सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2072, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2072

[ 2/98-107
दूसरा अध्याय
55
जीवज्ञान-कल्पित, ईश्वरे-सकल अज्ञान।
याहार श्रवणे भक्तेर फाटे मन-प्राण॥”99॥
महाप्रभुके ‘छोटा-हरिदास’ नामक कीर्तनीयाको अपने
घरपर बुलाकर कहा,-“तुम शिखि-माहितिकी बहन
माधवी देवीके घरमें जाकर मेरा नाम लेकर उनसे एक
‘मान’ श्वेत चावल माँगकर ले आओ॥”101-103॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 98-99॥
अमृतप्रवाह भाष्य-[श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,-]
“यद्यपि तुम्हारा चित्त कृष्णनिष्ठ होनेके कारण शाङ्कर-भाष्य
आदि सुनकर विकृत नहीं होता, तथापि उस मायावादमें,
‘ब्रह्म-चित्स्वरूप निराकार’; ‘यह जगत्-मायामात्र अथवा
मिथ्या’, ‘जीव वास्तवमें नहीं है,-वह केवल अज्ञान-कल्पित
है’ एवं ‘ईश्वरमें माया-मुग्धतारूप अज्ञान ही विद्यमान
है’ आदि विचार हैं। इन सब बातोंको सुननेसे भक्तोंको
अत्यन्त दुःख होता है॥”98-99॥
अनुभाष्य-पाठान्तरमें, ‘अड़ोया चाउलं’-‘अरोया’-
नामक आतप चावल (धानको उबालनेके बदले सूर्यमें
तपाकर प्राप्त चावल); ‘मान’-उड़ीसामें प्रचलित चावल
और अन्य अनाजके भार मापनेकी इकाई॥103॥
महाभागवत माधवीदेवीका परिचय :-
माहितिर भगिनीर नाम-माधवी देवी।
वृद्धा तपस्विनी आर परमा वैष्णवी॥104॥
अनुभाष्य-आदिलीला 5/58 संख्या एवं 7/113,
121-126 संख्या देखें॥ 98-99॥
अनुवाद-श्रीमाहितिकी बहनका नाम माधवी देवी
था। वे वृद्धा, तपस्विनी तथा परम-वैष्णवी थीं॥104॥
आचार्यको श्रीस्वरूपके वचनोंके वास्तविक अर्थकी
उपलब्धि और छोटे भाईको अपने गाँवमें भेजना :-
लज्जा-भय पाञा आचार्य मौन हइला।
आर दिन गोपालेरे देशे पाठाइला॥100॥
महाप्रभुके समस्त भक्तोंमें-से केवल
साढ़े तीन जन ही श्रीमतीके गण :-
प्रभु लेखा करे यारे-‘राधिकार गण’।
जगतेर मध्ये ‘पात्र’-साड़े तिनजन॥105॥
स्वरूप गोसाञि आर राय-रामानन्द।
शिखि-माहिति-तिन, ताँर भगिनी-अर्द्धजन॥106॥
अनुवाद-श्रीभगवान् आचार्य बहुत लज्जित और
भयभीत हो गये तथा वे कुछ नहीं कह सके। उन्होंने
अगले दिन ही गोपालको अपने ग्राममें भेज दिया॥100॥
अनुवाद-महाप्रभु जिन्हें ‘श्रीमती राधिकाका गण’
कहकर गिनते थे, ऐसे पात्र इस जगत्में केवल साढ़े
तीन व्यक्ति ही थे। श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीरामानन्द राय,
श्रीशिखि माहिति-ये तीन लोग और श्रीशिखि माहितिकी
बहन श्रीमाधवी देवीको आधा गिनकर कुल साढ़े तीन
व्यक्ति होते हैं॥105-106॥
अन्य एकदिन छोटे-हरिदासको महाप्रभुके भोजनके उद्देश्यसे
श्रीमाधवीदेवीसे चावल लानेके लिये भेजना :-
एकदिन आचार्य प्रभुरे कैला निमन्त्रण।
घरे भात करि’ करे विविध व्यञ्जन॥101॥
माधवीदेवीसे हरिदासके द्वारा सूक्ष्म-चावल लाना
और आचार्यके द्वारा रसोई बनाना :-
ताँर ठाञि तण्डुल मागि’ आनिल हरिदास।
तण्डुल देखि’ आचार्येर अधिक उल्लास॥107॥
‘छोट हरिदास’ नाम प्रभुर कीर्त्तनीया।
ताहारे कहेन डाकि’ आपने आनिया॥102॥
“मोर नामे शिखि-माहितिर भगिनी-स्थाने गिया।
शुक्लचाउल एक मान आनह मागिया॥”103॥
अनुवाद-छोटे-हरिदास श्रीमाधवी देवीसे चावल
माँगकर ले आये। उन चावलोंको देखकर श्रीभगवान्
आचार्यको बहुत आनन्द हुआ॥107॥
अनुवाद-एकदिन श्रीभगवान् आचार्यने महाप्रभुको
निमन्त्रण किया। वे घरपर ही चावल और अनेक
प्रकारके पकवान बनानेके लिये तत्पर हुए। उन्होंने