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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1670, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1670

[ 20/21-33 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
“तोमार ठाञि जानि किछु द्रव्य आछय।”
ईशान कहे, — “मोर ठाञि सात मोहर हय ॥” 24 ॥
अनुवाद—इतना कहकर जमींदारने उन्हें सम्मानपूर्वक
रसोई बनानेके लिये चावल, दाल आदि दिये। श्रीसनातन
गोस्वामीने पहले नदीमें जाकर स्नान किया। वे दो
दिनसे उपवास कर रहे थे, इसलिये रसोई बनाकर
उन्होंने भोजन ग्रहण किया। पूर्व-राजमन्त्री श्रीसनातनने
अपने मनमें विचार किया, — 'इस जमींदारने मेरा इतना
सम्मान क्यों किया?' यह सोचकर श्रीसनातन गोस्वामीने
ईशानसे पूछा, — “मुझे लगता है कि तुम्हारे पास कोई
मूल्यवान वस्तु है?” ईशानने कहा, — “मेरे पास स्वर्णकी
सात मोहरें हैं॥” 21-24 ॥
अनुभाष्य—'दुइ उपवासे'—दो दिन उपवास करके।
'हय'—हैं; पश्चिम भारतकी हिन्दी-भाषामें "हैं' कहते
हैं॥ 22-24 ॥
ईशानको डाँटना :—
शुनि' सनातन तारे करिला भर्त्सन।
“सङ्गे केने आनियाछ एइ काल-यम ?” ॥ 25 ॥
अनुवाद—यह सुनकर श्रीसनातन गोस्वामीने ईशानको
डाँट लगायी और पूछा, — “इस मृत्यु-नादको साथमें क्यों
लाये हो ?” ॥ 25 ॥
जमींदारको धन देना और सहायताकी प्रार्थना :—
तबे सेइ सात मोहर हस्तेते करिया।
भूञार काछे याञा कहे मोहर धरिया ॥ 26 ॥
“एइ सात सुवर्ण मोहर आछिल आमार।
इहा लञा धर्म देखि' पर्वत कर पार ॥ 27 ॥
राजबन्दी आमि, गड़द्वार याइते ना पारि।
पुण्य हबे, पर्वत आमा देह' पार करि ॥” 28 ॥
अनुवाद—तब उन सात मोहरोंको अपने हाथमें
लेकर श्रीसनातन गोस्वामी जमींदारके पास गये। अपने
हाथमें मोहरें दिखाकर कहा, — “मेरे पास ये सात
स्वर्णकी मोहरें हैं, इन्हें आप ले लीजिये और अपना
धर्म समझकर हमें पर्वत पार करा दीजिये। मैं एक
(भागा हुआ) राजबन्दी हूँ, इसलिये किलोंके साथ
राजमार्गसे नहीं जा सकता। आपका बहुत पुण्य होगा
यदि आप हमें पर्वत पार करा देंगे॥” 25-28 ॥
जमींदारका हत्याके सङ्कल्पको छोड़ना; धन लेनेसे मना
करना और सहायता करना स्वीकार :—
भूञा हासि' कहे, — “आमि जानियाछि पहिले।
अष्ट-मोहर हय तोमार सेवक-आँचले ॥ 29 ॥
तोमा मारि' मोहर लइताम आजिकार रात्र्ये।
भाल हैल, कहिला तुमि, छुटिलाङ पाप हैते ॥ 30 ॥
सन्तुष्ट हइलाङ आमि, मोहर ना लइब।
पुण्य लागि' पर्वत तोमा' पार करि' दिब ॥” 31 ॥
अनुवाद—जमींदारने हँसते हुए कहा, — “मुझे पहलेसे
ही पता चल गया था कि आपके सेवकके आँचलमें
आठ स्वर्ण मोहरें हैं। आप लोगोंको मारकर आज
रात्रिमें मैं मोहरें ले लेता, अच्छा हुआ आपने स्वयं
आकर ही बतला दिया, मैं पाप करनेसे बच गया। मैं
आपके व्यवहारसे बहुत सन्तुष्ट हुआ हूँ, इसलिये मैं
मोहरें नहीं लूँगा और पुण्य कार्य करते हुए आप
लोगोंको पर्वत पार करा दूँ गा ॥ ” 29-31 ॥
गोसाञि कहे, — “केह द्रव्य लइबे आमा मारि' ।
आमार प्राण रक्षा कर द्रव्य अङ्गीकरि' ॥” 32 ॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा, — “यदि आप
इन्हें नहीं लेंगे, तो अन्य कोई हमें मारकर इन
मोहरोंको ले लेगा, इसलिये आप ही इन मोहरोंको
स्वीकार करके हमारे प्राणोंकी रक्षा करो ॥” 32 ॥
जमींदारकी श्रीसनातनको पर्वतको
पार करनेमें सहायता :—
तबे भूञा गोसाञिर सङ्गे चारि पाइक दिल।
रात्र्ये रात्र्ये वनपथे पर्वत पार कैल ॥ 33 ॥
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