श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1276, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंदसवाँ अध्याय 10/178-182 ]
श्रीकृष्णकी इच्छा मात्रसे ही कर्म और
ज्ञान-निष्ठाका ध्वंस :-
श्रीकृष्णकर्णामृतमें बिल्वमङ्गल-वाक्य-
अद्वैतवीथीपथिकैरुपास्याः
स्वानन्दसिंहासन-लब्धदीक्षाः।
शठेन केनापि वयं हठेन
दासीकृता गोपवधूविटेन ॥ 178 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 178॥
अमृतप्रवाह भाष्य-अद्वैतमार्गके पथिकोंके द्वारा
उपास्य, और आत्मानन्द-सिंहासनसे दीक्षा प्राप्त करनेपर
भी मैं किसी गोपवधू-लम्पट शठके द्वारा हठतापूर्वक
दासीके रूपमें परिणत हो गया हूँ॥ 178॥
दसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य-
अद्वैतवीथीपथिकैः (अद्वैतं स्वगत-सजातीय-विजातीय-भेदरहितम्
एव वीथी पन्थाः तस्यां ये पथिकाः केवलाद्वैतवादिनः तैः
निराकारब्रह्मवादिभिः) उपास्याः (पूजनीयाः) स्वानन्दसिंहासन-
लब्धदीक्षा (आत्मानन्द एव सिंहासनम् उच्चपीठः तस्मिन्
लब्धा प्राप्ता दीक्षा यैः, एवम्भूताः योगमार्गरताः) वयं
(अहं-गौरवे-बहुवचनं) केनापि शठेन (कपटन्) गोपवधूविटेन
(गोपीलम्पटेन नन्दनन्दनेन) हठेन (बलात्कारेण) दासीकृताः
(स्वदास्ये नियुक्ता इत्येकवचनेनैव बोद्धव्यम्)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 178 ॥
महाप्रभुकी श्रीभारतीको 'महाभागवत' कहकर प्रशंसा :-
प्रभु कहे,-"कृष्णे तोमार गाढ़ प्रेमा हय।
याँहा नेत्र पड़े, ताँहा कृष्णस्फूर्ति हय॥" 179॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"श्रीकृष्णके प्रति आपका
गाढ़ प्रेम है, इसलिये जहाँ आपकी दृष्टि पड़ती है, वहाँ
आपको श्रीकृष्णकी स्फूर्ति होती है॥"179॥
श्रीसार्वभौमके द्वारा श्रीकृष्णकृपाकी महिमाकी व्याख्या :-
भट्टाचार्य कहे,-"तोमार हय सत्य वचन।
आगे यदि कृष्ण देन साक्षात् दरशन॥180॥
भक्तकी प्रेमसेवा और भगवान्की कृपा ही
परस्परका मिलन अथवा योगसूत्र :-
प्रेम बिना कभु नहे ताँर साक्षात्कार।
इँहार कृपाते हय दरशन इँहार॥" 181 ॥
अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यने कहा,-"आपके वचन सत्य
हैं। यदि श्रीकृष्ण साक्षात् दर्शन भी दें, तो भी प्रेमके
बिना कभी भी उनका साक्षात्कार नहीं होता। इनकी
(महाप्रभुकी) कृपासे ही इन्हें (ब्रह्मानन्द भारतीको)
श्रीकृष्णका साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ है॥"180-181॥
अनुभाष्य-श्रीमहाप्रभुने कहा,-"आप ब्रह्मानन्द भारती
प्रेममय महाभागवत हैं, इसलिये सर्वत्र आपको श्रीकृष्णदर्शन
होगा, इसमें और सन्देह क्या है?" भट्टाचार्य दोनोंके
मध्यस्थ होकर बोले,-"महाभागवत ब्रह्मानन्द भारतीको
श्रीकृष्णदर्शन हुए हैं, महाप्रभुका यह वाक्य भी सत्य
है, क्योंकि श्रीकृष्ण महाभागवतोंके समक्ष ही साक्षात्
दर्शन दिया करते हैं, किन्तु भक्तोंके प्रेमाधिक्यके
अतिरिक्त वैसे साक्षात्कारकी सम्भावना नहीं है।" पहले
'इँहार' शब्दका अर्थ-श्रीमहाप्रभुकी कृपासे है; बादवाले
'इँहार' शब्दका अर्थ ब्रह्मानन्द भारतीको दर्शन अर्थात्
श्रीकृष्ण दर्शन हुए हैं। (ब्रह्मसंहिता 5/38
श्लोक)-"प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्तिविलोचनेन सन्तः सदैव हृदयेषु
विलोकयन्ति" अर्थात् "प्रेमरूप काजलके द्वारा रञ्जित
भक्तिनेत्रोंसे सन्तपुरुष अपने हृदयमें श्रीकृष्णके दर्शन
करते हैं॥" 179-181 ॥
बाह्य-जीवाभिमान-हेतु महाप्रभुके द्वारा
श्रीसार्वभौमके वाक्यका अनादर :-
प्रभु कहे,-" 'विष्णु' 'विष्णु', कि कह सार्वभौम।
'अतिस्तुति' हय एइ निन्दार लक्षण॥" 182 ॥
अनुवाद-यह सुनकर महाप्रभुने कहा,-"'विष्णु'!
'विष्णु'! हे सार्वभौम, आप यह क्या कह रहे हैं?
किसीकी अधिक प्रशंसा निन्दाका ही लक्षण है॥" 182 ॥
अनुभाष्य-महाप्रभु श्रीसार्वभौमके वाक्यसे लज्जित
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