श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1682, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 20/108-114 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
चिन्मयधर्मके सम्बन्धसे तुम—श्रीकृष्णके अभेद-प्रकाश
हो और अणुचैतन्य-धर्मके कारण बृहद्-चैतन्य श्रीकृष्णके
भेद-प्रकाश हो। (श्रीकृष्णके साथ तुम्हारा) भेद और
अभेद-युगपत् (एक ही समयमें) सिद्ध है। जीवके
तटस्थ-स्वभावसे ही यह युगपत् भेदाभेद प्रकाश सिद्ध
हुआ है। जीव सूर्यस्वरूप श्रीकृष्णका किरण-कण है;
अथवा प्रज्वलित अग्निरूप श्रीकृष्णकी असंख्य
चिङ्गारियाँ जीवसमूहका उदाहरण-स्थल है॥108-109॥
अनुभाष्य—आदिलीला 2/96 संख्या देखें॥108-109॥
विष्णुका सर्वव्यापिनी शक्तिके द्वारा लीला-विलास :-
विष्णुपुराण (1/22/53)में—
एकदेशस्थितस्याग्नेर्ज्योत्स्ना विस्तारिणी यथा।
परस्य ब्रह्मणः शक्तिस्तथैदमखिलं जगत्॥110॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥110॥
अमृतप्रवाह भाष्य—एक स्थानपर स्थित अग्निका
प्रकाश अथवा आलोक जिस प्रकार विस्तृत होता है,
परब्रह्मकी शक्ति भी अखिल जगत्में उसी प्रकार व्याप्त
है॥110॥
अनुभाष्य—
यथा एकदेशस्थितस्य (निर्दिष्टस्थानाधिष्ठितस्य) अग्नेः ज्योत्स्ना
(प्रभा) विस्तारिणी (व्यापिनी), तथा इदम् अखिलं (सर्वं
चिदचिन्मयं) जगत् परस्य ब्रह्मणः (कृष्णस्य) शक्तिः।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥110॥
(क-2) श्रीकृष्णकी शक्तिका विचार :-
कृष्णेर स्वाभाविक तिनशक्ति परिणति।
चिच्छक्ति, जीवशक्ति, आर मायाशक्ति॥111॥
अनुवाद—श्रीकृष्णकी स्वाभाविक शक्तिकी तीन
परिणति हैं-चित्-शक्ति, जीवशक्ति और मायाशक्ति॥111॥
तीन प्रकारकी शक्ति :-
विष्णुपुराण (6/7/61)में—
विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथापरा।
अविद्या-कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते॥112॥
अनुवाद—विष्णुशक्ति-परा, क्षेत्रज्ञा और अविद्या
नामक तीन प्रकारकी है। विष्णुकी पराशक्ति ही
'चित्-शक्ति' है, क्षेत्रज्ञा-शक्ति ही जीवशक्ति है (जिसे
मायारूपी 'अविद्या'से 'अपरा' अर्थात् भिन्ना कहा गया
है) और कर्म नामक अविद्या-शक्तिका नाम 'माया'
है॥112॥
अनुभाष्य—आदिलीला 7/119 संख्या देखें॥112॥
(1) अन्तरङ्गा स्वरूपशक्ति अकाट्य-भावसे
शक्तिमानकी आश्रित :-
विष्णुपुराण (1/3/2)में—
शक्तयः सर्वभावानामिन्त्यज्ञानगोचराः।
यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तयः।
भवन्ति तपतां श्रेष्ठ पावकस्य यथोष्णता॥113॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥113॥
अमृतप्रवाह भाष्य—सभी भावोंकी अचिन्त्यज्ञानसे
गोचर समस्त शक्तियाँ ब्रह्ममें विद्यमान हैं; इस कारणसे
ब्रह्मकी वे समस्त शक्तियाँ सृष्टि आदि भावशक्तिके
रूपमें क्रिया करती हैं। हे तापस-श्रेष्ठ, अग्निका जिस
प्रकार गर्मी प्रदान करनेवाला धर्म स्वतःसिद्ध है, उसी
प्रकार सभी शक्तियाँ भी ब्रह्मका स्वतःसिद्ध धर्म
हैं॥113॥
अनुभाष्य—
हे तपतां (तापसानां) श्रेष्ठ, यथा पावकस्य (अग्नेः)
उष्णता (दाहकत्वादिशक्तिः) [अस्ति, तथा] यतः (ब्रह्मणः)
एव सर्वभावानाम् अचिन्त्यज्ञानगोचराः (मानवबुद्धेः अगोचराः)
अतः तु [एव] ताः (तथाविधाः) सर्गाद्याः (चित्सर्गाद्याः)
[अविच्छेद्यरूपेण] ब्रह्मणः शक्तयः [नित्यप्रकटिताः] भवन्ति।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥113॥
(2) तटस्था जीवशक्ति :-
विष्णुपुराण (6/7/62-63)में—
यया क्षेत्रज्ञशक्तिः सा वेष्टिता नृप सर्वगा।
संसारतापानखिलानवाप्नोत्यत्र सन्ततान्॥114॥
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