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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2067, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2067

50 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 2/54-65 ]
पाक-सामग्री आनह, आमि याहा चाइ।”
ये मागिल, शिवानन्द आनि' दिला ताइ ॥ 58 ॥
अनुवाद—श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने दो दिन तक
ध्यान करनेके बाद श्रीशिवानन्द सेनसे कहा, —“मैं
महाप्रभुको पाणिहाटि-ग्राम तक ले आया हूँ। कल
दोपहर तक वे आपके घरपर आ जायेंगे। आप रसोई
बनानेकी समस्त सामग्री लाकर मुझे दो, मैं स्वयं उन्हें
भोजन बनाकर खिलाऊँगा। तभी मैं उन्हें यहाँ शीघ्रतासे
ले आऊँगा। मेरी बातपर पूर्ण विश्वास रखो, मैं सत्य
कह रहा हूँ, कुछ सन्देह मत करना। मैं जो कुछ भी
चाहता हूँ, आप शीघ्रतासे उसे लाकर दे दो, क्योंकि
मैं अभी भोजन बनाना प्रारम्भ करना चाहता हूँ। मुझे
जो भी भोजनकी सामग्री चाहिये, आप उसे लेकर
आइये।” श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने जो कुछ माँगा,
श्रीशिवानन्द सेनने वह लाकर दे दिया ॥ 54-58 ॥
प्रद्युम्नका रसोई बनाना और महाप्रभु, श्रीजगन्नाथ एवं
अपने इष्टदेव श्रीनृसिंह, प्रत्येकके लिये तीन
अलग-अलग नैवेद्य-भोग सजाना :-
प्रातःकाल हैते पाक करिला अपार।
नाना सूप, व्यञ्जन, पिठा, क्षीर-उपहार ॥ 59 ॥
अनुवाद—श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने प्रातःकालसे
प्रारम्भकर बहुतसे पकवान जैसे अनेक प्रकारकी
रसेदार सब्जियाँ, व्यञ्जन, पीठा-पाना और खीर तथा
दूधसे अनेक मिठाइयाँ बनायीं ॥ 59 ॥
जगन्नाथेर भिन्न भोग पृथक् बाड़िल।
चैतन्यप्रभुर लागि' आर भोग कैल ॥ 60 ॥
इष्टदेव नृसिंह लागि' पृथक् बाड़िल।
तिनजने समर्पिया बाहिरे ध्यान कैल ॥ 61 ॥
अनुवाद—श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने श्रीजगन्नाथदेव और
महाप्रभुके प्रिय व्यञ्जनोंको पृथक्-पृथक् करके उन्हें
भोग अर्पित किया। फिर अपने इष्टदेव श्रीनृसिंहदेवके
लिये बनाये गये भोगको भी पृथक् सजाया। इस प्रकार
उन्होंने तीन भाग करके भोग निवेदन किया। तब वे
बाहर बैठकर ध्यान करने लगे ॥ 60-61 ॥
ब्रह्मचारीके ध्यानमें 'आविर्भूत' महाप्रभुके द्वारा
तीनों नैवेद्योंको खाना :-
देखे, शीघ्र आसि' बसिला चैतन्य-गोसाञि।
तिन भोग खाइला, किछु अवशिष्ट नाइ ॥ 62 ॥
अनुवाद—श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारीने ध्यानमें देखा
कि महाप्रभु शीघ्रतासे आकर बैठ गये और तीनों भोग
खा गये, उन्होंने कुछ भी नहीं छोड़ा ॥ 62 ॥
ऐसा देखकर प्रद्युम्नके हृदयमें आनन्द,
बाहरमें दुःखका आभास :-
आनन्दे विह्वल प्रद्युम्न, पड़े अश्रुधार।
“हाहा किबा कर” बलि' करये फुत्कार ॥ 63 ॥
अनुवाद—यद्यपि महाप्रभुको सम्पूर्ण भोग ग्रहण
करते देखकर श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी आनन्दसे विह्वल हो
रहे थे और उनके नेत्रोंसे अश्रुओंकी धारा प्रवाहित हो
रही थी, तथापि वे बाहरसे दुःख प्रकट करते हुए कह
रहे थे,—“हाय! हाय! [महाप्रभु!] आप यह क्या कर
रहे हैं?” 63 ॥
महाप्रभुके प्रति प्रद्युम्नका आरोप;
अपने इष्टदेव श्रीनृसिंहके प्रति निष्ठा :-
“जगन्नाथे-तोमाय ऐक्य, खाओ ताँर भोग।
नृसिंहेर भोग केने कर उपयोग ॥ 64 ॥
नृसिंहेर जानि हैल आजि उपवास।
ठाकुर उपवासी रहे, जिये कैछे दास?? 65 ॥
अनुवाद—“हे महाप्रभु! आप और श्रीजगन्नाथ तो
एक ही हैं, इसलिये आप यदि उनका भोग खा लेते
हैं, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। किन्तु आप श्रीनृसिंह
भगवान्का भोग क्यों ग्रहण कर रहे हो? मैं देख रहा