श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
यह स्वीकार करेंगे कि बाउल-लोग कभी भी
श्रीचैतन्य-सम्प्रदायके वैष्णव नहीं कहला सकते।
श्रीसनातनको 'फकीर' कहकर उल्लेख करनेसे
साँई, दरवेश, चरणपाली, दुलालचाँदी आदि अधिकांश
लोग मुसलमानके फकीर-वेशको धारण करके उनके
जैसे आचार-व्यवहार करते हैं और स्वयंको
चैतन्य-सम्प्रदाय-वैष्णव कहकर अपना परिचय देते हैं।
यदि कोई उनसे पूछे कि तुम लोग प्रायः मुसलमानके
फकीरका वेश धारण और उनके जैसा आचार-व्यवहार
भी करते हो और चैतन्य-सम्प्रदाय-वैष्णव कहकर
अपना परिचय देते हो, इसका क्या प्रमाण है? इस
प्रश्नके उत्तरमें वे कहते हैं कि इसका प्रमाण
श्रीसनातन गोस्वामी हैं, वे फकीर थे। किन्तु जब
महाप्रभुने श्रीसनातनके दाड़ी-मूँछ और सिरके केश
मुण्डन करवाकर वैष्णव-वेश धारण करवाया था, तब
उस स्थानपर ही साँई, दरवेश, चरणपाली, दुलालचाँदी
आदिका प्रमाण परिसमाप्त हो गया है। इस कारण साँई,
दरवेशादि लोगोंका चैतन्य-सम्प्रदाय-वैष्णव होना तो दूर
रहे, अपितु उनको एक प्रकार मोहम्मद-सम्प्रदाय ही
कहा जाना चाहिये। (—जगद्गुरु श्रीश्रील भक्तिविनोद
ठाकुर-कृत 'श्रीश्रीसनातन गोस्वामी प्रभु' प्रबन्ध।
श्रीगौड़ीय-पत्रिका, 7वाँ वर्ष, 4र्थ संख्या) ॥ 68-69 ॥
श्रीचन्द्रशेखरके द्वारा दिये नये वस्त्रोंको पहननेमें
श्रीसनातनकी असम्मति :—
सेइ वस्त्र सनातन ना कैल अङ्गीकार।
शुनिया प्रभुर मने आनन्द अपार ॥ 71 ॥
अनुवाद—श्रीचन्द्रशेखरके द्वारा लाये गये उन नये
वस्त्रोंको श्रीसनातनने स्वीकार नहीं किया। इस बातको
सुनकर महाप्रभुके मनमें अपार आनन्द हुआ॥ 71 ॥
दोपहरमें श्रीतपनमिश्रके घरमें महाप्रभुका भोजन,
श्रीसनातनको महाप्रभुके उच्छिष्टकी प्राप्ति :—
मध्याह्न करिया प्रभु गेला भिक्षा करिवारे।
सनातने लञा गेला तपनमिश्रेर घरे ॥ 72 ॥
अनुवाद—दोपहरका स्नान करनेके बाद महाप्रभु
श्रीसनातन गोस्वामीको अपने साथ लेकर भोजनके लिये
श्रीतपन मिश्रके घरपर गये॥ 72 ॥
पादप्रक्षालन करि' भिक्षाते बसिला।
“सनातने भिक्षा देह”—मिश्ररे कहिला ॥ 73 ॥
अनुवाद—चरणोंको धोनेके बाद महाप्रभु भोजनके
लिये बैठे। महाप्रभुने श्रीतपनमिश्रसे कहा, —“सनातनको
भोजन प्रदान करो॥”73 ॥
मिश्र कहे, —“सनातनेर किछु कृत्य आछे।
तुमि भिक्षा कर, प्रसाद ताँरे दिब पाछे॥” 74 ॥
अनुवाद—श्रीतपनमिश्रने कहा, —“सनातनका अभी
कुछ कार्य बाकी है। आप भोजन ग्रहण कीजिये, मैं
उन्हें बादमें प्रसाद दूँगा॥”74 ॥
भिक्षा करि' महाप्रभु विश्राम करिला।
मिश्र प्रभुर शेषपात्र सनातने दिला ॥ 75 ॥
अनुवाद—भोजन करनेके बाद महाप्रभुने थोड़ा
विश्राम किया। श्रीतपनमिश्रने महाप्रभुका उच्छिष्ट प्रसाद
श्रीसनातन गोस्वामीको दिया॥ 75 ॥
मिश्रके द्वारा दिये नये वस्त्रोंको पहननेमें
श्रीसनातनकी आपत्ति :—
मिश्र सनातने दिला नूतन वसन।
वस्त्र नाहि निला, तेँहो करे निवेदन ॥ 76 ॥
वैष्णव-उच्छिष्ट पुराने वस्त्र-ग्रहण करनेकी श्रीसनातनकी
इच्छा :—
“मोरे वस्त्र दिते यदि तोमार हय मन।
निज परिधान एक देह' पुरातन॥” 77 ॥
एक वस्त्रको दो टुकड़ोंमें बाँटकर बहिर्वास और उसके
उपयोगी डोर-कौपीन बनाना :—
तबे मिश्र पुरातन एक धुति दिला।
तेँहो दुइ बहिर्वास-कौपीन करिला ॥ 78 ॥
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