श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय 11/88-99 ]
कहते हैं; आज भी (काटोयाके निकट) अग्रद्वीपमें
घोषठाकुरका मेला होता है।
'वासुघोष'—इन्होंने महाप्रभुके विषयमें अनेक गीत
लिखे हैं, वे महाजनोंके गीतोंमें अग्रगण्य हैं॥ 88॥
(22) श्रीराघव, (23) श्रीनन्दन, (24) श्रीमान्,
(25) श्रीकान्त, (26) श्रीनारायण :-
राघव पण्डित, इँह आचार्य नन्दन।
श्रीमान् पण्डित एइ, श्रीकान्त, नारायण ॥ 89 ॥
(27) श्रीशुक्लाम्बर, (28) श्रीधर,
(29) श्रीविजय, (30) श्रीवल्लभसेन,
(31) श्रीपुरुषोत्तम, (32) श्रीसञ्जय :-
शुक्लाम्बर देख, एइ श्रीधर, विजय।
वल्लभ-सेन, एइ पुरुषोत्तम, सञ्जय ॥ 90 ॥
(33) श्रीसत्यराज, (34) श्रीरामानन्द :-
कुलीन-ग्रामवासी एइ सत्यराज-खान।
रामानन्द-आदि सबे देख विद्यमान ॥ 91 ॥
(35) श्रीमुकुन्द, (36) श्रीनरहरि, (37) श्रीरघुनन्दन,
(38) श्रीचिरञ्जीव, (39) श्रीसुलोचन :-
मुकुन्ददास, नरहरि, श्रीरघुनन्दन।
खण्डवासी, चिरञ्जीव, आर सुलोचन ॥ 92 ॥
कतेक कहिब, एइ देख यत जन।
चैतन्येर गण, सब—चैतन्यजीवन ॥ ”93 ॥
अनुवाद—ये श्रीराघव पण्डित, ये श्रीनन्दन आचार्य,
ये श्रीमान् पण्डित, श्रीकान्त और श्रीनारायण हैं। देखो!
ये श्रीशुक्लाम्बर हैं, ये श्रीधर, श्रीविजय, श्रीवल्लभसेन,
ये श्रीपुरुषोत्तम और श्रीसञ्जय हैं। ये कुलीनग्रामवासी
श्रीसत्यराज खान, श्रीरामानन्द आदि सभी उपस्थित
भक्तोंको देखो। ये खण्डवासी श्रीमुकुन्ददास, श्रीनरहरि,
श्रीरघुनन्दन, चिरञ्जीव और श्रीसुलोचन हैं। कहाँ तक
कहूँ? ये जितने भी भक्त आप देख रहे हैं, सभी
महाप्रभुके गण हैं और महाप्रभु ही इन सबके जीवन
स्वरूप हैं॥ ”89-93 ॥
वैष्णवोंके तेजके दर्शन और अपूर्व
कीर्तनादिके श्रवणसे राजाको आश्चर्य :-
राजा कहे,—“देखि' मोर हैल चमत्कार।
वैष्णवेर ऐछे तेज देखि नाहि आर ॥ 94 ॥
कोटिसूर्य-सम सब—उज्ज्वल-वरण।
कभु नाहि शुनि एइ मधुर कीर्त्तन ॥ 95 ॥
ऐछे प्रेम, ऐछे नृत्य, ऐछे हरिध्वनि।
काँहा नाहि देखि, ऐछे काँहा नाहि शुनि ॥ ”96 ॥
अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रने कहा,—“इन सबको देखकर
मुझे बहुत आश्चर्य हो रहा है। वैष्णवोंका ऐसा तेज
मैंने पहले कभी भी नहीं देखा, ये सब करोड़ों-करोड़ों
सूर्यके समान उज्ज्वल वर्णके हैं। इनके कीर्तनके जैसा
मधुर कीर्तन मैंने पहले कभी नहीं सुना। और ऐसा
प्रेम, ऐसा नृत्य और ऐसी हरिध्वनि—मैंने न तो कहीं
देखी है और न ही कहीं सुनी है॥ ”94-96 ॥
सङ्कीर्तनके प्रवर्त्तक श्रीकृष्णचैतन्य :-
भट्टाचार्य कहे एइ मधुर वचन।
“चैतन्येर सृष्टि—एइ प्रेम सङ्कीर्त्तन ॥ 97 ॥
विमुख-जीवको श्रीकृष्ण-उन्मुख करने
रूपी प्रचार ही सङ्कीर्तन :-
अवतारि' चैतन्य कैल धर्मप्रचारण।
कलिकालि धर्म—कृष्णनाम-सङ्कीर्त्तन ॥ 98 ॥
चैतन्य प्राप्त जीवके द्वारा गौर-कीर्तन करना ही बुद्धिमता
और जाड्यता (आलस्य) ही मूर्खता :-
सङ्कीर्त्तन-यज्ञे ताँरे करे आराधन।
सेइ त' सुमेधा, आर—कलिहत-जन ॥ ”99 ॥
अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने तब मधुर वचन कहे,—“यह
कीर्तन महाप्रभुकी सृष्टि है—यह प्रेम-सङ्कीर्तन है।
कलियुगका धर्म श्रीकृष्णनाम-सङ्कीर्तन ही है और
महाप्रभुने अवतीर्ण होकर उसी धर्मका प्रचार किया है।
जो कलियुगमें सङ्कीर्तन-यज्ञके द्वारा महाप्रभुकी आराधना
करते हैं, वे ही बुद्धिमान हैं। जिन सबकी बुद्धि
कलिके द्वारा हर ली गयी है, वे ऐसा नहीं करते॥ ”97-99 ॥
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