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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2063, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2063

46 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/17-27 ]
उद्धार करनेकी इच्छा हुई, तब महाप्रभुने श्रीनकुल चैतन्येर आवेश हय नकुलेर देहे।
ब्रह्मचारीके हृदयमें अपना ‘आवेश’ प्रकाशित किया॥ 17॥ शुनि' शिवानन्द आइला करिया सन्देहे ॥ 22 ॥
ग्रहग्रस्तप्राय नकुल प्रेमाविष्ट हञा। श्रीशिवानन्दका संशय और परीक्षा लेनेकी इच्छा :—
हासे, कान्दे, नाचे गाय उन्मत्त हञा ॥ 18 ॥ परीक्षा करिते ताँर यबे इच्छा हैल।
बाहिरे रहिया तबे विचार करिल ॥ 23 ॥
अश्रु, कम्प, स्तम्भ, स्वेद, सात्त्विक विकार। श्रीशिवानन्दका विचार और दूरमें अवस्थान :—
निरन्तर प्रेमे नृत्य, सघन हुङ्कार ॥ 19 ॥ 'आपने बोलान मोरे, इहा यदि जानि।
अनुवाद—भूतग्रस्त व्यक्तिका जिस प्रकार अपने आमार इष्ट-मन्त्र जानि' कहेन आपनि ॥ 24 ॥
शरीरपर नियन्त्रण नहीं रहता, उसी प्रकार महाप्रभुका तबे जानि, इँहाते हय चैतन्य-आवेशे।'
'आवेश' आनेसे श्रीनकुल ब्रह्मचारी प्रेमाविष्ट हो गये। एत चिन्ति' शिवानन्द रहिला दूरदेशे ॥ 25 ॥
वे उन्मत्त होकर कभी तो हँसने लगे, कभी रोने लगे
तथा कभी नृत्य-गान करने लगे। उनकी देहमें अश्रु, अनुवाद—श्रीनकुल ब्रह्मचारीकी देहमें श्रीचैतन्यदेवका
कम्प, स्तम्भ और स्वेद (पसीना आना) आदि आवेश हुआ है, यह सुनकर श्रीशिवानन्द सेनको कुछ
अष्ट-सात्त्विक विकार प्रकाशित होने लगे। वे प्रेममें सन्देह हुआ, इसलिये वे वहाँपर आये। जब उनके
डूबकर निरन्तर नृत्य और ज़ोरसे हुङ्कार करने मनमें श्रीनकुल ब्रह्मचारीकी परीक्षा करनेकी इच्छा हुई,
लगे॥ 18-19॥ तब वे श्रीनकुल ब्रह्मचारीके घरसे बाहर रहकर विचार
तैछे गौरकान्ति, तैछे सदा प्रेमावेश। करने लगे,—‘यदि नकुल ब्रह्मचारी यह जान जायँ कि
ताहाते देखिते आइसे सर्व गौड़देश ॥ 20 ॥ मैं यहाँ हूँ और वे मुझे स्वयं ही भीतर बुलायें एवं
मेरे इष्ट-मन्त्रको जानकर वे स्वयं उसे मुझे बतला दें,
अनुवाद—महाप्रभुकी भाँति श्रीनकुल ब्रह्मचारीकी तभी मैं मानूँगा कि उनमें श्रीचैतन्यदेवका आवेश हुआ
अङ्गकान्ति भी गौरवर्णकी हो गयी और उनमें निरन्तर है।' ऐसा विचारकर श्रीशिवानन्द सेन कुछ दूरीपर ही
प्रेमका आवेश होने लगा। गौड़देशमें सभी स्थानोंसे लोग खड़े रहे॥ 22-25॥
उनके दर्शन करनेके लिये आने लगे॥ 20॥
असंख्य लोकेर घटा,—केह आइसे याय।
अनुभाष्य—'सर्वगौड़देश',—समस्त गौड़देशवासी लोकेर संघट्टे केह दर्शन ना पाय ॥ 26 ॥
(गौड़ीयगण)॥ 20॥
अनुवाद—वहाँ असंख्य लोगोंकी भीड़ थी—कोई
ब्रह्मचारीका उपदेश :— आ रहा था, तो कोई जा रहा था। लोगोंकी भीड़के
याँरे देखे ताँरे कहे, — 'कह कृष्णनाम'। कारण किसी-किसीको तो श्रीनकुल ब्रह्मचारीके दर्शन
ताँहार दर्शने लोक हय प्रेमोद्दाम ॥ 21 ॥ भी प्राप्त नहीं हो रहे थे॥ 26॥
अनुवाद—श्रीनकुल ब्रह्मचारी जिसे भी देखते, श्रीशिवानन्दको अपने निकट बुलानेके
उसीको कहते,—'कृष्णनाम बोलो'। उनके दर्शनसे ही लिये लोगोंको भेजना :—
सभी लोग प्रेममें प्रमत्त हो उठते ॥ 21 ॥ ब्रह्मचारी कहे, — “शिवानन्द आछे दूरे।
अनुभाष्य—'प्रेमोद्दाम',—प्रेममें प्रमत्त॥ 21॥ जन दुइ-चारि याह, बोलाह ताहारे ॥”27 ॥