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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1675, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1675

बीसवाँ अध्याय 20/62-70 ]
महारौरव हैते तोमाय करिला उद्धार।
कृपार समुद्र कृष्ण गम्भीर अपार ॥"63॥
अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने आगे कहा,—“हे
सनातन ! सुनो, भगवान् श्रीकृष्ण बहुत ही दयामय और
पतित-पावन हैं। उन्होंने महारौरव-नरकसे तुम्हारा
उद्धार किया है। कृपाके समुद्र श्रीकृष्ण अपार और
गम्भीर हैं॥"62-63॥
अनुभाष्य—'महा-रौरव'-जीविकाके उद्देश्यसे
जन्तुओंका वध करनेवाले 'महारौरव' नामक नरकको
प्राप्त करते हैं (भाः 5/26/10-12 श्लोक देखें) ॥ 63 ॥
श्रीसनातनका महाप्रभुको श्रीकृष्णसे अभिन्न मानना :—
सनातन कहे, – “कृष्ण आमि नाहि जानि।
आमार उद्धार-हेतु तोमार कृपा मानि ॥ "64॥
महाप्रभुके प्रश्नके उत्तरमें अपने वृत्तान्तका वर्णन :—
'केमने छुटिला' बलि प्रभु प्रश्न कैला।
आद्योपान्त सब कथा तँहो शुनाइला ॥ 65 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीरूप और श्रीअनुपमका संवाद देना :—
प्रभु कहे, – “तोमार दुइ भाइ प्रयागे मिलिला।
रूप, अनुपम, – दुँहे वृन्दावन गेला ॥"66॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,- "मैं
श्रीकृष्णको नहीं जानता हूँ। मैं तो आपकी कृपाको
अपने उद्धारका कारण मानता हूँ।" 'आप कैसे
छूटे'—यह कहकर महाप्रभुने प्रश्न किया और श्रीसनातन
गोस्वामीने आरम्भसे अन्त तकका सब वृत्तान्त कह
सुनाया। महाप्रभुने कहा, – “तुम्हारे दोनों भाई रूप और
अनुपम, मुझसे प्रयागमें मिले थे। वहाँसे वे दोनों
वृन्दावन गये हैं॥"64-66 ॥
श्रीतपनमिश्र और श्रीचन्द्रशेखरके साथ
श्रीसनातनका मिलन :—
तपनमिश्रेरे आर चन्द्रशेखरेरे।
प्रभु-आज्ञाय सनातन मिलिला दोँ हारे ॥ 67 ॥
अनुवाद—महाप्रभुकी आज्ञासे श्रीसनातन गोस्वामी
श्रीतपनमिश्र और श्रीचन्द्रशेखरसे मिले ॥ 67 ॥
श्रीसनातनको श्रीतपनमिश्रका निमन्त्रण, श्रीसनातनको मुण्डन
करानेके लिये महाप्रभुकी आज्ञा :—
तपनमिश्र तबे ताँरे कैला निमन्त्रण।
प्रभु कहे, – “क्षौर कराह, याह, सनातन ॥” 68 ॥
अनुवाद—श्रीतपनमिश्रने श्रीसनातन गोस्वामीको
निमन्त्रण दिया। महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीसे कहा,—
“हे सनातन, जाओ और मुण्डन करवाकर आओ॥"68 ॥
श्रीचन्द्रशेखरको श्रीसनातनके अवैष्णव-वेशको त्याग कराके
वैष्णवोचित वेश धारण करानेकी आज्ञा :—
चन्द्रशेखरेरे प्रभु कहे बोलाञा।
“एइ वेश दूर कर, याह इँहारे लञा ॥" 69 ॥
भद्र कराञा ताँरे गङ्गास्नान कराइल।
शेखर आनिया ताँरे नूतन वस्त्र दिल ॥ 70 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीचन्द्रशेखरको बुलाकर
कहा,—“आप सनातनको अपने साथ ले जाकर इनके
इस वेशको दूर करो।" श्रीचन्द्रशेखरने श्रीसनातनका
मुण्डन कराके उन्हें गङ्गास्नान कराया और उन्हें नये
वस्त्र लाकर दिये ॥ 69-70 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'भद्र कराञा'-मुण्डन करवाकर
अर्थात् दरवेशी दाड़ी और बालोंका मुण्डन करवाकर
सुवैष्णव जैसा वेश धारण कराया ॥ 70 ॥
अमृतानुकणा—महाप्रभुकी कृपा पानेकी इच्छुक
श्रीसनातनने जब महाप्रभुकी मधुर मूर्तिके दर्शन किये,
उस समय श्रीसनातनकी दाड़ी-मूँछ थी। वह दाड़ी-मूँछ
ही बाउल-वैष्णवोंके दाड़ी-मूँछ रखनेका एकमात्र प्रमाण
है। किन्तु महाप्रभुने श्रीसनातनको देखकर प्रेमालिङ्गन
करके तुरन्त उनका मुण्डन करवाया था। इसलिये
बाउल-वैष्णवोंका अकाट्य प्रमाण उसी समय ही नाईके
उस्तरेके द्वारा काटा गया था। अब सभी अवश्य ही
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