श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2064, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 2/27-36 दूसरा अध्याय 47
अनुवाद—श्रीनकुल ब्रह्मचारीने कहा,–"शिवानन्द
सेन कुछ दूरीपर हैं। दो-चार लोग जाकर उन्हें
बुलाकर ले आओ ॥"27॥
चारिदिके धाय लोके 'शिवानन्द' बलि' ।
“शिवानन्द कोन्, तोमाय बोलाय ब्रह्मचारी ॥ "28॥
अनुवाद—लोग 'शिवानन्द' बोलते हुए चारों दिशाओंमें
दौड़ पड़े और उनको पुकारते हुए कहने लगे,–"शिवानन्द
कौन हैं? आपको श्रीनकुल ब्रह्मचारी बुला रहे
हैं॥"28॥
श्रीशिवानन्दका शीघ्र आना :—
शुनि' शिवानन्द सेन ताँहा शीघ्र आइल।
नमस्कार करि' ताँर निकटे बसिल ॥ 29 ॥
अनुवाद—उन लोगोंकी पुकारको सुनकर श्रीशिवानन्द
सेन शीघ्रतासे वहाँ आ गये और श्रीनकुल ब्रह्मचारीको
नमस्कार करके उनके निकट बैठ गये ॥ 29 ॥
श्रीशिवानन्दके सन्देहका भङ्ग होना :—
ब्रह्मचारी बोले,–“तुमि करिला संशय।
एक मना हञा ताहा शुनह निश्चय ॥ 30॥
'गौरगोपाल-मन्त्र' तोमार चारि अक्षर।
अविश्वास छाड़, येइ करियाछ अन्तर ॥"31 ॥
अनुवाद—तब श्रीनकुल ब्रह्मचारीने श्रीशिवानन्दसे
कहा,–“आपने मुझपर संशय किया। अब आप
एकाग्रचित्त होकर उसका प्रमाण सुनो। आप चार
अक्षरवाले 'गौरगोपाल-मन्त्र'का जप करते हैं। आपके
हृदयमें जो अविश्वास है, अब उसे छोड़ो ॥"30-31॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'गौरगोपाल-मन्त्र',—गौरवादिगण
'गौराङ्ग'-नामसे चार-अक्षरवाले गौरमन्त्रको लक्ष्य करते
हैं; केवल-कृष्णावादिगण इस 'गौरगोपालमन्त्र'-शब्दसे
राधा-कृष्णके चार-अक्षरवाले मन्त्रको लक्ष्य करते
हैं॥ 31 ॥
अनुभाष्य—'अन्तर'—मनमें ॥ 31 ॥
श्रीशिवानन्दका विश्वास :—
तबे शिवानन्देर मने प्रतीति हइल।
अनेक सम्मान करि' बहु भक्ति कैल ॥ 32 ॥
अनुवाद—तब श्रीशिवानन्द सेनके हृदयमें यह पूर्ण
विश्वास हुआ कि श्रीनकुल ब्रह्मचारीमें महाप्रभुका
आवेश हुआ है और उन्होंने सम्मानपूर्वक उनकी बहुत
सेवा की ॥ 32 ॥
एइमत महाप्रभुर अचिन्त्य प्रभाव।
एबे शुन प्रभुर यैछे हय 'आविर्भाव' ॥ 33 ॥
अनुवाद—इस प्रकारसे महाप्रभुके अचिन्त्य प्रभावको
समझना चाहिये। महाप्रभुका 'आविर्भाव' जिस प्रकार
होता है, अब उसके विषयमें श्रवण करो ॥ 33 ॥
प्रेमसे आकृष्ट महाप्रभुके
'नित्य-आविर्भाव'के चार स्थान :—
शचीर मन्दिरे, आर नित्यानन्द-नर्त्तने।
श्रीवास-कीर्त्तने आर राघव-भवने ॥ 34 ॥
एइ चारि ठाञि, प्रभुर सदा 'आविर्भाव' ।
प्रेमाविष्ट हय–प्रभुर सहज स्वभाव ॥ 35 ॥
अनुवाद—श्रीशचीमाताके घरके मन्दिरमें, श्रीनित्यानन्द
प्रभुके नृत्य करनेके स्थानमें, श्रीवास पण्डितके घरपर
कीर्त्तनके समयमें और श्रीराघव पण्डितके भवनमें–इन
चारों स्थानोंपर महाप्रभुका सदा 'आविर्भाव' होता है।
भक्तोंके प्रेमसे आकृष्ट होकर महाप्रभुका आविर्भाव
होता है—यह महाप्रभुका सहज-स्वभाव है ॥ 34-35 ॥
कभी-कभी 'आविर्भाव'का दृष्टान्त; प्रद्युम्न अथवा
नृसिंह ब्रह्मचारीके वृत्तान्तका वर्णन :—
नृसिंहानन्देर आगे आविर्भूत हञा।
भोजन करिला, ताहा शुन मन दिया ॥ 36 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीनृसिंहानन्दके समक्ष आविर्भूत