श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1292, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 11/99-104 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अमृतप्रवाह भाष्य—कलिकालमें सङ्कीर्तन-यज्ञके द्वारा
जो श्रीकृष्णचैतन्यकी आराधना करते हैं, वे सुमेधा
(बुद्धिमान) हैं। जो उस प्रकारसे भजन नहीं करते, वे
सब व्यक्ति कलिहत अर्थात् कलिके द्वारा हत (मारी
गयी) बुद्धिवाले हैं॥ 99॥
अनुभाष्य—लब्धचैतन्य अर्थात् श्रीकृष्णसेवोन्मुख जीवकी
श्रीकृष्णकीर्त्तनरूप चेतनमयी वाणीके प्रभावसे अन्य जीव
जाग्रत-चेतन होकर सेवोन्मुखी वृत्ति प्राप्त करके शुद्ध
सेवक (भक्त) होते हैं। इस प्रकार शुद्धभक्तोंकी अपने
गोत्र-वर्द्धनरूपी (अपने जैसे शुद्धभक्तोंकी संख्या वृद्धिरूपी)
उपासनामें ही श्रीकृष्णचैतन्यको आनन्द होता है। इस
उपासनामें ही जीवकी सर्वापेक्षा अधिक बुद्धिमताका
परिचय है।
तुच्छ, जड़-स्वार्थपरक जीवका ताण्डव नृत्य-कीर्तन
आदि समस्त क्रियाएँ जड़ताकी ही परिचायक हैं। इसका
कारण यह है कि 'वास्तव-वस्तु ही परम सेव्य हैं', इस
बातमें उसका अविश्वास और संशय है। इसलिये
उसका भगवद्-कीर्तन भी क्षणिक कृत्रिम भावुकता
और उत्तेजना अथवा आन्दोलन मात्र है॥ 99॥
श्रीमद्भागवत (11/5/32)—
कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्।
यज्ञैः सङ्कीर्त्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः ॥ 100॥
अनुवाद—जिनके मुखमें सदा श्रीकृष्ण-वर्ण अर्थात्
श्रीकृष्णनाम और जिनकी अङ्गकान्ति अकृष्ण अर्थात्
गौर है, उन्हीं अङ्ग, उपाङ्ग, अस्त्र तथा पार्षदोंसे
परिवेष्टित महापुरुषकी बुद्धिमान् व्यक्ति सङ्कीर्तनप्राय
यज्ञके द्वारा पूजा करते हैं॥ 100॥
अनुभाष्य—आदिलीला 3/51 संख्या देखें॥ 100॥
पराविद्यापति चैतन्य ही श्रीकृष्ण,
जड़विद्या या अपरा-विद्या उनसे विमुख :-
राजा कहे,—“शास्त्र-प्रमाणे चैतन्य हन कृष्ण।
तबे केने पण्डित सब ताँहाते वितृष्ण?”॥ 101॥
अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रने कहा,—“शास्त्र-प्रमाणके
आधारपर जब महाप्रभु साक्षात् श्रीकृष्ण हैं, तब पण्डित
लोग उनके प्रति उदासीन क्यों रहते हैं?”॥ 101॥
सेवान्मुखतासे ही कृपा-प्राप्ति, कृपाके
प्रभावसे ही भगवान्की उपलब्धि :-
भट्ट कहे,—“ताँर कृपा-लेश हय याँरे।
सेइ से ताँहारे ‘कृष्ण’ करि’ लइते पारे॥ 102॥
कृपाके बिना जड़विद्यासे नास्तिकताकी
वृद्धि और मोहकी प्राप्ति :-
ताँर कृपा नहे यारे, पण्डित नहे केने।
देखिले शुनिलेह ताँरे ‘ईश्वर’ ना माने॥” 103॥
अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने कहा,—“जिसपर महाप्रभुकी
लेशमात्र भी कृपा होती है, वही उन्हें श्रीकृष्णके रूपमें
स्वीकार कर पाता है। और जिसपर उनकी कृपा नहीं
हो, तो भले कितना बड़ा पण्डित ही क्यों ना हो, सब
कुछ देख-सुनकर भी उनको ‘ईश्वर’ नहीं
मानता॥” 102-103॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिनके प्रति उनकी कृपा नहीं
है, वह भले ही पण्डित क्यों न हो, उनका समस्त
ऐश्वर्य देखने-सुननेपर भी वह उनकी कृपाके अभावके
कारण श्रीकृष्णचैतन्यको ‘ईश्वर’ मान नहीं
पाता॥ 102-103॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 6/82-87 संख्या देखें॥ 102-103॥
श्रीमद्भागवत (10/14/29)—
तथापि ते देव पदाम्बुजद्वय-
प्रसादलेशानुगृहीत एव हि।
जानाति तत्त्वं भगवन्महिम्नो
न चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वन्॥ 104॥
अनुवाद—हे देव, आपके श्रीचरणकमलोंकी लेशमात्र
कृपाको प्राप्त करनेवाला व्यक्ति ही केवल आपकी
महिमाके तत्त्वको जान सकता है; किन्तु जो चिरकालसे
भी अनुमानके द्वारा शास्त्रोंका विचार करते हुए
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