श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 10/159-169 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
ही संसारसे उद्धार नहीं होता। मनुसंहिता छठा अध्याय—
“फलं कतकवृक्षस्य यद्यप्यम्बुप्रसादकम्।
न नामग्रहणादेव तस्य वारि प्रसीदति।”
और इस श्लोककी कुल्लुक-भट्टकृत टीका—
“कतक-वृक्षस्य फलं कलुषजलस्वच्छताजनकं, तथापि
तन्नामोच्चारणवशात् न प्रसीदति किन्तु फलप्रक्षेपेण। एवं न
लिङ्गधारणमात्रम् धर्म-कारणम्।”
अर्थात् “ 'कतक'-वृक्षका फल (रीठा) यद्यपि
जलको निर्मल करता है, किन्तु इस फलका नाम
लेनेसे ही जल निर्मल नहीं होता। कुल्लुक-भट्टकृत
टीका—'कतक'-वृक्षका फल गन्दे-जलको स्वच्छ करता
है। ऐसा कहकर 'कतक' 'कतक', इस प्रकार नामके
उच्चारणसे जल निर्मल नहीं होता, बल्कि जलमें रीठा
फल डालनेपर ही जल स्वच्छ होता है। उसी प्रकार
केवल धार्मिक-चिह्न धारण करनेसे ही धर्मका पालन
नहीं होता।”
'बहिर्वास'—कौपीनके ऊपर पहना जानेवाला
वस्त्र ॥ 159-160 ॥
महाप्रभुके प्रणामको ग्रहण करनेमें श्रीभारतीको आपत्ति :-
भारती कहे,—“तोमार आचार लोक शिखाइते।
पुनः ना करिबे नति, भय पाङ चित्ते ॥ 162 ॥
श्रीभारतीका तत्त्वदर्शन—महाप्रभु और
जगन्नाथमें अभेद दर्शन :-
साम्प्रतिक 'दुइ ब्रह्म' इहाँ,—'चलाचल' ।
जगन्नाथ—अचल, तुमि—ब्रह्म सचल ॥ 163 ॥
अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 162-163 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'साम्प्रतिक'—वर्तमान कालमें।
इस पुरुषोत्तममें 'चल' और 'अचल', दो ब्रह्म देख रहा
हूँ॥ 163 ॥
अनुभाष्य—लोकशिक्षाके लिये ही आपका आचरण
है। यदि आपके मनके अनुसार मैं सदाचार पालन न
करूँ, तो आप पुनः मुझे प्रणाम न करके मेरी उपेक्षा
करेंगे, इसलिये मुझे भय हो रहा है।
'श्रीजगन्नाथ विग्रह'—अचल-ब्रह्म एवं आप श्रीचैतन्य
महाप्रभु—सचल ब्रह्म हैं। आप दोनों ही मायाधीश
चल-अचल ब्रह्मवस्तु स्वरूपमें इस समय श्रीपुरुषोत्तममें
विराजमान हैं ॥ 162-163 ॥
तुमि—गौरवर्ण, तेंह—श्यामवरण।
दुइ ब्रह्म कैल सब जगत्-तारण ॥” 164 ॥
अनुवाद—आप गौरवर्ण हैं और वे श्यामवर्णके हैं।
आप दोनों ब्रह्म समस्त जगत्का उद्धार कर रहे
हैं॥” 164 ॥
महाप्रभुके द्वारा उत्तर देना :-
प्रभु कहे,—“सत्य कहि, तोमार आगमने।
दुइ ब्रह्म प्रकटिल श्रीपुरुषोत्तमे ॥ 165 ॥
'ब्रह्मानन्द' नाम तुमि—गौर-ब्रह्म 'चल'।
श्यामवर्ण जगन्नाथ बसियाछेन 'अचल' ॥” 166 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने उत्तर दिया,—“मैं सत्य कह
रहा हूँ, आपके आनेसे श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्रमें दो ब्रह्म
प्रकट हो गये हैं। 'ब्रह्मानन्द' नामक गौरवर्णके आप
'चल' ब्रह्म हैं और दूसरे श्यामवर्णके श्रीजगन्नाथ
'अचल' ब्रह्म यहाँ पहलेसे ही बैठे हैं॥” 165-166 ॥
महाप्रभु और श्रीभारती, दोनोंके विचारमें
श्रीसार्वभौमकी मध्यस्थता :-
भारती कहे,—“सार्वभौम, मध्यस्थ हञा।
इँहार सने आमार 'न्याय' बुझ' मन दिया ॥ 167 ॥
श्रीभारतीका जीव-ब्रह्म विचार :-
'व्याप्य'-'व्यापक'-भावे 'जीव'-'ब्रह्मे' जानि।
जीव—व्याप्य, ब्रह्म—व्यापक, शास्त्रेते बाखानि ॥ 168 ॥
स्वेच्छापूर्वक चालित करानेवाले इच्छाशक्तिके परिचालक
प्रभु ही विभु या विष्णु या ब्रह्म, श्रीभारती ही जीव :-
चर्म घुचाञा कैल आमारे शोधन।
दोँहार व्याप्य-व्यापकत्वे, एइ त' कारण ॥ 169 ॥
अनुवाद—श्रीब्रह्मानन्द भारतीने कहा,—“हे सार्वभौम
426 ।
दसवाँ अध्याय 10/167-174 ]
भट्टाचार्य ! आप मध्यस्थ होकर इनके साथ मेरे न्यायसङ्गत
विचारको ध्यानपूर्वक सुनिये। 'व्याप्य' और 'व्यापक'—इन
दो प्रकारसे 'जीव' और 'ब्रह्म'को मैं जानता हूँ।
जीवको व्याप्य और ब्रह्मको व्यापकके रूपमें शास्त्रोंमें
कहा गया है। मृगछाला छुड़ाकर इन्होंने मेरा शोधन
किया है, इसलिये ये व्यापक-ब्रह्म हैं और मैं
व्याप्य-जीव हूँ॥ 167-169 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—इनके साथ आप मेरा विचार
ध्यानपूर्वक सुनिये। ब्रह्म-व्यापक अर्थात् सर्वव्यापक हैं;
जीव-अणु अर्थात् ब्रह्मके द्वारा व्याप्य है। जिन्होंने
मृगछाला छुड़ाकर मेरा शोधन किया है, वे-व्यापक हैं
और मैं-व्याप्य हूँ। यहाँपर विचार करके देखिये कि
ब्रह्मानन्द-भारतीरूप मैं या श्रीकृष्णचैतन्यरूप ये-हम
दोनोंमेंसे कौन 'ब्रह्म' हुए॥ 169॥
महाभारतमें दानधर्म 149, विष्णुसहस्त्रनाम-स्तोत्र (92, 75)—
सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी।
संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा-शान्ति-परायणः ॥ 170॥
अनुवाद—सुवर्णवर्ण, पिघले स्वर्णकी भाँति अङ्ग,
सर्वाङ्गसुन्दर गठन, चन्दनमालासे सुशोभित, संन्यासाश्रमी,
हरि-रहस्यकी आलोचनारूप शमगुणसे युक्त, हरिकीर्त्तनरूप
महायज्ञमें दृढ़तापूर्वक निष्ठावान् और केवलाद्वैतवादी
अभक्त-निवृत्तिकारिणी शान्ति-प्राप्त महाभावपरायण—ये
विष्णु सहस्त्र नामोंमें आठ नाम हैं॥ 170॥
अनुभाष्य—आदिलीला 3/49 संख्या देखें॥ 170॥
महाप्रभुमें ही उपरोक्त श्लोकका तात्पर्य निहित :-
एइसब नामेर इँह हय निजास्पद।
चन्दनाक्त प्रसाद-डोर—द्विभुजे अङ्गद॥”171॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 171 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'सुवर्णवर्णः'-श्लोकमें जो सब
नाम हैं, उनके श्रीकृष्णचैतन्य ही आस्पद हैं अर्थात् उन
नामोंने उन्होंने ही स्थान प्राप्त किया है। चन्दनका लेप
और प्रसाद-डोर (श्रीजगन्नाथदेवकी प्रसादी डोर जो उन्हें
प्राप्त हुई है)—ये उनकी दोनों भुजाओंमें कङ्कनस्वरूप
हैं॥” 171॥
श्रीसार्वभौमकी मीमांसा—श्रीभारतीकी जय
और महाप्रभुकी पराजय स्वीकार :-
भट्टाचार्य कहे,—“भारती, देखि तोमार जय।”
प्रभु कहे,—“येइ कह, सेइ सत्य हय॥ 172 ॥
गुरुतुल्य श्रीभारतीके समक्ष शिष्य-स्थानीय
महाप्रभुकी पराजय :-
गुरु-शिष्य-न्याये शिष्येर सत्य पराजय।”
भारती कहे,—“ए नहे, अन्य हेतु हय ॥ 173 ॥
श्रीभारतीकी प्रत्युक्ति—भक्तोंके
समक्ष भगवान्की पराजय :-
भक्त ठाञि हार' तुमि,—ए तोमार स्वभाव।
आर एक शुन तुमि आपन प्रभाव ॥ 174॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“भारती !
मैं तो आपकी विजय देखता हूँ।” उनकी बात सुनकर
महाप्रभुने कहा,—“आपने जो कहा, वह सत्य ही है,
क्योंकि गुरु और शिष्यके तर्कमें शिष्यकी ही पराजय
निश्चित है।” श्रीब्रह्मानन्द भारतीने कहा,—“यह नहीं,
बल्कि इसका अन्य कोई कारण है। यह आपका
स्वभाव है कि आप अपने भक्तोंसे सदा पराजित होते
हैं। इसके अतिरिक्त आप अपना एक और प्रभाव
सुनिये ॥ 172-174 ॥
अनुभाष्य—शिष्य-वाक्य सत्य होनेपर भी गुरु-वाक्य
ही शिष्यके ऊपर विजयी होता है। गुरु-वाक्य सब
समय ही शिष्य-वाक्यकी अपेक्षा अधिक आदरणीय है।
महाप्रभुने यह कहा,—उक्त न्यायके अनुसार श्रीब्रह्मानन्द
भारती ही गुरु हैं और महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्यने स्वयंको
उनका शिष्य माना, इसलिये ब्रह्मानन्दके वाक्योंकी ही
विजय हुई। किन्तु श्रीब्रह्मानन्दने इस विषयमें महाप्रभुके
द्वारा कहे गये गुरु-शिष्य-न्यायके आधारको ही उनकी
। 427
[ 10/174-177 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
पराजयका कारण स्वीकार नहीं किया; उन्होंने कहा कि
उसका एक और कारण है। वह यह है कि भगवान्
भक्तके सामने अपनी पराजय स्वीकार करते हैं, —यही
भगवत्ताका स्वभाव है; जैसे भीष्मवाक्य (भा: 1/9/34)—
“स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञामृतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थः।
धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलद्गुर्हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीयः ॥ ”
अर्थात् “श्रीभीष्मदेवने कहा, — 'कुरुक्षेत्र-युद्धमें मैं
अस्त्र धारण नहीं करूँगा' - अपनी यह प्रतिज्ञा त्यागकर
श्रीकृष्ण मेरी उनसे अस्त्र धारण करवानेकी प्रतिज्ञाको
सत्य करनेके लिये रथसे उतरकर चक्र धारणकर मेरा
वध करनेके लिये दौड़े थे, जिसमें उनका ऊपरका वस्त्र
भी गिर गया था॥” 174 ॥
महाप्रभुकी अलौकिक महिमाका वर्णन,—श्रीभारतीका
निर्विशेष-विचार चिद्विलासमें परिवर्तित :—
आजन्म करिनु मुञि 'निराकार'-ध्यान।
तोमा देखि' 'कृष्ण' हैल मोर विद्यमान ॥ 175 ॥
महाप्रभुकी कृपासे श्रीभारतीको कृष्णभक्तिकी प्राप्ति :—
कृष्णनाम स्फुरे मुखे, मने नेत्रे कृष्ण।
तोमाके तद्रूप देखि' हृदय—सतृष्ण ॥ 176 ॥
श्रीबिल्वमङ्गलके साथ तुलना :—
बिल्वमङ्गल कैल यैछे दशा आपनार।
इँह देखि' सेइ दशा हइल आमार ॥” 177 ॥
अनुवाद—मैंने जन्मसे ही निराकारका ध्यान किया
है, परन्तु आपके दर्शन करके मुझे ऐसा लगता है कि
श्रीकृष्ण साक्षात् मेरे सामने हैं। मेरे मुखसे श्रीकृष्णनाम
स्फुरित हो रहा है, मेरे मनमें और नेत्रोंसे श्रीकृष्णके
दर्शन हो रहे हैं और मैं आपको श्रीकृष्णरूपमें देख
रहा हूँ और आपकी सेवा करनेकी तृष्णा हो रही है।
निराकारका ध्यान छोड़कर साकारकी अनुभूतिसे जैसी
दशा बिल्वमङ्गल ठाकुरकी हुई थी, मैं देख रहा हूँ कि
मेरी भी वैसी ही दशा हो गयी है ॥ 175-177 ॥
अनुभाष्य—मैं सारा जीवन निराकार-ब्रह्मका ध्यान
ही करता था, परन्तु आपके साक्षात्कारके फलस्वरूप
अप्राकृत श्रीकृष्णमूर्ति मेरे सामने उदित हुई है। मेरे
मुखमें और मनमें श्रीकृष्णनाम स्फुरित हो रहा है एवं
नेत्रोंसे श्रीकृष्णके दर्शन हो रहे हैं। फिर, आपमें
श्रीकृष्णरूप दर्शन करके हृदयमें भी सेवाकी तृष्णा
जाग्रत हुई है। ठाकुर बिल्वमङ्गल पूर्व जीवनमें
अद्वैतवादी निराकार-ब्रह्म-ध्यानपरायण थे और बादमें
श्रीकृष्णभक्त होकर उन्होंने अपनी यह बात कही है,
मेरी भी आज वही दशा हुई है।
श्रीचैतन्यचन्द्रामृतमें,—
“कैवल्यं नरकायते ××× यत्कारुण्यकटाक्षवैभववतां तं
गौरमेव स्तुमः”, “धिक् कुर्वन्ति च ब्रह्मयोगविदुषस्तं गौरचन्द्रं
नुमः”; “तावद् ब्रह्मकथा विमुक्तपदवी तावन्न तिक्तीभवेत्तावच्चापि
विशृङ्खलत्वमयते नो लोकवेदस्थितिः । तावच्छास्त्रविदां मिथः
कलकलो नाना-बहिर्वर्त्मसु श्रीचैतन्यपदाम्बुजप्रियजनो यावन्न
दृग्गोचरः”॥ “गौरश्चौरः सकलमहरत् कोऽपि मे तीव्रवीर्यः ॥”
अर्थात् “'जिनकी कृपाकटाक्ष-सम्पत्तिसे सम्पत्तिशाली
उन गौरभक्तोंको केवलारूपा मुक्ति नरकतुल्य प्रतीत
होती है, उन श्रीगौरसुन्दरका मैं स्तव करता हूँ।'
'जिनके चरणकमलोंसे क्षरित उज्ज्वल प्रेमानन्दमय
अद्भुत अमृतरस पान करके ब्रह्मज्ञानी और
अष्टाङ्ग-योगियोंको धिक्कार करता हूँ, उन श्रीगौरहरिकी
मैं वन्दना करता हूँ।' 'उस समय तक ही
निर्विशेष-ब्रह्म-आलोचना चलती रहती है, उस समय
तक ही ईश्वर-सायुज्यादि मुक्तिमार्ग कड़वा नहीं लगता,
उस समय तक ही लौकिक और वैदिक कर्मकाण्ड
सभी विशृङ्खलताको प्राप्त न हों (अर्थात् सुन्दररूपसे
सम्पन्न होते रहें), उस समय तक ही नाना बहिर्मुख
मार्गमें दौड़ते हुए पण्डित-मान्यगणोंका परस्पर वाद-विवाद
होता रहता है, जिस समय तक श्रीचैतन्यचरणकमल-प्रिय
गौरभक्तगण दृष्टिगोचर नहीं होते।' 'कोई एक अमित
प्रभावशाली गौरविग्रहधारी चोर मेरे सभी (कुण्ठा-स्वभावका)
अपहरण कर रहा है।'॥” 175-177 ॥
428 ।
दसवाँ अध्याय 10/178-182 ]
श्रीकृष्णकी इच्छा मात्रसे ही कर्म और
ज्ञान-निष्ठाका ध्वंस :-
श्रीकृष्णकर्णामृतमें बिल्वमङ्गल-वाक्य-
अद्वैतवीथीपथिकैरुपास्याः
स्वानन्दसिंहासन-लब्धदीक्षाः।
शठेन केनापि वयं हठेन
दासीकृता गोपवधूविटेन ॥ 178 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 178॥
अमृतप्रवाह भाष्य-अद्वैतमार्गके पथिकोंके द्वारा
उपास्य, और आत्मानन्द-सिंहासनसे दीक्षा प्राप्त करनेपर
भी मैं किसी गोपवधू-लम्पट शठके द्वारा हठतापूर्वक
दासीके रूपमें परिणत हो गया हूँ॥ 178॥
दसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य-
अद्वैतवीथीपथिकैः (अद्वैतं स्वगत-सजातीय-विजातीय-भेदरहितम्
एव वीथी पन्थाः तस्यां ये पथिकाः केवलाद्वैतवादिनः तैः
निराकारब्रह्मवादिभिः) उपास्याः (पूजनीयाः) स्वानन्दसिंहासन-
लब्धदीक्षा (आत्मानन्द एव सिंहासनम् उच्चपीठः तस्मिन्
लब्धा प्राप्ता दीक्षा यैः, एवम्भूताः योगमार्गरताः) वयं
(अहं-गौरवे-बहुवचनं) केनापि शठेन (कपटन्) गोपवधूविटेन
(गोपीलम्पटेन नन्दनन्दनेन) हठेन (बलात्कारेण) दासीकृताः
(स्वदास्ये नियुक्ता इत्येकवचनेनैव बोद्धव्यम्)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 178 ॥
महाप्रभुकी श्रीभारतीको 'महाभागवत' कहकर प्रशंसा :-
प्रभु कहे,-"कृष्णे तोमार गाढ़ प्रेमा हय।
याँहा नेत्र पड़े, ताँहा कृष्णस्फूर्ति हय॥" 179॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"श्रीकृष्णके प्रति आपका
गाढ़ प्रेम है, इसलिये जहाँ आपकी दृष्टि पड़ती है, वहाँ
आपको श्रीकृष्णकी स्फूर्ति होती है॥"179॥
श्रीसार्वभौमके द्वारा श्रीकृष्णकृपाकी महिमाकी व्याख्या :-
भट्टाचार्य कहे,-"तोमार हय सत्य वचन।
आगे यदि कृष्ण देन साक्षात् दरशन॥180॥
भक्तकी प्रेमसेवा और भगवान्की कृपा ही
परस्परका मिलन अथवा योगसूत्र :-
प्रेम बिना कभु नहे ताँर साक्षात्कार।
इँहार कृपाते हय दरशन इँहार॥" 181 ॥
अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यने कहा,-"आपके वचन सत्य
हैं। यदि श्रीकृष्ण साक्षात् दर्शन भी दें, तो भी प्रेमके
बिना कभी भी उनका साक्षात्कार नहीं होता। इनकी
(महाप्रभुकी) कृपासे ही इन्हें (ब्रह्मानन्द भारतीको)
श्रीकृष्णका साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ है॥"180-181॥
अनुभाष्य-श्रीमहाप्रभुने कहा,-"आप ब्रह्मानन्द भारती
प्रेममय महाभागवत हैं, इसलिये सर्वत्र आपको श्रीकृष्णदर्शन
होगा, इसमें और सन्देह क्या है?" भट्टाचार्य दोनोंके
मध्यस्थ होकर बोले,-"महाभागवत ब्रह्मानन्द भारतीको
श्रीकृष्णदर्शन हुए हैं, महाप्रभुका यह वाक्य भी सत्य
है, क्योंकि श्रीकृष्ण महाभागवतोंके समक्ष ही साक्षात्
दर्शन दिया करते हैं, किन्तु भक्तोंके प्रेमाधिक्यके
अतिरिक्त वैसे साक्षात्कारकी सम्भावना नहीं है।" पहले
'इँहार' शब्दका अर्थ-श्रीमहाप्रभुकी कृपासे है; बादवाले
'इँहार' शब्दका अर्थ ब्रह्मानन्द भारतीको दर्शन अर्थात्
श्रीकृष्ण दर्शन हुए हैं। (ब्रह्मसंहिता 5/38
श्लोक)-"प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्तिविलोचनेन सन्तः सदैव हृदयेषु
विलोकयन्ति" अर्थात् "प्रेमरूप काजलके द्वारा रञ्जित
भक्तिनेत्रोंसे सन्तपुरुष अपने हृदयमें श्रीकृष्णके दर्शन
करते हैं॥" 179-181 ॥
बाह्य-जीवाभिमान-हेतु महाप्रभुके द्वारा
श्रीसार्वभौमके वाक्यका अनादर :-
प्रभु कहे,-" 'विष्णु' 'विष्णु', कि कह सार्वभौम।
'अतिस्तुति' हय एइ निन्दार लक्षण॥" 182 ॥
अनुवाद-यह सुनकर महाप्रभुने कहा,-"'विष्णु'!
'विष्णु'! हे सार्वभौम, आप यह क्या कह रहे हैं?
किसीकी अधिक प्रशंसा निन्दाका ही लक्षण है॥" 182 ॥
अनुभाष्य-महाप्रभु श्रीसार्वभौमके वाक्यसे लज्जित
। 429
[ 10/182-190 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
होकर 'विष्णु' 'विष्णु' शब्द उच्चारण करके बोले कि
किसी व्यक्तिकी अति-स्तुति करना वास्तवमें उसकी
निन्दा करना ही है॥ 182 ॥
श्रीभारतीको साथ लेकर महाप्रभुका
अपने स्थानपर आना :-
एत बलि' भारतीरे लञा निज-वासा आइला।
भारती-गोसाञि प्रभुर निकटे रहिला ॥ 183 ॥
अनुवाद—इतना कहकर महाप्रभु श्रीब्रह्मानन्द भारतीको
अपने निवास-स्थानपर ले आये। तब श्रीभारती गोसाईं
महाप्रभुके निकट ही रहने लगे ॥ 183 ॥
महाप्रभुके ऐकान्तिक भक्त-(1) रामभद्र
और (2) भगवान्-आचार्य :-
रामभद्राचार्य, आर भगवान् आचार्य।
प्रभुपदे रहिला दुँहे छाड़ि' सर्व कार्य ॥ 184 ॥
अनुवाद—श्रीरामभद्राचार्य और श्रीभगवान् आचार्य
भी अपने सब कार्योंको छोड़कर महाप्रभुकी शरणमें
रहने लगे ॥ 184 ॥
काशीश्वरका आगमन :-
काशीश्वर गोसाञि आइला आर दिने।
सम्मान करिया प्रभु राखिला निज-स्थाने ॥ 185 ॥
अनुवाद—अगले दिन श्रीकाशीश्वर गोसाईं भी आ
गये। महाप्रभुने उन्हें सम्मानपूर्वक अपने पास रख
लिया ॥ 185 ॥
अनुभाष्य— 'रामभद्राचार्य'—आदिलीला 10/148 संख्या
देखें। 'भगवान् आचार्य'—आदिलीला 10/136 संख्या
देखें। 'काशीश्वर'—आदिलीला 8/66 संख्याका अनुभाष्य
देखें।
'मुरारि-कड़चामें'—
“अथ भक्तगणाः सर्वे ये ये गौड़निवासिनः।
गन्तुमिच्छन्ति गौराङ्गदर्शनाय नीलाचलम् ॥
श्रीकाशीश्वर-गोस्वामी" इत्यादि।
अर्थात् “गौड़देशके निवासी श्रीगौरभक्त श्रीगौराङ्ग
महाप्रभुके दर्शनके लिये नीलाचल आते। श्रीकाशीश्वर
गोस्वामी भी इसी भावसे नीलाचल आये थे।”
आदि ॥" 184-185 ॥
दसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
बलवान श्रीकाशीश्वरका महाप्रभुकी सेवामें
बलका सद्-व्यवहार :-
प्रभुके लञा करा'न ईश्वर दरशन।
लोक-भिड़ आगे सब करि' निवारण ॥ 186 ॥
अनुवाद—श्रीकाशीश्वर गोस्वामी महाप्रभुको
श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनके लिये मन्दिर लेकर जाते और
महाप्रभुके आगे चलते हुए भीड़को हटाकर उनके लिये
मार्ग बनाते थे जिससे कोई उन्हें स्पर्श न करे ॥ 186 ॥
महाप्रभुके साथ सभी भक्तोंके मिलनकी उपमा :-
यत नद नदी यैछे समुद्रे मिलय।
ऐछे महाप्रभुर भक्त याँहा ताँहा हय ॥ 187 ॥
सबे आसि' मिलिला प्रभुर श्रीचरणे।
प्रभु कृपा करि' सबाय राखिल निज-स्थाने ॥ 188 ॥
अनुवाद—जिस प्रकार समस्त नद-नदियाँ आकर
समुद्रमें मिलती हैं, उसी प्रकार महाप्रभुके भक्त जहाँ
कहीं भी रहते थे, वे सब आकर महाप्रभुके श्रीचरणोंमें
उपस्थित हुए और महाप्रभुने कृपापूर्वक उन सबको
अपने पास ही रहनेका स्थान दिया ॥ 187-188 ॥
महाप्रभुके साथ भक्त-मिलनके संवादका वर्णन समाप्त :-
एत त' कहिल प्रभुर वैष्णव-मिलन।
इहा येइ शुने, पाय चैतन्य-चरण ॥ 189 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 190 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे वैष्णवमिलनं
नाम दशम परिच्छेदः।
430 ।
दसवाँ अध्याय 10/189-190 ]
अनुवाद-यहाँ तक मैंने महाप्रभुके साथ वैष्णवोंके करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन
मिलनकी कथाका वर्णन किया है। इसे जो भी श्रवण कर रहा है ॥ 189-190 ॥
करता है, उसे महाप्रभुके श्रीचरणकमलोंकी प्राप्ति होती
है। श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यखण्डमें वैष्णवमिलन
नामक दसवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
। 431
ग्यारहवाँ अध्याय
कथासार—जब श्रीसार्वभौमने राजा प्रतापरुद्रकी
महाप्रभुके साथ भेंट करानेकी चेष्टा की, तब महाप्रभुने
उसे अस्वीकार कर दिया। श्रीरामानन्द-रायने पुरुषोत्तममें
(पुरीमें) आकर महाप्रभुके साथ मिलकर राजाके बहुतसे
वैष्णव-गुणोंकी व्याख्या की, जिससे महाप्रभुका चित्त
परिवर्तित हो गया। उधर राजाने श्रीसार्वभौमको अपनी
दैन्य-प्रतिज्ञा बतलायी। तब श्रीसार्वभौमने राजाको महाप्रभुके
चरण-दर्शनका एक उपाय बतला दिया। अनवसर-काल
आनेपर भगवद्-दर्शनके विरहमें व्याकुल होकर महाप्रभु
आलालनाथ चले गये, कुछ समय बाद गौड़देशसे सभी
भक्तोंके आगमनके विषयमें सुनकर महाप्रभु पुरुषोत्तम
लौट आये। श्रीअद्वैताचार्य आदि भक्तोंके आनेके समय
श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीगोविन्द महाप्रभुके द्वारा दी
गयी मालाओंको लेकर उन्हें लाने गये। राजा अट्टालिकासे
वैष्णवोंको आते हुए देखने लगे। श्रीसार्वभौमकी इच्छानुसार
श्रीगोपीनाथाचार्यने इन सब वैष्णवोंका परिचय दिया।
श्रीचैतन्यके श्रीकृष्णत्व और समागत वैष्णवोंके
मुण्डन-उपवास आदिको परित्यागकर प्रसादान्न-सेवनके
सम्बन्धमें श्रीसार्वभौमके साथ राजाके अनेक विचार
उपस्थित हुए। इसके उपरान्त राजाने वैष्णवोंके रहनेके
स्थान और प्रसादान्न आदिकी व्यवस्था कर दी।
महाप्रभुने श्रीवासुदेव-दत्तादि वैष्णवोंके साथ अनेक
आनन्दजनक वार्त्तालाप किया। श्रीहरिदास ठाकुरका
दैन्य देखकर महाप्रभुने बगीचेके बीचमें उन्हें एक
एकान्त स्थान प्रदान किया और दूसरोंको श्रीहरिदासकी
महिमा बतलायी। उसके बाद श्रीजगन्नाथदेवके मन्दिरमें
चार मण्डलियाँ बनाकर महासङ्कीर्त्तन हुआ। तदुपरान्त
वैष्णवगण महाप्रभुकी आज्ञासे अपने-अपने स्थानपर
चले गये।
—(अमृतप्रवाहभाष्य)
नृत्यशील श्रीगौरका विश्वको प्रेमकी बाढ़में डुबोना :—
अत्युद्दण्डं ताण्डवं गौरचन्द्रः
कुर्वन् भक्तैः श्रीजगन्नाथगेहे।
नानाभावालङ्कृताङ्गः स्वधाम्ना
चक्रे विश्वं प्रेमवन्या-निमग्नम्॥ 1 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीजगन्नाथके मन्दिरमें भक्तोंके
साथ नाना प्रकारके भावोंसे अलङ्कृत शरीरवाले श्रीगौरचन्द्रने
अतिशय उद्दण्ड नृत्य करके अपने माधुर्यके द्वारा इस
विश्वको प्रेमकी बाढ़में डुबोया था॥ 1 ॥
अनुभाष्य—
नानाभावालङ्कृताङ्गः (विविधभावाभरणमण्डितदेहः) गौरचन्द्रः
श्रीजगन्नाथगेहे (श्रीजगन्नाथदेवस्य मन्दिरे) भक्तैः [सह] स्वधाम्ना
(अलौकिक-स्वमाधुर्येण) अत्युद्दण्डं ताण्डवं (अतिमनोज्ञ-
नृत्यादिकं) कुर्वन् विश्वं (चिद्रसहीनं जड़रसपरं भुवनं)
प्रेमवन्या-निमग्नं चक्रे (कृष्णप्रेमतराङ्गैः प्लावयामास)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥
जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥ 2 ॥
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो।
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो
एवं श्रीगौरभक्तवृन्दकी जय हो॥ 2 ॥
। 433
[ 11/3-10
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्रीसार्वभौमकी महाप्रभुसे कुछ निवेदन करनेकी इच्छा :-
आर दिन सार्वभौम कहे प्रभुस्थाने।
“अभय-दान देह’ यदि, करि निवेदने॥” ३॥
अनुवाद—अगले दिन श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने महाप्रभुसे
कहा,—“यदि आप अभय-दान दें, तो मैं आपसे कुछ
निवेदन करूँ॥” ३॥
महाप्रभुके द्वारा अनुमति प्रदान :-
प्रभु कहे,—“कह कमि, नाहि किछु भय।
योग्य हैले करिब, अयोग्य हैले नय॥” ४॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“जो कहना है, आप
निर्भय होकर कहिये। यदि आपकी बात उचित होगी,
तो मैं अवश्य करूँगा, अनुचित होनेपर उसे अस्वीकार
कर दूँगा॥” ४॥
प्रतापरुद्रका पक्ष लेकर श्रीसार्वभौमके द्वारा
महाप्रभुकी कृपाकी याचना :-
सार्वभौम कहे,—“एइ प्रतापरुद्र राय।
उत्कण्ठा हञाछे, तोमा मिलिबारे चाय॥” ५॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“ये राजा
प्रतापरुद्र आपसे मिलनेके लिये बहुत उत्कण्ठित हो रहे
हैं॥” ५॥
राजादर्शन करनेमें महाप्रभुकी असम्मति और वितृष्णा :-
कर्णे हस्त दिया प्रभु स्मरे ‘नारायण’।
“सार्वभौम, कह केन अयोग्य वचन॥ ६॥
संन्यासीका धर्म :-
विरक्त संन्यासी आमार राज-दरशन।
स्त्री-दरशन-सम विषेर भक्षण॥” ७॥
अनुवाद—यह सुनते ही महाप्रभुने अपने कानोंको
हाथोंसे ढक करके भगवान् श्रीनारायणका स्मरण किया।
तब महाप्रभुने कहा,—“हे सार्वभौम ! आप ऐसी अनुचित
बात क्यों कह रहे हैं? मैं एक विरक्त संन्यासी हूँ।
मेरे लिये राजाका दर्शन तो स्त्री-दर्शनके समान
विषपान करना है॥” ६-७॥
प्रेमाकाङ्क्षीके लिये भोक्ताभावसे भोग्य वस्तुका
दर्शन विष खानेके समान निषिध :-
श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटक (8/24)—
निष्किञ्चनस्य भगवद्भजनोन्मुखस्य
पारं परं जिगमिषोर्भवसागरस्य।
सन्दर्शनं विषयिणामथ योषिताञ्च
हा हन्त हन्त विषभक्षणतोऽप्यसाधु॥ ८॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ८॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीचैतन्यदेवने खेदके साथ
कहा,—हाय! भवसागरको सम्पूर्णरूपसे पार होनेकी
जिनकी इच्छा है, ऐसे भगवद्-भजनोन्मुख निष्किञ्चन
व्यक्तिके लिये विषयी और स्त्रीका [भोग बुद्धिसे] दर्शन
विषपानकी अपेक्षा अधिक अकल्याणकारी है॥ ८॥
अनुभाष्य—
हा हन्त हन्त (खेदातिशये) भवसागरस्य (संसारसमुद्रस्य)
परं पारं (देवीधामतीतं परव्योम-भगवद्धाम) जिगमिषोः (गन्तुकामस्य)
निष्किञ्चनस्य (निर्विषयिणः) भगवद्भजनोन्मुखस्य (कृष्णसेवापरस्य)
विषयिणां (कृष्णेतरविषयभोगपराणां) योषितां (भोग्यानां च)
सन्दर्शनं (भोग्यबुद्ध्या अवलोकनादिकं) विषभक्षणतः
(आत्मविनाशक-गरलस्य सेवनात्) अपि असाधु
(अकल्याणकरम्)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ८॥
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके द्वारा राजाकी प्रशंसा :-
सार्वभौम कहे,—“सत्य तोमार वचन।
जगन्नाथ-सेवक राजा, किन्तु भक्तोत्तम॥” ९॥
भोक्ता बनकर वस्तुको भोग्य मानकर उसके बाहिरी
दर्शनसे द्वितीयाभिनिवेशसे भयकी उत्पत्ति :-
प्रभु कहे,—“तथापि राजा कालसर्पाकार।
काष्ठनारी-स्पर्शे यैछे उपजाय विकार॥ १०॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ९-१०॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—
“प्रभो! आपने जो कहा है, वह सत्य है। किन्तु राजा
434 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/9-17 ]
प्रतापरुद्रदेव श्रीजगन्नाथके सेवक और उत्तम भक्त हैं।”
महाप्रभुने कहा,—“श्रीजगन्नाथके सेवक और उत्तम भक्त
होनेपर भी 'राजा' कालसर्पके समान है। देखो, लकड़ीकी
बनी हुई नारीको स्पर्श करनेसे जैसे किसी प्रकारका
विकार उत्पन्न हो सकता है, उसी प्रकार उत्तम भक्त
राजाके दर्शन करनेपर विरक्त व्यक्तिमें भी अनर्थ उदित
हो सकते हैं॥ 9-10॥
श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटक (8/25)—
आकारादपि भेतव्यं स्त्रीणां विषयाणामपि।
यथाहिर्मनसः क्षोभस्तथा तस्याकृतेरपि॥ 11॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 11॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिस प्रकार साँप और उसकी
आकृति देखनेसे मनमें क्षोभ (भय) उत्पन्न होता है,
उसी प्रकार स्त्री और विषयीका आकार देखते ही भय
हुआ करता है॥ 11॥
अनुभाष्य—
स्त्रीणां (योषितां) विषयाणाम् (इन्द्रियसेविनां) [(भोक्तृ-भोग्यानामिति
यावत्] आकारात् अपि (बहिराकृतेरपि) [कृष्णैक-सेविभिः
परमार्थपरैः साधकैः जनैः] भेतव्यम्। यथा अहेः (भुजङ्गात्)
मनसः क्षोभः (भयं) भवति, तथा तस्य (सर्पस्य) आकृतेः
(सदृशाकारात्) अपि [भयं भवति]।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 11॥
लोकशिक्षक महाप्रभुका कठोर सङ्कल्प, आश्रम-मर्यादाकी
रक्षाके लिये श्रीसार्वभौमका तिरस्कार :—
ऐछे बात पुनरपि मुखे ना आनिबे।
कह यदि, तबे आमाय एथा ना देखिबे॥” 12॥
अनुवाद—आप ऐसी बात फिर कभी अपने मुखमें
मत लाना। यदि पुनः कहेंगे, तो आप मुझे यहाँ नहीं
देखेंगे॥” 12॥
श्रीसार्वभौमका दुःखी मनसे घर जाना :—
भय पाञा सार्वभौम निज घरे गेला।
बासाय गिया भट्टाचार्य चिन्तित हइला॥ 13॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य यह सुनकर भयभीत
होकर अपने घर चले गये। घर आकर श्रीभट्टाचार्य इस
विषयपर चिन्तन करने लगे॥ 13॥
कटकसे श्रीरामानन्दादि परिकरोंके
साथ राजाका पुरीमें आगमन :—
हेनकाले प्रतापरुद्र पुरुषोत्तमे आइला।
पात्र-मित्र-सङ्गे राजा दर्शने चलिला॥ 14॥
महाप्रभु और रामानन्दका मिलन :—
रामानन्द राय आइला गजपति-सङ्गे।
प्रथमेइ प्रभुरे आसि' मिलिला बहुरङ्गे॥ 15॥
अनुवाद—उसी समय राजा प्रतापरुद्र पुरुषोत्तम
क्षेत्रमें आ गये तथा वे अपने मन्त्रियों और मित्रोंके
साथ भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन करनेके लिये चल
पड़े। श्रीरामानन्द राय भी गजपति (राजा प्रतापरुद्र)के
साथ आये थे। वे आते ही सर्वप्रथम महाप्रभुसे बड़े
आनन्दसे मिले॥ 14-15॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'गजपति'—जिस प्रकार अन्यान्य
कोई-कोई विशेष राजाओंकी 'छत्रपति', 'नरपति', 'अश्वपति'
आदि पदवियाँ थीं, उसी प्रकार 'गजपति'—उड़ीसाके
सम्राटोंकी उपाधि थी॥ 15॥
अनुभाष्य—गङ्गावंशीय प्रतापरुद्र-राजाकी राजधानी
कटक-नगरमें थी। बादमें कटकसे खुर्द्दामें राजधानी
स्थानान्तरित हुई थी॥ 14॥
राय प्रणति कैल, प्रभु कैल आलिङ्गन।
दुइजने प्रेमावेशे करेन क्रन्दन॥ 16॥
श्रीरायके प्रति महाप्रभुके आचरणको
देखकर सभीको आश्चर्य :—
राय-सङ्गे प्रभुर देखि' स्नेह-व्यवहार।
सर्व भक्तगणेर मने हैल चमत्कार॥ 17॥
अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुको प्रणाम किया
और महाप्रभुने उनका आलिङ्गन किया। दोनों ही प्रेममें
। 435
[ 11/16-26 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
आविष्ट होकर क्रन्दन करने लगे। श्रीरामानन्द रायके
साथ महाप्रभुके ऐसे स्नेहपूर्ण व्यवहारको देखकर सभी
भक्तोंके मनमें आश्चर्य हुआ॥16-17॥
श्रीरायका राजकार्य-त्याग करनेके विषयमें बताना :-
राय कहे,—“तोमार आज्ञा राजाके कहिल।
तोमार इच्छाय राजा मोर विषय छाड़ाइल॥18॥
राजासे श्रीरायकी सेवासे निवृत्तिकी प्रार्थना :-
आमि कहि,—‘आमा हैते ना हय विषय’।
चैतन्यचरणे रहौं, यदि आज्ञा हय॥’19॥
राजाके द्वारा आनन्दपूर्वक सम्मति प्रदान :-
तोमार नाम शुनि’ राजा आनन्दित हैल।
आसन हैते उठि’ मोरे आलिङ्गन कैल॥20॥
अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“मैंने आपकी
आज्ञा जब राजाको बतलायी, तब आपकी इच्छानुसार
राजाने मुझे उन राजकार्योंसे मुक्त कर दिया। मैंने राजा
प्रतापरुद्रसे कहा,—‘अब मुझसे यह राजकार्य नहीं
होता। आप यदि मुझे आज्ञा दें, तो मैं श्रीचैतन्य
महाप्रभुके चरणोंमें जाकर रहूँ।’ आपका नाम सुनकर
राजा बहुत आनन्दित हुए और उन्होंने अपने आसनसे
उठकर मेरा आलिङ्गन किया॥18-20॥
अनुभाष्य—‘तोमार आज्ञा’—मध्यलीला 8/296-297
संख्या देखें। यह बात श्रीरामानन्द रायने जब राजा
प्रतापरुद्रको कही, तब महाप्रभुके अभिप्रायके अनुसार
राजा प्रतापरुद्रने लौकिक-दृष्टिसे श्रीरामानन्दके विषय
छुड़वा दिये अर्थात् उस राजकार्यसे उन्हें निवृत्त कर
दिया॥18॥
महाप्रभुके प्रति राजाकी भक्ति :-
‘तोमार नाम शुनि’ हैल महा-प्रेमावेश।
मोर हाते धरि’ करे पिरीति विशेष॥21॥
राजाके द्वारा श्रीरायको सेवा-निवृत्तिपर भी वेतन-दान :-
तोमार ये वर्त्तन, तुमि खाओ सेइ वर्त्तन।
निश्चिन्त हञा भज चैतन्येर चरण॥22॥
राजाका दैन्य :-
आमि—छार, योग्य नहि ताँर दरशने।
ताँरे येइ भजे, ताँर सफल जीवने॥23॥
परम कृपालु तँह व्रजेन्द्रनन्दन।
कोन-जन्मे मोरे अवश्य दिबेन दरशन॥’24॥
अनुवाद—‘आपका नाम सुनकर वे महा-प्रेमावेशमें
आ गये। उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर मुझसे विशेष प्रीति
प्रदर्शित करते हुए कहा कि आपका जो वेतन है, वह
आपको मिलता रहेगा। अब आप निश्चिन्त होकर
महाप्रभुके श्रीचरणोंकी सेवा करो। मैं तो महापतित हूँ,
महाप्रभुके दर्शन करने योग्य भी नहीं हूँ। परन्तु जो
उनका भजन करता है, उसीका जीवन सफल है।
महाप्रभु परम कृपालु और साक्षात् व्रजेन्द्रनन्दन हैं।
किसी-न-किसी जन्ममें वे मुझे अवश्य ही दर्शन
देंगे॥’21-24॥
अमृतप्रवाह भाष्य—दक्षिण-कलिङ्गके शासनकर्त्ता
पदपर आप जो वर्त्तन अर्थात् पारिश्रमिक या वेतन
प्राप्त करते थे, अब आपको कार्यसे निवृत्त कर दिया
है, तथापि आपको वही वेतन प्राप्त होगा॥22॥
रायके द्वारा महाप्रभुके समक्ष राजाकी प्रशंसा :-
ये ताँहार प्रेम-आर्त्ति देखिलुँ तोमाते।
तार एक प्रेम-लेश नाहिक आमाते॥”25॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥25॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीरामानन्द ने कहा,—“प्रभो!
मैंने आपके प्रति राजाकी जो प्रेमवेदना देखी थी,
उसका लेशमात्र भी मुझमें नहीं है॥”25॥
शुद्धवैष्णवमें प्रीति हेतु महाप्रभुके द्वारा राजाको
भावी-कृपा-प्रदान करनेका इङ्गित :-
प्रभु कहे,—“तुमि कृष्णभक्त प्रधान।
तोमाके ये प्रीति करे, सेइ भाग्यवान्॥26॥
436 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/26-31 ]
तोमाते ये एत प्रीति हइल राजार।
एइ गुणे कृष्ण ताँरे करिबे अङ्गीकार ॥”27॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, – “आप श्रीकृष्ण-भक्तोंमें
प्रधान हैं, इसलिये आपसे जो प्रीति करता है, वह
भाग्यवान् है। राजाकी आपके प्रति जो इतनी प्रीति
उत्पन्न हुई है, उनके इसी गुणके कारण श्रीकृष्ण उन्हें
अवश्य अङ्गीकार करेंगे ॥”26-27॥
भक्तोंके भक्त ही भगवद्भक्त :-
आदिपुराण वचन—
ये मे भक्तजनाः पार्थ न मे भक्ताश्च ते जनाः।
मद्भक्तानाञ्च ये भक्तास्ते मे भक्ततमा मताः ॥ 28 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 28 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे पार्थ, जो केवल मेरे ही भक्त
हैं, वे वास्तवमें मेरे भक्त नहीं है। किन्तु जो मेरे
भक्तोंके भक्त हैं, उन्हें ही मैं अपना 'उत्तम भक्त'
समझता हूँ ॥ 28 ॥
अनुभाष्य-
हे पार्थ (अर्जुन), ये मे (मम) भक्तजनाः, ते मे (मम)
भक्ताः जनाः न [भवन्ति]; ये च मद्भक्तानां [एव] भक्ताः, ते
मे (मम) भक्ततमाः (श्रेष्ठ-सेवकाः) [इति मयैव] मताः
(सम्मताः)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 28 ॥
शुद्धभक्तोंकी क्रिया :-
श्रीमद्भागवत (11.19.21-22)-
आदरः परिचर्यायां सर्वाङ्गैरभिवन्दनम्।
मद्भक्तपूजाभ्यधिका सर्वभूतेषु मन्मतिः ॥ 29 ॥
मदर्थेष्वङ्गचेष्टा च वचसा मद्गुणेरणम्।
मय्यर्पणञ्च मनसः सर्वकामविवर्जनम् ॥ 30 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 29-30 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मेरी परिचर्या (सेवा) का आदर,
सर्वाङ्गके द्वारा अभिवन्दन, मेरे भक्तोंकी विशेष पूजा,
सभी जीवोंमें मुझसे सम्बन्धित बुद्धि, मेरे लिये अखिल
चेष्टा, वाक्यके द्वारा मेरे गुणोंकी व्याख्या, मुझमें मन
अर्पण और सब प्रकारकी कामनाओंका परित्याग, – ये
सब भक्तोंके लक्षण हैं ॥ 29-30 ॥
अनुभाष्य-श्रीउद्धवके द्वारा भगवद्भक्तियोगके विषयमें
जाननेके लिये जिज्ञासा करनेपर श्रीभगवान्की उक्ति-
[भक्तियोगं तुभ्यं पुनश्च कथयिष्यामीत्याह-मम] परिचर्यायां
(सेवायाम्) आदरः, सर्वाङ्गैः (अङ्गप्रत्यङ्गाद्यैः) अभिवन्दनं,
[मत्तः] अभ्यधिका (श्रेष्ठा) मद्भक्तपूजा, सर्वभूतेषु (प्राणि-मात्रेषु)
मन्मतिः (भगवद्भावदर्शनम्)।
मदर्थेषु च (कृष्णैकतात्पर्येषु) कार्येषु अङ्गचेष्टा (अखिल-
चेष्टा), वचसा (वाक्यद्वारेण) मद्गुणेरणं (कृष्णगुण-कथनं)
मनसः मयि (कृष्णे) अर्पणं (समर्पणं), सर्वकाम-विवर्जनं
(मनसः कृष्णेतर-विषयभोगवासना-परित्यागः)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 29-30 ॥
सर्वेश्वरेश्वर विष्णुकी पूजाकी अपेक्षा वैष्णवपूजा श्रेष्ठ :-
लघुभागवतामृत (2/4) पद्मपुराणवचन-
आराधनानां सर्वेषां विष्णोराराधनं परम्।
तस्मात् परतरं देवि तदीयानां समर्चनम् ॥ 31 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 31 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हे देवि ! अन्यान्य देवताओंकी
आराधनाकी अपेक्षा विष्णुकी आराधना ही श्रेष्ठ है।
विष्णुकी आराधनाकी अपेक्षा भक्तोंका अर्चन श्रेष्ठ
है॥ 31 ॥
अनुभाष्य-
हे देवि, सर्वेषां आराधनानाम् (उपासनानां मध्ये) विष्णोः
(भगवतः कृष्णचन्द्रस्य) आराधनं (पूजनं) परं (श्रेष्ठं); तस्मात्
(कृष्णोपासनम् अपि) तदीयानां (मधुररसे श्रीरूप-वार्षभानव्यादीनां,
वात्सल्ये नन्द-यशोदादीनां, सख्ये श्रीदाम-सुबलादीनां, दास्ये
चित्रकादीनां), समर्चनं (दृढ़पूजनं) परतरं (प्रशस्ततरम्)।
श्लोक-भावानुवाद—हे देवि ! सभी उपासनाओंमें
भगवान् श्रीकृष्णकी उपासना श्रेष्ठ है। श्रीकृष्ण उपासनासे
भी उनके भक्तोंकी (मधुर रसमें श्रीरूप मञ्जरी, श्रीमती
। 437
[ 11/31-36 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
राधिका आदिकी, वात्सल्य रसमें श्रीनन्द-यशोदा आदिकी,
सख्य रसमें श्रीदाम-सुबल आदिकी और दास्य रसमें
चित्रक आदिकी) दृढ़ उपासना श्रेष्ठ है॥31॥
शुद्धभक्तकी सेवा बहुत सुकृतिसे प्राप्त होती है :-
श्रीमद्भागवत (3/7/20)-
दुरापा ह्यल्पतपसः सेवा वैकुण्ठवर्त्मसु।
यत्रोपगीयते नित्यं देवदेवो जनार्दनः ॥ 32 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 32 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-देवदेव श्रीजनार्दनका जो नित्य
गान करते हैं, उन वैकुण्ठपथपर चलनेवाले कृष्णदासोंकी
सेवा अल्प-तपस्यावान् व्यक्तिको प्राप्त नहीं हो सकती॥ 32 ॥
अनुभाष्य-महाभागवत श्रीमैयात्रेय ऋषिसे हरिकथा
सुनकर विदुरके संशय दूर होनेपर विदुरके द्वारा
हरिभक्तोंके गुण-माहात्म्य-कीर्तन-
यत्र (येषु महत्सु साधुषु) नित्यं (सर्वदा) देवदेवः (सर्वदेवमयः)
जनार्दनः (कृष्णः) उपगीयते, तत्र (तेषु) वैकुण्ठवर्त्मसु (वैकुण्ठस्य
श्रीकृष्णस्य वैकुण्ठलोकस्य वा, वर्त्मसु मार्गभूतेषु हरिजनेषु)
सेवा-अल्पतपसः (क्षीणपुण्यजनस्य) दुरापा (दुर्लभा) हि
(एव)। [महत्सेवयैव हरिकथाश्रवणं, ततो हरौ प्रेम, तेन च
देहाद्यनुसन्धानमपि निवर्त्तते इति तात्पर्यम्।]
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें।
[महत्-सेवाके द्वारा ही हरिकथा श्रवण होती है,
इसके फलस्वरूप श्रीहरिमें प्रेम उत्पन्न होता है और
इसके द्वारा देहादिमें अभिनिवेश निवृत्त होता है, यही
तात्पर्य है।]
इस प्रसङ्गमें पद्मपुराणके ये श्लोक आलोच्य हैं-
“भक्तिस्तु भगवद्भक्तसङ्गेन परिजायते।
सत्सङ्गः प्राप्यते पुंभिः सुकृतैः पूर्वसञ्चितैः॥” एवं
“महाप्रसादे गोविन्दे नामब्रह्मणि वैष्णवे।
स्वल्पपुण्यवतां राजन् विश्वासो नैव जायते॥”
अर्थात् “भगवद्भक्तके साथ सङ्गवशतः भक्तिका
उदय होता है और पूर्व पूर्व जन्मकी सञ्चित सुकृतिके
फलसे जीव वह भक्तसङ्ग प्राप्त करते हैं।' 'हे राजन्!
अति अल्प सुकृतिवान् व्यक्तिको महाप्रसादमें, श्रीगोविन्दमें,
श्रीनामब्रह्ममें और वैष्णवमें विश्वास उत्पन्न नहीं होता॥”32॥
श्रीरायके द्वारा सभी भक्तोंको यथायोग्य सम्मान :-
पुरी, भारती-गोसाञि, स्वरूप, नित्यानन्द।
जगदानन्द, मुकुन्दादि यत भक्तवृन्द ॥ 33 ॥
चारि गोसाञिर कैल राय चरण वन्दन।
यथायोग्य सब भक्तेर करिल मिलन ॥ 34 ॥
अनुवाद-श्रीरामानन्द रायने श्रीपरमानन्द पुरी,
श्रीब्रह्मानन्द भारती, श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीनित्यानन्द
प्रभु, इन चार गोस्वामियोंके श्रीचरणकमलोंकी वन्दना
की और श्रीजगदानन्द पण्डित तथा श्रीमुकुन्दादि अन्यान्य
भक्तोंके साथ वे उन्हें यथोचित सम्मान देते हुए
मिले॥ 33-34 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'पुरी'- श्रीपरमानन्दपुरी।
'भारती'-श्रीब्रह्मानन्द भारती। 'स्वरूप'-प्रसिद्ध श्रीदामोदर-
स्वरूप। 'नित्यानन्द' - श्रीनित्यानन्द प्रभु; श्रीरामानन्दने
इन चारों गोसाइयोंके चरणोंकी वन्दना की॥ 33-34 ॥
श्रीजगन्नाथके दर्शन करनेके लिये श्रीरायको आदेश :-
प्रभु कहे,-“राय, देखिले कमलनयन?”
राय कहे,-“एबे याइ' पाब दरशन ॥”35॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “राय! क्या आपने
कमलनयन श्रीजगन्नाथका दर्शन किया है?" श्रीरामानन्द
रायने उत्तर दिया, - “अभी तो दर्शन मिलेंगे, इसलिये
अब जाऊँगा ॥"35॥
महाप्रभुके दर्शनसे पहले श्रीजगन्नाथका दर्शन
न करनेके कारणकी जिज्ञासा :-
प्रभु कहे,-“राय, तुमि कि कार्य करिले ?
ईश्वरे ना देखि' केने आगे एथा आइल?" ॥ 36 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “हे राय! आपने यह
कैसा कार्य किया? श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन न करके
आप पहले यहाँ क्यों आये?" ॥ 36 ॥
438 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/37-43 ]
श्रीरायका चित्त औदार्यप्रधान-विग्रहमें
ही अधिक आकृष्ट :-
राय कहे,—“चरण—रथ, हृदय—सारथि।
याँहा लञा याय, ताँहा याय जीव-रथी ॥ 37 ॥
आमि कि करिब, मन इँहा लञा आइल।
जगन्नाथ-दरशने विचार ना कैल ॥” 38 ॥
अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“चरण रथ हैं
और हृदय इस रथका सारथी। जहाँ सारथी ले जाता
है, वहीं रथपर सवार जीव जाता है। मैं क्या करूँ,
मेरे मनने श्रीजगन्नाथके दर्शनका विचार ही नहीं किया
और मुझे यहाँ ले आया ॥ 37-38 ॥
अनुभाष्य—'जीव'—रथके सवारके समान, 'जीवके
चरण'—रथके समान, और 'जीवका मन'—रथचालक
सारथिके समान। इसलिये मनरूप सारथी जीवरूप
सवारको चरण-रथपर बैठाकर जहाँ ले जाता है, जीव
वहीं गमन करता है। कठोपनिषद् (3/3/6-9)—
'आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥
यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः॥
यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा।
तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः॥
××× विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः-प्रग्रहवान्नरः।
सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्॥”
अर्थात् “आत्माको रथी (रथपर सवार व्यक्ति)
जानो और शरीरको रथ, बुद्धिको सारथि और मनको
लगाम-रूपमें जानो। पण्डित लोग इन्द्रियोंको घोड़े और
विषयोंको इन्द्रियरूप घोड़ोंकी चारणभूमि कहते हैं और
इस प्रकारसे शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धियुक्त
जीवात्माको सुख-दुःखादिके भोक्ताके रूपमें निर्देश करते
हैं। जो व्यक्ति किन्तु असंयत मनमें आविष्ट होकर
सर्वदा अविज्ञानवान् (विवेकहीन बुद्धियुक्त) होते हैं,
उनकी इन्द्रियाँ अदक्ष (अनाड़ी) सारथिके दुष्ट घोड़ोंके
समान अनियन्त्रित हो जाती हैं। किन्तु जो सर्वदा संयत
मनके साथ विज्ञानवान् (विवेकयुक्त बुद्धिसम्पन्न) होते हैं,
उनकी इन्द्रियाँ सारथिके नियन्त्रित घोड़ोंके समान
वशीभूत होती हैं। जिन व्यक्तियोंने विवेकयुक्त-बुद्धिरूप
सारथिके द्वारा मनोरूप लगाम धारण की है, वे
व्यवस्थित-चित्तवाले व्यक्ति संसारसे परे जाकर श्रीविष्णुके
परमपदको प्राप्त करते हैं॥” 37-38 ॥
श्रीरायको जगन्नाथ और स्वजनोंके दर्शनका आदेश :-
प्रभु कहे,—“शीघ्र गिया कर दरशन।
ऐछे घर याइ' कर कुटुम्ब मिलन ॥” 39 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“अब शीघ्र जाकर
श्रीजगन्नाथदेवका दर्शन करो और वहाँसे घर जाकर
अपने परिवारजनोंसे मिलो ॥” 39 ॥
श्रीरायके द्वारा महाप्रभुकी आज्ञाका पालन :-
प्रभु आज्ञा पाञा राय चलिला दरशने।
रायेर प्रेमभक्ति-रीति बुझे कोन् जने ॥ 40 ॥
अनुवाद—महाप्रभुकी आज्ञा पाकर श्रीरामानन्द राय
श्रीजगन्नाथका दर्शन करने चले। श्रीरामानन्द रायकी
प्रेमभक्तिकी रीतिको कौन समझ सकता है ? ॥ 40 ॥
श्रीसार्वभौमसे राजाकी अपने प्रति महाप्रभुकी
कृपा-प्राप्तिके विषयमें जिज्ञासा :-
क्षेत्रे आसि' राजा सार्वभौमे बोलाइला।
सार्वभौमे नमस्करि' ताँहारे पुछिला ॥ 41 ॥
“मोर लागि' प्रभुपदे कैले निवेदन?”
सार्वभौम कहे,—“कैनु अनेक यतन ॥ 42 ॥
श्रीसार्वभौमके द्वारा महाप्रभुकी दृढ़ और
अचल वितृष्णाका ज्ञापन :-
तथापि ना करे तँह राज-दरशन।
क्षेत्र छाड़ि' याबेन पुनः यदि करि निवेदन ॥” 43 ॥
अनुवाद—नीलाचलमें आकर राजा प्रतापरुद्रने
। 439
[ 11/41-52 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको अपने पास बुलवाया। श्रीसार्वभौमके
आनेपर राजाने उन्हें प्रणाम किया और उनसे पूछा,—“क्या
आपने मेरे लिये महाप्रभुके चरणोंमें प्रार्थना की?”
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“यद्यपि मैंने अनेक यत्न
किये, तथापि वे राजाका दर्शन नहीं करना चाहते और
यदि मैं उनसे पुनः निवेदन करूँगा, तो वे नीलाचल
छोड़कर चले जायेंगे ॥” 41-43 ॥
राजाका गम्भीर विलाप और खेदपूर्ण उक्ति :-
शुनिया राजार मने दुःख उपजिला।
विषाद करिया किछु कहिते लागिला ॥ 44 ॥
“पापी-नीच उद्धारिते ताँर अवतार।
जगाइ माधाइ करियाछेन उद्धार ॥ 45 ॥
प्रतापरुद्र छाड़ि' करिबे जगत् निस्तार।
एइ प्रतिज्ञा करि' करियाछेन अवतार ? ॥ 46 ॥
अनुवाद—यह सुनकर राजा प्रतापरुद्रके मनमें
बहुत दुःख हुआ और वे निराश होकर कहने
लगे,—“पापी और नीच लोगोंका उद्धार करनेके लिये
ही उनका अवतार हुआ है और उन्होंने जगाइ-माधाइ
तकका भी उद्धार किया। क्या वे ऐसी प्रतिज्ञा करके
अवतरित हुए हैं कि प्रतापरुद्रको छोड़कर समस्त
जगत्का उद्धार करेंगे ? ॥ 44-46 ॥
श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटक (8/70)—
अदर्शनीयानपि नीचजातीन् संवीक्षते
हन्त तथापि नो माम्।
मदेकवर्जं कृपयिष्यतीति निर्णीय
किं सोऽवततार देवः ॥ 47 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 47 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—अदर्शनीय नीच जातिके भी
सभी लोगोंको दर्शन दे रहे हैं, तथापि मुझे दर्शन नहीं
देंगे। मेरे अतिरिक्त सभी जीवोंपर कृपा करेंगे, यही
निश्चय करके ही क्या वे अवतीर्ण हुए हैं? ॥ 47 ॥
अनुभाष्य—
अदर्शनीयान् (द्रष्टुमनर्हान्) नीचजातीन् (नीचकुलोद्भूतान्
अधमवृत्तिजीवनान्) अपि संवीक्षते (करुणया अवलोकयति,
कृपयति); तथापि, हन्त (खेदे) मां न [वीक्षते]; मदेकवर्ज्जं
(मामेकं त्यक्त्वा अन्यं सर्वं) कृपयिष्यति इति निर्णीय
(स्थिरीकृत्य) किं सः देवः (गौरहरिः) भुवि अवततार
(प्रकटोऽभूत्)?
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 47 ॥
महाप्रभु-कृपा न पाकर राजाका प्राण-त्यागका सङ्कल्प :-
ताँर प्रतिज्ञा—मोरे ना करिबे दरशन।
मोर प्रतिज्ञा—ताँहा बिना छाड़िब जीवन ॥ 48 ॥
यदि सेइ महाप्रभुर ना पाइ कृपा-धन।
किवा राज्य, किवा देह,—सब अकारण ॥” 49 ॥
अनुवाद—उनकी यह प्रतिज्ञा है—वे मेरा मुख नहीं
देखेंगे। तो मेरी भी यह प्रतिज्ञा है—मैं उनके दर्शनके
बिना अपना जीवन त्याग दूँगा। यदि महाप्रभुका
कृपा-धन मुझे प्राप्त नहीं हुआ, तो मेरा राज्य और
मेरी यह देह—सब व्यर्थ हैं ॥” 48-49 ॥
राजाकी महाप्रभुमें प्रीतिको देखकर
श्रीसार्वभौमको आश्चर्य :-
एत शुनि' सार्वभौम हइला चिन्तित।
राजार अनुराग देखि' हइला विस्मित ॥ 50 ॥
अनुवाद—यह सुनकर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य बहुत
चिन्तित हो गये और साथ ही राजाका महाप्रभुके प्रति
अनुराग देखकर वे विस्मित हो गये ॥ 50 ॥
श्रीभट्टाचार्यके द्वारा सान्त्वना दान :-
भट्टाचार्य कहे,—“देव, ना कर विषाद।
तोमारे प्रभुर अवश्य हइबे प्रसाद ॥ 51 ॥
तेँह—प्रेमाधीन, तोमार प्रेम—गाढ़तर।
अवश्य करिबेन कृपा तोमार उपर ॥ 52 ॥
अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने कहा,—“राजन्! आप निराश
440 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/51-63 ]
मत होइये। आपपर महाप्रभुकी कृपा अवश्य होगी।
आपका उनके प्रति प्रगाढ़ प्रेम है और वे प्रेमके अधीन
हैं, इसलिये वे आपपर अवश्य ही कृपा करेंगे॥ 51-52॥
महाप्रभुके साथ राजाके साक्षात्कारका उपाय निर्धारण :-
तथापि कहिये आमि एक उपाय।
एइ उपाय कर, प्रभु देखिबे याहाय ॥ 53 ॥
रथयात्रा-दिने प्रभु सब भक्त लञा।
रथ-आगे नृत्य करिबेन प्रेमाविष्ट हञा ॥ 54 ॥
प्रेमावेशे पुष्पोद्याने करिबेन प्रवेश।
सेइकाले एकले तुमि छाड़ि' राजवेश ॥ 55 ॥
'कृष्ण-रासपञ्चाध्याय' करिते पठन।
एकले याइ' महाप्रभुर धरिबे चरण ॥ 56 ॥
बाह्यज्ञान नाहि, से-काले कृष्णनाम शुनि'।
आलिङ्गन करिबेन तोमाय 'वैष्णव' जानि' ॥ 57 ॥
श्रीरामानन्दके द्वारा महाप्रभुका कठिन मन भी द्रवीभूत :-
रामानन्द राय, आजि तोमार प्रेम-गुण।
प्रभु-आगे कहिते, प्रभुर फिरि' गेल मन ॥" 58 ॥
अनुवाद-तथापि मैं आपको एक उपाय बतलाता
हूँ। इस उपायको करनेसे आपको महाप्रभुके दर्शन
होंगे। रथ-यात्राके दिन महाप्रभु अपने सभी भक्तोंको
अपने साथ लेकर रथके आगे प्रेमाविष्ट होकर नृत्य
करेंगे और प्रेमावेशमें वे पुष्पोद्यानमें प्रवेश करेंगे। उस
समय आप अपने राजवेशको छोड़कर साधारण वेशमें
अकेले वहाँ जाना। कृष्ण-रासपञ्चाध्यायका पाठ करते
हुए महाप्रभुके श्रीचरणोंको पकड़ लेना। उस समय
महाप्रभुको प्रेमावेशके कारण बाह्यज्ञान नहीं रहेगा,
इसलिये उस समय आपके मुखसे श्रीकृष्ण नाम सुनकर
वे आपको 'वैष्णव' समझकर आपका आलिङ्गन करेंगे।
रामानन्दरायने आज जब आपके प्रेमके गुणोंका महाप्रभुके
समक्ष वर्णन किया, तब महाप्रभुका मन आपके प्रति
बदल गया ॥" 53-58 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- श्रीमद्भागवतके (दशम स्कन्ध,
29-33 अध्याय) श्रीकृष्णके रास-पञ्चाध्यायकी कविताओंका
पाठ करते-करते आप अकेले जाकर महाप्रभुके
श्रीचरण पकड़ लेना ॥ 56 ॥
अनुभाष्य- 'पुष्पोद्याने'-गुण्डिचामें ॥ 55 ॥
महाप्रभुकी कृपाप्राप्तिकी आशामें राजाका दृढ़ सङ्कल्प :-
शुनि' गजपतिर मने सुख उपजिल।
प्रभुरे मिलिते एइ मन्त्रणा दृढ़ कैल ॥ 59 ॥
राजाकी अधीरता और दिनोंको गिनना :-
स्नानयात्रा कबे हबे पुछिल भट्टेरे।
भट्ट कहे, - "तिन दिन आछये यात्रारे ॥" 60 ॥
अनुवाद-यह सुनकर गजपतिका (राजा प्रतापरुद्रका)
मन प्रसन्न हो गया। श्रीसार्वभौमके परामर्श अनुसार
उन्होंने महाप्रभुसे मिलनेके दृढ़ निश्चय कर लिया और
उनसे पूछा, - "श्रीजगन्नाथदेवकी स्नानयात्रा कब होगी?
श्रीभट्टाचार्यने उत्तर दिया, - "स्नानयात्रामें अभी तीन दिन
बाकी हैं ॥" 59-60 ॥
श्रीसार्वभौमका प्रस्थान; स्नानयात्रामें महाप्रभुकी प्रसन्नता :-
राजारे प्रबोधिया भट्ट गेला निजालय।
स्नानयात्रा-दिने प्रभुर आनन्द हृदय ॥ 61 ॥
स्नानयात्रा देखि' प्रभुर हैल बड़ सुख।
ईश्वरेर 'अनवसरे' पाइल बड़ दुःख ॥ 62 ॥
अनवसरके समय महाप्रभुका श्रीकृष्ण-विरह
और अकेले ही आलालनाथ जाना :-
गोपीभावे विरहे प्रभु व्याकुल हञा।
आलालनाथे गेला प्रभु सबारे छाड़िया ॥ 63 ॥
अनुवाद-इस प्रकार राजा प्रतापरुद्रको आश्वस्त
करके श्रीसार्वभौम अपने घर चले गये। स्नान-यात्राके
दिन महाप्रभुके हृदयमें बड़ा आनन्द था। श्रीजगन्नाथदेवकी
स्नान-यात्रा देखकर महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए, परन्तु
स्नान-यात्राके बाद 'अनवसर'में महाप्रभुको श्रीजगन्नाथके
। 441
[ 11/61-70 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
दर्शन न होनेसे बहुत दुःख हुआ और वे गोपीभावमें
आविष्ट होकर विरहमें कातर हो गये। तब वे सबको
छोड़कर अकेले ही आलालनाथ चले गये॥ 61-63 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - अनवसरके समय श्रीजगन्नाथजीके
दर्शन प्राप्त ना कर पानेके कारण महाप्रभु श्रीकृष्णके
विरहमें व्याकुल-अवस्थामें आलालनाथमें जाकर रहे ॥ 63 ॥
अनुभाष्य - 'अनवसर'- स्नानयात्राके बाद
श्रीजगन्नाथदेवके अङ्ग-रागादिके उद्देश्यसे श्रीविग्रहको
दर्शनार्थियोंकी दृष्टिसे दूर रखा जाता है। इस कालको
ही 'अनवसर' कहते हैं ॥ 62 ॥
महाप्रभुको भक्तोंके द्वारा गौड़ीय-भक्तोंके
आगमनका संवाद देना :-
पाछे प्रभुर निकट आइला भक्तगण।
गौड़ हैते भक्त आइसे, - कैल निवेदन ॥ 64 ॥
अनुवाद - बादमें भक्तगण भी महाप्रभुके पास
आलालनाथ आये और उन्होंने महाप्रभुसे निवेदन किया
कि गौड़देशसे भक्त श्रीजगन्नाथपुरी आ रहे हैं ॥ 64 ॥
महाप्रभुके साथ श्रीभट्टाचार्यका पुरीमें आगमन
और राजाको महाप्रभुका समाचार देना :-
सार्वभौम नीलाचले आइला प्रभु लञा।
'प्रभु आइला'-राजा-ठाञि कहिलेन गिया ॥ 65 ॥
गौड़देशसे सबसे पहले श्रीगोपीनाथाचार्यका आगमन :-
हेनकाले आइला तथा गोपीनाथाचार्य।
राजाके आशीर्वाद करि' कहे, - "शुन भट्टाचार्य ॥ 66 ॥
दो सौ गौड़ीय गौरभक्तोंके आगमनका समाचार देना और
उनके रहनेके स्थानकी व्यवस्थाके लिये अनुरोध :-
गौड़ हैते वैष्णव आसितेछेन दुइशत।
महाप्रभुर भक्त, सब - महाभागवत ॥ 67 ॥
नरेन्द्रे आसिया सबे हैल विद्यमान।
ताँ-सबारे चाहि वासा प्रसाद-समाधान ॥" 68 ॥
अनुवाद - यह संवाद सुनकर श्रीसार्वभौम महाप्रभुको
लेकर नीलाचल आ गये। श्रीसार्वभौमने राजाके पास
जाकर उन्हें महाप्रभुके आनेका समाचार दिया। तभी
वहाँ श्रीगोपीनाथाचार्य भी आ गये। उन्होंने राजाको
आशीर्वाद देकर श्रीसार्वभौमसे कहा, - “सुनो भट्टाचार्य !
गौड़देशसे दो-सौ वैष्णव आ रहे हैं। वे सब महाभागवत
हैं और महाप्रभुके भक्त हैं। वे सब नरेन्द्र सरोवर तक
आ गये हैं और वहाँ प्रतीक्षा कर रहे हैं। मैं चाहता
हूँ कि उन सबके रहनेके स्थान तथा प्रसादकी व्यवस्था
हो ॥" 65-68 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'नरेन्द्र'-'नरेन्द्र' नामक सरोवर,
जिसमें 'चन्दन-यात्रा' उत्सव होता है। आज तक भी
गौड़ीय भक्तगण पुरुषोत्तममें प्रवेश करते समय नरेन्द्र
सरोवरके जलमें हाथ-पैर धोकर श्रीमन्दिरमें जाते
हैं ॥ 68 ॥
अनुभाष्य - 'गोपीनाथाचार्य'-आदिलीला 10/130 संख्या
देखें।
'महाभागवत' - निष्किञ्चन (संसारमें किसी वस्तुको
अपना न माननेवाले), वर्णाश्रमसे अतीत, श्रीकृष्णके
शरणागत परमहंस; जैसे श्रीनरोत्तम ठाकुर स्वरचित
'प्रार्थना' में लिखते हैं, -
“गौराङ्गेर सङ्गिगेणे, नित्यसिद्ध करि' माने,
से याय ब्रजेन्द्रसुतपाश।”
अर्थात् “जो महाप्रभुके सङ्गियोंको नित्य सिद्ध
परिकर मानता है, वह निश्चय ही श्रीव्रजेन्द्रनन्दनके
पास जाता है ॥" 66-68 ॥
राजाके द्वारा सब व्यवस्थाके लिये पड़िछाको आदेश :-
राजा कहे, - “पड़िछाके आमि आज्ञा दिब।
वासा आदि ये चाहिये, - पड़िछा सब दिब ॥ 69 ॥
गौड़ीय भक्तोंका परिचय देनेके
लिये श्रीभट्टाचार्यसे राजाका अनुरोध :-
महाप्रभुर गण यत आइल गौड़ हैते।
भट्टाचार्य, एके एके देखाह आमाते ॥" 70 ॥
442 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/69-81 ]
अनुवाद—यह सुनकर राजा प्रतापरुद्रने कहा,—“मैं
'पड़िछा' को आदेश दे दूँगा। वासस्थान आदि जो कुछ
भी चाहिये, पड़िछा वह सब आपको दे देगा। महाप्रभुके
जितने भी भक्त गौड़देशसे आये हैं, हे भट्टाचार्य ! आप
मुझे उन सबके एक-एक करके दर्शन कराइये॥” 69-70॥
श्रीभट्टाचार्यके द्वारा अपनी असमर्थता बतलाना, इसके लिये
श्रीगोपीनाथसे प्रार्थना, तीनोंका अट्टालिकापर चढ़ना :-
भट्ट कहे, —“अट्टालिकाय कर आरोहण।
गोपीनाथ चिने सबारे, कराबे दरशन ॥ 71 ॥
आमि काहारे नाहि चिनि, चिनिते मन हय।
गोपीनाथाचार्य सबारे करा'बे परिचय ॥” 72 ॥
एत बलि' तिन जन अट्टालिकाय चड़िल।
हेनकाले वैष्णव सब निकटे आइल ॥ 73 ॥
अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने कहा,—“आइये हम सब
महलकी अट्टालिकापर चढ़ जाते हैं। श्रीगोपीनाथाचार्य
सभी भक्तोंको पहचानते हैं, वे आपको सबके दर्शन
करायेंगे। मैं भी किसी भक्तको नहीं पहचानता, परन्तु
मेरी भी उनके विषयमें जाननेकी इच्छा है। इसलिये
श्रीगोपीनाथाचार्य ही उन सबका परिचय करायेंगे।” इतना
कहकर तीनों अट्टालिकापर चढ़ गये। उस समय वे
सब वैष्णव राजभवनके निकट आ गये थे ॥ 71-73 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसार्वभौमने कहा, —मैं किसीको
भी नहीं पहचानता, (किन्तु) जाननेकी इच्छा होती
है॥ 72 ॥
महाप्रभुकी प्रेरणासे श्रीदामोदरस्वरूप और श्रीगोविन्दके
द्वारा माला एवं प्रसादके साथ भक्तोंका स्वागत :-
दामोदरस्वरूप, गोविन्द—दुइ जन।
माला-प्रसाद लञा याय, याँहा वैष्णवगण ॥ 74 ॥
प्रथमेते महाप्रभु पाठाइल दुँहारे।
राजा कहे, —“एइ दुइ कोन् चिनाह आमारे ॥” 75 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने गौड़देशके भक्तोंके अभिनन्दनके
लिये श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीगोविन्द—इन दोनोंको
श्रीजगन्नाथदेवकी माला और प्रसाद लेकर भेजा था। ये
दोनों वहाँ जा रहे थे, जहाँ वे वैष्णव लोग थे। राजा
प्रतापरुद्रने पूछा, —“ये दोनों कौन है? मुझे इनका
परिचय दीजिये ॥” 74-75 ॥
राजाको भट्टाचार्यके द्वारा (1) श्रीदामोदर-
स्वरूपका परिचय देना :-
भट्टाचार्य कहे, —“एइ स्वरूप-दामोदर।
महाप्रभुर हय इँह द्वितीय कलेवर ॥ 76 ॥
(2) श्रीगोविन्दका परिचय प्रदान-
द्वितीय, गोविन्द-भृत्य, इँहा दों'हा दिया।
माला पाठाञाछेन प्रभु गौरव करिया ॥” 77 ॥
अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने कहा,—“ये श्रीस्वरूप दामोदर
हैं। महाप्रभुके ये दूसरे शरीर हैं। उनके साथ ये दूसरे
भक्त महाप्रभुके सेवक श्रीगोविन्द हैं। महाप्रभुने इन
दोनोंको वैष्णवोंका सम्मान करनेके लिये माला देकर
भेजा है ॥ 76-77 ॥
श्रीअद्वैताचार्यको माला पहनाना :-
आदौ माला अद्वैतेरे स्वरूप पराइल।
पाछे गोविन्द द्वितीय माला आनि' ताँरे दिल ॥ 78 ॥
श्रीगोविन्दके प्रणाम करनेपर श्रीअद्वैताचार्यके प्रश्नके
उत्तरमें श्रीगोविन्दका परिचय देना :-
तबे गोविन्द दण्डवत् कैल आचार्ये।
ताँरे नाहि चिने आचार्य, पुछिल दामोदरे ॥ 79 ॥
दामोदर कहे, —“इँहार 'गोविन्द' नाम।
ईश्वर-पुरीर सेवक अति गुणवान् ॥ 80 ॥
प्रभुर सेवा करिते पुरी आज्ञा दिल।
अतएव प्रभु ताँरे निकटे राखिल ॥” 81 ॥
अनुवाद—सबसे पहले श्रीस्वरूप दामोदरने
श्रीअद्वैताचार्यको माला पहनायी और बादमें श्रीगोविन्दने
भी अद्वैताचार्यको दूसरी माला पहनाकर उनको दण्डवत्
। 443
[ 11/78-88 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
प्रणाम किया। श्रीअद्वैताचार्य श्रीगोविन्दको नहीं पहचानते
थे, इसलिये उनके बारेमें श्रीस्वरूप दामोदरसे पूछा।
श्रीस्वरूप दामोदरने कहा, — “इनका नाम 'गोविन्द' है। ये
श्रीईश्वरपुरीके सेवक थे और बहुत गुणवान् हैं।
श्रीईश्वरपुरीने इन्हें महाप्रभुकी सेवा करनेके लिये
आदेश दिया था, इसलिये महाप्रभुने इन्हें अपने पास
रख लिया है॥” 78-81॥
श्रीअद्वैताचार्यको देखकर राजाका कौतूहल :-
राजा कहे, — “याँरे माला दिल दुइजन।
आश्चर्य तेज, बड़ महान्त, — कह कोन् जन?” ॥ 82 ॥
अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रने कहा, — “जिन्हें श्रीस्वरूप
दामोदर और श्रीगोविन्दने माला पहनायी है, उनके
तेजको देखकर बड़ा आश्चर्य हो रहा है, वे अवश्य
ही बड़े महापुरुष होंगे। कृपा करके बतलाइये कि वे
कौन हैं?” ॥ 82 ॥
(3) श्रीअद्वैताचार्यका परिचय देना :-
आचार्य कहे, — “इँहार नाम अद्वैत आचार्य।
महाप्रभुर मान्यपात्र, सर्व-शिरोधार्य ॥ 83 ॥
अनुवाद—श्रीगोपीनाथाचार्यने कहा, — “इनका नाम
श्रीअद्वैताचार्य है। ये महाप्रभुके भी आदरणीय और
अन्यान्य सभी भक्तोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं॥” 83 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य — 'आचार्य कहे'—श्रीगोपीनाथाचार्यने
कहा ॥ 83 ॥
(4) श्रीवास, (5) श्रीवक्रेश्वर,
(6) श्रीविद्यानिधि, (7) श्रीगदाधर :-
श्रीवास-पण्डित इँह, पण्डित-वक्रेश्वर।
विद्यानिधि-आचार्य, इँह पण्डित-गदाधर ॥ 84 ॥
अनुवाद—ये श्रीवास पण्डित, श्रीवक्रेश्वर पण्डित,
और श्रीविद्यानिधि आचार्य हैं तथा ये श्रीगदाधर पण्डित
हैं॥ 84 ॥
अनुभाष्य — 'विद्यानिधि आचार्य' (आचार्य
निधि) — पुण्डरीक विद्यानिधि; आदिलीला 10/14 संख्याका
अनुभाष्य और वैष्णव-मञ्जूषा-समाहृति-(प्रथम संख्या)
देखें ॥ 84 ॥
(8) श्रीचन्द्रशेखर, (9) श्रीपुरन्दर,
(10) श्रीगङ्गादास, (11) श्रीशङ्कर :-
आचार्यरत्न इँह, पण्डित-पुरन्दर ।
गङ्गादास पण्डित इँह, पण्डित-शङ्कर ॥ 85 ॥
अनुवाद—ये श्रीआचार्य रत्न, श्रीपुरन्दर पण्डित, ये
श्रीगङ्गादास पण्डित और श्रीशङ्कर पण्डित हैं॥ 85 ॥
(12) श्रीमुरारि, (13) श्रीनारायण,
(14) श्रीहरिदास ठाकुर :-
एइ मुरारि गुप्त, इँह पण्डित-नारायण।
हरिदास ठाकुर इँह भुवनपावन ॥ 86 ॥
अनुवाद—ये श्रीमुरारि गुप्त हैं, ये श्रीनारायण
पण्डित और ये ब्रह्माण्डको पवित्र करनेवाले श्रीहरिदास
ठाकुर हैं॥ 86 ॥
(15) श्रीहरिभट्ट, (16) श्रीनृसिंहानन्द,
(17) श्रीवासुदेव दत्त, (18) श्रीसेन शिवानन्द :-
एइ हरि-भट्ट, एइ श्रीनृसिंहानन्द।
एइ वासुदेव दत्त, एइ शिवानन्द ॥ 87 ॥
अनुवाद—ये श्रीहरि भट्ट हैं, ये श्रीनृसिंहानन्द हैं, ये
श्रीवासुदेव दत्त और ये श्रीशिवानन्द सेन हैं॥ 87 ॥
(19) श्रीगोविन्द, (20) श्रीमाधव, (21) श्रीवासुघोष :-
गोविन्द, माधव घोष, एइ वासुघोष।
तिन भाइर कीर्तने प्रभु पायेन सन्तोष ॥ 88 ॥
अनुवाद—ये श्रीगोविन्द, श्रीमाधव घोष और
श्रीवासुघोष-तीन भाई हैं। इन तीनों भाइयोंका कीर्तन
सुनकर महाप्रभुको बहुत आनन्द होता है॥ 88 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य — 'गोविन्द घोष' — उत्तर-राढ़देशके
कायस्थ कुलमें प्रकटित हुए थे; इन्हें ही 'घोषठाकुर'
444 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/88-99 ]
कहते हैं; आज भी (काटोयाके निकट) अग्रद्वीपमें
घोषठाकुरका मेला होता है।
'वासुघोष'—इन्होंने महाप्रभुके विषयमें अनेक गीत
लिखे हैं, वे महाजनोंके गीतोंमें अग्रगण्य हैं॥ 88॥
(22) श्रीराघव, (23) श्रीनन्दन, (24) श्रीमान्,
(25) श्रीकान्त, (26) श्रीनारायण :-
राघव पण्डित, इँह आचार्य नन्दन।
श्रीमान् पण्डित एइ, श्रीकान्त, नारायण ॥ 89 ॥
(27) श्रीशुक्लाम्बर, (28) श्रीधर,
(29) श्रीविजय, (30) श्रीवल्लभसेन,
(31) श्रीपुरुषोत्तम, (32) श्रीसञ्जय :-
शुक्लाम्बर देख, एइ श्रीधर, विजय।
वल्लभ-सेन, एइ पुरुषोत्तम, सञ्जय ॥ 90 ॥
(33) श्रीसत्यराज, (34) श्रीरामानन्द :-
कुलीन-ग्रामवासी एइ सत्यराज-खान।
रामानन्द-आदि सबे देख विद्यमान ॥ 91 ॥
(35) श्रीमुकुन्द, (36) श्रीनरहरि, (37) श्रीरघुनन्दन,
(38) श्रीचिरञ्जीव, (39) श्रीसुलोचन :-
मुकुन्ददास, नरहरि, श्रीरघुनन्दन।
खण्डवासी, चिरञ्जीव, आर सुलोचन ॥ 92 ॥
कतेक कहिब, एइ देख यत जन।
चैतन्येर गण, सब—चैतन्यजीवन ॥ ”93 ॥
अनुवाद—ये श्रीराघव पण्डित, ये श्रीनन्दन आचार्य,
ये श्रीमान् पण्डित, श्रीकान्त और श्रीनारायण हैं। देखो!
ये श्रीशुक्लाम्बर हैं, ये श्रीधर, श्रीविजय, श्रीवल्लभसेन,
ये श्रीपुरुषोत्तम और श्रीसञ्जय हैं। ये कुलीनग्रामवासी
श्रीसत्यराज खान, श्रीरामानन्द आदि सभी उपस्थित
भक्तोंको देखो। ये खण्डवासी श्रीमुकुन्ददास, श्रीनरहरि,
श्रीरघुनन्दन, चिरञ्जीव और श्रीसुलोचन हैं। कहाँ तक
कहूँ? ये जितने भी भक्त आप देख रहे हैं, सभी
महाप्रभुके गण हैं और महाप्रभु ही इन सबके जीवन
स्वरूप हैं॥ ”89-93 ॥
वैष्णवोंके तेजके दर्शन और अपूर्व
कीर्तनादिके श्रवणसे राजाको आश्चर्य :-
राजा कहे,—“देखि' मोर हैल चमत्कार।
वैष्णवेर ऐछे तेज देखि नाहि आर ॥ 94 ॥
कोटिसूर्य-सम सब—उज्ज्वल-वरण।
कभु नाहि शुनि एइ मधुर कीर्त्तन ॥ 95 ॥
ऐछे प्रेम, ऐछे नृत्य, ऐछे हरिध्वनि।
काँहा नाहि देखि, ऐछे काँहा नाहि शुनि ॥ ”96 ॥
अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रने कहा,—“इन सबको देखकर
मुझे बहुत आश्चर्य हो रहा है। वैष्णवोंका ऐसा तेज
मैंने पहले कभी भी नहीं देखा, ये सब करोड़ों-करोड़ों
सूर्यके समान उज्ज्वल वर्णके हैं। इनके कीर्तनके जैसा
मधुर कीर्तन मैंने पहले कभी नहीं सुना। और ऐसा
प्रेम, ऐसा नृत्य और ऐसी हरिध्वनि—मैंने न तो कहीं
देखी है और न ही कहीं सुनी है॥ ”94-96 ॥
सङ्कीर्तनके प्रवर्त्तक श्रीकृष्णचैतन्य :-
भट्टाचार्य कहे एइ मधुर वचन।
“चैतन्येर सृष्टि—एइ प्रेम सङ्कीर्त्तन ॥ 97 ॥
विमुख-जीवको श्रीकृष्ण-उन्मुख करने
रूपी प्रचार ही सङ्कीर्तन :-
अवतारि' चैतन्य कैल धर्मप्रचारण।
कलिकालि धर्म—कृष्णनाम-सङ्कीर्त्तन ॥ 98 ॥
चैतन्य प्राप्त जीवके द्वारा गौर-कीर्तन करना ही बुद्धिमता
और जाड्यता (आलस्य) ही मूर्खता :-
सङ्कीर्त्तन-यज्ञे ताँरे करे आराधन।
सेइ त' सुमेधा, आर—कलिहत-जन ॥ ”99 ॥
अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने तब मधुर वचन कहे,—“यह
कीर्तन महाप्रभुकी सृष्टि है—यह प्रेम-सङ्कीर्तन है।
कलियुगका धर्म श्रीकृष्णनाम-सङ्कीर्तन ही है और
महाप्रभुने अवतीर्ण होकर उसी धर्मका प्रचार किया है।
जो कलियुगमें सङ्कीर्तन-यज्ञके द्वारा महाप्रभुकी आराधना
करते हैं, वे ही बुद्धिमान हैं। जिन सबकी बुद्धि
कलिके द्वारा हर ली गयी है, वे ऐसा नहीं करते॥ ”97-99 ॥
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[ 11/99-104 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अमृतप्रवाह भाष्य—कलिकालमें सङ्कीर्तन-यज्ञके द्वारा
जो श्रीकृष्णचैतन्यकी आराधना करते हैं, वे सुमेधा
(बुद्धिमान) हैं। जो उस प्रकारसे भजन नहीं करते, वे
सब व्यक्ति कलिहत अर्थात् कलिके द्वारा हत (मारी
गयी) बुद्धिवाले हैं॥ 99॥
अनुभाष्य—लब्धचैतन्य अर्थात् श्रीकृष्णसेवोन्मुख जीवकी
श्रीकृष्णकीर्त्तनरूप चेतनमयी वाणीके प्रभावसे अन्य जीव
जाग्रत-चेतन होकर सेवोन्मुखी वृत्ति प्राप्त करके शुद्ध
सेवक (भक्त) होते हैं। इस प्रकार शुद्धभक्तोंकी अपने
गोत्र-वर्द्धनरूपी (अपने जैसे शुद्धभक्तोंकी संख्या वृद्धिरूपी)
उपासनामें ही श्रीकृष्णचैतन्यको आनन्द होता है। इस
उपासनामें ही जीवकी सर्वापेक्षा अधिक बुद्धिमताका
परिचय है।
तुच्छ, जड़-स्वार्थपरक जीवका ताण्डव नृत्य-कीर्तन
आदि समस्त क्रियाएँ जड़ताकी ही परिचायक हैं। इसका
कारण यह है कि 'वास्तव-वस्तु ही परम सेव्य हैं', इस
बातमें उसका अविश्वास और संशय है। इसलिये
उसका भगवद्-कीर्तन भी क्षणिक कृत्रिम भावुकता
और उत्तेजना अथवा आन्दोलन मात्र है॥ 99॥
श्रीमद्भागवत (11/5/32)—
कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्।
यज्ञैः सङ्कीर्त्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः ॥ 100॥
अनुवाद—जिनके मुखमें सदा श्रीकृष्ण-वर्ण अर्थात्
श्रीकृष्णनाम और जिनकी अङ्गकान्ति अकृष्ण अर्थात्
गौर है, उन्हीं अङ्ग, उपाङ्ग, अस्त्र तथा पार्षदोंसे
परिवेष्टित महापुरुषकी बुद्धिमान् व्यक्ति सङ्कीर्तनप्राय
यज्ञके द्वारा पूजा करते हैं॥ 100॥
अनुभाष्य—आदिलीला 3/51 संख्या देखें॥ 100॥
पराविद्यापति चैतन्य ही श्रीकृष्ण,
जड़विद्या या अपरा-विद्या उनसे विमुख :-
राजा कहे,—“शास्त्र-प्रमाणे चैतन्य हन कृष्ण।
तबे केने पण्डित सब ताँहाते वितृष्ण?”॥ 101॥
अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रने कहा,—“शास्त्र-प्रमाणके
आधारपर जब महाप्रभु साक्षात् श्रीकृष्ण हैं, तब पण्डित
लोग उनके प्रति उदासीन क्यों रहते हैं?”॥ 101॥
सेवान्मुखतासे ही कृपा-प्राप्ति, कृपाके
प्रभावसे ही भगवान्की उपलब्धि :-
भट्ट कहे,—“ताँर कृपा-लेश हय याँरे।
सेइ से ताँहारे ‘कृष्ण’ करि’ लइते पारे॥ 102॥
कृपाके बिना जड़विद्यासे नास्तिकताकी
वृद्धि और मोहकी प्राप्ति :-
ताँर कृपा नहे यारे, पण्डित नहे केने।
देखिले शुनिलेह ताँरे ‘ईश्वर’ ना माने॥” 103॥
अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने कहा,—“जिसपर महाप्रभुकी
लेशमात्र भी कृपा होती है, वही उन्हें श्रीकृष्णके रूपमें
स्वीकार कर पाता है। और जिसपर उनकी कृपा नहीं
हो, तो भले कितना बड़ा पण्डित ही क्यों ना हो, सब
कुछ देख-सुनकर भी उनको ‘ईश्वर’ नहीं
मानता॥” 102-103॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिनके प्रति उनकी कृपा नहीं
है, वह भले ही पण्डित क्यों न हो, उनका समस्त
ऐश्वर्य देखने-सुननेपर भी वह उनकी कृपाके अभावके
कारण श्रीकृष्णचैतन्यको ‘ईश्वर’ मान नहीं
पाता॥ 102-103॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 6/82-87 संख्या देखें॥ 102-103॥
श्रीमद्भागवत (10/14/29)—
तथापि ते देव पदाम्बुजद्वय-
प्रसादलेशानुगृहीत एव हि।
जानाति तत्त्वं भगवन्महिम्नो
न चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वन्॥ 104॥
अनुवाद—हे देव, आपके श्रीचरणकमलोंकी लेशमात्र
कृपाको प्राप्त करनेवाला व्यक्ति ही केवल आपकी
महिमाके तत्त्वको जान सकता है; किन्तु जो चिरकालसे
भी अनुमानके द्वारा शास्त्रोंका विचार करते हुए
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