श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2061, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें44 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/2-10 ]
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो।
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो
और श्रीगौरभक्तोंकी जय हो ॥ २॥
तीन प्रकारसे महाप्रभुके द्वारा जीवोंका उद्धार :-
सर्वलोक उद्धारिते गौर-अवतार।
निस्तारेर हेतु तांर त्रिविध प्रकार॥ ३॥
अनुवाद—सभी लोगोंका उद्धार करनेके लिये ही
श्रीगौर-अवतार हुआ है। उन्होंने उनका उद्धार तीन
प्रकारसे किया॥ ३॥
(1) साक्षात्-दर्शन, (2) योग्य जीवमें आवेश
और (3) आविर्भाव :-
साक्षात्-दर्शन, आर योग्यभक्त-जीवे।
‘आवेश’ करये काँहा हञा ‘आविर्भावे’ ॥ 4 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहीं साक्षात्-दर्शन देकर जीवोंका
उद्धार किया। कहीं योग्यभक्त-जीवमें ‘आवेश’रूपसे
और कहीं ‘आविर्भाव’रूपसे जीवोंका उद्धार किया॥ 4॥
अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुने जीवोंको साक्षात् दर्शन
देकर, किसी योग्यभक्त-जीवमें आविष्ट होकर और
किसी भक्तजीवके समक्ष आविर्भूत होकर जीवोंका
उद्धार किया ॥ 3-4 ॥
तीन प्रकारके प्राकट्यका वर्णन :-
‘साक्षात्-दर्शने’ प्राय सब निस्तारिला।
नकुल-ब्रह्मचारीर देहे ‘आविष्ट’ हइला॥ 5 ॥
ईश्वरका स्वभाव :-
प्रद्युम्न-नृसिंहानन्द आगे कैला ‘आविर्भाव’।
‘लोक निस्तारिब’,—एइ ईश्वर-स्वभाव॥ 6 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने प्रायः सभीका तो साक्षात्-दर्शन
देकर ही उद्धार किया था। एक बार महाप्रभुने श्रीनकुल
ब्रह्मचारीकी देहमें ‘आविष्ट’ होकर उनके देहके विकारोंको
देखनेके लिये आये गौड़भक्तोंका उद्धार किया था।
महाप्रभु श्रीप्रद्युम्नके (श्रीनृसिंहानन्दके) समक्ष स्वयं
आविर्भूत हुए और उन्होंने अनेक लोगोंका उद्धार
किया। ईश्वरका स्वभाव ही जीवोंका उद्धार करना
है॥ 5-6॥
अनुभाष्य—‘साक्षात् दर्शन’ प्रदान करके, नकुल-
ब्रह्मचारीकी देहमें ‘आविष्ट’ होकर और प्रद्युम्न अथवा
नृसिंहानन्द-ब्रह्मचारीके सम्मुख ‘आविर्भूत’ होकर महाप्रभुने
लोगोंका उद्धार किया। (1) श्रीशचीके गृहमन्दिरमें,
(2) श्रीनित्यानन्द प्रभुके नर्त्तनस्थलपर, (3) श्रीवास-अङ्गनमें
कीर्त्तनस्थलपर एवं (4) श्रीराघवके भवनमें,—इन चार
स्थानोंपर महाप्रभु नित्य ‘आविर्भाव’ प्रकटित करते थे
(इसी अध्यायकी 34 संख्या देखें)॥ 5-6॥
तीन प्रकारके प्राकट्योंके फलका वर्णन;
महाप्रभुके ‘साक्षात्-दर्शन’का फल :-
साक्षात्-दर्शने सब जगत् तारिला।
एकबार ये देखिला, से कृतार्थ हइला॥ 7 ॥
अनुवाद—साक्षात्-दर्शन देकर महाप्रभुने समस्त
जगत्का उद्धार किया। एकबार भी जिसने उनका
दर्शन किया, वह कृतार्थ हो गया॥ 7॥
गौड़-देशेर भक्तगण प्रत्यब्द आसिया।
पुनः गौड़देशे याय प्रभुरे मिलिया॥ 8 ॥
अनुवाद—गौड़-देशके भक्तगण प्रत्येक वर्ष नीलाचल
आते थे। महाप्रभुसे मिलकर वे पुनः गौड़देशमें लौट
जाते थे॥ 8॥
आर नाना-देशेर लोक देखि’ जगन्नाथ।
चैतन्य-चरण देखि’ हइल कृतार्थ॥ 9 ॥
अनुवाद—अन्य देशोंके लोग भी श्रीजगन्नाथके
दर्शन करने आते थे और पुरीमें आकर श्रीचैतन्य
महाप्रभुके चरणोंका दर्शन करके कृतार्थ हो जाते
थे॥ 9॥
सप्तद्वीपेर लोक आर नवखण्डवासी।
देव, गन्धर्व, किन्नर—मनुष्य-वेशे आसि’ ॥ 10 ॥