श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1674, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 20/59-62 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ]
अरविन्दनाभपादारविन्दविमुखात् (पद्मनाभ-कृष्णस्य पादपद्मात्
विमुखात्) द्विषड्गुणयुतात् (पूर्वश्लोकोक्ताः धनाभिजन-रूप-
तपः-श्रुतौजस्तेजः-प्रभाव बल-पौरुष-बुद्धियोगाः इत्यादयः ये
द्विष्ट् द्वादशगुणाः, यद्वा, “धर्मश्च सत्यञ्च दमस्तपश्च अमात्सर्यं
ह्रीस्तितिक्षाऽनसूया। यज्ञश्च दानञ्च धृतिः श्रुतञ्च व्रतानि वै
द्वादश ब्राह्मणस्य ॥” इति महाभारतीये-सनत्सुजातोक्ता द्वादश-गुणाः,
यद्वा, “शमो दमस्तपः शौचं क्षान्त्यार्जव-विरक्तयः। ज्ञान-विज्ञान-
सन्तोषाः सत्यास्तिक्ये द्विषड्गुणाः॥” इति मुक्ताफल-टीकोक्ता
द्वादशगुणाः, तैः युक्तात्) विप्रात् अपि तदर्पितमनो-वचनेहितार्थप्राणं
(तत् तस्मिन् अरविन्दनाभे कृष्णे अर्पिताः मनः वचनं ईहितं
कर्म अर्थः प्राणश्च एते येन, तं) श्वपचं वरिष्ठं (श्रेष्ठम्) अहं
मन्ये; [यतः] स (एवम्भूतः श्वपचः सर्वं) कुलं पुनाति,
भूरिमानः (भूरिः मानः गर्वः यस्य स विप्रः) तु [आत्मानमपि]
न [पुनाति, कुतः कुलम्? यतो भक्तिहीनस्य एते गुणाः
गर्वायैव भवन्ति, न तु शुद्धये; अतो हीन इति भावः]।
श्लोक-भावानुवाद-श्रीकृष्णके चरणकमलोंसे विमुख
बारह-गुणोंसे (श्रीमद्भागवतमें “विप्राद्द्विषड्”-श्लोकके पूर्व
श्लोकमें ये 'द्विष्ट्' अर्थात् बारह गुण कहे गये
हैं-“धन, सत्कुलमें जन्म, सौन्दर्य, तपस्या, पाण्डित्य,
इन्द्रिय-नैपुण्य, तेज, प्रताप, शारीरिक बल, पौरुष, बुद्धि
और अष्टाङ्गयोग” आदि; अथवा महाभारतमें सनत्सुजातके
द्वारा कथित बारह गुण-“धर्म, सत्य, दम, तप,
मात्सर्यशून्यता, लज्जा, सहनशीलता, ईर्ष्याशून्यता, यज्ञ,
दान, धैर्य, पाण्डित्य-ये ही ब्राह्मणके बारह व्रत हैं।”
अथवा, 'मुक्ताफल'-टीकामें कहे गये बारह गुण, जैसे,-
“शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, विषय-विरक्ति,
ज्ञान, विज्ञान, सन्तोष, सत्य, आस्तिकता-ये बारह गुण
हैं।”) युक्त ब्राह्मणकी अपेक्षा भी जिसके मन, वचन,
चेष्टा, अर्थ और प्राण श्रीकृष्णमें समर्पित हैं, ऐसे
चण्डालको भी मैं श्रेष्ठ मानता हूँ; क्योंकि वह (चण्डाल
कुलमें उत्पन्न भक्त) अपने कुलको पवित्र करता है।
और अपने उच्चकुलका गर्व करनेवाला ब्राह्मण जब
स्वयंको भी पवित्र नहीं कर सकता, [तब वह कुलको
कैसे पवित्र करेगा? जो भक्तिहीन ऐसे गुणोंसे गर्वित
होता है, वह शुद्ध नहीं है, इसलिये वह हीन है-यह
भाव है] ॥ 59 ॥
[दायाँ स्तम्भ]
भक्त-सेवामें लगनेसे ही सभी इन्द्रियोंकी सार्थकता :-
तोमा देखि, तोमा स्पर्शि, गाइ तोमार गुण।
सर्वेन्द्रिय-फल,-एइ शास्त्र-निरूपण॥ 60॥
अनुवाद-आपको देखना, आपको स्पर्श करना,
आपके गुणोंका गान करना ही सभी इन्द्रियोंका फल
है-शास्त्र यही निरूपण करते हैं॥ 60॥
जगत्में शुद्ध-भगवद्भक्त-सुदुर्लभ :-
हरिभक्तिसुधोदय (13/2)में-
अक्ष्णोः फलं त्वादृश-दर्शनं हि
तनोः फलं त्वादृश-गात्रसङ्गः।
जिह्वाफलं त्वादृश-कीर्त्तनं हि
सुदुर्लभा भागवता हि लोके॥ 61॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 61॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हे वैष्णव, तुम्हारे जैसे व्यक्तिका
दर्शन करना ही नेत्रोंका फल है; तुम्हारे जैसे व्यक्तिकी
देहको स्पर्श करना ही शरीरका फल है; तुम्हारे जैसे
व्यक्तिके गुणोंका कीर्तन करना ही जिह्वाका फल है;
क्योंकि, जगत्में भागवतजन ही सुदुर्लभ हैं॥”61॥
अनुभाष्य-
त्वादृशदर्शनं (त्वादृशानां भवत्तुल्यानां भागवतानां श्रद्धापूर्वक-दर्शनं)
अक्ष्णोः (चक्षुर्भ्यां वीक्षणकार्यस्य) फलं (तात्पर्यम्); त्वादृशगात्रसङ्गः
(त्वादृशानां भक्तानां गात्रसङ्गः अङ्गस्पर्शः) तनोः (शरीरस्य
धारणकार्यस्य) फलम्; त्वादृशकीर्त्तनं (त्वादृशानां भक्तानां
गुणकीर्त्तनं) हि (एव) जिह्वाफलं (वाक्योच्चारणस्य प्रयोजनम्);
[अतः] लोके (जगति) भागवताः (शुद्धभक्ताः) सुदुर्लभाः
(सुदुरापाः) हि (एव)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 61॥
श्रीकृष्णकी अहैतुकी कृपाके माहात्म्यका वर्णन; महाप्रभु
स्वयं ही श्रीसनातनके कारागारमें बन्द होने और वहाँसे
छूटनेकी लीलाके अभिनयके मूल-सूत्रधार :-
एत कहि' कहे प्रभु,-“शुन, सनातन।
कृष्ण-बड़ दयामय, पतित-पावन॥ 62॥
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