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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2057

40 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/205-213 ]
महाप्रभु अपनी इच्छाके द्वारा चालित भक्तके द्वारा अप्राकृत
व्रजरसके माहात्म्यका प्रचार करनेवाले :-
भक्ते कृपा-हेतु प्रकाशिते चाह व्रज-रस।
यारे कराओ, सेइ करिबे जगत् तोमार वश॥"205॥
अनुवाद-भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही आप
व्रज-रसको प्रकाशित करवाना चाहते हैं। आप जिसके
द्वारा करवायेंगे, वही करेगा, क्योंकि समस्त जगत् ही
आपके वशमें है॥"205॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपको आलिङ्गन, श्रीरूपके
द्वारा भक्तोंके चरणोंकी वन्दना :-
तबे महाप्रभु कैला रूपे आलिङ्गन।
ताँरे कराइला सबार चरण-वन्दन॥206॥
अनुवाद-तब महाप्रभुने श्रीरूपका आलिङ्गन किया
और उन्होंने श्रीरूपसे सभी भक्तोंके चरणोंकी वन्दना
करवायी॥206॥
श्रीनित्यानन्द-अद्वैतादि सभीके
द्वारा श्रीरूपको आलिङ्गन :-
अद्वैत-नित्यानन्दादि सब भक्तगण।
कृपा करि' रूपे सबे कैला आलिङ्गन॥207॥
अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द आदि
सभी भक्तोंने श्रीरूपको आलिङ्गन करके उनके ऊपर
कृपाका वर्षण किया॥207॥
श्रीरूपके प्रति महाप्रभुकी कृपा और श्रीरूपके
कृष्णाकर्षक गुण-दर्शनसे सभीको विस्मय :-
प्रभु-कृपा रूपे, आर रूपेर सद्गुण।
देखि' चमत्कार हैल सबाकार मन॥208॥
अनुवाद-महाप्रभुकी श्रीरूपके प्रति कृपा तथा
श्रीरूपके सद्गुण-इन्हें देखकर सभी भक्तोंके मनमें बड़ा
आश्चर्य हुआ॥208॥
श्रीरूपका ठाकुर-श्रीहरिदासके द्वारा आलिङ्गन :-
तबे महाप्रभु सब भक्त लञा गेला।
हरिदास-ठाकुर रूपे आलिङ्गन कैला॥209॥
अनुवाद-तब महाप्रभु अपने समस्त भक्तोंको
अपने साथ लेकर चले गये। श्रीहरिदास ठाकुरने भी
श्रीरूपको आलिङ्गन किया॥209॥
श्रीहरिदासके द्वारा श्रीरूपके सौभाग्यकी प्रशंसा :-
हरिदास कहे,-"तोमार भाग्येरे नाहि सीमा।
ये-सब वर्णिला, इहार के जाने महिमा?"210॥
अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,-"तुम्हारे
सौभाग्यकी सीमा नहीं है। तुमने जो सब वर्णन किया
है, उसकी महिमाको कौन जान सकता है?"210॥
श्रीरूपके द्वारा दैन्यज्ञापन, स्वयंको
यन्त्री-महाप्रभुका यन्त्र मानना :-
श्रीरूप कहेन,-"आमि किछुइ ना जानि।
येइ महाप्रभु कहान, सेइ कहि वाणी॥"211॥
अनुवाद-श्रीरूप गोस्वामीने कहा,-"मैं कुछ भी
नहीं जानता हूँ। महाप्रभु मुझसे जो कहलवाते हैं, मैं
वही कहता हूँ॥"211॥
भःरःसिः (1/1/2) में-
हृदि यस्य प्रेरणया प्रवर्त्तितोऽहं वराकरूपोऽपि।
तस्य हरेः पदकमलं वन्दे चैतन्यदेवस्य॥212॥
अनुवाद-हृदयमें जिनकी प्रेरणाके द्वारा सामान्य
कङ्गालरूपी मैं भक्तिग्रन्थकी रचनामें प्रवृत्त हुआ हूँ, उन
श्रीचैतन्यदेव हरिके चरणकमलोंकी मैं वन्दना करता
हूँ॥212॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 19/134 संख्या देखें॥212॥
श्रीरूप और श्रीहरिदासका कृष्णकथा-आलाप :-
एइमत दुइजन कृष्णकथारङ्गे।
सुखे काल गोङाय रूप हरिदास-सङ्गे॥213॥