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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

उन्नीसवाँ अध्याय 19/234-245 ]
अनुवाद—(महाप्रभु अब उपसंहार करते हुए कह
रहे हैं)—इस प्रकार मैंने तुम्हें भक्तिरसका दिग्दर्शन
कराया है। इसे विस्तृत रूपसे जाननेके लिये तुम
इसपर मनन करना। मनन करते-करते श्रीकृष्ण तुम्हारे
हृदयमें स्फुरित होंगे। श्रीकृष्णकी कृपासे अज्ञ व्यक्ति भी
रससिन्धुके तट तक पहुँच जाता है॥ 234-235 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—शान्तकी 'कृष्णनिष्ठा', दास्यकी
'अतिशय सेवा', सख्यकी 'असङ्कोच सेवा' और वात्सल्यका
'ममताधिक्य लालन'—इन सब भावोंमें और कान्ता-
भाव-गत 'निजाङ्ग-दानरूप-सेवा' दृढ़रूपसे संयुक्त होनेपर
पाँच गुणोंसे युक्त 'मधुर-रस' होता है। उसमें सभी
भावोंका ही संग्रह है। इसलिये आस्वादनका आधिक्य
होनेके कारण इसमें अत्यन्त चमत्कारिता लक्षित होती
है। संक्षेपमें कहे गये इस भक्ति-रसका सूत्र ही
विचारपूर्वक भक्तिरसामृतसिन्धु-रूप शास्त्रको उदित
करायेगा ॥ 234-235 ॥
उन्नीसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
प्रयागसे महाप्रभुकी काशी यात्रा :—
एत बलि' प्रभु ताँरे कैला आलिङ्गन।
वाराणसी चलिबारे प्रभुर हैल मन ॥ 236 ॥
प्रभाते उठिया यबे करिला गमन।
तबे ताँर पदे रूप करे निवेदन ॥ 237 ॥
महाप्रभुके अनुगमनके लिये श्रीरूपकी आज्ञा-याचना :—
“आज्ञा-हय, आसि मुञि श्रीचरण-सङ्गे।
सहिते ना पारि मुञि विरह-तरङ्गे ॥ ” 238 ॥
अनुवाद—इतना कहकर महाप्रभुने श्रीरूपका
आलिङ्गन किया। महाप्रभुने अब वाराणसी जानेका
निश्चय किया। अगले दिन प्रातःकाल उठकर जब
महाप्रभु जाने लगे, तब श्रीरूप गोस्वामीने उनके
चरणकमलोंमें निवेदन किया,—“यदि आपकी आज्ञा हो,
तो मैं भी आपके साथ चलूँ, मैं आपके विरहकी
तरङ्गको सहन नहीं कर सकता ॥ ” 236-238 ॥
श्रीरूपको वृन्दावन जाने और बादमें वहाँसे
पुरीमें आकर मिलनेकी आज्ञा देना :—
प्रभु कहे,—“तोमार कर्त्तव्य, आमार वचन।
निकटे आसियाछ तुमि, याह वृन्दावन ॥ 239 ॥
वृन्दावन हैते तुमि गौड़देश दिया।
आमारे मिलिबा नीलाचलेते आसिया ॥ ” 240 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“मेरे वचनका पालन
करना तुम्हारा कर्त्तव्य है। तुम वृन्दावनके निकट आ
पहुँचे हो, इसलिये वृन्दावन जाओ। वृन्दावनसे तुम
गौड़देश (बङ्गाल) होते हुए मुझसे नीलाचलमें आकर
मिलना ॥ ” 239-240 ॥
महाप्रभुका नौकापर चढ़ना, श्रीरूपकी मूर्च्छा :—
ताँरे आलिङ्गिया प्रभु नौकाते चड़िला।
मूर्च्छित हञा तेंहो ताहाञि पड़िला ॥ 241 ॥
अनुवाद—श्रीरूपको आलिङ्गन करके महाप्रभु नौकापर
चढ़ गये। श्रीरूप मूर्च्छित होकर वहींपर गिर पड़े॥ 241 ॥
श्रीरूप और अनुपमकी वृन्दावन-यात्रा :—
दाक्षिणात्य-विप्र ताँरे घरे लञा गेला।
तबे दुइ भाइ वृन्दावनेरे चलिला ॥ 242 ॥
अनुवाद—दक्षिण भारतीय ब्राह्मण उनको अपने
घरपर ले गये। तब वहाँसे दोनों भाई (श्रीरूप और
श्रीवल्लभ) वृन्दावनकी ओर चल दिये ॥ 242 ॥
महाप्रभुका काशीमें आगमन :—
महाप्रभु चलि' चलि' आइला वाराणसी।
चन्द्रशेखर मिलिला ग्रामेर बाहिरे आसिं ॥ 243 ॥
वैद्य शेखरके स्वप्नके अनुसार महाप्रभुका
दर्शन और अपने घरमें लाना :—
रात्रे तेंहो स्वप्न देखे, — प्रभु आइला घरे।
प्रातःकाले आसिं' रहे ग्रामेर बाहिरे ॥ 244 ॥
आचम्बिते प्रभु देखि' चरणे पड़िला।
आनन्दित हञा निज-गृहे लञा गेला ॥ 245 ॥
। 217

[ 19/243-254 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद-महाप्रभु चलते-चलते वाराणसी आ पहुँचे।
श्रीचन्द्रशेखर नगरसे बाहर आकर उनसे मिले। रात्रिके
समय श्रीचन्द्रशेखरने स्वप्न देखा था कि महाप्रभु उनके
घरपर आये हैं। इसलिये वे प्रातःकालमें ही महाप्रभुको
लेने नगरके बाहर आ गये। अचानक महाप्रभुको
देखकर श्रीचन्द्रशेखर उनके चरणकमलोंमें गिर पड़े
और आनन्दित होकर उन्हें अपने घरपर ले
गये॥ 243-245 ॥
महाप्रभुको श्रीतपनमिश्रका और बलभद्रको
श्रीचन्द्रशेखरका निमन्त्रण :-
तपनमिश्र शुनि' आसि' प्रभुरे मिलिला।
इष्टगोष्ठी करि' प्रभुर निमन्त्रण कैला ॥ 246 ॥
निज घरे लञा प्रभुरे भिक्षा कराइल।
भट्टाचार्ये चन्द्रशेखर निमन्त्रण कैल॥ 247 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके आगमनके विषयमें सुनकर
श्रीतपनमिश्र श्रीचन्द्रशेखरके घरपर आकर उनसे मिले।
वहाँपर वार्तालाप करनेके बाद उन्होंने महाप्रभुको अपने
घर आनेका निमन्त्रण दिया। श्रीतपनमिश्र महाप्रभुको
अपने घरपर ले गये और उन्होंने महाप्रभुको भोजन
कराया। श्रीबलभद्र भट्टाचार्यको श्रीचन्द्रशेखरने भोजनका
निमन्त्रण दिया॥ 246-247 ॥
काशीमें रहनेके समय तक महाप्रभुको भिक्षा
देनेके लिये मिश्रकी आज्ञाकी याचना :-
भिक्षा-कराञा मिश्र कहे प्रभु-पाय धरि'।
“एक भिक्षा मागि, मोरे देह कृपा करि' ॥ 248 ॥
यावत् तोमार हय काशीपुरे स्थिति।
मोर घर बिना भिक्षा ना करिबा कति ॥” 249 ॥
अनुवाद-महाप्रभुको भोजन करानेके बाद श्रीतपन
मिश्रने महाप्रभुके श्रीचरणकमलोंको पकड़कर कहा,-“मैं
आपसे एक भिक्षा माँगता हूँ, कृपा करके आप मुझे
वह भिक्षा प्रदान कीजिये। जब तक आप काशीमें
रहेंगे, मेरे घरके अतिरिक्त अन्य कहीं भी भोजन ग्रहण
मत कीजियेगा॥” 248-249 ॥
मायावादी संन्यासियोंके सङ्गको दुःसङ्ग जानकर महाप्रभुके
द्वारा भक्तकी प्रार्थनापर सम्मति :-
प्रभु जानेन—'दिन पाँच-सात से रहिब।
संन्यासीर सङ्गे भिक्षा काँहा ना करिब ॥' 250 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीतपनमिश्रके घरमें भिक्षा तथा
श्रीचन्द्रशेखरके घरमें रहना :-
एत जानि' ताँर भिक्षा कैला अङ्गीकार।
वासा-निष्ठा कैला चन्द्रशेखरेर घर ॥ 251 ॥
अनुवाद-महाप्रभु जानते थे,—'मैं काशीमें पाँच-सात
दिन ही रहूँगा और मायावादी संन्यासियोंके साथ कहींपर
भी भिक्षा ग्रहण नहीं करूँगा।' ऐसा जाननेके कारण
महाप्रभुने श्रीतपनमिश्रकी भिक्षाके निमन्त्रणको स्वीकार
कर लिया, किन्तु उन्होंने श्रीचन्द्रशेखरके घरमें ही
रहनेका निश्चय किया॥ 250-251 ॥
महाराष्ट्र
महाराष्ट्र
प्रभु ताँरे स्नेह करि' कृपा प्रकाशिला ॥ 252 ॥
महाप्रभु आइला शुनि' शिष्ट शिष्ट जन।
ब्राह्मण, क्षत्रिय आसि' करेन दरशन ॥ 253 ॥
अनुवाद-महाराष्ट्र
मिले। महाप्रभुने उन्हें बहुत स्नेह करके कृपा प्रकाशित
की। महाप्रभुके आनेका समाचार सुनकर ब्राह्मण तथा
क्षत्रिय समाजके सज्जन व्यक्तियोंने आकर उनका दर्शन
किया ॥ 252-253 ॥
श्रीरूप-शिक्षाका संक्षेपमें वर्णन :-
श्रीरूप-उपरे प्रभुर यत कृपा हैल।
अत्यन्त विस्तार-कथा संक्षेपे कहिल ॥ 254 ॥
218 |

उन्नीसवाँ अध्याय 19/254-256 ]
अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीपर महाप्रभुकी जितनी श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
कृपा हुई, उस अत्यन्त विस्तृत कथाको मैंने केवल चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 256॥
संक्षेपमें ही वर्णन किया है ॥ 254 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे श्रीरूपानुग्रहो नाम
श्रीरूपशिक्षा-श्रवणसे श्रीचैतन्यचरणोंमें प्रेमभक्ति-प्राप्ति :- ऊनविंश-परिच्छेदः।
श्रद्धा करि' एइ कथा सुने येइ जने। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी
प्रेमभक्ति पाय सेइ चैतन्य-चरणे ॥ 255 ॥ कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका
वर्णन कर रहा है ॥ 256 ॥
अनुवाद—श्रद्धापूर्वक जो व्यक्ति इस कथाका श्रवण
करता है, उसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके श्रीचरणकमलोंमें श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें श्रीरूपानुग्रह-नामक उन्नीसवें
प्रेमभक्तिकी प्राप्ति होती है ॥ 255 ॥ अध्यायका अनुवाद समाप्त।
। 219

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
220 ।

बीसवाँ अध्याय
कथासार—जब श्रीसनातन गोस्वामी गौड़देशकी
कारागारमें बन्द थे, तब श्रीरूपगोस्वामीने उन्हें पत्रमें
लिखा,—‘महाप्रभु मथुरा गये हैं।’ श्रीसनातनने कारागारके
रक्षकको मीठे वचन कहकर सात हजार मुद्राएँ दीं और
गङ्गा पार करके पलायन कर गये। साथी ईशानके पास
आठ स्वर्णमुद्राएँ होनेके कारण पातड़ा-पर्वतके जमींदारने
उन मुद्राओंको हरण करनेकी आशासे श्रीसनातनका
आतिथ्य-सत्कार किया। ईशानसे पूछनेपर श्रीसनातनको
पता चला कि उसके पास स्वर्णमुद्राएँ हैं। उन
मुद्राओंको अनर्थरूप जानकर उन्हें जमींदारको देकर
उन्होंने पर्वतमय देशको पार किया। पर्वत पार करके
श्रीसनातनने ईशानको देश जानेके लिये विदायी दी।
हाजिपुर पहुँचनेपर उनके बहनोई राजकर्मचारी श्रीकान्त
उनसे मिले और समस्त वृत्तान्त सुनकर उन्हें गङ्गा पार
करा दी। तब श्रीसनातन चलते-चलते काशीधाममें
आकर श्रीचन्द्रशेखरके द्वारपर पहुँचे; महाप्रभुने उन्हें
बुलवाया और उनके प्रति कृपा दिखलाते हुए उन्हें वेश
बदलने और भद्र (सज्जन) व्यक्तिकी भाँति दिखने
आज्ञा दी। श्रीसनातन केश मुँड़वाकर और स्नान करके
आये एवं उन्होंने श्रीतपनमिश्रके द्वारा दिये गये पुराने
वस्त्रको कौपीन और बहिर्वास बनाकर पहन लिया।
बादमें उन्होंने अपने साथ लाये मूल्यवान कम्बलको
गङ्गातटपर एक फटे-पुराने चिथड़ेसे बदलकर उसे
धारण करके महाप्रभुको आनन्दित किया। श्रीसनातनने
वहाँ रहकर जब महाप्रभुसे तत्त्वकी जिज्ञासा की, तब
महाप्रभुने पहले ‘जीवके स्वरूप’ और ‘श्रीकृष्णशक्ति’के
विषयमें समझाया, बादमें सम्बन्ध-ज्ञान सिखलाकर
अभिधेय-रूपा भक्तिकी व्याख्या की। श्रीकृष्णके
स्वरूप-विचारमें ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्‌का विचार,
स्वयंरूप और तदेकात्म और आवेश, उनमें ‘वैभव’
और ‘प्रभाव’-विलास आदिके विचारसे भगवान्‌की मूर्तियोंके
भेद आदिके विषयमें बतलाया; उसके बाद पुरुषावतारके
माया-वैभव, मन्वन्तरावतार, गुणावतार, शक्त्यावेशावतार
और बाल्य-पौगण्ड-अवस्थाके भेदसे सभी लीलाओं एवं
किशोर-लीलाकी नित्यताकी व्याख्या की।
—(अमृतप्रवाह भाष्य)
वन्देऽनन्ताद्भुतैश्वर्यं श्रीचैतन्यमहाप्रभुम्।
नीचोऽपि यत्प्रसादात् स्याद्भक्तिशास्त्रप्रवर्त्तकः॥ 1॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिनकी कृपासे नीच व्यक्ति भी
भक्तिशास्त्रका प्रवर्त्तक हो सकता है, उन अनन्त-अद्भुत-
ऐश्वर्यसे युक्त श्रीचैतन्यमहाप्रभुकी मैं वन्दना करता
हूँ॥ 1॥
अनुभाष्य—
यत्प्रसादात् (यस्य कृपया) नीचः (विषयी) अपि
भक्ति-शास्त्र-प्रवर्त्तकः (भक्तिशास्त्रलेखकः) स्यात्, तम्
अनन्ताद्भुतैश्वर्यम् (अशेषापूर्व्वैश्वर्यपूर्णं) श्रीचैतन्यमहाप्रभुम् अहं
वन्दे।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1॥
जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥ 2॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, श्रीनित्यानन्द
प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्र प्रभुकी जय हो, सभी
गौरभक्तोंकी जय हो॥ 2॥
बन्दी श्रीसनातनको श्रीरूपके द्वारा लिखित पत्र-प्राप्ति :-
एथा गौड़े सनातन आछे बन्दिशाले।
श्रीरूप-गोसाञिर पत्री आइल हेनकाले॥ 3॥
अनुवाद—जब श्रीसनातन गौड़देशमें कारागारमें बन्द
। 221

[ 20/3-13 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
थे, तब उनके पास श्रीरूप-गोस्वामीका एक पत्र
आया॥ ३॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'पत्री' - उद्भटचन्द्रिका-ग्रन्थके
टीकाकारने लिखा है कि निम्नलिखित श्लोक श्रीरूपने
बाक्लासे लिखकर गौड़देशके कारागारमें श्रीसनातनके
पास भेजा था। इस श्लोकमें महाप्रभुके मथुरा जानेका
सङ्केत होनेके कारण इसे श्रीरूप गोस्वामीकी पत्री
कहकर विश्वास किया जा सकता है-
“यदुपतेः क्व गता मथुरापुरी, रघुपतेः क्व गतोत्तरकोशला।
इति विचिन्त्य कुरुष्व मनः स्थिरं, न सदिदं जगदित्यवधारय॥”
[अर्थात् “यदुपतिकी मथुरापुरी कहाँ गयी है, रघुपतिकी
ही उत्तरकोशला (अयोध्या) कहाँ गयी है-इसपर
विशेषरूपसे चिन्ता करके मन स्थिर कीजिये और यह
दृश्यमान् जगत् नित्य नहीं है, - इससे अवगत होइये।”]॥३॥
श्रीसनातनका आनन्द और कारागार-रक्षककी प्रशंसा :-
पत्री पाञा सनातन आनन्दित हैला।
यवन-रक्षक-पाश कहिते लागिला ॥ 4 ॥
“तुमि एक जिन्दापीर महाभाग्यवान्।
केताब-कोराण-शास्त्रे आछे तोमार ज्ञान॥5॥
एक बन्दी छाड़े यदि निज-धर्म देखिया।
संसार हइते तारे मुक्त करेन गोसाञा ॥ 6 ॥
प्रत्युपकारकी प्रार्थना :-
पूर्वे आमि तोमार करियाछि उपकार।
तुमि आमा छाड़ि' कर प्रत्युपकार ॥ 7 ॥
शुद्धहरिभजनके लिये लौकिक सुनीतिके विचारसे
घृणित चेष्टाकी भी श्रीसनातनके द्वारा
अनुकूलरूपमें नियुक्ति - यही सत्य-धर्म :-
पाँच सहस्र मुद्रा दिब, तुमि कर अङ्गीकार।
पुण्य, अर्थ,-दुइ लाभ हइबे तोमार ॥” 8 ॥
अनुवाद-पत्रको प्राप्त करके श्रीसनातन बहुत
प्रसन्न हुए। तब वे कारागार-अध्यक्षके पास गये और
उनसे कहा, - “आप एक जिन्दापीर हैं और महासौभाग्यशाली
हैं। आपको कुरान और अन्य शास्त्रोंका पूर्ण ज्ञान भी
है। यदि कोई अपने धर्मका पालन करते हुए किसी
एक बन्दीको मुक्त कर देता है, तब फिर खुदा उसे
संसारसे मुक्त कर देते हैं। पहले मैंने आपके ऊपर
उपकार किया था और अब मैं कठिनाईमें हूँ, इसलिये
आप मुझे कारागारसे मुक्त करके उसका प्रत्युपकार
करो। मैं आपको पाँच हजार स्वर्ण मुद्राएँ भी दूँगा,
आप उसे स्वीकार करें। मुझे छोड़नेसे आपको पुण्य
और धन-इन दोनोंकी प्राप्ति होगी॥” 4-8॥
अनुभाष्य - 'जिन्दापीर' - जीवित पीर । 'गोसाञा' - खुदा,
भगवान् ॥ 5-6 ॥
कारागार-रक्षकको राजाका भय :-
तबे सेइ यवन कहे, - “शुन, महाशय।
तोमारे छाड़िब, किन्तु करि राजभय ॥”9॥
अनुवाद-तब उस यवनने कहा, - “सुनो, महाशय !
मैं आपको छोड़ना तो चाहता हूँ, किन्तु मुझे बादशाहका
भय है॥”9॥
श्रीसनातनके द्वारा परामर्श देना :-
सनातन कहे, - “तुमि ना कर राजभय।
दक्षिण गियाछे, यदि लेउटि' आओयय॥ 10॥
ताँहारे कहिओ-सेइ बाह्यकृत्ये गेल।
गङ्गार निकट गङ्गा देखि झाँप दिल ॥ 11 ॥
अनेक देखिल, तार लाग् ना पाइल।
दाड़ुका-सहित डुबि काँहा बहि' गेल॥ 12 ॥
किछु भय नाहि, आमि ए-देशे ना रब।
दरवेश हञा आमि मक्काके याइब ॥ ”13॥
अनुवाद - श्रीसनातनने उससे कहा, - “आप
बादशाहका भय मत कीजिये। अभी तो वे दक्षिणमें
युद्ध करनेके लिये गये हैं, जब वे लौटकर आयेंगे, तो
उनसे कहना - वे (साकर मल्लिक) गङ्गाके निकट
मलत्याग करनेके लिये गङ्गा तटपर गये थे और
222 ।

बीसवाँ अध्याय 20/10-23 ]
गङ्गाको देखकर उन्होंने उसीमें छलाँग लगा दी। हमने
उन्हें बहुत खोजा, किन्तु उनका कहीं भी पता नहीं
चला। वे बेड़ीके साथ ही डूबकर न जाने कहाँ बह
गये? आपको भय करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है,
क्योंकि मैं इस गौड़देशमें नहीं रहूँगा, दरवेश (फकीर)
बनकर मक्कामें चला जाऊँगा॥" 10-13॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'दाड़ुका'—बेड़ी॥ 12॥
अनुभाष्य—'लेउटि' आओयय'—लौट आनेपर। यह
पश्चिम भारतकी हिन्दी भाषा है॥ 10॥
परन्तु कारागार-रक्षक इससे सन्तुष्ट नहीं होनेपर
उसे और अधिक रिश्वत-देनेकी चेष्टा :-
तथापि यवन-मन प्रसन्न ना देखिला।
सात-हाजार मुद्रा तार आगे राशि कैला॥ 14॥
अनुवाद—इस प्रस्तावसे भी उस यवनके मनको
सन्तुष्ट नहीं देखकर श्रीसनातनने सात हजार मुद्राएँ
उसके आगे रख दीं॥ 14॥
श्रीसनातनकी कारागारसे मुक्ति :-
लोभ हइल यवनेर मुद्रा देखिया।
रात्रे गङ्गापार कैल दाडुका काटिया॥ 15॥
अनुवाद—उन मुद्राओंको देखकर उस यवनमें
लोभ जाग उठा। उसने रात्रिके समय श्रीसनातन
गोस्वामीकी बेड़ियोंको काटकर उन्हें गङ्गा पार करने
दी॥ 15॥
ईशानके साथ श्रीसनातनका पातड़ा-पर्वतपर आगमन :-
गड़द्वार-पथ छाड़िला, नारे ताँहा याइते।
रात्रि-दिन चलि' आइला पातड़ा-पर्वते॥ 16॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी इस प्रकार कारागारसे
मुक्त हो गये, परन्तु वे किलोंके सामने राजमार्गसे नहीं
जा सकते थे, इसलिये उस मार्गको उन्होंने छोड़ दिया।
वे रात-दिन चलते-चलते पातड़ा-पर्वतपर आ पहुँचे॥ 16॥
(लुटेरे) जमींदारके साथ भेंट :-
तथा एक भौमिक हय, तार ठाञि गेला।
'पर्वत पार कर आमाय'—विनति करिला॥ 17॥
अनुवाद—वहाँपर एक जमींदार रहता था,
श्रीसनातन गोस्वामी उसके पास गये और उससे विनती
की—'आप हमें पर्वत पार करा दीजिये॥' 17॥
जमींदारको ज्योतिषीसे श्रीसनातनके पास धन होनेका पता
चलना और श्रीसनातनकी हत्याका सङ्कल्प :-
सेइ भूञार सङ्गे हय हातगणिता।
भूञार काणे कहे सेइ जानि' एइ कथा॥ 18॥
“इँहार ठाञि सुवर्णेर अष्ट मोहर हय।”
शुनि' आनन्दित भूञा सनातने कय॥ 19॥
श्रीसनातनका जमींदारके द्वारा आदर-सम्मान;
श्रीसनातनका स्नान और भोजन :-
“रात्र्ये पर्वत पार करिब निज-लोक दिया।
भोजन करह तुमि रन्धन करिया॥” 20॥
अनुवाद—उस जमींदारके साथमें एक ज्योतिषी था।
उस ज्योतिषीने जमींदारके कानमें कहा,—“इनके पास
सोनेकी आठ मोहरें हैं।” यह बात सुनकर जमींदारने
प्रसन्न होकर श्रीसनातन गोस्वामीसे कहा,—“रातमें मैं
अपने लोगोंको आपके साथ भेजकर आपको पर्वत पार
करा दूँगा। अभी आप रसोई बनाकर भोजन ग्रहण
कीजिये॥” 18-20॥
एत बलि' अन्न दिल करिया सम्मान।
सनातन आसि' तबे कैल नदीस्नान॥ 21॥
दुइ उपवासे कैला रन्धन-भोजने।
राजमन्त्री सनातन विचारिला मने॥ 22॥
श्रीसनातनको सन्देह और आशङ्का,
ईशानसे धनके विषयमें जानना :-
'एइ भूञा केने मोरे सम्मान करिल?'
एत चिन्ति' सनातन ईशाने पुछिल॥ 23॥
। 223

[ 20/21-33 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
“तोमार ठाञि जानि किछु द्रव्य आछय।”
ईशान कहे, — “मोर ठाञि सात मोहर हय ॥” 24 ॥
अनुवाद—इतना कहकर जमींदारने उन्हें सम्मानपूर्वक
रसोई बनानेके लिये चावल, दाल आदि दिये। श्रीसनातन
गोस्वामीने पहले नदीमें जाकर स्नान किया। वे दो
दिनसे उपवास कर रहे थे, इसलिये रसोई बनाकर
उन्होंने भोजन ग्रहण किया। पूर्व-राजमन्त्री श्रीसनातनने
अपने मनमें विचार किया, — 'इस जमींदारने मेरा इतना
सम्मान क्यों किया?' यह सोचकर श्रीसनातन गोस्वामीने
ईशानसे पूछा, — “मुझे लगता है कि तुम्हारे पास कोई
मूल्यवान वस्तु है?” ईशानने कहा, — “मेरे पास स्वर्णकी
सात मोहरें हैं॥” 21-24 ॥
अनुभाष्य—'दुइ उपवासे'—दो दिन उपवास करके।
'हय'—हैं; पश्चिम भारतकी हिन्दी-भाषामें "हैं' कहते
हैं॥ 22-24 ॥
ईशानको डाँटना :—
शुनि' सनातन तारे करिला भर्त्सन।
“सङ्गे केने आनियाछ एइ काल-यम ?” ॥ 25 ॥
अनुवाद—यह सुनकर श्रीसनातन गोस्वामीने ईशानको
डाँट लगायी और पूछा, — “इस मृत्यु-नादको साथमें क्यों
लाये हो ?” ॥ 25 ॥
जमींदारको धन देना और सहायताकी प्रार्थना :—
तबे सेइ सात मोहर हस्तेते करिया।
भूञार काछे याञा कहे मोहर धरिया ॥ 26 ॥
“एइ सात सुवर्ण मोहर आछिल आमार।
इहा लञा धर्म देखि' पर्वत कर पार ॥ 27 ॥
राजबन्दी आमि, गड़द्वार याइते ना पारि।
पुण्य हबे, पर्वत आमा देह' पार करि ॥” 28 ॥
अनुवाद—तब उन सात मोहरोंको अपने हाथमें
लेकर श्रीसनातन गोस्वामी जमींदारके पास गये। अपने
हाथमें मोहरें दिखाकर कहा, — “मेरे पास ये सात
स्वर्णकी मोहरें हैं, इन्हें आप ले लीजिये और अपना
धर्म समझकर हमें पर्वत पार करा दीजिये। मैं एक
(भागा हुआ) राजबन्दी हूँ, इसलिये किलोंके साथ
राजमार्गसे नहीं जा सकता। आपका बहुत पुण्य होगा
यदि आप हमें पर्वत पार करा देंगे॥” 25-28 ॥
जमींदारका हत्याके सङ्कल्पको छोड़ना; धन लेनेसे मना
करना और सहायता करना स्वीकार :—
भूञा हासि' कहे, — “आमि जानियाछि पहिले।
अष्ट-मोहर हय तोमार सेवक-आँचले ॥ 29 ॥
तोमा मारि' मोहर लइताम आजिकार रात्र्ये।
भाल हैल, कहिला तुमि, छुटिलाङ पाप हैते ॥ 30 ॥
सन्तुष्ट हइलाङ आमि, मोहर ना लइब।
पुण्य लागि' पर्वत तोमा' पार करि' दिब ॥” 31 ॥
अनुवाद—जमींदारने हँसते हुए कहा, — “मुझे पहलेसे
ही पता चल गया था कि आपके सेवकके आँचलमें
आठ स्वर्ण मोहरें हैं। आप लोगोंको मारकर आज
रात्रिमें मैं मोहरें ले लेता, अच्छा हुआ आपने स्वयं
आकर ही बतला दिया, मैं पाप करनेसे बच गया। मैं
आपके व्यवहारसे बहुत सन्तुष्ट हुआ हूँ, इसलिये मैं
मोहरें नहीं लूँगा और पुण्य कार्य करते हुए आप
लोगोंको पर्वत पार करा दूँ गा ॥ ” 29-31 ॥
गोसाञि कहे, — “केह द्रव्य लइबे आमा मारि' ।
आमार प्राण रक्षा कर द्रव्य अङ्गीकरि' ॥” 32 ॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा, — “यदि आप
इन्हें नहीं लेंगे, तो अन्य कोई हमें मारकर इन
मोहरोंको ले लेगा, इसलिये आप ही इन मोहरोंको
स्वीकार करके हमारे प्राणोंकी रक्षा करो ॥” 32 ॥
जमींदारकी श्रीसनातनको पर्वतको
पार करनेमें सहायता :—
तबे भूञा गोसाञिर सङ्गे चारि पाइक दिल।
रात्र्ये रात्र्ये वनपथे पर्वत पार कैल ॥ 33 ॥
224

बीसवाँ अध्याय 20/33-43 ]
अनुवाद—तब जमींदारने श्रीसनातन गोस्वामीके
साथ चार सेवक भेजे। रात-रातमें वनके मार्गसे उन्होंने
पर्वत पार किया॥33॥
श्रीसनातनके द्वारा ईशानसे बचे हुए धनका
पूछना और देशमें भेजना :—
पार हञा गोसाञि तब पुछिला ईशाने।
“जानि, —शेष द्रव्य किछु आछे तोमा-स्थाने ॥” 34॥
ईशान कहे, —“एक मोहर आछे अवशेष।”
गोसाञि कहे, —“मोहर लञा याह' तुमि देश॥” 35॥
अनुवाद—पर्वतको पार करके श्रीसनातन गोस्वामीने
ईशानसे पूछा,—“मैं जानता हूँ कि अभी भी कुछ
मूल्यवान वस्तु तुम्हारे पास बची है।” ईशानने कहा,—“मेरे
पास अब एक मोहर बची है।” श्रीसनातन गोस्वामीने
कहा,—“तुम मोहरको लेकर अपने घर लौट
जाओ॥”34-35॥
अकिञ्चन, निसहाय श्रीसनातनका अकेले ही जाना :—
तारे विदाय दिया गोसाञि चलिला एकला।
हाते करोंया, छिड़ा कान्था, निर्भय हइला ॥ 36 ॥
अनुवाद—ईशानको विदायी देकर श्रीसनातन गोस्वामी
अकेले चल दिये। अब उनके हाथमें जलका पात्र और
कन्धेपर पुराने वस्त्रोंको जोड़कर बना कम्बल था।
श्रीसनातन गोस्वामी अब निश्चिन्त हो गये॥36॥
हाजिपुरमें आगमन :—
चलि' चलि' गोसाञि तब आइला हाजिपुरे।
सन्ध्याकाले बसिला एक उद्यान-भितरे ॥ 37 ॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी चलते-चलते हाजिपुर
आ पहुँचे। वे सन्ध्याके समय वे एक उद्यानके अन्दर
जाकर बैठे॥ 37॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'हाजिपुर'—गङ्गा-नदीके और
गण्डक-नदके सङ्गम स्थलपर पटनाके दूसरी ओर
हाजिपुर है॥ 37॥
वहाँ बहनोई राजसेवक श्रीकान्तके साथ भेंट :—
सेइ हाजिपुरे रहे, —श्रीकान्त ताहार नाम।
गोसाञिर भगिनीपति, करे राजकाम॥ 38॥
तिन लक्ष मुद्रा राजा दियाछे तार स्थाने।
घोड़ा मूल्य लञा पाठाय पातसार स्थाने ॥ 39 ॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीके बहनोई श्रीकान्त
हाजिपुरमें रहते थे और राजकार्य करते थे। बादशाहने
उनके पास तीन लाख स्वर्ण मुद्राएँ भेजी थीं। उस
धनसे वे घोड़ोंको खरीदकर बादशाहके पास भेजते
थे॥ 38 ॥
श्रीसनातनके साथ वार्तालाप :—
टुङ्गिर उपर बसि' सेइ गोसाञिरे देखिल।
रात्र्ये एकजने-सङ्गे गोसाञि-पाश आइल ॥ 40 ॥
दुइजने मिलि' तथा इष्टगोष्ठी कैल।
बन्धन-मोक्षण-कथा सकलि गोसाञि कहिल ॥ 41 ॥
अनुवाद—श्रीकान्त एक ऊँचे स्थानपर बैठे थे और
वहींसे उन्होंने श्रीसनातन गोस्वामीको देखा। वे रात्रिके
समय एक व्यक्तिको अपने साथ लेकर श्रीसनातन
गोस्वामीके पास आये। श्रीकान्त और श्रीसनातन
गोस्वामीने मिलकर वहींपर ही वार्तालाप किया। श्रीसनातन
गोस्वामीने अपने कारागारसे छूटनेकी सारी बात उन्हें
बतलायी ॥ 40-41 ॥
श्रीकान्तका श्रीसनातनको वहाँ रहनेके लिये अनुरोध :—
तेंहो कहे,—“दिन-दुइ रह एइस्थाने।
भद्र हओ, छाड़' एइ मलिन वसने ॥” 42 ॥
श्रीसनातनकी असम्मति और गङ्गा
पार करानेका अनुरोध :—
गोसाञि कहे, —“एकक्षण इहा ना रहिब।
गङ्गा पार करि' देह', एक्षणे चलिब ॥” 43 ॥
अनुवाद—श्रीकान्तने कहा,—“आप दो दिन यहाँपर
रहिये। इन मैले वस्त्रोंको त्यागकर सज्जन व्यक्तिकी
। 225

[ 20/42-52 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
भाँति वस्त्र पहनो।” श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,-“मैं
एक क्षण भी यहाँपर नहीं रहूँगा। आप मुझे गङ्गा पार
करा दीजिये, मैं अभी चला जाऊँगा॥” 42-43 ॥
श्रीसनातनको ऊनी कम्बल देना और
गङ्गा पार करवाना :-
यत्न करि' तैं हो एक भोटकम्बल दिल।
गङ्गा पार करि' दिल-गोसाञि चलिल ॥ 44 ॥
अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीके मना करनेपर भी
बहुत अनुरोध करके श्रीकान्तने उन्हें एक बहुत अच्छा
ऊनी कम्बल दिया और गङ्गा पार करा दी। श्रीसनातन
गोस्वामी आगे बढ़ चले ॥ 44 ॥
श्रीसनातनका काशीमें आगमन :-
तबे वाराणसी गोसाञि आइला कतदिने।
शुनि' आनन्दित हइला प्रभुर आगमने ॥ 45 ॥
अनुवाद-कुछ दिनोंमें श्रीसनातन गोस्वामी वाराणसी
आ पहुँचे। महाप्रभुके वाराणसीमें आनेके विषयमें
सुनकर उन्हें बहुत आनन्द हुआ॥ 45 ॥
श्रीचन्द्रशेखरके घरपर पहुँचना :-
चन्द्रशेखरेर घरे आसि' द्वारेते बसिला।
महाप्रभु जानि' चन्द्रशेखरे कहिला ॥ 46 ॥
बाहरी वेशके प्रति निरपेक्ष वास्तविक वैष्णव श्रीसनातनको
लानेके लिये शेखरको आदेश :-
“द्वारे एक 'वैष्णव' हय, बोलाह ताँहारे।”
चन्द्रशेखर देखे, 'वैष्णव' नाहिक द्वारे ॥ 47 ॥
श्रीसनातनके बाहरी वैष्णव-वेशको
नहीं देखनेपर लौटकर आना :-
“द्वारेते वैष्णव नाहि”—प्रभुरे कहिल।
'केह हय?' करि' प्रभु ताहारे पुछिल ॥ 48 ॥
अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामी श्रीचन्द्रशेखरके घर
पहुँचकर बाहर द्वारपर बैठ गये। श्रीसनातन गोस्वामीके
आगमनको जानकर महाप्रभुने श्रीचन्द्रशेखरसे कहा, —
“द्वारपर एक वैष्णव हैं, उन्हें बुलाकर ले आओ।”
श्रीचन्द्रशेखरने जाकर देखा कि द्वारपर तो कोई 'वैष्णव'
नहीं है। श्रीचन्द्रशेखरने आकर महाप्रभुसे कहा, – “द्वारपर
तो कोई वैष्णव नहीं हैं।” महाप्रभुने उनसे पूछा, 'क्या
कोई द्वारपर है?'॥ 46-48 ॥
दरवेश वेशधारी श्रीसनातनको लानेके
लिये महाप्रभुका आदेश :-
तैं हो कहे,- “एक 'दरवेश' आछे द्वारे।”
'ताँरे आन' प्रभुर वाक्ये कहिल आसि' ताँरे ॥ 49 ॥
श्रीचन्द्रशेखरका श्रीसनातनको
'दरवेश' कहकर सम्बोधन :-
“प्रभु तोमाय बोलाय, आइस, दरवेश !”
शुनि' आनन्दे सनातन करिला प्रवेश ॥ 50 ॥
श्रीसनातनको देखकर तेजीसे महाप्रभुका
आगमन और आलिङ्गन :-
ताँहारे अङ्गने देखि' प्रभु धाञा आइला।
ताँरे आलिङ्गन करि' प्रेमाविष्ट हैला ॥ 51 ॥
अनुवाद-श्रीचन्द्रशेखरने कहा,-“द्वारपर एक
'फकीर' है।” महाप्रभुने कहा, - 'उन्हींको ले आओ।'
श्रीचन्द्रशेखरने द्वारपर आकर श्रीसनातन गोस्वामीको
महाप्रभुके ये वचन कहे, “हे फकीर ! आओ, महाप्रभु
तुम्हें बुला रहे हैं।” श्रीचन्द्रशेखरकी बात सुनकर
श्रीसनातन गोस्वामी बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने घरके
अन्दर प्रवेश किया। श्रीसनातन गोस्वामीको आँगनमें
देखकर महाप्रभु दौड़े हुए चले आये और उनको
आलिङ्गन करके महाप्रभु प्रेममें आविष्ट हो गये ॥ 49-51 ॥
आलिङ्गनके फलस्वरूप श्रीसनातनमें प्रेम
और उनकी दैन्य-उक्ति :-
प्रभुस्पर्शे प्रेमाविष्ट हइला सनातन।
'मोरे ना छुइह'-कहे गद्गद-वचन ॥ 52 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके स्पर्शसे श्रीसनातन गोस्वामी भी
प्रेममें आविष्ट हो गये। श्रीसनातन गोस्वामीने गद्गद
वाणीसे कहा, - 'आप मुझे मत छुइये ॥ '52 ॥
226 ।

बीसवाँ अध्याय 20/53-59 ]
महाप्रभु और श्रीसनातन, दोनोंका ही प्रेम-क्रन्दन,
श्रीचन्द्रशेखरका विस्मय :-
दुइजने गलागलि रोदन अपार।
देखि' चन्द्रशेखरेर हइल चमत्कार ॥ 53 ॥
अनुवाद—दोनों परस्पर गले लगकर बहुत रोने
लगे। उन दोनोंकी ऐसी अवस्थाको देखकर
श्रीचन्द्रशेखरको बहुत आश्चर्य हुआ ॥ 53 ॥
स्नेहपूर्वक श्रीसनातनको अपने निकट आसन देना :-
तबे प्रभु ताँर हात धरि' लञा गेला।
पिण्डार उपरे ताँरे आपन-पाश बसाइला ॥ 54 ॥
अपने हाथोंसे श्रीसनातनके अङ्गोंका मार्जन,
श्रीसनातनका दीनतापूर्वक कहना :-
श्रीहस्ते करेन ताँर अङ्ग सम्मार्जन।
तँहो कहे, — “मोरे, प्रभु, ना कर स्पर्शन ॥” 55 ॥
अनुवाद—तब महाप्रभु श्रीसनातनका हाथ पकड़कर
उन्हें अपने साथ ले गये और उन्होंने श्रीसनातन
गोस्वामीको अपने निकट चबूतरेपर बैठाया। महाप्रभु
अपने श्रीहस्तकमलोंसे श्रीसनातन गोस्वामीके अङ्गोंका
सम्मार्जन करने लगे। श्रीसनातन गोस्वामी कहने लगे, — “हे
प्रभो, आप मुझे स्पर्श मत कीजिये ॥” 54-55 ॥
महाप्रभुके द्वारा उन्हें महाभागवतके लिये
उचित गौरव देना :-
प्रभु कहे, — “तोमा स्पर्शि आत्म पवित्रिते।
भक्ति-बले पार तुमि ब्रह्माण्ड शोधिते ॥ 56 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “मैं तो अपनेको पवित्र
करनेके लिये आपको स्पर्श कर रहा हूँ, क्योंकि आप
अपनी भक्तिके बलसे ब्रह्माण्डको पवित्र कर सकते
हैं ॥ 56 ॥
श्रीमद्भागवत (1/13/10)में—
भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूताः स्वयं प्रभो।
तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभृता ॥ 57 ॥
अनुवाद—आपके जैसे भागवतजन स्वयं तीर्थस्वरूप
हैं। आप लोग अपने अन्तःस्थित भगवान्की पवित्रताके
बलसे पापियोंके पापोंके द्वारा मलिन सभी तीर्थोंको
पवित्र करते हैं ॥ 57 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 1/63 संख्या देखें ॥ 57 ॥
हरिभक्तिविलास (10/91) में :-
न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्भक्तः श्वपचः प्रियः।
तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा ह्यहम् ॥ 58 ॥
अनुवाद—चतुर्वेदपाठी अर्थात् चौबे ब्राह्मण होनेपर
ही 'भक्त' होता है, ऐसा नहीं है। मेरा भक्त चण्डाल
होनेपर भी मुझे प्रिय है; भक्त ही वास्तवमें दान-पात्र
एवं ग्रहण-पात्र है; भक्तमात्र ही मेरे समान पूजनीय
है ॥” 58 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 19/50 संख्या देखें ॥ 58 ॥
श्रीमद्भागवत (7/9/10) में—
विप्राद्द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ-
पादारविन्दविमुखात् श्वपचं वरिष्ठम्।
मन्ये तदर्पित-मनोवचनेहितार्थ-
प्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरिमानः ॥ 59 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 59 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णके चरणकमलोंसे विमुख
बारह-गुणोंसे युक्त ब्राह्मणकी अपेक्षा भी जिसके मन,
वचन, चेष्टा, अर्थ और प्राण श्रीकृष्णमें समर्पित हैं, ऐसे
चण्डालको भी मैं श्रेष्ठ मानता हूँ; क्योंकि वह (चण्डाल
कुलमें उत्पन्न भक्त) अपने कुलको पवित्र करता है,
और अत्यधिक सम्मानसे युक्त ब्राह्मण वैसा नहीं कर
सकता ॥ 59 ॥
अनुभाष्य—धर्मराज युधिष्ठिरको देवर्षि नारद भगवान्
श्रीनृसिंहके द्वारा किये गये हिरण्यकशिपुके वध-वृत्तान्तके
वर्णन-प्रसङ्गमें वधके बाद भक्त प्रह्लादके द्वारा किये गये
भगवान् नृसिंहके स्तवका वर्णन कर रहे हैं, —
। 227

[ 20/59-62 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ]
अरविन्दनाभपादारविन्दविमुखात् (पद्मनाभ-कृष्णस्य पादपद्मात्
विमुखात्) द्विषड्गुणयुतात् (पूर्वश्लोकोक्ताः धनाभिजन-रूप-
तपः-श्रुतौजस्तेजः-प्रभाव बल-पौरुष-बुद्धियोगाः इत्यादयः ये
द्विष्ट् द्वादशगुणाः, यद्वा, “धर्मश्च सत्यञ्च दमस्तपश्च अमात्सर्यं
ह्रीस्तितिक्षाऽनसूया। यज्ञश्च दानञ्च धृतिः श्रुतञ्च व्रतानि वै
द्वादश ब्राह्मणस्य ॥” इति महाभारतीये-सनत्सुजातोक्ता द्वादश-गुणाः,
यद्वा, “शमो दमस्तपः शौचं क्षान्त्यार्जव-विरक्तयः। ज्ञान-विज्ञान-
सन्तोषाः सत्यास्तिक्ये द्विषड्गुणाः॥” इति मुक्ताफल-टीकोक्ता
द्वादशगुणाः, तैः युक्तात्) विप्रात् अपि तदर्पितमनो-वचनेहितार्थप्राणं
(तत् तस्मिन् अरविन्दनाभे कृष्णे अर्पिताः मनः वचनं ईहितं
कर्म अर्थः प्राणश्च एते येन, तं) श्वपचं वरिष्ठं (श्रेष्ठम्) अहं
मन्ये; [यतः] स (एवम्भूतः श्वपचः सर्वं) कुलं पुनाति,
भूरिमानः (भूरिः मानः गर्वः यस्य स विप्रः) तु [आत्मानमपि]
न [पुनाति, कुतः कुलम्? यतो भक्तिहीनस्य एते गुणाः
गर्वायैव भवन्ति, न तु शुद्धये; अतो हीन इति भावः]।
श्लोक-भावानुवाद-श्रीकृष्णके चरणकमलोंसे विमुख
बारह-गुणोंसे (श्रीमद्भागवतमें “विप्राद्द्विषड्”-श्लोकके पूर्व
श्लोकमें ये 'द्विष्ट्' अर्थात् बारह गुण कहे गये
हैं-“धन, सत्कुलमें जन्म, सौन्दर्य, तपस्या, पाण्डित्य,
इन्द्रिय-नैपुण्य, तेज, प्रताप, शारीरिक बल, पौरुष, बुद्धि
और अष्टाङ्गयोग” आदि; अथवा महाभारतमें सनत्सुजातके
द्वारा कथित बारह गुण-“धर्म, सत्य, दम, तप,
मात्सर्यशून्यता, लज्जा, सहनशीलता, ईर्ष्याशून्यता, यज्ञ,
दान, धैर्य, पाण्डित्य-ये ही ब्राह्मणके बारह व्रत हैं।”
अथवा, 'मुक्ताफल'-टीकामें कहे गये बारह गुण, जैसे,-
“शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, विषय-विरक्ति,
ज्ञान, विज्ञान, सन्तोष, सत्य, आस्तिकता-ये बारह गुण
हैं।”) युक्त ब्राह्मणकी अपेक्षा भी जिसके मन, वचन,
चेष्टा, अर्थ और प्राण श्रीकृष्णमें समर्पित हैं, ऐसे
चण्डालको भी मैं श्रेष्ठ मानता हूँ; क्योंकि वह (चण्डाल
कुलमें उत्पन्न भक्त) अपने कुलको पवित्र करता है।
और अपने उच्चकुलका गर्व करनेवाला ब्राह्मण जब
स्वयंको भी पवित्र नहीं कर सकता, [तब वह कुलको
कैसे पवित्र करेगा? जो भक्तिहीन ऐसे गुणोंसे गर्वित
होता है, वह शुद्ध नहीं है, इसलिये वह हीन है-यह
भाव है] ॥ 59 ॥
[दायाँ स्तम्भ]
भक्त-सेवामें लगनेसे ही सभी इन्द्रियोंकी सार्थकता :-
तोमा देखि, तोमा स्पर्शि, गाइ तोमार गुण।
सर्वेन्द्रिय-फल,-एइ शास्त्र-निरूपण॥ 60॥
अनुवाद-आपको देखना, आपको स्पर्श करना,
आपके गुणोंका गान करना ही सभी इन्द्रियोंका फल
है-शास्त्र यही निरूपण करते हैं॥ 60॥
जगत्में शुद्ध-भगवद्भक्त-सुदुर्लभ :-
हरिभक्तिसुधोदय (13/2)में-
अक्ष्णोः फलं त्वादृश-दर्शनं हि
तनोः फलं त्वादृश-गात्रसङ्गः।
जिह्वाफलं त्वादृश-कीर्त्तनं हि
सुदुर्लभा भागवता हि लोके॥ 61॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 61॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हे वैष्णव, तुम्हारे जैसे व्यक्तिका
दर्शन करना ही नेत्रोंका फल है; तुम्हारे जैसे व्यक्तिकी
देहको स्पर्श करना ही शरीरका फल है; तुम्हारे जैसे
व्यक्तिके गुणोंका कीर्तन करना ही जिह्वाका फल है;
क्योंकि, जगत्में भागवतजन ही सुदुर्लभ हैं॥”61॥
अनुभाष्य-
त्वादृशदर्शनं (त्वादृशानां भवत्तुल्यानां भागवतानां श्रद्धापूर्वक-दर्शनं)
अक्ष्णोः (चक्षुर्भ्यां वीक्षणकार्यस्य) फलं (तात्पर्यम्); त्वादृशगात्रसङ्गः
(त्वादृशानां भक्तानां गात्रसङ्गः अङ्गस्पर्शः) तनोः (शरीरस्य
धारणकार्यस्य) फलम्; त्वादृशकीर्त्तनं (त्वादृशानां भक्तानां
गुणकीर्त्तनं) हि (एव) जिह्वाफलं (वाक्योच्चारणस्य प्रयोजनम्);
[अतः] लोके (जगति) भागवताः (शुद्धभक्ताः) सुदुर्लभाः
(सुदुरापाः) हि (एव)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 61॥
श्रीकृष्णकी अहैतुकी कृपाके माहात्म्यका वर्णन; महाप्रभु
स्वयं ही श्रीसनातनके कारागारमें बन्द होने और वहाँसे
छूटनेकी लीलाके अभिनयके मूल-सूत्रधार :-
एत कहि' कहे प्रभु,-“शुन, सनातन।
कृष्ण-बड़ दयामय, पतित-पावन॥ 62॥
228 |

बीसवाँ अध्याय 20/62-70 ]
महारौरव हैते तोमाय करिला उद्धार।
कृपार समुद्र कृष्ण गम्भीर अपार ॥"63॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने आगे कहा,—“हे
सनातन ! सुनो, भगवान् श्रीकृष्ण बहुत ही दयामय और
पतित-पावन हैं। उन्होंने महारौरव-नरकसे तुम्हारा
उद्धार किया है। कृपाके समुद्र श्रीकृष्ण अपार और
गम्भीर हैं॥"62-63॥
अनुभाष्य—'महा-रौरव'-जीविकाके उद्देश्यसे
जन्तुओंका वध करनेवाले 'महारौरव' नामक नरकको
प्राप्त करते हैं (भाः 5/26/10-12 श्लोक देखें) ॥ 63 ॥
श्रीसनातनका महाप्रभुको श्रीकृष्णसे अभिन्न मानना :—
सनातन कहे, – “कृष्ण आमि नाहि जानि।
आमार उद्धार-हेतु तोमार कृपा मानि ॥ "64॥
महाप्रभुके प्रश्नके उत्तरमें अपने वृत्तान्तका वर्णन :—
'केमने छुटिला' बलि प्रभु प्रश्न कैला।
आद्योपान्त सब कथा तँहो शुनाइला ॥ 65 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीरूप और श्रीअनुपमका संवाद देना :—
प्रभु कहे, – “तोमार दुइ भाइ प्रयागे मिलिला।
रूप, अनुपम, – दुँहे वृन्दावन गेला ॥"66॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,- "मैं
श्रीकृष्णको नहीं जानता हूँ। मैं तो आपकी कृपाको
अपने उद्धारका कारण मानता हूँ।" 'आप कैसे
छूटे'—यह कहकर महाप्रभुने प्रश्न किया और श्रीसनातन
गोस्वामीने आरम्भसे अन्त तकका सब वृत्तान्त कह
सुनाया। महाप्रभुने कहा, – “तुम्हारे दोनों भाई रूप और
अनुपम, मुझसे प्रयागमें मिले थे। वहाँसे वे दोनों
वृन्दावन गये हैं॥"64-66 ॥
श्रीतपनमिश्र और श्रीचन्द्रशेखरके साथ
श्रीसनातनका मिलन :—
तपनमिश्रेरे आर चन्द्रशेखरेरे।
प्रभु-आज्ञाय सनातन मिलिला दोँ हारे ॥ 67 ॥
अनुवाद—महाप्रभुकी आज्ञासे श्रीसनातन गोस्वामी
श्रीतपनमिश्र और श्रीचन्द्रशेखरसे मिले ॥ 67 ॥
श्रीसनातनको श्रीतपनमिश्रका निमन्त्रण, श्रीसनातनको मुण्डन
करानेके लिये महाप्रभुकी आज्ञा :—
तपनमिश्र तबे ताँरे कैला निमन्त्रण।
प्रभु कहे, – “क्षौर कराह, याह, सनातन ॥” 68 ॥
अनुवाद—श्रीतपनमिश्रने श्रीसनातन गोस्वामीको
निमन्त्रण दिया। महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीसे कहा,—
“हे सनातन, जाओ और मुण्डन करवाकर आओ॥"68 ॥
श्रीचन्द्रशेखरको श्रीसनातनके अवैष्णव-वेशको त्याग कराके
वैष्णवोचित वेश धारण करानेकी आज्ञा :—
चन्द्रशेखरेरे प्रभु कहे बोलाञा।
“एइ वेश दूर कर, याह इँहारे लञा ॥" 69 ॥
भद्र कराञा ताँरे गङ्गास्नान कराइल।
शेखर आनिया ताँरे नूतन वस्त्र दिल ॥ 70 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीचन्द्रशेखरको बुलाकर
कहा,—“आप सनातनको अपने साथ ले जाकर इनके
इस वेशको दूर करो।" श्रीचन्द्रशेखरने श्रीसनातनका
मुण्डन कराके उन्हें गङ्गास्नान कराया और उन्हें नये
वस्त्र लाकर दिये ॥ 69-70 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'भद्र कराञा'-मुण्डन करवाकर
अर्थात् दरवेशी दाड़ी और बालोंका मुण्डन करवाकर
सुवैष्णव जैसा वेश धारण कराया ॥ 70 ॥
अमृतानुकणा—महाप्रभुकी कृपा पानेकी इच्छुक
श्रीसनातनने जब महाप्रभुकी मधुर मूर्तिके दर्शन किये,
उस समय श्रीसनातनकी दाड़ी-मूँछ थी। वह दाड़ी-मूँछ
ही बाउल-वैष्णवोंके दाड़ी-मूँछ रखनेका एकमात्र प्रमाण
है। किन्तु महाप्रभुने श्रीसनातनको देखकर प्रेमालिङ्गन
करके तुरन्त उनका मुण्डन करवाया था। इसलिये
बाउल-वैष्णवोंका अकाट्य प्रमाण उसी समय ही नाईके
उस्तरेके द्वारा काटा गया था। अब सभी अवश्य ही
। 229

[ 20/68-78
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
यह स्वीकार करेंगे कि बाउल-लोग कभी भी
श्रीचैतन्य-सम्प्रदायके वैष्णव नहीं कहला सकते।
श्रीसनातनको 'फकीर' कहकर उल्लेख करनेसे
साँई, दरवेश, चरणपाली, दुलालचाँदी आदि अधिकांश
लोग मुसलमानके फकीर-वेशको धारण करके उनके
जैसे आचार-व्यवहार करते हैं और स्वयंको
चैतन्य-सम्प्रदाय-वैष्णव कहकर अपना परिचय देते हैं।
यदि कोई उनसे पूछे कि तुम लोग प्रायः मुसलमानके
फकीरका वेश धारण और उनके जैसा आचार-व्यवहार
भी करते हो और चैतन्य-सम्प्रदाय-वैष्णव कहकर
अपना परिचय देते हो, इसका क्या प्रमाण है? इस
प्रश्नके उत्तरमें वे कहते हैं कि इसका प्रमाण
श्रीसनातन गोस्वामी हैं, वे फकीर थे। किन्तु जब
महाप्रभुने श्रीसनातनके दाड़ी-मूँछ और सिरके केश
मुण्डन करवाकर वैष्णव-वेश धारण करवाया था, तब
उस स्थानपर ही साँई, दरवेश, चरणपाली, दुलालचाँदी
आदिका प्रमाण परिसमाप्त हो गया है। इस कारण साँई,
दरवेशादि लोगोंका चैतन्य-सम्प्रदाय-वैष्णव होना तो दूर
रहे, अपितु उनको एक प्रकार मोहम्मद-सम्प्रदाय ही
कहा जाना चाहिये। (—जगद्गुरु श्रीश्रील भक्तिविनोद
ठाकुर-कृत 'श्रीश्रीसनातन गोस्वामी प्रभु' प्रबन्ध।
श्रीगौड़ीय-पत्रिका, 7वाँ वर्ष, 4र्थ संख्या) ॥ 68-69 ॥
श्रीचन्द्रशेखरके द्वारा दिये नये वस्त्रोंको पहननेमें
श्रीसनातनकी असम्मति :—
सेइ वस्त्र सनातन ना कैल अङ्गीकार।
शुनिया प्रभुर मने आनन्द अपार ॥ 71 ॥
अनुवाद—श्रीचन्द्रशेखरके द्वारा लाये गये उन नये
वस्त्रोंको श्रीसनातनने स्वीकार नहीं किया। इस बातको
सुनकर महाप्रभुके मनमें अपार आनन्द हुआ॥ 71 ॥
दोपहरमें श्रीतपनमिश्रके घरमें महाप्रभुका भोजन,
श्रीसनातनको महाप्रभुके उच्छिष्टकी प्राप्ति :—
मध्याह्न करिया प्रभु गेला भिक्षा करिवारे।
सनातने लञा गेला तपनमिश्रेर घरे ॥ 72 ॥
अनुवाद—दोपहरका स्नान करनेके बाद महाप्रभु
श्रीसनातन गोस्वामीको अपने साथ लेकर भोजनके लिये
श्रीतपन मिश्रके घरपर गये॥ 72 ॥
पादप्रक्षालन करि' भिक्षाते बसिला।
“सनातने भिक्षा देह”—मिश्ररे कहिला ॥ 73 ॥
अनुवाद—चरणोंको धोनेके बाद महाप्रभु भोजनके
लिये बैठे। महाप्रभुने श्रीतपनमिश्रसे कहा, —“सनातनको
भोजन प्रदान करो॥”73 ॥
मिश्र कहे, —“सनातनेर किछु कृत्य आछे।
तुमि भिक्षा कर, प्रसाद ताँरे दिब पाछे॥” 74 ॥
अनुवाद—श्रीतपनमिश्रने कहा, —“सनातनका अभी
कुछ कार्य बाकी है। आप भोजन ग्रहण कीजिये, मैं
उन्हें बादमें प्रसाद दूँगा॥”74 ॥
भिक्षा करि' महाप्रभु विश्राम करिला।
मिश्र प्रभुर शेषपात्र सनातने दिला ॥ 75 ॥
अनुवाद—भोजन करनेके बाद महाप्रभुने थोड़ा
विश्राम किया। श्रीतपनमिश्रने महाप्रभुका उच्छिष्ट प्रसाद
श्रीसनातन गोस्वामीको दिया॥ 75 ॥
मिश्रके द्वारा दिये नये वस्त्रोंको पहननेमें
श्रीसनातनकी आपत्ति :—
मिश्र सनातने दिला नूतन वसन।
वस्त्र नाहि निला, तेँहो करे निवेदन ॥ 76 ॥
वैष्णव-उच्छिष्ट पुराने वस्त्र-ग्रहण करनेकी श्रीसनातनकी
इच्छा :—
“मोरे वस्त्र दिते यदि तोमार हय मन।
निज परिधान एक देह' पुरातन॥” 77 ॥
एक वस्त्रको दो टुकड़ोंमें बाँटकर बहिर्वास और उसके
उपयोगी डोर-कौपीन बनाना :—
तबे मिश्र पुरातन एक धुति दिला।
तेँहो दुइ बहिर्वास-कौपीन करिला ॥ 78 ॥
230

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बीसवाँ अध्याय 20/76-81 ]
अनुवाद—श्रीतपनमिश्रने श्रीसनातन गोस्वामीको एक
नया वस्त्र दिया, परन्तु उन्होंने वह वस्त्र नहीं लिया।
उन्होंने श्रीतपनमिश्रसे निवेदन किया, — “यदि आपकी
मुझे वस्त्र देनेकी इच्छा ही है, तो फिर मुझे अपना
पहना हुआ एक पुराना वस्त्र दीजिये।” तब श्रीतपनमिश्रने
श्रीसनातन गोस्वामीको अपनी व्यवहार की गयी एक
पुरानी धोती दी। श्रीसनातन गोस्वामीने उस धोतीको
फाड़कर उसमेंसे ही दो बहिर्वास और दो डोर-कौपीन
बनाये॥ 76-78 ॥
अमृतानुकणा—इस जगत्में अपनी इन्द्रियोंके द्वारा
प्राप्त ज्ञानको श्रेष्ठ माननेवालोंके लिये वर्ण-चिह्न और
आश्रम-चिह्नकी व्यवस्था पूर्ण रूपसे अनावश्यक नहीं
है। तो भी बहुत बार ऐसे लोग चिह्नमात्र देखनेसे धोखा
खा जाते हैं। जिस प्रकार सिंदूर वर्णके मेषोंको देखकर
गाय आदि पशु भयभीत हो जाते हैं, उसी प्रकार ये
लोग वैष्णवोंके बाह्य चिह्नोंसे धोखा खाकर लज्जित होते
हैं। इसलिये इनकी अन्तर्मुखी-प्रवृत्ति नहीं होनेके कारण
इस प्रकारका अपमान अवश्यम्भावी है।”
“गौड़ीय-वैष्णव परमहंस हो सकते हैं, परन्तु उनके
वेशको देखकर कि वे वैष्णव अथवा अवैष्णव हैं, ऐसा
कोई निर्णय नहीं कर सकता। श्रीसनातन गोस्वामीके
वेशमें वर्णाश्रमके चिह्न नहीं थे, और श्रीप्रबोधानन्द
सरस्वती गोस्वामीके वेशमें गेरुए वस्त्र और त्रिदण्ड देखा
जाता है। श्रीपरमानन्द पुरी, श्रीईश्वरपुरी आदिके वेशमें
एक दण्ड और गेरुए वस्त्र दिखायी देते हैं। (इसलिये)
त्रिदण्डी और एकदण्डी या निर्दण्डी (बिना दण्डके),
सभी गौड़ीय वैष्णव हो सकते हैं। वे कर्म-त्रिदण्ड,
ज्ञान-त्रिदण्ड और भक्ति-निर्दण्ड आदि आश्रम-चिह्न
परित्याग करनेके लिये वेश ले सकते हैं। और
वर्णाश्रममें अवस्थित गौड़ीय वैष्णवोंका भी अभाव नहीं
है। वे अपने वर्णचिह्न और आश्रमवेशको रखकर भी
गौड़ीय वैष्णव हो सकते हैं। और भक्तचिह्न धारण
करके किसीको कोई वर्णाश्रममें अवस्थित होनेमें बाधा
नहीं दे सकता। गेरुए-वस्त्रके माहात्म्यका और त्रिदण्डके
माहात्म्यका शास्त्रोंमें प्रचुर परिमाणमें उल्लेख किया गया
है। परन्तु चिह्नके द्वारा और वेशग्रहणकी रीतिको
देखकर गौड़ीय-वैष्णवको निर्देश नहीं कर सकते।
हरिभजनमें निष्कपटता ही वैष्णव-परिचयका एकमात्र
निर्देश है। जो लोग कर्मकाण्डको वैष्णवके कन्धेपर
मढ़कर वैष्णवको कर्मी या ज्ञानीमात्र जानते हैं, वे
सुविचार करनेमें असमर्थ और वैष्णवविरोधी हैं।
लँगोट-बाह्य-वस्त्रादि दिखाकर जो वैष्णवताको लज्जित
करते हैं और भजनको लक्ष्य नहीं करके 'नवमीमें
लौकी खाना मना है' आदि नियमोंको ही वैष्णवाचार
कहकर सिद्ध करनेमें व्यस्त हैं। वे श्रीमद्भागवतके
विचारके अनुसार 'त्रिधातुके (कफ-वात-पित्तके) शरीर'को
लेकर ही प्रमत्त हैं, इसलिये वैष्णव-वेशको स्थिर करते
हुए (वे) लोकदृष्टिके अनुगमनसे वैष्णवोंको पहचाननेमें
असमर्थ हैं। [—जगद्गुरु श्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती
प्रभुपाद-कृत 'गौड़ीयका वेश' प्रबन्ध। (साप्ताहिक 'गौड़ीय'
2रा वर्ष, श्रीगौड़ीय-पत्रिका 17वाँ वर्ष)] ॥ 78 ॥
महाराष्ट्र
महाराष्ट्र
सेइ विप्र ताँरे कैल महा-निमन्त्रणे ॥ 79 ॥
काशीमें रहते समय श्रीसनातनको ब्राह्मणके द्वारा
प्रतिदिन अपने घरमें निमन्त्रण :—
“सनातन, तुमि यावत् काशीते रहिबा।
तावत् आमार घरे भिक्षा ये करिबा ॥” 80 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने महाराष्ट्र
गोस्वामीसे मिलवाया। उस ब्राह्मणने श्रीसनातन गोस्वामीको
लम्बा निमन्त्रण दिया, — “हे सनातन ! आप जब तक
काशीमें रहोगे, तब तक मेरे घरपर ही भोजन ग्रहण
करना ॥” 79-80 ॥
श्रीसनातनके द्वारा स्थूल भिक्षामें असम्मति,
माधुकरी-भिक्षाकी इच्छा :—
सनातन कहे, — “आमि माधुकरी करिब।
ब्राह्मणेर घरे केने एकत्र भिक्षा लब?” ॥ 81 ॥
। 231

[ 20/81-89 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—“मैं माधुकरी
करूँगा। ब्राह्मणके घरमें पूरा भोजन क्यों ग्रहण
करूँगा?”॥81॥

अमृताणुकणिका—भ्रमर पुष्पोंसे मधु ग्रहण करता है,
इसलिये उसे मधुकर कहते हैं। वह एक ही पुष्पसे मधु
नहीं ग्रहण करता, अपितु अनेक पुष्पोंसे मधु संग्रह
करता है। श्रीसनातन गोस्वामीका विचार था कि यदि
वे प्रतिदिन एक ही ब्राह्मणके घरमें पूरा भोजन करेंगे
तो उन ब्राह्मणको कष्ट होगा। इसलिये उन्होंने कहा
कि वे अपने शरीर निर्वाहके लिये जितना आवश्यक
है, उतना भोजन अल्प मात्रामें दो-तीन ब्राह्मणोंके घरसे
भिक्षा करेंगे॥81॥

श्रीसनातनके युक्त वैराग्यसे महाप्रभुको आनन्द :—
सनातनेर वैराग्ये प्रभुर आनन्द अपार।
भोटकम्बल-पाने प्रभु चाहे बारे बार ॥82॥

अनुवाद—महाप्रभु श्रीसनातन गोस्वामीके वैराग्यको
देखकर बहुत प्रसन्न थे, परन्तु वे बार-बार उनके
बहुमूल्य कम्बलकी ओर देखते थे॥82॥

बहुमूल्य कम्बल महाप्रभुको पसन्द नहीं, ऐसा जानकर
पुराने-फटे कपड़ोंसे बनी गुदड़ी-ग्रहण :—
सनातन जानिल एइ प्रभुरे ना भाय।
भोट त्याग परिवारे चिन्तिला उपाय ॥83॥

अनुवाद—महाप्रभुके बार-बार कम्बलको देखनेसे
श्रीसनातन गोस्वामी समझ गये कि यह कम्बल उन्हें
अच्छा नहीं लग रहा है। श्रीसनातन गोस्वामीने तब उस
कम्बलको त्याग करनेके उपायपर विचार किया॥83॥

एत चिन्ति' गेला गङ्गाय मध्याह्न करिते।
एक गौड़ीया दियाछे कान्था धुञा शुक्लाइते ॥84॥

अनुवाद—उपायका विचार करके श्रीसनातन गोस्वामी
गङ्गामें दोपहरका स्नान करनेके लिये गये। वहाँ उन्होंने
देखा कि एक गौड़ीयने अपने पुराने वस्त्रोंसे बने
कम्बलको (गुदड़ीको) धोकर धूपमें सुखानेके लिये
डाल रखा था॥84॥

तारे कहे,—“ओरे भाइ, कर उपकारे।
एइ भोट लञा एइ काँथा देह' मोरे ॥”85॥

अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने उस गौड़ीयसे
कहा,—“हे भाई, मुझपर उपकार करो। इस ऊनी
कम्बलको लेकर मुझे अपनी यह गुदड़ी दे दो॥”85॥

सेइ कहे,—“रहस्य कर प्रामाणिक हञा?
बहुमूल्य भोट दिबा केने काँथा लञा?”॥86॥

अनुवाद—उस गौड़ीयने कहा,—“आप सज्जन व्यक्ति
होकर भी मुझसे परिहास कर रहे हैं? आप किसलिये
बहुमूल्य कम्बल देकर बदलेमें गुदड़ी लेंगे?”॥86॥

अनुभाष्य—'प्रामाणिक'—आदर्श विचार-चरित्रवाला,
पण्डित ॥ 86 ॥

तेंहो कहे,—“रहस्य नहे, कहि सत्यवाणी।
भोट लह, तुमि देह' मोरे काँथाखानि ॥”87॥

अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—“मैं परिहास
नहीं कर रहा, मैं सत्य कह रहा हूँ। इस ऊनी
कम्बलको लेकर तुम मुझे यह गुदड़ी दे दो॥”87॥

एत बलि' काँथा लइल, भोट ताँरे दिया।
गोसाञिर ठाँइ आइला काँथा गले दिया ॥88॥

अनुवाद—यह कहकर श्रीसनातन गोस्वामीने उसे
बहुमूल्य ऊनी कम्बल देकर गुदड़ी ले ली। फिर उस
गुदड़ीको अपनी कन्धोंपर लपेटकर वे महाप्रभुके पास
आये॥ 88॥

महाप्रभुके द्वारा बहुमूल्य कम्बलके विषयमें पूछना,
श्रीसनातनके द्वारा पूरी घटनाका वर्णन :—
प्रभु कहे,—“तोमार भोटकम्बल कोथा गेल?”
प्रभुपदे सब कथा गोसाञि कहिल ॥ 89 ॥

232 |

बीसवाँ अध्याय 20/89-97 ]
अनुवाद—महाप्रभुने पूछा, - "तुम्हारा बहुमूल्य कम्बल
कहाँ गया?" श्रीसनातन गोस्वामीने महाप्रभुको पूरी बात
बतायी ॥ 89 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णकृपा-माहात्म्यका वर्णन :-
प्रभु कहे, - "इहा आमि करियाछि विचार ।
विषय-रोग खण्डाइल कृष्ण ये तोमार ॥ 90 ॥
से केने राखिबे तोमार शेष विषय-भोग ?
रोग खण्डि' सद्यैद्य ना राखे शेष रोग ॥ 91 ॥
आचार और प्रचारमें परस्पर सामञ्जस्य
रखनेका उपदेश :-
तिन मुद्रार भोट गाय, माधुकरी ग्रास ।
धर्महानि हय, लोके करे उपहास ॥ "92॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, - "मैंने विचार किया है
कि श्रीकृष्णने तुम्हारे विषय-रोगको दूर कर दिया है।
तब वे तुम्हारे अन्तिम विषय-भोगको क्यों छोड़ देंगे?
जैसे एक अच्छा वैद्य रोगको दूर करके उसका
लेशमात्र भी शरीरमें शेष नहीं रहने देता। तीन मुद्राओं
मूल्यका महँगा कम्बल शरीरपर धारण करके भोजनके
लिये माधुकरी करना परस्पर विरोधी कार्य हैं। इससे
धर्मकी हानि होती है और लोग भी उपहास
करेंगे॥"90-92॥
श्रीसनातनके द्वारा महाप्रभु-कृपा-माहात्म्यकी प्रशंसा :-
गोसाञि कहे, - "ये खण्डिल कुविषय-भोग।
ताँर इच्छाय गेल मोर शेष विषय-रोग ॥ "93 ॥
अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीने कहा, - "जिन्होंने मेरी
पापमय जीवनसे रक्षा की है, उन्हींकी इच्छासे मेरी
अन्तिम विषय-आसक्ति भी दूर हो गई है॥"93॥
अनुभाष्य- 'कुविषय-भोग' - पाप-विषय-सेवा ॥ 93 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनमें शक्ति-सञ्चार :-
प्रसन्न हुआ प्रभु ताँरे कृपा कैल।
ताँर कृपाय प्रश्न करिते ताँर शक्ति हैल ॥ 94 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने प्रसन्न होकर उनपर कृपा की।
महाप्रभुकी कृपासे उनमें प्रश्न करनेकी शक्ति आयी ॥ 94 ॥
पहले महाप्रभुकी शक्तिके बलसे श्रीरायके द्वारा महाप्रभुके
प्रश्नोंके उत्तर देनेका सामर्थ्य :-
पूर्वे यैछे राय-पाशे प्रभु प्रश्न कैला।
ताँर शक्त्ये रामानन्द ताँर उत्तर दिला ॥ 95 ॥
अनुवाद-पहले (गोदावरीके तटपर) जैसे श्रीरामानन्द
रायसे महाप्रभुने प्रश्न पूछे थे और उनकी शक्तिसे
श्रीरामानन्द रायने उनके उत्तर दिये थे ॥ 95 ॥
उसी प्रकार महाप्रभुकी शक्तिके सञ्चारके बलसे
श्रीसनातनके प्रश्न, और स्वयं महाप्रभुका उत्तर देना :-
इहाँ प्रभुर शक्त्ये प्रश्न करे सनातन।
आपने महाप्रभु करे 'तत्त्व'-निरूपण ॥ 96 ॥
अनुवाद-यहाँपर महाप्रभुकी शक्तिसे श्रीसनातन
गोस्वामी प्रश्न कर रहे थे और स्वयं महाप्रभु 'तत्त्व'का
निरूपण कर रहे थे॥96 ॥
श्रीसनातनको स्वयं महाप्रभुके द्वारा
सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजन तत्त्वको बतलाना :-
(ग्रन्थकार-वाक्य-)
कृष्णस्वरूपमाधुर्यैश्वर्यभक्तिरसाश्रयम्।
तत्त्वं सनातनायेशः कृपयोपदिदेश सः ॥ 97 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 97 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभुने
कृपापूर्वक श्रीसनातनको श्रीकृष्णके स्वरूप-माधुर्य, उनके
स्वरूप-ऐश्वर्य और भक्तिरसाश्रय-रूप तत्त्वका उपदेश
दिया ॥ 97 ॥
अनुभाष्य-
स ईशः (महाप्रभुः) कृपया (अतुल-करुणया) सनातनाय
(सनातन-गोस्वामिने) कृष्णस्वरूपमाधुर्यैश्वर्यभक्तिरसाश्रयं (कृष्णस्य
स्वरूपं सर्वेश्वरेश्वरेश्वर-सच्चिदानन्दघनात्मक-किशोर-शेखर-
यशोदानन्दनत्वं, माधुर्यम् असमोर्ध्वतया सर्वमनोहरं
स्वाभाविक-रूपगुणलीलादिसौष्ठवं, ऐश्वर्यम् असमोर्द्धानन्त-
। 233

[ 20/97-103 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
स्वाभाविकप्रभुत्वं, भक्तिरसश्च, तेषाम् आश्रयं- 'दशमे दशमं
लक्ष्यमाश्रिताश्रय-विग्रहम्' इति वचनोद्दिष्टं वस्तु तत् एव)
तत्त्वम् (अद्वयज्ञानम्) उपदिदेश (उपदिष्टवान्)।
श्लोक-भावानुवाद-भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभुने
अतुल-करुणापूर्वक श्रीसनातन-गोस्वामीको श्रीकृष्णके
स्वरूपके (सर्वेश्वरेश्वरेश्वर सच्चिदानन्दघन किशोरशेखर
यशोदानन्दनस्वरूप), माधुर्यके (असमोध्र्व सर्वमनोहर
स्वाभाविक-रूपगुणलीलादिके परम सौन्दर्ययुक्त), ऐश्वर्यके
(असमोध्र्व अनन्त स्वाभाविक प्रभुता), भक्तिरसके एवं
उसके आश्रयके ("दशम स्कन्धमें भागवतके दशम
लक्षण आश्रय-विग्रह" - इस वचनके द्वारा उद्दिष्ट वस्तुके
भी) तत्त्वका (अद्वयज्ञानका) उपदेश दिया॥ 97 ॥
'सनातनशिक्षा'का वर्णन आरम्भ; दीनतापूर्वक प्रणिपात-
परिप्रश्न और सेवापूर्वक लोक-शिक्षाके लिये नित्यसिद्ध
श्रीसनातनके द्वारा बद्धजीवका अभिनय करते हुए शिष्यकी
भाँति कीर्तन-विग्रह जगद्गुरु महाप्रभुसे तत्त्व-जिज्ञासा :-
तबे सनातन प्रभुर चरणे धरिया।
दैन्य विनति करे दन्ते तृण लञा ॥ 98 ॥
“नीच जाति, नीच सङ्गी, पतित अधम।
कुविषय-कूपे पड़ि' गोङाइनु जनम ! ॥ 99 ॥
आपनार हिताहित किछुइ ना जानि !
ग्राम्य-व्यवहारे पण्डित, ताइ सत्य मानि ॥ 100 ॥
कृपा करि' यदि मोरे करियाछ उद्धार।
आपन-कृपाते कह 'कर्त्तव्य' आमार ॥ 101 ॥
जीवके स्वरूप और बन्धनसे उत्पन्न
दुःखके कारणकी जिज्ञासा :-
के आमि, केने आमाय जारे तापत्रय।
इहा नाहि जानि-केमने 'हित' हय ॥ 102 ॥
'साध्य', 'साधन'-तत्त्व पुछिते ना जानि।
कृपा करि' सब तत्त्व कह त' आपनि ॥" 103 ॥
अनुवाद-तब श्रीसनातन गोस्वामीने दाँतोमें तिनका
दबाकर महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर दीनतापूर्वक
विनती करते हुए कहा, - "मैं नीच जातिका, नीच
लोगोंका सङ्ग करनेवाला, अधम-पतित हूँ। पापरूपी
कुएँमें पड़े रहकर ही मैंने अपना जन्म गँवा दिया है।
मैं अपने हित और अहितके विषयमें कुछ भी नहीं
जानता हूँ। लोग मुझे लौकिक व्यवहारमें पण्डित मानते
हैं और मैं भी इसे सत्य मानता हूँ। आपने अपनी
अहैतुकी कृपासे मेरा उद्धार किया है। अब स्वयं
अपनी अहैतुकी कृपासे मुझे मेरे कर्त्तव्यसे भी अवगत
कराइये। मैं कौन हूँ, मुझे (आध्यात्मिक, आधिभौतिक
और आधिदैविक) तीन ताप क्यों जलाते हैं? मैं यह
नहीं जानता हूँ कि मेरा कल्याण कैसे होगा? मैं 'साध्य'
और 'साधन-तत्त्व'के विषयमें पूछना भी नहीं जानता
हूँ। इसलिये कृपा करके आप स्वयं ही मुझे सभी
तत्त्वोंके विषयमें बतलाइये॥" 98-103 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीसनातनने जिज्ञासा की,-"मैं
कौन हूँ? आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक-ये
तीन ताप मुझे क्यों जला रहे हैं और मेरा कल्याण
किस प्रकार होगा? मैं साध्य-साधन तत्त्वकी जिज्ञासा
करनेमें असमर्थ हूँ, आप कृपा करके मुझे मेरे जानने
योग्य विषय बतलाइये ॥ 102-103 ॥
अनुभाष्य- 'ग्राम्य-व्यवहार' -स्त्री-पुरुषगत लौकिक-
व्यवहार। 'तापत्रय'-(1) आध्यात्मिक, (2) आधिभौतिक
और (3) आधिदैविक-ये तीन प्रकारके दुःख हैं। (1)
आध्यात्मिक ताप दो प्रकारके हैं-(क) शारीरिक,
जैसे-ज्वर आदि रोग; (ख) मानसिक, जैसे-प्रिय
आदिका वियोग। (2) आधिभौतिक ताप चार प्रकारके
हैं-(क) जरायुज-प्राणियोंसे (गर्भसे उत्पन्न मनुष्य-पशु
आदिसे) ताप (ख) अण्डज-प्राणियोंसे (अण्डेसे उत्पन्न
कीट-पक्षी आदिसे) ताप; (ग) स्वेदज-प्राणियोंसे (शरीरके
स्त्रावसे उत्पन्न जीवाणुओंसे) ताप; (घ) उद्भिज्ज-प्राणियोंसे
(पृथ्वीसे उत्पन्न वृक्षादिसे) ताप; (3) आधिदैविक ताप
अर्थात् वरदेवता जैसे इन्द्रादिसे उत्पन्न ताप-शीत,
234 |

बीसवाँ अध्याय 20/102-109 ]
वज्रपात आदि और अपदेवता जैसे हिंसक स्वभाववाले
यक्ष-पिशाचादिसे अशुभजनक कष्टादि-ताप ॥ 102 ॥
श्रीसनातनको नित्यसिद्ध जानकर केवल बद्धजीवोंके
मङ्गलके उद्देश्यसे महाप्रभुके द्वारा उत्तर देना :-
प्रभु कहे,-“कृष्ण-कृपा तोमाते पूर्ण हय।
सब तत्त्व जान, तोमार नाहि तापत्रय ॥ 104 ॥
कृष्णभक्ति धर तुमि, जान तत्त्वभाव।
जानिं दार्ढ्य लागि' पुछे, - साधुर स्वभाव ॥ 105 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा,- “तुमपर भगवान् श्रीकृष्णकी
पूर्ण कृपा है, इसलिये तुम सभी तत्त्वोंको जानते हो
और तुम्हारे लिये तीनों तापोंका अस्तित्व ही नहीं है।
तुम श्रीकृष्णभक्तिको धारण करते हो और सभी
तत्त्वोंको भी जानते हो। किन्तु जाननेपर भी दृढ़ताके
लिये पूछना साधुका स्वभाव होता है॥ 104-105 ॥
तत्त्व-जिज्ञासाकी ऐकान्तिक आवश्यकता,
उसीसे ही अभीष्टसिद्धि :-
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/103) में उद्धृत नारदजीके वचन :-
सद्धर्मस्यावबोधाय येषां निर्बन्धिनी मतिः।
अचिरादेव सर्वार्थः सिद्ध्यत्येषामभीप्सितः ॥ 106 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 106 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-सद्धर्मको उदित करानेके लिये
जिनकी दृढ़ मति है, उनकी शीघ्र ही अभिलषित
सर्वार्थ-सिद्धि होती है॥ 106 ॥
अनुभाष्य-
सद्धर्मस्य (नित्योपादेय-भागवतधर्मस्य) अवबोधाय (तत्त्वज्ञानाय,
तत्त्वं जिज्ञासितुमित्यर्थः) येषां (भक्त्युन्मुख-सुकृतिवतां पुंसां)
निर्बन्धिनी (अचञ्चला) मतिः (रुचिः बुद्धर्वा) (वर्त्तते), एषां
(शुद्धचित्तानां निर्मलचेतसाम्) अभीप्सितः (प्रार्थितः) सर्वार्थः
(साध्यः) अचिरात् (शीघ्रम्) एव सिद्ध्यति (सफलो भवति)।
श्लोक-भावानुवाद-भागवतधर्मके तत्त्वको जाननेके
जिज्ञासु जिन सुकृतिवान् व्यक्तियोंकी अचलबुद्धि होती
है, ऐसे निर्मल चित्तवालोंको उनके द्वारा प्रार्थित
साध्य-प्राप्तिमें शीघ्र सफलता मिलती है ॥ 106 ॥
महाप्रभुका श्रीसनातनको आचार्यरूपमें अङ्गीकार करना :-
योग्यपात्र हओ तुमि भक्ति प्रवर्त्ताइते।
क्रमे सब तत्त्व शुन, कहिये तोमाते ॥ 107 ॥
अनुवाद-तुम भक्तिका प्रवर्तन (प्रचार) करनेके
लिये योग्यपात्र हो। क्रमशः तुम सब तत्त्वोंको सुनो, मैं
तुम्हें सब बतला रहा हूँ॥ 107 ॥
श्रीश्रीसनातन-शिक्षारम्भ; (क-1)
सर्वप्रथम जीवके स्वरूपका विचार :-
जीवेर 'स्वरूप' हय-कृष्णेर 'नित्यदास'।
कृष्णेर 'तटस्था-शक्ति', 'भेदाभेद-प्रकाश' ॥ 108 ॥
सूर्याशु-किरण, येन अग्निज्वालाचय।
स्वाभाविक कृष्णेर तिनप्रकार 'शक्ति' हय ॥ 109 ॥
अनुवाद-जीव श्रीकृष्णका 'नित्यदास' है, यही
जीवका स्वरूप है, क्योंकि वह श्रीकृष्णकी तटस्था-शक्ति
और उनका भेदाभेद-प्रकाश है। जीव सूर्य-स्वरूप
श्रीकृष्णका किरण-कण है अथवा वह प्रज्ज्वलित
अग्निरूपी श्रीकृष्णकी चिङ्गारीके जैसा है। श्रीकृष्णकी
स्वाभाविक तीन प्रकारकी शक्तियाँ हैं॥ 108-109 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-“मैं कौन हूँ?” इन प्रश्नके
उत्तरमें महाप्रभुने कहा,- “तुम-जीव हो। क्या तुम
जड़से उत्पन्न यह शरीर हो? ऐसा नहीं है। अथवा तुम
मन-बुद्धि-अहङ्कारस्वरूप लिङ्ग-शरीर हो? वह भी नहीं
है। तुम स्वरूपतः श्रीकृष्णके नित्यदास हो। तुम
श्रीकृष्णकी तटस्थाशक्ति हो अर्थात् श्रीकृष्णके चिद्-
जगत् और मायिक जगत्,-इन दोनोंके बीचकी सीमापर
(तटपर) स्थित होनेके कारण तुम्हारा दोनों जगत्से
सम्बन्ध है, तुम-तटस्था-शक्ति हो। श्रीकृष्णके साथ
तुम्हारा भेदाभेद-प्रकाशरूप दोनों प्रकारका 'सम्बन्ध' है।
। 235

[ 20/108-114 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
चिन्मयधर्मके सम्बन्धसे तुम—श्रीकृष्णके अभेद-प्रकाश
हो और अणुचैतन्य-धर्मके कारण बृहद्-चैतन्य श्रीकृष्णके
भेद-प्रकाश हो। (श्रीकृष्णके साथ तुम्हारा) भेद और
अभेद-युगपत् (एक ही समयमें) सिद्ध है। जीवके
तटस्थ-स्वभावसे ही यह युगपत् भेदाभेद प्रकाश सिद्ध
हुआ है। जीव सूर्यस्वरूप श्रीकृष्णका किरण-कण है;
अथवा प्रज्वलित अग्निरूप श्रीकृष्णकी असंख्य
चिङ्गारियाँ जीवसमूहका उदाहरण-स्थल है॥108-109॥
अनुभाष्य—आदिलीला 2/96 संख्या देखें॥108-109॥
विष्णुका सर्वव्यापिनी शक्तिके द्वारा लीला-विलास :-
विष्णुपुराण (1/22/53)में—
एकदेशस्थितस्याग्नेर्ज्योत्स्ना विस्तारिणी यथा।
परस्य ब्रह्मणः शक्तिस्तथैदमखिलं जगत्॥110॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥110॥
अमृतप्रवाह भाष्य—एक स्थानपर स्थित अग्निका
प्रकाश अथवा आलोक जिस प्रकार विस्तृत होता है,
परब्रह्मकी शक्ति भी अखिल जगत्में उसी प्रकार व्याप्त
है॥110॥
अनुभाष्य—
यथा एकदेशस्थितस्य (निर्दिष्टस्थानाधिष्ठितस्य) अग्नेः ज्योत्स्ना
(प्रभा) विस्तारिणी (व्यापिनी), तथा इदम् अखिलं (सर्वं
चिदचिन्मयं) जगत् परस्य ब्रह्मणः (कृष्णस्य) शक्तिः।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥110॥
(क-2) श्रीकृष्णकी शक्तिका विचार :-
कृष्णेर स्वाभाविक तिनशक्ति परिणति।
चिच्छक्ति, जीवशक्ति, आर मायाशक्ति॥111॥
अनुवाद—श्रीकृष्णकी स्वाभाविक शक्तिकी तीन
परिणति हैं-चित्-शक्ति, जीवशक्ति और मायाशक्ति॥111॥
तीन प्रकारकी शक्ति :-
विष्णुपुराण (6/7/61)में—
विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथापरा।
अविद्या-कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते॥112॥
अनुवाद—विष्णुशक्ति-परा, क्षेत्रज्ञा और अविद्या
नामक तीन प्रकारकी है। विष्णुकी पराशक्ति ही
'चित्-शक्ति' है, क्षेत्रज्ञा-शक्ति ही जीवशक्ति है (जिसे
मायारूपी 'अविद्या'से 'अपरा' अर्थात् भिन्ना कहा गया
है) और कर्म नामक अविद्या-शक्तिका नाम 'माया'
है॥112॥
अनुभाष्य—आदिलीला 7/119 संख्या देखें॥112॥
(1) अन्तरङ्गा स्वरूपशक्ति अकाट्य-भावसे
शक्तिमानकी आश्रित :-
विष्णुपुराण (1/3/2)में—
शक्तयः सर्वभावानामिन्त्यज्ञानगोचराः।
यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तयः।
भवन्ति तपतां श्रेष्ठ पावकस्य यथोष्णता॥113॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥113॥
अमृतप्रवाह भाष्य—सभी भावोंकी अचिन्त्यज्ञानसे
गोचर समस्त शक्तियाँ ब्रह्ममें विद्यमान हैं; इस कारणसे
ब्रह्मकी वे समस्त शक्तियाँ सृष्टि आदि भावशक्तिके
रूपमें क्रिया करती हैं। हे तापस-श्रेष्ठ, अग्निका जिस
प्रकार गर्मी प्रदान करनेवाला धर्म स्वतःसिद्ध है, उसी
प्रकार सभी शक्तियाँ भी ब्रह्मका स्वतःसिद्ध धर्म
हैं॥113॥
अनुभाष्य—
हे तपतां (तापसानां) श्रेष्ठ, यथा पावकस्य (अग्नेः)
उष्णता (दाहकत्वादिशक्तिः) [अस्ति, तथा] यतः (ब्रह्मणः)
एव सर्वभावानाम् अचिन्त्यज्ञानगोचराः (मानवबुद्धेः अगोचराः)
अतः तु [एव] ताः (तथाविधाः) सर्गाद्याः (चित्सर्गाद्याः)
[अविच्छेद्यरूपेण] ब्रह्मणः शक्तयः [नित्यप्रकटिताः] भवन्ति।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥113॥
(2) तटस्था जीवशक्ति :-
विष्णुपुराण (6/7/62-63)में—
यया क्षेत्रज्ञशक्तिः सा वेष्टिता नृप सर्वगा।
संसारतापानखिलानवाप्नोत्यत्र सन्ततान्॥114॥
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