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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1289, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1289

ग्यारहवाँ अध्याय 11/69-81 ]

अनुवाद—यह सुनकर राजा प्रतापरुद्रने कहा,—“मैं
'पड़िछा' को आदेश दे दूँगा। वासस्थान आदि जो कुछ
भी चाहिये, पड़िछा वह सब आपको दे देगा। महाप्रभुके
जितने भी भक्त गौड़देशसे आये हैं, हे भट्टाचार्य ! आप
मुझे उन सबके एक-एक करके दर्शन कराइये॥” 69-70॥

श्रीभट्टाचार्यके द्वारा अपनी असमर्थता बतलाना, इसके लिये
श्रीगोपीनाथसे प्रार्थना, तीनोंका अट्टालिकापर चढ़ना :-
भट्ट कहे, —“अट्टालिकाय कर आरोहण।
गोपीनाथ चिने सबारे, कराबे दरशन ॥ 71 ॥
आमि काहारे नाहि चिनि, चिनिते मन हय।
गोपीनाथाचार्य सबारे करा'बे परिचय ॥” 72 ॥
एत बलि' तिन जन अट्टालिकाय चड़िल।
हेनकाले वैष्णव सब निकटे आइल ॥ 73 ॥

अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने कहा,—“आइये हम सब
महलकी अट्टालिकापर चढ़ जाते हैं। श्रीगोपीनाथाचार्य
सभी भक्तोंको पहचानते हैं, वे आपको सबके दर्शन
करायेंगे। मैं भी किसी भक्तको नहीं पहचानता, परन्तु
मेरी भी उनके विषयमें जाननेकी इच्छा है। इसलिये
श्रीगोपीनाथाचार्य ही उन सबका परिचय करायेंगे।” इतना
कहकर तीनों अट्टालिकापर चढ़ गये। उस समय वे
सब वैष्णव राजभवनके निकट आ गये थे ॥ 71-73 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसार्वभौमने कहा, —मैं किसीको
भी नहीं पहचानता, (किन्तु) जाननेकी इच्छा होती
है॥ 72 ॥

महाप्रभुकी प्रेरणासे श्रीदामोदरस्वरूप और श्रीगोविन्दके
द्वारा माला एवं प्रसादके साथ भक्तोंका स्वागत :-
दामोदरस्वरूप, गोविन्द—दुइ जन।
माला-प्रसाद लञा याय, याँहा वैष्णवगण ॥ 74 ॥
प्रथमेते महाप्रभु पाठाइल दुँहारे।
राजा कहे, —“एइ दुइ कोन् चिनाह आमारे ॥” 75 ॥

अनुवाद—महाप्रभुने गौड़देशके भक्तोंके अभिनन्दनके
लिये श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीगोविन्द—इन दोनोंको
श्रीजगन्नाथदेवकी माला और प्रसाद लेकर भेजा था। ये
दोनों वहाँ जा रहे थे, जहाँ वे वैष्णव लोग थे। राजा
प्रतापरुद्रने पूछा, —“ये दोनों कौन है? मुझे इनका
परिचय दीजिये ॥” 74-75 ॥

राजाको भट्टाचार्यके द्वारा (1) श्रीदामोदर-
स्वरूपका परिचय देना :-
भट्टाचार्य कहे, —“एइ स्वरूप-दामोदर।
महाप्रभुर हय इँह द्वितीय कलेवर ॥ 76 ॥

(2) श्रीगोविन्दका परिचय प्रदान-
द्वितीय, गोविन्द-भृत्य, इँहा दों'हा दिया।
माला पाठाञाछेन प्रभु गौरव करिया ॥” 77 ॥

अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने कहा,—“ये श्रीस्वरूप दामोदर
हैं। महाप्रभुके ये दूसरे शरीर हैं। उनके साथ ये दूसरे
भक्त महाप्रभुके सेवक श्रीगोविन्द हैं। महाप्रभुने इन
दोनोंको वैष्णवोंका सम्मान करनेके लिये माला देकर
भेजा है ॥ 76-77 ॥

श्रीअद्वैताचार्यको माला पहनाना :-
आदौ माला अद्वैतेरे स्वरूप पराइल।
पाछे गोविन्द द्वितीय माला आनि' ताँरे दिल ॥ 78 ॥

श्रीगोविन्दके प्रणाम करनेपर श्रीअद्वैताचार्यके प्रश्नके
उत्तरमें श्रीगोविन्दका परिचय देना :-
तबे गोविन्द दण्डवत् कैल आचार्ये।
ताँरे नाहि चिने आचार्य, पुछिल दामोदरे ॥ 79 ॥
दामोदर कहे, —“इँहार 'गोविन्द' नाम।
ईश्वर-पुरीर सेवक अति गुणवान् ॥ 80 ॥
प्रभुर सेवा करिते पुरी आज्ञा दिल।
अतएव प्रभु ताँरे निकटे राखिल ॥” 81 ॥

अनुवाद—सबसे पहले श्रीस्वरूप दामोदरने
श्रीअद्वैताचार्यको माला पहनायी और बादमें श्रीगोविन्दने
भी अद्वैताचार्यको दूसरी माला पहनाकर उनको दण्डवत्

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