वामी
सहित उन श्रीरूप गोस्वामी; श्रीअद्वैतप्रभु, श्रीनित्यानन्दप्रभु
एवं परिजन (आवरण-पार्षद) सहित श्रीकृष्णचैतन्यदेव
(महाप्रभु); गणोंसहित (सखी-मञ्जरी सहित) श्रीललिता-
विशाखा आदिसे युक्त श्रीराधाकृष्णके चरणकमलोंकी
वन्दना करता हूँ॥1॥
जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥2॥
44 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/2-10 ]
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो।
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो
और श्रीगौरभक्तोंकी जय हो ॥ २॥
तीन प्रकारसे महाप्रभुके द्वारा जीवोंका उद्धार :-
सर्वलोक उद्धारिते गौर-अवतार।
निस्तारेर हेतु तांर त्रिविध प्रकार॥ ३॥
अनुवाद—सभी लोगोंका उद्धार करनेके लिये ही
श्रीगौर-अवतार हुआ है। उन्होंने उनका उद्धार तीन
प्रकारसे किया॥ ३॥
(1) साक्षात्-दर्शन, (2) योग्य जीवमें आवेश
और (3) आविर्भाव :-
साक्षात्-दर्शन, आर योग्यभक्त-जीवे।
‘आवेश’ करये काँहा हञा ‘आविर्भावे’ ॥ 4 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहीं साक्षात्-दर्शन देकर जीवोंका
उद्धार किया। कहीं योग्यभक्त-जीवमें ‘आवेश’रूपसे
और कहीं ‘आविर्भाव’रूपसे जीवोंका उद्धार किया॥ 4॥
अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुने जीवोंको साक्षात् दर्शन
देकर, किसी योग्यभक्त-जीवमें आविष्ट होकर और
किसी भक्तजीवके समक्ष आविर्भूत होकर जीवोंका
उद्धार किया ॥ 3-4 ॥
तीन प्रकारके प्राकट्यका वर्णन :-
‘साक्षात्-दर्शने’ प्राय सब निस्तारिला।
नकुल-ब्रह्मचारीर देहे ‘आविष्ट’ हइला॥ 5 ॥
ईश्वरका स्वभाव :-
प्रद्युम्न-नृसिंहानन्द आगे कैला ‘आविर्भाव’।
‘लोक निस्तारिब’,—एइ ईश्वर-स्वभाव॥ 6 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने प्रायः सभीका तो साक्षात्-दर्शन
देकर ही उद्धार किया था। एक बार महाप्रभुने श्रीनकुल
ब्रह्मचारीकी देहमें ‘आविष्ट’ होकर उनके देहके विकारोंको
देखनेके लिये आये गौड़भक्तोंका उद्धार किया था।
महाप्रभु श्रीप्रद्युम्नके (श्रीनृसिंहानन्दके) समक्ष स्वयं
आविर्भूत हुए और उन्होंने अनेक लोगोंका उद्धार
किया। ईश्वरका स्वभाव ही जीवोंका उद्धार करना
है॥ 5-6॥
अनुभाष्य—‘साक्षात् दर्शन’ प्रदान करके, नकुल-
ब्रह्मचारीकी देहमें ‘आविष्ट’ होकर और प्रद्युम्न अथवा
नृसिंहानन्द-ब्रह्मचारीके सम्मुख ‘आविर्भूत’ होकर महाप्रभुने
लोगोंका उद्धार किया। (1) श्रीशचीके गृहमन्दिरमें,
(2) श्रीनित्यानन्द प्रभुके नर्त्तनस्थलपर, (3) श्रीवास-अङ्गनमें
कीर्त्तनस्थलपर एवं (4) श्रीराघवके भवनमें,—इन चार
स्थानोंपर महाप्रभु नित्य ‘आविर्भाव’ प्रकटित करते थे
(इसी अध्यायकी 34 संख्या देखें)॥ 5-6॥
तीन प्रकारके प्राकट्योंके फलका वर्णन;
महाप्रभुके ‘साक्षात्-दर्शन’का फल :-
साक्षात्-दर्शने सब जगत् तारिला।
एकबार ये देखिला, से कृतार्थ हइला॥ 7 ॥
अनुवाद—साक्षात्-दर्शन देकर महाप्रभुने समस्त
जगत्का उद्धार किया। एकबार भी जिसने उनका
दर्शन किया, वह कृतार्थ हो गया॥ 7॥
गौड़-देशेर भक्तगण प्रत्यब्द आसिया।
पुनः गौड़देशे याय प्रभुरे मिलिया॥ 8 ॥
अनुवाद—गौड़-देशके भक्तगण प्रत्येक वर्ष नीलाचल
आते थे। महाप्रभुसे मिलकर वे पुनः गौड़देशमें लौट
जाते थे॥ 8॥
आर नाना-देशेर लोक देखि’ जगन्नाथ।
चैतन्य-चरण देखि’ हइल कृतार्थ॥ 9 ॥
अनुवाद—अन्य देशोंके लोग भी श्रीजगन्नाथके
दर्शन करने आते थे और पुरीमें आकर श्रीचैतन्य
महाप्रभुके चरणोंका दर्शन करके कृतार्थ हो जाते
थे॥ 9॥
सप्तद्वीपेर लोक आर नवखण्डवासी।
देव, गन्धर्व, किन्नर—मनुष्य-वेशे आसि’ ॥ 10 ॥
[ 2/10-17 दूसरा अध्याय 45
प्रभुरे देखिया याय ‘वैष्णव’ हञा।
कृष्ण बलि’ नाचे सब प्रेमाविष्ट हञा ॥ 11 ॥
अनुवाद—सातों द्वीपोंके लोग, नौ खण्डोंके निवासी, देवता, गन्धर्व और किन्नर भी मनुष्यके वेशमें आकर महाप्रभुके दर्शन करके सब वैष्णव बन जाते थे। वे ‘कृष्ण’ नामका उच्चारण करके प्रेमाविष्ट होकर नृत्य करने लगते थे ॥ 10-11 ॥
अनुभाष्य—‘सप्तद्वीप’,—मध्यलीला 20/218 संख्याका अनुभाष्य और भागवतके पाँचवें स्कन्धके 16 और 20 अध्याय देखें।
‘नवखण्ड’,—सिद्धान्तशिरोमणिमें गोलाध्यायके भुवनकोशमें—
“ऐन्द्रं कशेरुसकलं किल ताम्रपर्ण-
मन्यद्गभस्तिमदतश्च कुमारिकाख्यम्।
नागञ्च सौम्यमिह वारुणमन्त्यखण्डं
गान्धर्व-संज्ञमिति भारतवर्षमध्ये॥”
- ऐन्द्र, (2) कशेरु, (3) ताम्रपर्ण, (4) गभस्तिमत्, (5) कुमारिका, (6) नाग, (7) सौम्य, (8) वारुण और (9) गान्धर्व—भारतवर्षमें ये नौ खण्ड हैं ॥ 10 ॥
महाप्रभुके आवेशका कारण, देश, काल और पात्रके वैशिष्ट्यका वर्णन :—
एइमत दर्शने त्रिजगत् निस्तारि’।
ये केह आसिते नारे अनेक संसारी ॥ 12 ॥
ता-सबा तारिते प्रभु सेइ सब देशे।
योग्यभक्त-जीवदेहे करेन ‘आवेश’ ॥ 13 ॥
अनुवाद—इस प्रकार अपने दर्शनोंसे महाप्रभुने त्रिभुवनका उद्धार कर दिया। संसारमें फंसे अनेक लोग ऐसे भी थे जो महाप्रभुके दर्शनोंको प्राप्त नहीं कर सके। उन सबका भी उद्धार करनेके लिये महाप्रभु उन सब देशोंमें किसी योग्यभक्त-जीवकी देहमें अपना ‘आवेश’ प्रकट कर देते थे॥ 12-13 ॥
आवेशका फल :—
सेइ जीवे निज भक्ति करेन प्रकाशे।
ताहार दर्शने ‘वैष्णव’ हय सर्वदेशे ॥ 14 ॥
अनुवाद—महाप्रभु उस जीवमें अपनी भक्तिका प्रकाश कर देते और उस जीवके दर्शनसे समस्त देशवासी वैष्णव बन जाते थे॥ 14 ॥
एइमत आवेशे तारिल त्रिभुवन।
गौड़े यैछे आवेश, करि’ दिग्दरशन ॥ 15 ॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने आवेशके द्वारा त्रिभुवनका उद्धार किया। महाप्रभुने गौड़देशमें जिस प्रकारसे आवेश प्रकाशित किया, मैं (ग्रन्थकार) यहाँ उसका दिग्दर्शन करवा रहा हूँ॥ 15 ॥
‘आवेश’का दृष्टान्त—श्रीनकुल ब्रह्मचारीमें महाप्रभुका ‘आवेश’ और उनकी अवस्थाका वर्णन :—
आम्बुया-मुलुके हय नकुल ब्रह्मचारी।
परम-वैष्णव तेंहो बड़ अधिकारी ॥ 16 ॥
अनुवाद—गौड़देशमें श्रीनवद्वीपधामके निकट आम्बुया-मुलुकमें एक श्रीनकुल ब्रह्मचारी नामक परम वैष्णव रहते थे, जो कि भक्तिराज्यमें उत्तम अधिकारी थे॥ 16 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— ‘आम्बुया-मुलुक’,—उस समय मुलुक विभाग करके एक-एक स्थानपर यवन-राजाओंकी तहसील-कचहरी थी; ‘अम्बिका’ (वर्धमान जिलेके कालना-नगरसे संलग्न एक विशेष पल्ली)-नामक स्थानपर एक मुलुक था। उसके अधिकारमें जो स्थान अब ‘प्यारीगञ्ज’के नामसे प्रसिद्ध है, वहीं श्रीनकुल ब्रह्मचारी रहते थे॥ 16 ॥
गौड़देशे लोक निस्तारिते मन हैल।
नकुल-हृदये प्रभु ‘आवेश’ करिल ॥ 17 ॥
अनुवाद—जब महाप्रभुके मनमें गौड़देशके लोगोंका
46 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/17-27 ]
उद्धार करनेकी इच्छा हुई, तब महाप्रभुने श्रीनकुल चैतन्येर आवेश हय नकुलेर देहे।
ब्रह्मचारीके हृदयमें अपना ‘आवेश’ प्रकाशित किया॥ 17॥ शुनि' शिवानन्द आइला करिया सन्देहे ॥ 22 ॥
ग्रहग्रस्तप्राय नकुल प्रेमाविष्ट हञा। श्रीशिवानन्दका संशय और परीक्षा लेनेकी इच्छा :—
हासे, कान्दे, नाचे गाय उन्मत्त हञा ॥ 18 ॥ परीक्षा करिते ताँर यबे इच्छा हैल।
बाहिरे रहिया तबे विचार करिल ॥ 23 ॥
अश्रु, कम्प, स्तम्भ, स्वेद, सात्त्विक विकार। श्रीशिवानन्दका विचार और दूरमें अवस्थान :—
निरन्तर प्रेमे नृत्य, सघन हुङ्कार ॥ 19 ॥ 'आपने बोलान मोरे, इहा यदि जानि।
अनुवाद—भूतग्रस्त व्यक्तिका जिस प्रकार अपने आमार इष्ट-मन्त्र जानि' कहेन आपनि ॥ 24 ॥
शरीरपर नियन्त्रण नहीं रहता, उसी प्रकार महाप्रभुका तबे जानि, इँहाते हय चैतन्य-आवेशे।'
'आवेश' आनेसे श्रीनकुल ब्रह्मचारी प्रेमाविष्ट हो गये। एत चिन्ति' शिवानन्द रहिला दूरदेशे ॥ 25 ॥
वे उन्मत्त होकर कभी तो हँसने लगे, कभी रोने लगे
तथा कभी नृत्य-गान करने लगे। उनकी देहमें अश्रु, अनुवाद—श्रीनकुल ब्रह्मचारीकी देहमें श्रीचैतन्यदेवका
कम्प, स्तम्भ और स्वेद (पसीना आना) आदि आवेश हुआ है, यह सुनकर श्रीशिवानन्द सेनको कुछ
अष्ट-सात्त्विक विकार प्रकाशित होने लगे। वे प्रेममें सन्देह हुआ, इसलिये वे वहाँपर आये। जब उनके
डूबकर निरन्तर नृत्य और ज़ोरसे हुङ्कार करने मनमें श्रीनकुल ब्रह्मचारीकी परीक्षा करनेकी इच्छा हुई,
लगे॥ 18-19॥ तब वे श्रीनकुल ब्रह्मचारीके घरसे बाहर रहकर विचार
तैछे गौरकान्ति, तैछे सदा प्रेमावेश। करने लगे,—‘यदि नकुल ब्रह्मचारी यह जान जायँ कि
ताहाते देखिते आइसे सर्व गौड़देश ॥ 20 ॥ मैं यहाँ हूँ और वे मुझे स्वयं ही भीतर बुलायें एवं
मेरे इष्ट-मन्त्रको जानकर वे स्वयं उसे मुझे बतला दें,
अनुवाद—महाप्रभुकी भाँति श्रीनकुल ब्रह्मचारीकी तभी मैं मानूँगा कि उनमें श्रीचैतन्यदेवका आवेश हुआ
अङ्गकान्ति भी गौरवर्णकी हो गयी और उनमें निरन्तर है।' ऐसा विचारकर श्रीशिवानन्द सेन कुछ दूरीपर ही
प्रेमका आवेश होने लगा। गौड़देशमें सभी स्थानोंसे लोग खड़े रहे॥ 22-25॥
उनके दर्शन करनेके लिये आने लगे॥ 20॥
असंख्य लोकेर घटा,—केह आइसे याय।
अनुभाष्य—'सर्वगौड़देश',—समस्त गौड़देशवासी लोकेर संघट्टे केह दर्शन ना पाय ॥ 26 ॥
(गौड़ीयगण)॥ 20॥
अनुवाद—वहाँ असंख्य लोगोंकी भीड़ थी—कोई
ब्रह्मचारीका उपदेश :— आ रहा था, तो कोई जा रहा था। लोगोंकी भीड़के
याँरे देखे ताँरे कहे, — 'कह कृष्णनाम'। कारण किसी-किसीको तो श्रीनकुल ब्रह्मचारीके दर्शन
ताँहार दर्शने लोक हय प्रेमोद्दाम ॥ 21 ॥ भी प्राप्त नहीं हो रहे थे॥ 26॥
अनुवाद—श्रीनकुल ब्रह्मचारी जिसे भी देखते, श्रीशिवानन्दको अपने निकट बुलानेके
उसीको कहते,—'कृष्णनाम बोलो'। उनके दर्शनसे ही लिये लोगोंको भेजना :—
सभी लोग प्रेममें प्रमत्त हो उठते ॥ 21 ॥ ब्रह्मचारी कहे, — “शिवानन्द आछे दूरे।
अनुभाष्य—'प्रेमोद्दाम',—प्रेममें प्रमत्त॥ 21॥ जन दुइ-चारि याह, बोलाह ताहारे ॥”27 ॥
[ 2/27-36 दूसरा अध्याय 47
अनुवाद—श्रीनकुल ब्रह्मचारीने कहा,–"शिवानन्द
सेन कुछ दूरीपर हैं। दो-चार लोग जाकर उन्हें
बुलाकर ले आओ ॥"27॥
चारिदिके धाय लोके 'शिवानन्द' बलि' ।
“शिवानन्द कोन्, तोमाय बोलाय ब्रह्मचारी ॥ "28॥
अनुवाद—लोग 'शिवानन्द' बोलते हुए चारों दिशाओंमें
दौड़ पड़े और उनको पुकारते हुए कहने लगे,–"शिवानन्द
कौन हैं? आपको श्रीनकुल ब्रह्मचारी बुला रहे
हैं॥"28॥
श्रीशिवानन्दका शीघ्र आना :—
शुनि' शिवानन्द सेन ताँहा शीघ्र आइल।
नमस्कार करि' ताँर निकटे बसिल ॥ 29 ॥
अनुवाद—उन लोगोंकी पुकारको सुनकर श्रीशिवानन्द
सेन शीघ्रतासे वहाँ आ गये और श्रीनकुल ब्रह्मचारीको
नमस्कार करके उनके निकट बैठ गये ॥ 29 ॥
श्रीशिवानन्दके सन्देहका भङ्ग होना :—
ब्रह्मचारी बोले,–“तुमि करिला संशय।
एक मना हञा ताहा शुनह निश्चय ॥ 30॥
'गौरगोपाल-मन्त्र' तोमार चारि अक्षर।
अविश्वास छाड़, येइ करियाछ अन्तर ॥"31 ॥
अनुवाद—तब श्रीनकुल ब्रह्मचारीने श्रीशिवानन्दसे
कहा,–“आपने मुझपर संशय किया। अब आप
एकाग्रचित्त होकर उसका प्रमाण सुनो। आप चार
अक्षरवाले 'गौरगोपाल-मन्त्र'का जप करते हैं। आपके
हृदयमें जो अविश्वास है, अब उसे छोड़ो ॥"30-31॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'गौरगोपाल-मन्त्र',—गौरवादिगण
'गौराङ्ग'-नामसे चार-अक्षरवाले गौरमन्त्रको लक्ष्य करते
हैं; केवल-कृष्णावादिगण इस 'गौरगोपालमन्त्र'-शब्दसे
राधा-कृष्णके चार-अक्षरवाले मन्त्रको लक्ष्य करते
हैं॥ 31 ॥
अनुभाष्य—'अन्तर'—मनमें ॥ 31 ॥
श्रीशिवानन्दका विश्वास :—
तबे शिवानन्देर मने प्रतीति हइल।
अनेक सम्मान करि' बहु भक्ति कैल ॥ 32 ॥
अनुवाद—तब श्रीशिवानन्द सेनके हृदयमें यह पूर्ण
विश्वास हुआ कि श्रीनकुल ब्रह्मचारीमें महाप्रभुका
आवेश हुआ है और उन्होंने सम्मानपूर्वक उनकी बहुत
सेवा की ॥ 32 ॥
एइमत महाप्रभुर अचिन्त्य प्रभाव।
एबे शुन प्रभुर यैछे हय 'आविर्भाव' ॥ 33 ॥
अनुवाद—इस प्रकारसे महाप्रभुके अचिन्त्य प्रभावको
समझना चाहिये। महाप्रभुका 'आविर्भाव' जिस प्रकार
होता है, अब उसके विषयमें श्रवण करो ॥ 33 ॥
प्रेमसे आकृष्ट महाप्रभुके
'नित्य-आविर्भाव'के चार स्थान :—
शचीर मन्दिरे, आर नित्यानन्द-नर्त्तने।
श्रीवास-कीर्त्तने आर राघव-भवने ॥ 34 ॥
एइ चारि ठाञि, प्रभुर सदा 'आविर्भाव' ।
प्रेमाविष्ट हय–प्रभुर सहज स्वभाव ॥ 35 ॥
अनुवाद—श्रीशचीमाताके घरके मन्दिरमें, श्रीनित्यानन्द
प्रभुके नृत्य करनेके स्थानमें, श्रीवास पण्डितके घरपर
कीर्त्तनके समयमें और श्रीराघव पण्डितके भवनमें–इन
चारों स्थानोंपर महाप्रभुका सदा 'आविर्भाव' होता है।
भक्तोंके प्रेमसे आकृष्ट होकर महाप्रभुका आविर्भाव
होता है—यह महाप्रभुका सहज-स्वभाव है ॥ 34-35 ॥
कभी-कभी 'आविर्भाव'का दृष्टान्त; प्रद्युम्न अथवा
नृसिंह ब्रह्मचारीके वृत्तान्तका वर्णन :—
नृसिंहानन्देर आगे आविर्भूत हञा।
भोजन करिला, ताहा शुन मन दिया ॥ 36 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीनृसिंहानन्दके समक्ष आविर्भूत
48 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/36-45 ]
होकर उनके द्वारा अर्पित भोजनको ग्रहण किया, इस
प्रसङ्गको ध्यानपूर्वक श्रवण कीजिये॥ ३६॥
श्रीकान्त सेनकी कथा; महाप्रभुके दर्शनके लिये
उनका अकेले श्रीक्षेत्रमें गमन :-
शिवानन्देर भागिना श्रीकान्त-सेन नाम।
प्रभुर कृपाते तेंहो बड़ भाग्यवान् ॥ ३७॥
एक वत्सर तेंहो प्रथम एकेश्वर।
प्रभु देखिबारे आइला उत्कण्ठा अन्तर ॥ ३८ ॥
अनुवाद - श्रीशिवानन्द सेनके भाञ्जे जिनका नाम
श्रीकान्त-सेन था, वे महाप्रभुकी कृपा प्राप्त करनेके
कारण बड़े सौभाग्यशाली थे। एक वर्ष वे अकेले ही
हृदयमें उत्कण्ठाके कारण महाप्रभुके दर्शनोंके लिये
श्रीजगन्नाथपुरी गये ॥ ३७-३८ ॥
अनुभाष्य - 'एकेश्वर',—अकेले, सेवकके बिना ॥ ३८ ॥
उनके प्रति महाप्रभुकी कृपा और आदेश :-
महाप्रभु तांरे देखि' बड़ कृपा कैला।
मास-दुइ तेंहो प्रभुर निकटे रहिला ॥ ३९ ॥
अनुवाद-महाप्रभुने उनको देखकर उनपर बहुत
कृपा की। श्रीकान्त-सेन दो मास तक महाप्रभुके पास
श्रीजगन्नाथपुरीमें रहे ॥ ३९ ॥
गौड़ीय-भक्तोंको पुरी आनेके लिये निषेध-आज्ञा :-
तबे प्रभु ताँरे आज्ञा कैला गौड़े याइते।
भक्तगणे निषेधिला इहाँके आसिते ॥ ४० ॥
पौषमासमें स्वयं गौड़देशमें जानेका निर्णय :-
“ए-वत्सर ताँहा आमि याइमु आपने।
ताँहाइ मिलिमु सब अद्वैतादि सने ॥ ४१ ॥
शिवानन्दे कहिह,—आमि एइ पौषमासे।
आचम्बिते अवश्य आमि याइब ताँर पाशे ॥ ४२ ॥
जगदानन्द हय ताँहा, तेंहो भिक्षा दिबे।
सबारे कहिह,—ए वत्सर केह ना आसिबे ॥” ४३ ॥
अनुवाद-जब श्रीकान्त सेन गौड़देशमें लौटने लगे,
तब महाप्रभुने उनके माध्यमसे गौड़देशके भक्तोंको उस
वर्ष श्रीजगन्नाथपुरी आनेके लिये निषेध करते हुए
कहा,—“इस वर्ष मैं स्वयं गौड़देश आऊँगा, मैं वहींपर
ही श्रीअद्वैतादि सभी भक्तोंसे मिलूँगा। शिवानन्द सेनसे
कहना कि मैं इस पौष-मासमें अवश्य अचानक ही
उनके पास आऊँगा। जगदानन्द पण्डित वहींपर हैं, वे
मेरे लिये भोजनकी व्यवस्था कर देंगे। तुम सभीसे
कहना कि इस वर्ष यहाँ कोई भी नहीं आये॥” ४०-४३ ॥
अनुभाष्य - 'इँहाँके',—इस स्थानपर, श्रीपुरुषोत्तम-क्षेत्रमें।
'ताँहा',—गौड़देशमें ॥ ४०-४१ ॥
गौड़देशमें आकर श्रीकान्तके द्वारा महाप्रभुकी आज्ञाको
बतलाना, भक्तोंका आनन्दपूर्वक गौड़में ही रहना :-
श्रीकान्त आसिया गौड़े सन्देश कहिल।
शुनि' भक्तगण-मने आनन्द हइल ॥ ४४ ॥
अनुवाद-श्रीकान्तने गौड़देशमें आकर सभी भक्तोंको
महाप्रभुका सन्देश सुनाया। महाप्रभुके सन्देशको सुनकर
भक्तोंके मनमें बहुत आनन्द हुआ ॥ ४४ ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - 'सन्देश',—संवाद ॥ ४४ ॥
अनुभाष्य - 'सन्देश',—अगले पौषमासमें महाप्रभुके
गौड़देशमें आगमनकी वार्त्ता ॥ ४४ ॥
श्रीशिवानन्द और श्रीजगदानन्दके द्वारा
प्रतिदिन महाप्रभुकी प्रतीक्षा :-
चलितेछिला आचार्य, रहिला स्थिर हञा।
शिवानन्द, जगदानन्द रहे प्रत्याशा करिया ॥ ४५ ॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य अन्य भक्तोंके साथ श्रीजगन्नाथ
पुरी जानेके लिये तत्पर हो रहे थे, परन्तु वे महाप्रभुके
सन्देशको सुनकर रुक गये। श्रीशिवानन्द सेन
और श्रीजगदानन्द पण्डित भी प्रतिदिन महाप्रभुके
आनेकी प्रतीक्षामें वहीं रह गये ॥ ४५ ॥
अनुभाष्य - 'आचार्य',—श्रीअद्वैत प्रभु ॥ ४५ ॥
[ 2/46-57 दूसरा अध्याय 49
पौषमासे आइल दुँहे सामग्री करिया।
सन्ध्या-पर्यन्त रहे अपेक्षा करिया ॥ 46 ॥
अनुवाद—जब पौष मास आ गया, तब श्रीशिवानन्द सेन और श्रीजगदानन्द पण्डित, दोनों प्रतिदिन महाप्रभुके अभिवादन और सेवाके लिये सभी प्रकारकी सामग्री प्रस्तुत करके सन्ध्या तक उनकी प्रतीक्षा करते थे ॥ 46 ॥
महाप्रभुके नहीं आनेके कारण दोनोंका दुःख :-
एइमत मास गेल, गोसाञि ना आइला।
जगदानन्द, शिवानन्द दुःखित हइला ॥ 47 ॥
अनुवाद—इस प्रकार धीरे-धीरे पौष-मास समाप्त होनेको आया, किन्तु महाप्रभु नहीं आये। श्रीजगदानन्द पण्डित और श्रीशिवानन्द सेन बहुत दुःखी हुए ॥ 47 ॥
अनुभाष्य—'गोसाञि,'—महाप्रभु ॥ 47 ॥
श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीका आगमन तथा उनके दुःखके कारणकी जिज्ञासा :-
आचम्बिते नृसिंहानन्द ताँहाइ आइला।
दुँहे ताँरे मिलि' तबे स्थाने बसाइला ॥ 48 ॥
दुँहे दुःखी भावे देखि' कहे नृसिंहानन्द।
“तोमा दुँहाकारे केने देखि निरानन्द ? ? ” 49 ॥
अनुवाद—अचानक ही श्रीनृसिंहानन्द (श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी) वहाँ आ गये। वे दोनों (श्रीशिवानन्द सेन और श्रीजगदानन्द पण्डित) उनसे मिले और उन्हें एक आसनपर बैठाया। उन दोनोंको दुःखी देखकर श्रीनृसिंहानन्दने पूछा, — “मैं आप दोनोंको दुःखी क्यों देख रहा हूँ?” 48-49 ॥
श्रीशिवानन्दके द्वारा सम्पूर्ण वृत्तान्त कहना :-
तबे शिवानन्द ताँरे सकल कहिला।
“आसिते आज्ञा दिया प्रभु केने ना आइला ॥” 50 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने उन्हें सारा वृत्तान्त सुनानेके पश्चात् कहा,—“आनेका सन्देश देकर भी महाप्रभु क्यों नहीं आये ?” 50 ॥
श्रीप्रद्युम्नके द्वारा आश्वासन तथा प्रबोध-दान :-
शुनि' ब्रह्मचारी कहे, — “करह सन्तोषे।
आमि त' आनिब ताँरे तृतीय दिवसे ॥” 51 ॥
अनुवाद—यह सुनकर श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने कहा, — “आप थोड़ा शान्त रहिये। मैं महाप्रभुको आजसे तीसरे दिन ही यहाँ ले आऊँगा ॥” 51 ॥
श्रीशिवानन्द और श्रीजगदानन्द, दोनोंको विश्वास :-
ताँहार प्रभाव-प्रेम जाने दुइजने।
आनिबे प्रभुरे एबे निश्चय कैला मने ॥ 52 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन और श्रीजगदानन्द पण्डित श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीके प्रभाव एवं महाप्रभुके प्रति उनके प्रेमके विषयमें भली-भाँति जानते थे। इसलिये उनके मनमें यह विश्वास हो गया कि ये महाप्रभुको अवश्य ही यहाँ ले आयेंगे ॥ 52 ॥
'नृसिंहानन्द'-नामकी प्राप्तिका कारण :-
'प्रद्युम्न ब्रह्मचारी' — ताँर निज-नाम।
'नृसिंहानन्द' - नाम ताँर कैला गौरधाम ॥ 53 ॥
अनुवाद—उनका वास्तविक नाम तो 'प्रद्युम्न ब्रह्मचारी' था। श्रीगौरसुन्दरने उनको 'नृसिंहानन्द' नाम प्रदान किया था ॥ 53 ॥
महाप्रभुको प्रकट करनेकी प्रद्युम्न ब्रह्मचारीकी प्रतिज्ञा और भोग पकानेका प्रयास :-
दुइदिन ध्यान करि' शिवानन्देरे कहिल।
“पाणिहाटि-ग्रामे आमि प्रभुरे आनिल ॥ 54 ॥
कालि मध्याह्ने तँहो आसिबेन तोमार घरे।
पाक-सामग्री आनह, आमि भिक्षा दिमु ताँरे ॥ 55 ॥
तबे ताँरे एथा आमि आनिब सत्वर।
निश्चय कहिलाङ, किछु सन्देह ना कर ॥ 56 ॥
ये चाहिये, ताहा कर हुआ तत्पर।
अति त्वराय करिब पाक, शुन अतःपर ॥ 57 ॥
50 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/54-65 ]
पाक-सामग्री आनह, आमि याहा चाइ।”
ये मागिल, शिवानन्द आनि' दिला ताइ ॥ 58 ॥
अनुवाद—श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने दो दिन तक
ध्यान करनेके बाद श्रीशिवानन्द सेनसे कहा, —“मैं
महाप्रभुको पाणिहाटि-ग्राम तक ले आया हूँ। कल
दोपहर तक वे आपके घरपर आ जायेंगे। आप रसोई
बनानेकी समस्त सामग्री लाकर मुझे दो, मैं स्वयं उन्हें
भोजन बनाकर खिलाऊँगा। तभी मैं उन्हें यहाँ शीघ्रतासे
ले आऊँगा। मेरी बातपर पूर्ण विश्वास रखो, मैं सत्य
कह रहा हूँ, कुछ सन्देह मत करना। मैं जो कुछ भी
चाहता हूँ, आप शीघ्रतासे उसे लाकर दे दो, क्योंकि
मैं अभी भोजन बनाना प्रारम्भ करना चाहता हूँ। मुझे
जो भी भोजनकी सामग्री चाहिये, आप उसे लेकर
आइये।” श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने जो कुछ माँगा,
श्रीशिवानन्द सेनने वह लाकर दे दिया ॥ 54-58 ॥
प्रद्युम्नका रसोई बनाना और महाप्रभु, श्रीजगन्नाथ एवं
अपने इष्टदेव श्रीनृसिंह, प्रत्येकके लिये तीन
अलग-अलग नैवेद्य-भोग सजाना :-
प्रातःकाल हैते पाक करिला अपार।
नाना सूप, व्यञ्जन, पिठा, क्षीर-उपहार ॥ 59 ॥
अनुवाद—श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने प्रातःकालसे
प्रारम्भकर बहुतसे पकवान जैसे अनेक प्रकारकी
रसेदार सब्जियाँ, व्यञ्जन, पीठा-पाना और खीर तथा
दूधसे अनेक मिठाइयाँ बनायीं ॥ 59 ॥
जगन्नाथेर भिन्न भोग पृथक् बाड़िल।
चैतन्यप्रभुर लागि' आर भोग कैल ॥ 60 ॥
इष्टदेव नृसिंह लागि' पृथक् बाड़िल।
तिनजने समर्पिया बाहिरे ध्यान कैल ॥ 61 ॥
अनुवाद—श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने श्रीजगन्नाथदेव और
महाप्रभुके प्रिय व्यञ्जनोंको पृथक्-पृथक् करके उन्हें
भोग अर्पित किया। फिर अपने इष्टदेव श्रीनृसिंहदेवके
लिये बनाये गये भोगको भी पृथक् सजाया। इस प्रकार
उन्होंने तीन भाग करके भोग निवेदन किया। तब वे
बाहर बैठकर ध्यान करने लगे ॥ 60-61 ॥
ब्रह्मचारीके ध्यानमें 'आविर्भूत' महाप्रभुके द्वारा
तीनों नैवेद्योंको खाना :-
देखे, शीघ्र आसि' बसिला चैतन्य-गोसाञि।
तिन भोग खाइला, किछु अवशिष्ट नाइ ॥ 62 ॥
अनुवाद—श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने ध्यानमें देखा
कि महाप्रभु शीघ्रतासे आकर बैठ गये और तीनों भोग
खा गये, उन्होंने कुछ भी नहीं छोड़ा ॥ 62 ॥
ऐसा देखकर प्रद्युम्नके हृदयमें आनन्द,
बाहरमें दुःखका आभास :-
आनन्दे विह्वल प्रद्युम्न, पड़े अश्रुधार।
“हाहा किबा कर” बलि' करये फुत्कार ॥ 63 ॥
अनुवाद—यद्यपि महाप्रभुको सम्पूर्ण भोग ग्रहण
करते देखकर श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी आनन्दसे विह्वल हो
रहे थे और उनके नेत्रोंसे अश्रुओंकी धारा प्रवाहित हो
रही थी, तथापि वे बाहरसे दुःख प्रकट करते हुए कह
रहे थे,—“हाय! हाय! [महाप्रभु!] आप यह क्या कर
रहे हैं?” 63 ॥
महाप्रभुके प्रति प्रद्युम्नका आरोप;
अपने इष्टदेव श्रीनृसिंहके प्रति निष्ठा :-
“जगन्नाथे-तोमाय ऐक्य, खाओ ताँर भोग।
नृसिंहेर भोग केने कर उपयोग ॥ 64 ॥
नृसिंहेर जानि हैल आजि उपवास।
ठाकुर उपवासी रहे, जिये कैछे दास?? 65 ॥
अनुवाद—“हे महाप्रभु! आप और श्रीजगन्नाथ तो
एक ही हैं, इसलिये आप यदि उनका भोग खा लेते
हैं, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। किन्तु आप श्रीनृसिंह
भगवान्का भोग क्यों ग्रहण कर रहे हो? मैं देख रहा
[ 2/64-74 दूसरा अध्याय 51
हूँ कि आज तो श्रीनृसिंहदेवका उपवास हो गया। यदि
ठाकुरजी ही उपवासी रहेंगे, तब फिर दास किस
प्रकारसे जीवित रहेगा?” 64-65 ॥
भोजन देखि' यद्यपि ताँर हृदये उल्लास।
नृसिंह लक्ष्य करि' बाह्ये किछु करे दुःखाभास ॥ 66 ॥
अनुवाद—यद्यपि श्रीनृसिंहानन्दके हृदयमें महाप्रभुको
समस्त भोग खाते देखकर उल्लास हो रहा था, किन्तु
श्रीनृसिंहदेवको लक्ष्य करके वे बाहरसे कुछ दुःखको
प्रकट कर रहे थे॥ 66 ॥
महाप्रभुके द्वारा तीनों पात्रोंके भोजनकी लीलाके द्वारा
श्रीप्रद्युम्नको समस्त विष्णुतत्त्वोंके साथ अपने अभेद
अथवा एक होनेका प्रदर्शन :-
स्वयं भगवान् कृष्णचैतन्य-गोसाञि।
जगन्नाथ-नृसिंह-सह किछु भेद नाइ ॥ 67 ॥
इहा जानिवारे प्रद्युम्नेर गूढ़ हैल मन।
ताहा देखाइला प्रभु करिया भोजन ॥ 68 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य-गोसाईं स्वयं भगवान् हैं।
इसलिये श्रीजगन्नाथदेव एवं श्रीनृसिंहदेवके साथ उनका
कोई भेद नहीं है, इस बातको समझनेके लिये श्रीप्रद्युम्न
ब्रह्मचारीके मनमें प्रबल इच्छा थी। महाप्रभुने इस
तथ्यको समझानेके लिये सम्पूर्ण भोजनको ग्रहण
किया॥ 67-68 ॥
भोजनके अन्तमें महाप्रभुका पाणिहाटी स्थित
राघव-भवनमें नित्य-अवस्थान हेतु गमन :-
भोजन करिया प्रभु गेला पाणिहाटि।
सन्तोष पाइला देखि' व्यञ्जन-परिपाटी ॥ 69 ॥
अनुवाद—भोजन करनेके बाद महाप्रभु पाणिहाटी
चले गये। पाणिहाटीमें महाप्रभु श्रीराघव पण्डितके घरमें
बनायी गयी व्यञ्जनकी परिपाटीको देखकर बहुत
सन्तुष्ट हुए॥ 69 ॥
श्रीशिवानन्दकी ब्रह्मचारीके दुःखी होनेके कारणकी जिज्ञासा
और ब्रह्मचारीके द्वारा सम्पूर्ण वृत्तान्तका वर्णन :-
शिवानन्द कहे,—“केने करह फुत्कार?”
ब्रह्मचारी कहे,—“देख, प्रभुर व्यवहार ॥ 70 ॥
तिनजनार भोग तेंहो अकेला खाइला।
जगन्नाथ-नृसिंह उपवासी हइला ॥” 71 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीसे
कहा,—“आप किसलिये दुःख प्रकाश कर रहे हैं?”
श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीने उत्तर दिया,—“महाप्रभुके व्यवहारको
तो देखो, वे तीन प्रभुओंके भोगको अकेले ही खा गये।
इसलिये श्रीजगन्नाथदेव तथा श्रीनृसिंहदेव उपवासी रह
गये॥” 70-71 ॥
श्रीशिवानन्दका सन्देह :-
शुनि' शिवानन्देर चित्ते हइल संशय।
किवा प्रेमावेशे कहे, किवा सत्य हय ॥ 72 ॥
अनुवाद—यह सुनकर श्रीशिवानन्द सेनके चित्तमें
संशय हुआ कि श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी यह बात प्रेमके
आवेशमें कह रहे हैं अथवा यह बात सत्य है॥ 72 ॥
श्रीशिवानन्दको श्रीनृसिंहके लिये
भोगको लानेका आदेश :-
तबे शिवानन्दे किछु कहे ब्रह्मचारी।
“सामग्री आनह नृसिंहरे, पुनः पाक करि ॥” 73 ॥
अनुवाद—तब श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीने श्रीशिवानन्द
सेनसे कहा,—“आप श्रीनृसिंहदेवके लिये फिरसे भोग-सामग्री
लाकर दीजिये, मैं पुनः रसोई बनाऊँगा॥” 73 ॥
श्रीनृसिंहको पुनः भोग समर्पण :-
तबे शिवानन्द भोग-सामग्री आनिला।
पाक करि' नृसिंहरे भोग लागाइला ॥ 74 ॥
अनुवाद—तब श्रीशिवानन्द सेन पुनः भोग-सामग्री
लेकर आये तथा श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीने पकवान बनाकर
श्रीनृसिंहदेवको भोग लगाया॥ 74 ॥
52 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/75-84 ]
अगली वर्षाऋतुके समय गौड़ीय-भक्तोंका पुरीमें गमन :-
वर्षान्तरे शिवानन्द लञा भक्तगण।
नीलाचले देखे याञा प्रभुर चरण॥ 75॥
अनुवाद—अगले वर्ष महाप्रभुके चरणकमलोंके दर्शनके
लिये श्रीशिवानन्द सेन भक्तोंको साथ लेकर नीलाचल
श्रीजगन्नाथपुरीमें गये॥ 75॥
एकदिन महाप्रभुके द्वारा श्रीनृसिंहानन्दके
पूर्वोक्त भोजनके वृत्तान्तका वर्णन :-
एकदिन सभाते प्रभु बात चालाइला।
नृसिंहानन्देर गुण कहिते लागिला॥ 76॥
“गतवर्ष पौषे मोरे कराइल भोजन।
कभु नाहि खाइ ऐछे मिष्टान्न-व्यञ्जन॥" 77॥
अनुवाद—एकदिन भक्तोंकी सभामें बातचीत करते
हुए महाप्रभु प्रसङ्ग उठाकर श्रीनृसिंहानन्दके गुणोंका
वर्णन करने लगे,—“पिछले वर्ष पौष मासमें नृसिंहानन्दने
मुझे भोजन कराया था। मैंने वैसे मिष्टान्न और व्यञ्जन
पहले कभी नहीं खाये थे॥" 76-77॥
अनुभाष्य—'बात चालाइला',—प्रसङ्ग उठाया॥ 76॥
महाप्रभुके वचनोंसे श्रीशिवानन्दका पूर्व-सन्देह भङ्ग :-
शुनि' सभ्यगण मने आश्चर्य मानिल।
शिवानन्देर मने तबै प्रत्यय जन्मिल॥ 78॥
अनुवाद—यह सुनकर सभी भक्तोंके मनमें आश्चर्य
हुआ और श्रीशिवानन्द सेनके मनमें दृढ़ विश्वास
उत्पन्न हुआ कि वह घटना सत्य थी॥ 78॥
चार स्थानोंपर महाप्रभुका 'नित्य-आविर्भाव' :-
एइमत शचीगृहे सतत भोजन।
श्रीवासेर गृहे करेन कीर्त्तन-दर्शन॥ 79॥
अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु श्रीशचीमाताके घरमें
सदा भोजन करते तथा श्रीवास पण्डितके घरमें
कीर्तनके समय वहाँ उपस्थित होते॥ 79॥
नित्यानन्देर नृत्य देखेन आसि' बारे बारे।
'निरन्तर आविर्भाव' राघवेर घरे॥ 80॥
अनुवाद—महाप्रभु बार-बार आकर श्रीनित्यानन्द
प्रभुके नृत्यको देखते तथा श्रीराघव पण्डितके घरमें भी
उनका 'निरन्तर आविर्भाव' होता॥ 80॥
भक्तोंके प्रेमके वशीभूत श्रीगौरसुन्दर :-
प्रेमवश गौरप्रभु, याँहा प्रेमोत्तम।
प्रेमवश हञा ताहा देन दरशन॥ 81॥
अनुवाद—श्रीगौराङ्ग महाप्रभु प्रेमके वशीभूत हैं। वे
जहाँ कहींपर भी उत्तम प्रेमको देखते हैं, वहींपर ही
प्रेमके वशीभूत होकर दर्शन देते हैं॥ 81॥
श्रीशिवानन्दका अनिर्वचनीय गौरप्रेम :-
शिवानन्देर प्रेमसीमा के कहिते पारे?
याँर प्रेमे वश प्रभु आइसे बारे बारे॥ 82॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनके प्रेमकी सीमाका कौन
वर्णन कर सकता है? जिनके प्रेमके वशीभूत होकर
महाप्रभु बार बार उनके निकट आते हैं॥ 82॥
श्रीगौरके 'आविर्भाव'के श्रवणसे
श्रीकृष्णचैतन्यकी महिमाको जानना :-
एइ त' कहिलु गौरेर 'आविर्भाव'।
इहा येइ शुने, जाने चैतन्य-प्रभाव॥ 83॥
अनुवाद—इस प्रकार मैंने महाप्रभुके [नित्य और
कभी-कभी] 'आविर्भाव'के विषयमें वर्णन किया। इसे
जो कोई भी श्रवण करता है, वह श्रीचैतन्य महाप्रभुकी
महिमाको जान जाता है॥ 83॥
अन्य प्रसङ्ग-वर्णन, भगवान् आचार्यका वृत्तान्त-वर्णन :-
पुरुषोत्तमे प्रभु-पाशे भगवान् आचार्य।
परम वैष्णव तँहो सुपण्डित आर्य॥ 84॥
अनुवाद—श्रीजगन्नाथपुरीमें महाप्रभुके पास भगवान्
आचार्य रहते थे, वे परम वैष्णव, सुविद्वान और सज्जन
व्यक्ति थे॥ 84॥
[ 2/84-91 दूसरा अध्याय 53 ]
अनुभाष्य—'भगवान् आचार्य'—आदिलीलाकी 10/136
संख्या देखें ॥ 84 ॥
सख्यभावाक्रान्त-चित्त, गोप-अवतार।
स्वरूप-गोसाञि-सह सख्य-व्यवहार ॥ 85 ॥
अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्यका चित्त सख्य-भावसे
विभावित था, क्योंकि वे व्रजलीलाके गोपबालकके
अवतार थे। श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीके साथ भी
उनका सख्य व्यवहार था ॥ 85 ॥
बीच-बीचमें अपने घरपर रसोई बनाकर
एकमात्र महाप्रभुको ही निमन्त्रण :—
एकान्तभावे आश्रियाछेन चैतन्यचरण।
मध्ये मध्ये प्रभुर तेंहो करेन निमन्त्रण ॥ 86 ॥
अनुवाद—उन्होंने एकान्तिक भावसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके
चरणकमलोंका आश्रय ग्रहण किया हुआ था। बीच-बीचमें
वे रसोई बनाकर श्रीचैतन्य महाप्रभुको निमन्त्रण भी
किया करते थे ॥ 86 ॥
घरे भात करि' करेन विविध व्यञ्जन।
एकले गोसाञि लञा करान भोजन ॥ 87 ॥
अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्य अपने घरमें अनेक
प्रकारके पकवान बनाते थे और वे महाप्रभुको अकेले
ले जाकर उनको ही भोजन कराते थे ॥ 87 ॥
अनुभाष्य—'घरे भात करि'—श्रीजगन्नाथदेवके प्रसादको
मँगवाकर उसके द्वारा अपने परिवारके सदस्यों, भिक्षुकों
तथा निमन्त्रित व्यक्तियोंको तृप्त करनेके स्थानपर उन्हें
घरपर भोजन करवाने हेतु चावल आदि अर्थात्
साधारण द्रव्य आदि बनानेको 'घरभात' कहते हैं।
उड़ीसामें 'आमानी' एवं 'प्रसादी'—दो शब्दोंका व्यवहार
होता है; श्रीजगन्नाथदेवके उद्देश्यसे बनाये गये नैवेद्य-भोगके
समर्पित होनेपर वह 'प्रसाद' एवं साधारण खाद्य
वस्तुओंको पकानेपर वह 'आमानी' अर्थात् श्रीजगन्नाथदेवका
'उच्छिष्ट नहीं' है, ऐसा समझना होगा ॥ 87 ॥
भगवान् आचार्य एवं उनके पिता
और छोटे भाईका चरित्र :—
ताँर पिता 'विषयी' बड़ शतानन्द-खाँन।
'विषयविमुख' आचार्य—'वैराग्यप्रधान' ॥ 88 ॥
अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्यके पिता शतानन्द खाँन
बहुत ही अधिक 'विषयी' अर्थात् धनवान् थे, किन्तु
श्रीभगवान् आचार्य धन-सम्पत्तिसे विरक्त थे। उनका
जीवन वैराग्यपूर्ण था ॥ 88 ॥
'गोपाल-भट्टाचार्य' नाम, ताँर छोट भाइ।
काशीते वेदान्त पड़ि' गेला आचार्य ठाञि ॥ 89 ॥
अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्यके छोटे भाईका नाम
गोपाल भट्टाचार्य था, वह काशीमें वेदान्त पढ़कर
श्रीभगवान् आचार्यके घर श्रीजगन्नाथ पुरीमें आया ॥ 89 ॥
अनुभाष्य—'वेदान्त',—यहाँपर वेदान्त या शारीरक
सूत्रका तात्पर्य शङ्कराचार्य-कृत निर्विशेष-ब्रह्मपरक भाष्यसे
है। 'आचार्य',—बड़े भाई श्रीभगवान् आचार्य ॥ 89 ॥
आचार्य ताहारे प्रभुपदे मिलाइला।
अन्तर्यामी प्रभु चित्ते सुख ना पाइला ॥ 90 ॥
अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्यने अपने छोटे भाईको
महाप्रभुसे मिलवाया। अन्तर्यामी महाप्रभुको गोपाल भट्टाचार्यसे
मिलकर हृदयमें आनन्द नहीं हुआ ॥ 90 ॥
शुद्धकृष्णभजनसे ही गौर-प्रीति, अभक्तकी भक्ति विरोधी
बिद्धा-चेष्टासे महाप्रभुके द्वारा उसका अनादर :—
आचार्य-सम्बन्धे बाह्ये करे प्रीत्याभास।
कृष्णभक्ति बिना प्रभुर ना हय उल्लास ॥ 91 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीभगवान् आचार्यके भाई होनेके
कारण उसके प्रति बाहरमें प्रसन्नता दिखलायी, किन्तु
जिसके हृदयमें श्रीकृष्णभक्ति न हो, उससे मिलनेपर
महाप्रभुको उल्लास नहीं होता ॥ 91 ॥
54 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/92-98 ]
एकदिन श्रीस्वरूपको अपने छोटे भाईके मुखसे शाङ्कर-
मायावाद-भाष्यके श्रवणके लिये आचार्यका अनुरोध :-
स्वरूपेरे आचार्य कहे आर दिने।
“वेदान्त पड़िया गोपाल आसियाछे एखाने ॥ 92 ॥
सबे मेलि' आइस, शुनि 'भाष्य' इहार स्थाने।”
प्रेम-क्रोध करि' स्वरूप बलय वचने ॥ 93 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा तिरस्कार :-
“बुद्धिभ्रष्ट हैल तोमार गोपालेर सङ्गे।
मायावाद शुनिवारे उपजिल रङ्गे ॥ 94 ॥
समस्त वैष्णवोंके गुरु श्रीदामोदर-स्वरूपके द्वारा
मायावादके दोषोंका वर्णन और उसकी निन्दा;
शङ्करके मायावाद-भाष्यके प्रति शुद्धविष्णुभजन
करनेके इच्छुक व्यक्तिके व्यवहारकी विधि :-
वैष्णव हञा येबा शारीरक-भाष्य शुने।
सेव्य-सेवक-भाव छाड़ि' आपनारे 'ईश्वर' माने ॥ 95 ॥
अनुवाद—एकदिन श्रीभगवान् आचार्यने श्रीस्वरूप
दामोदर गोस्वामीसे कहा, - “मेरा भाई गोपाल काशीसे
वेदान्त पढ़कर यहाँ आया है। हम सब मिलकर उससे
वेदान्तके भाष्यका श्रवण करेंगे।” श्रीभगवान् आचार्यके
प्रति प्रेम होनेके कारण श्रीस्वरूप दामोदरने क्रोध करते
हुए कहा, –“गोपालका सङ्ग करनेसे तुम्हारी बुद्धि भी
भ्रष्ट हो गयी है, इसलिये तुम मायावाद सिद्धान्त
सुननेके लिये उत्कण्ठित हो रहे हो। वैष्णव होकर भी
जो वेदान्तके शारीरक-भाष्यका श्रवण करता है, वह
सेव्य और सेवकके भावको छोड़कर स्वयंको ही
'ईश्वर' मानने लगता है ॥ 92-95 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - 'शारीरक-भाष्य', - श्रीमत्
शङ्कराचार्य-कृत वेदान्त-सूत्र-भाष्य ॥ 95 ॥
अनुभाष्य-केवलाद्वैतवादी शङ्करने कल्पनाका आश्रय
लेकर शारीरक-ब्रह्मसूत्र-भाष्यमें 'मायावाद' अथवा 'बिद्ध
केवलाद्वैतवाद'की स्थापना की है; किन्तु ब्रह्मसूत्रके
श्रीसम्प्रदायी श्रीरामानुज-कृत श्रीभाष्यमें 'विशिष्टाद्वैतवाद',
ब्रह्म-सम्प्रदायी श्रीमध्व-कृत पूर्णप्रज्ञ-भाष्यमें 'शुद्धाद्वैतवाद',
चतुःसन-सम्प्रदायी श्रीनिम्बार्क-कृत पारिजात-सौरभ-भाष्यमें
'द्वैताद्वैतवाद' एवं रुद्रसम्प्रदायी श्रीविष्णुस्वामि-कृत
सर्वज्ञ-भाष्यमें 'शुद्धाद्वैतवाद' वेदान्त-तात्पर्य कहा गया
है एवं उनमें सेव्य-सेवक-भाव विद्यमान रहनेके कारण
ये-भगवान् विष्णुके भक्तोंके लिये पठनीय एवं उनमें
निहित तत्त्वसमूह - सत्-सम्प्रदायके द्वारा अर्थात् वैष्णवोंके
द्वारा चिरकालसे अत्यन्त आदरणीय हैं। आदिलाला
7/101 संख्याका अनुभाष्य देखें। ब्रह्मसूत्र अथवा
वेदान्तकी व्याख्यामें बिद्ध केवलाद्वैतवाद अथवा निर्विशेषब्रह्म-
मत-स्थापन हेतु प्रयास करनेपर, वह पूर्णतया शुद्धभक्तिके
विरुद्ध कुमतवाद मात्र है ॥ 95 ॥
मायावाद-विषकी तीव्रताका वर्णन और
श्रवणसे पतनकी आशङ्का :-
महाभागवत, कृष्ण प्राणधन याँर।
मायावाद-श्रवणे चित्त अवश्य फिरे ताँर ॥” 96 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 96 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - जिनके प्राणधन- कृष्ण हैं, ऐसे
जो महाभागवत हैं, वे भी यदि मायावादपूर्ण शारीरकभाष्यको
श्रवण करें, तब उनका चित्त भी उस ओर झुककर
भक्तिसे च्युत हो जाता है ॥” 96 ॥
आचार्यके द्वारा अपनी श्रीकृष्ण-निष्ठाकी प्रशंसा :-
आचार्य कहे, –“आमा सबार कृष्णनिष्ठ-चित्ते।
आमा-सबार मन भाष्य नारे फिराइते ॥” 97 ॥
अनुवाद-श्रीभगवान् आचार्यने कहा, - “हम सबका
चित्त तो कृष्णनिष्ठ है, इसलिये शारीरक भाष्य हम
सबके मनको विचलित नहीं कर सकता ॥” 97 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा शुद्धभक्तोंके हृदयविदारक
मायावादके अर्थका निरूपण :-
स्वरूप कहे, –“तथापि मायावाद-श्रवणे।
'चित्, ब्रह्म, माया, मिथ्या'- एइमात्र शुने ॥ 98 ॥
[ 2/98-107
दूसरा अध्याय
55
जीवज्ञान-कल्पित, ईश्वरे-सकल अज्ञान।
याहार श्रवणे भक्तेर फाटे मन-प्राण॥”99॥
महाप्रभुके ‘छोटा-हरिदास’ नामक कीर्तनीयाको अपने
घरपर बुलाकर कहा,-“तुम शिखि-माहितिकी बहन
माधवी देवीके घरमें जाकर मेरा नाम लेकर उनसे एक
‘मान’ श्वेत चावल माँगकर ले आओ॥”101-103॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 98-99॥
अमृतप्रवाह भाष्य-[श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,-]
“यद्यपि तुम्हारा चित्त कृष्णनिष्ठ होनेके कारण शाङ्कर-भाष्य
आदि सुनकर विकृत नहीं होता, तथापि उस मायावादमें,
‘ब्रह्म-चित्स्वरूप निराकार’; ‘यह जगत्-मायामात्र अथवा
मिथ्या’, ‘जीव वास्तवमें नहीं है,-वह केवल अज्ञान-कल्पित
है’ एवं ‘ईश्वरमें माया-मुग्धतारूप अज्ञान ही विद्यमान
है’ आदि विचार हैं। इन सब बातोंको सुननेसे भक्तोंको
अत्यन्त दुःख होता है॥”98-99॥
अनुभाष्य-पाठान्तरमें, ‘अड़ोया चाउलं’-‘अरोया’-
नामक आतप चावल (धानको उबालनेके बदले सूर्यमें
तपाकर प्राप्त चावल); ‘मान’-उड़ीसामें प्रचलित चावल
और अन्य अनाजके भार मापनेकी इकाई॥103॥
महाभागवत माधवीदेवीका परिचय :-
माहितिर भगिनीर नाम-माधवी देवी।
वृद्धा तपस्विनी आर परमा वैष्णवी॥104॥
अनुभाष्य-आदिलीला 5/58 संख्या एवं 7/113,
121-126 संख्या देखें॥ 98-99॥
अनुवाद-श्रीमाहितिकी बहनका नाम माधवी देवी
था। वे वृद्धा, तपस्विनी तथा परम-वैष्णवी थीं॥104॥
आचार्यको श्रीस्वरूपके वचनोंके वास्तविक अर्थकी
उपलब्धि और छोटे भाईको अपने गाँवमें भेजना :-
लज्जा-भय पाञा आचार्य मौन हइला।
आर दिन गोपालेरे देशे पाठाइला॥100॥
महाप्रभुके समस्त भक्तोंमें-से केवल
साढ़े तीन जन ही श्रीमतीके गण :-
प्रभु लेखा करे यारे-‘राधिकार गण’।
जगतेर मध्ये ‘पात्र’-साड़े तिनजन॥105॥
स्वरूप गोसाञि आर राय-रामानन्द।
शिखि-माहिति-तिन, ताँर भगिनी-अर्द्धजन॥106॥
अनुवाद-श्रीभगवान् आचार्य बहुत लज्जित और
भयभीत हो गये तथा वे कुछ नहीं कह सके। उन्होंने
अगले दिन ही गोपालको अपने ग्राममें भेज दिया॥100॥
अनुवाद-महाप्रभु जिन्हें ‘श्रीमती राधिकाका गण’
कहकर गिनते थे, ऐसे पात्र इस जगत्में केवल साढ़े
तीन व्यक्ति ही थे। श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीरामानन्द राय,
श्रीशिखि माहिति-ये तीन लोग और श्रीशिखि माहितिकी
बहन श्रीमाधवी देवीको आधा गिनकर कुल साढ़े तीन
व्यक्ति होते हैं॥105-106॥
अन्य एकदिन छोटे-हरिदासको महाप्रभुके भोजनके उद्देश्यसे
श्रीमाधवीदेवीसे चावल लानेके लिये भेजना :-
एकदिन आचार्य प्रभुरे कैला निमन्त्रण।
घरे भात करि’ करे विविध व्यञ्जन॥101॥
माधवीदेवीसे हरिदासके द्वारा सूक्ष्म-चावल लाना
और आचार्यके द्वारा रसोई बनाना :-
ताँर ठाञि तण्डुल मागि’ आनिल हरिदास।
तण्डुल देखि’ आचार्येर अधिक उल्लास॥107॥
‘छोट हरिदास’ नाम प्रभुर कीर्त्तनीया।
ताहारे कहेन डाकि’ आपने आनिया॥102॥
“मोर नामे शिखि-माहितिर भगिनी-स्थाने गिया।
शुक्लचाउल एक मान आनह मागिया॥”103॥
अनुवाद-छोटे-हरिदास श्रीमाधवी देवीसे चावल
माँगकर ले आये। उन चावलोंको देखकर श्रीभगवान्
आचार्यको बहुत आनन्द हुआ॥107॥
अनुवाद-एकदिन श्रीभगवान् आचार्यने महाप्रभुको
निमन्त्रण किया। वे घरपर ही चावल और अनेक
प्रकारके पकवान बनानेके लिये तत्पर हुए। उन्होंने
56 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/108-116 ]
स्नेहे रान्धिल प्रभुर प्रिय ये व्यञ्जन।
देउल-प्रसाद, आदा-चाकि, लेम्बु-सलवण ॥ 108 ॥
अनुवाद—श्रीभगवान् आचार्यने बहुत प्रेमसे महाप्रभुको
प्रिय लगनेवाले पकवान बनाये। उन्होंने श्रीजगन्नाथदेवका
प्रसाद और पचानेके लिये घिसी हुई अदरक, नींबूके
साथ नमक एकत्रित करके रखे ॥ 108 ॥
अनुभाष्य— देउल प्रसाद,—देवालयका प्रसाद अर्थात्
श्रीजगन्नाथ मन्दिरसे लाया गया महाप्रसाद ॥ 108 ॥
महाप्रभुके द्वारा भोजन और सूक्ष्म-चावलकी
प्राप्तिके कारणकी जिज्ञासा :—
मध्याह्ने आसिया प्रभु भोजने बसिला।
शाल्यन्न देखि' प्रभु आचार्ये पुछिला ॥ 109 ॥
“उत्तम अन्न एत तण्डुल काँहाते पाइला ?”
आचार्य कहे,—माधवी-पाश मागिया आनिला ॥ 110 ॥
अनुवाद—मध्याह्नके समय महाप्रभु श्रीभगवान् आचार्यके
स्थानपर आकर भोजनके लिये बैठे। भोजनमें श्वेत
पतले चावलोंको देखकर महाप्रभुने उनसे पूछा,—“ये
बड़े उत्तम चावल हैं, इतने चावल तुम्हें कहाँसे मिले ?”
श्रीभगवान् आचार्यने उत्तर दिया, —‘माधवी देवीसे माँगकर
लाये गये हैं ॥'109-110 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'शाल्यन्न',—श्वेत पतले
चावल ॥ 109 ॥
आचार्यके द्वारा माधवी और छोटे-हरिदासके
नामका उल्लेख :—
प्रभु कहे,—“कोन् याइ' मागिया आनिल ?”
छोट हरिदासेर नाम आचार्य कहिल ॥ 111 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने पूछा, —“कौन जाकर माँगकर
लाया है ?” श्रीभगवान् आचार्यने छोटे-हरिदासका नाम
बताया ॥ 111 ॥
भोजनके अन्तमें महाप्रभुके द्वारा श्रीगोविन्दको छोटे-
हरिदासके अपने घरमें प्रवेशके लिये निषेध-आज्ञा :—
अन्न प्रशंसिया प्रभु भोजने बसिला।
निजगृहे आसि' गोविन्देरे आज्ञा दिला ॥ 112 ॥
“आजि हैते एइ मोर आज्ञा पालिबा।
छोट हरिदासे इँहा आसिते ना दिबा ॥”113 ॥
अनुवाद—चावलोंकी प्रशंसा करके बैठकर महाप्रभुने
भोजन किया। तब अपने वासस्थानपर आकर उन्होंने
अपने सेवक श्रीगोविन्दको आदेश दिया,—“आजसे मेरी
इस आज्ञाका पालन करना—छोटे-हरिदासको यहाँ मत
आने देना ॥”112-113 ॥
हरिदासका गम्भीर दुःख और उपवास :—
द्वार-माना, हरिदास दुःखी हैल मने।
कि लागिया द्वार-माना केह नाहि जाने ॥ 114 ॥
अनुवाद—'महाप्रभुका द्वार मेरे लिये बन्द हैं'—ऐसा
सुनकर छोटे-हरिदासका मन बहुत दुःखी हुआ। कोई
नहीं समझ पाया कि छोटे-हरिदासको वहाँ आनेके
लिये मना क्यों किया है ॥ 114 ॥
तिन दिन हरिदास करे उपवास।
स्वरूपादि सबे पुछिला प्रभुर पाश ॥ 115 ॥
महाप्रभुके निकट जाकर श्रीस्वरूप आदिके द्वारा हरिदासके
प्रवेश-निषेधके कारणकी जिज्ञासा :—
“कोन् अपराध प्रभु, कैल हरिदास ?
कि लागिया द्वार-माना, करे उपवास ?”116 ॥
अनुवाद—छोटे-हरिदासने तीन दिन तक उपवास
किया। तब श्रीस्वरूप दामोदर आदि सभी भक्तों ने
महाप्रभुसे पूछा,—“हे प्रभो! छोटे-हरिदासने कौन-सा
अपराध किया है ? आपने किस कारणसे उसे अपने
द्वारपर आनेके लिये मना किया है ? वह तीन दिनसे
उपवास कर रहा है ॥”115-116 ॥