श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1288, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 11/61-70 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
दर्शन न होनेसे बहुत दुःख हुआ और वे गोपीभावमें
आविष्ट होकर विरहमें कातर हो गये। तब वे सबको
छोड़कर अकेले ही आलालनाथ चले गये॥ 61-63 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - अनवसरके समय श्रीजगन्नाथजीके
दर्शन प्राप्त ना कर पानेके कारण महाप्रभु श्रीकृष्णके
विरहमें व्याकुल-अवस्थामें आलालनाथमें जाकर रहे ॥ 63 ॥
अनुभाष्य - 'अनवसर'- स्नानयात्राके बाद
श्रीजगन्नाथदेवके अङ्ग-रागादिके उद्देश्यसे श्रीविग्रहको
दर्शनार्थियोंकी दृष्टिसे दूर रखा जाता है। इस कालको
ही 'अनवसर' कहते हैं ॥ 62 ॥
महाप्रभुको भक्तोंके द्वारा गौड़ीय-भक्तोंके
आगमनका संवाद देना :-
पाछे प्रभुर निकट आइला भक्तगण।
गौड़ हैते भक्त आइसे, - कैल निवेदन ॥ 64 ॥
अनुवाद - बादमें भक्तगण भी महाप्रभुके पास
आलालनाथ आये और उन्होंने महाप्रभुसे निवेदन किया
कि गौड़देशसे भक्त श्रीजगन्नाथपुरी आ रहे हैं ॥ 64 ॥
महाप्रभुके साथ श्रीभट्टाचार्यका पुरीमें आगमन
और राजाको महाप्रभुका समाचार देना :-
सार्वभौम नीलाचले आइला प्रभु लञा।
'प्रभु आइला'-राजा-ठाञि कहिलेन गिया ॥ 65 ॥
गौड़देशसे सबसे पहले श्रीगोपीनाथाचार्यका आगमन :-
हेनकाले आइला तथा गोपीनाथाचार्य।
राजाके आशीर्वाद करि' कहे, - "शुन भट्टाचार्य ॥ 66 ॥
दो सौ गौड़ीय गौरभक्तोंके आगमनका समाचार देना और
उनके रहनेके स्थानकी व्यवस्थाके लिये अनुरोध :-
गौड़ हैते वैष्णव आसितेछेन दुइशत।
महाप्रभुर भक्त, सब - महाभागवत ॥ 67 ॥
नरेन्द्रे आसिया सबे हैल विद्यमान।
ताँ-सबारे चाहि वासा प्रसाद-समाधान ॥" 68 ॥
अनुवाद - यह संवाद सुनकर श्रीसार्वभौम महाप्रभुको
लेकर नीलाचल आ गये। श्रीसार्वभौमने राजाके पास
जाकर उन्हें महाप्रभुके आनेका समाचार दिया। तभी
वहाँ श्रीगोपीनाथाचार्य भी आ गये। उन्होंने राजाको
आशीर्वाद देकर श्रीसार्वभौमसे कहा, - “सुनो भट्टाचार्य !
गौड़देशसे दो-सौ वैष्णव आ रहे हैं। वे सब महाभागवत
हैं और महाप्रभुके भक्त हैं। वे सब नरेन्द्र सरोवर तक
आ गये हैं और वहाँ प्रतीक्षा कर रहे हैं। मैं चाहता
हूँ कि उन सबके रहनेके स्थान तथा प्रसादकी व्यवस्था
हो ॥" 65-68 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'नरेन्द्र'-'नरेन्द्र' नामक सरोवर,
जिसमें 'चन्दन-यात्रा' उत्सव होता है। आज तक भी
गौड़ीय भक्तगण पुरुषोत्तममें प्रवेश करते समय नरेन्द्र
सरोवरके जलमें हाथ-पैर धोकर श्रीमन्दिरमें जाते
हैं ॥ 68 ॥
अनुभाष्य - 'गोपीनाथाचार्य'-आदिलीला 10/130 संख्या
देखें।
'महाभागवत' - निष्किञ्चन (संसारमें किसी वस्तुको
अपना न माननेवाले), वर्णाश्रमसे अतीत, श्रीकृष्णके
शरणागत परमहंस; जैसे श्रीनरोत्तम ठाकुर स्वरचित
'प्रार्थना' में लिखते हैं, -
“गौराङ्गेर सङ्गिगेणे, नित्यसिद्ध करि' माने,
से याय ब्रजेन्द्रसुतपाश।”
अर्थात् “जो महाप्रभुके सङ्गियोंको नित्य सिद्ध
परिकर मानता है, वह निश्चय ही श्रीव्रजेन्द्रनन्दनके
पास जाता है ॥" 66-68 ॥
राजाके द्वारा सब व्यवस्थाके लिये पड़िछाको आदेश :-
राजा कहे, - “पड़िछाके आमि आज्ञा दिब।
वासा आदि ये चाहिये, - पड़िछा सब दिब ॥ 69 ॥
गौड़ीय भक्तोंका परिचय देनेके
लिये श्रीभट्टाचार्यसे राजाका अनुरोध :-
महाप्रभुर गण यत आइल गौड़ हैते।
भट्टाचार्य, एके एके देखाह आमाते ॥" 70 ॥
442 ।