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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1679, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1679

बीसवाँ अध्याय 20/89-97 ]
अनुवाद—महाप्रभुने पूछा, - "तुम्हारा बहुमूल्य कम्बल
कहाँ गया?" श्रीसनातन गोस्वामीने महाप्रभुको पूरी बात
बतायी ॥ 89 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णकृपा-माहात्म्यका वर्णन :-
प्रभु कहे, - "इहा आमि करियाछि विचार ।
विषय-रोग खण्डाइल कृष्ण ये तोमार ॥ 90 ॥
से केने राखिबे तोमार शेष विषय-भोग ?
रोग खण्डि' सद्यैद्य ना राखे शेष रोग ॥ 91 ॥
आचार और प्रचारमें परस्पर सामञ्जस्य
रखनेका उपदेश :-
तिन मुद्रार भोट गाय, माधुकरी ग्रास ।
धर्महानि हय, लोके करे उपहास ॥ "92॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, - "मैंने विचार किया है
कि श्रीकृष्णने तुम्हारे विषय-रोगको दूर कर दिया है।
तब वे तुम्हारे अन्तिम विषय-भोगको क्यों छोड़ देंगे?
जैसे एक अच्छा वैद्य रोगको दूर करके उसका
लेशमात्र भी शरीरमें शेष नहीं रहने देता। तीन मुद्राओं
मूल्यका महँगा कम्बल शरीरपर धारण करके भोजनके
लिये माधुकरी करना परस्पर विरोधी कार्य हैं। इससे
धर्मकी हानि होती है और लोग भी उपहास
करेंगे॥"90-92॥
श्रीसनातनके द्वारा महाप्रभु-कृपा-माहात्म्यकी प्रशंसा :-
गोसाञि कहे, - "ये खण्डिल कुविषय-भोग।
ताँर इच्छाय गेल मोर शेष विषय-रोग ॥ "93 ॥
अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीने कहा, - "जिन्होंने मेरी
पापमय जीवनसे रक्षा की है, उन्हींकी इच्छासे मेरी
अन्तिम विषय-आसक्ति भी दूर हो गई है॥"93॥
अनुभाष्य- 'कुविषय-भोग' - पाप-विषय-सेवा ॥ 93 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनमें शक्ति-सञ्चार :-
प्रसन्न हुआ प्रभु ताँरे कृपा कैल।
ताँर कृपाय प्रश्न करिते ताँर शक्ति हैल ॥ 94 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने प्रसन्न होकर उनपर कृपा की।
महाप्रभुकी कृपासे उनमें प्रश्न करनेकी शक्ति आयी ॥ 94 ॥
पहले महाप्रभुकी शक्तिके बलसे श्रीरायके द्वारा महाप्रभुके
प्रश्नोंके उत्तर देनेका सामर्थ्य :-
पूर्वे यैछे राय-पाशे प्रभु प्रश्न कैला।
ताँर शक्त्ये रामानन्द ताँर उत्तर दिला ॥ 95 ॥
अनुवाद-पहले (गोदावरीके तटपर) जैसे श्रीरामानन्द
रायसे महाप्रभुने प्रश्न पूछे थे और उनकी शक्तिसे
श्रीरामानन्द रायने उनके उत्तर दिये थे ॥ 95 ॥
उसी प्रकार महाप्रभुकी शक्तिके सञ्चारके बलसे
श्रीसनातनके प्रश्न, और स्वयं महाप्रभुका उत्तर देना :-
इहाँ प्रभुर शक्त्ये प्रश्न करे सनातन।
आपने महाप्रभु करे 'तत्त्व'-निरूपण ॥ 96 ॥
अनुवाद-यहाँपर महाप्रभुकी शक्तिसे श्रीसनातन
गोस्वामी प्रश्न कर रहे थे और स्वयं महाप्रभु 'तत्त्व'का
निरूपण कर रहे थे॥96 ॥
श्रीसनातनको स्वयं महाप्रभुके द्वारा
सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजन तत्त्वको बतलाना :-
(ग्रन्थकार-वाक्य-)
कृष्णस्वरूपमाधुर्यैश्वर्यभक्तिरसाश्रयम्।
तत्त्वं सनातनायेशः कृपयोपदिदेश सः ॥ 97 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 97 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभुने
कृपापूर्वक श्रीसनातनको श्रीकृष्णके स्वरूप-माधुर्य, उनके
स्वरूप-ऐश्वर्य और भक्तिरसाश्रय-रूप तत्त्वका उपदेश
दिया ॥ 97 ॥
अनुभाष्य-
स ईशः (महाप्रभुः) कृपया (अतुल-करुणया) सनातनाय
(सनातन-गोस्वामिने) कृष्णस्वरूपमाधुर्यैश्वर्यभक्तिरसाश्रयं (कृष्णस्य
स्वरूपं सर्वेश्वरेश्वरेश्वर-सच्चिदानन्दघनात्मक-किशोर-शेखर-
यशोदानन्दनत्वं, माधुर्यम् असमोर्ध्वतया सर्वमनोहरं
स्वाभाविक-रूपगुणलीलादिसौष्ठवं, ऐश्वर्यम् असमोर्द्धानन्त-
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