श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदसवाँ अध्याय 10/167-174 ]
भट्टाचार्य ! आप मध्यस्थ होकर इनके साथ मेरे न्यायसङ्गत
विचारको ध्यानपूर्वक सुनिये। 'व्याप्य' और 'व्यापक'—इन
दो प्रकारसे 'जीव' और 'ब्रह्म'को मैं जानता हूँ।
जीवको व्याप्य और ब्रह्मको व्यापकके रूपमें शास्त्रोंमें
कहा गया है। मृगछाला छुड़ाकर इन्होंने मेरा शोधन
किया है, इसलिये ये व्यापक-ब्रह्म हैं और मैं
व्याप्य-जीव हूँ॥ 167-169 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—इनके साथ आप मेरा विचार
ध्यानपूर्वक सुनिये। ब्रह्म-व्यापक अर्थात् सर्वव्यापक हैं;
जीव-अणु अर्थात् ब्रह्मके द्वारा व्याप्य है। जिन्होंने
मृगछाला छुड़ाकर मेरा शोधन किया है, वे-व्यापक हैं
और मैं-व्याप्य हूँ। यहाँपर विचार करके देखिये कि
ब्रह्मानन्द-भारतीरूप मैं या श्रीकृष्णचैतन्यरूप ये-हम
दोनोंमेंसे कौन 'ब्रह्म' हुए॥ 169॥
महाभारतमें दानधर्म 149, विष्णुसहस्त्रनाम-स्तोत्र (92, 75)—
सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी।
संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा-शान्ति-परायणः ॥ 170॥
अनुवाद—सुवर्णवर्ण, पिघले स्वर्णकी भाँति अङ्ग,
सर्वाङ्गसुन्दर गठन, चन्दनमालासे सुशोभित, संन्यासाश्रमी,
हरि-रहस्यकी आलोचनारूप शमगुणसे युक्त, हरिकीर्त्तनरूप
महायज्ञमें दृढ़तापूर्वक निष्ठावान् और केवलाद्वैतवादी
अभक्त-निवृत्तिकारिणी शान्ति-प्राप्त महाभावपरायण—ये
विष्णु सहस्त्र नामोंमें आठ नाम हैं॥ 170॥
अनुभाष्य—आदिलीला 3/49 संख्या देखें॥ 170॥
महाप्रभुमें ही उपरोक्त श्लोकका तात्पर्य निहित :-
एइसब नामेर इँह हय निजास्पद।
चन्दनाक्त प्रसाद-डोर—द्विभुजे अङ्गद॥”171॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 171 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'सुवर्णवर्णः'-श्लोकमें जो सब
नाम हैं, उनके श्रीकृष्णचैतन्य ही आस्पद हैं अर्थात् उन
नामोंने उन्होंने ही स्थान प्राप्त किया है। चन्दनका लेप
और प्रसाद-डोर (श्रीजगन्नाथदेवकी प्रसादी डोर जो उन्हें
प्राप्त हुई है)—ये उनकी दोनों भुजाओंमें कङ्कनस्वरूप
हैं॥” 171॥
श्रीसार्वभौमकी मीमांसा—श्रीभारतीकी जय
और महाप्रभुकी पराजय स्वीकार :-
भट्टाचार्य कहे,—“भारती, देखि तोमार जय।”
प्रभु कहे,—“येइ कह, सेइ सत्य हय॥ 172 ॥
गुरुतुल्य श्रीभारतीके समक्ष शिष्य-स्थानीय
महाप्रभुकी पराजय :-
गुरु-शिष्य-न्याये शिष्येर सत्य पराजय।”
भारती कहे,—“ए नहे, अन्य हेतु हय ॥ 173 ॥
श्रीभारतीकी प्रत्युक्ति—भक्तोंके
समक्ष भगवान्की पराजय :-
भक्त ठाञि हार' तुमि,—ए तोमार स्वभाव।
आर एक शुन तुमि आपन प्रभाव ॥ 174॥
अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“भारती !
मैं तो आपकी विजय देखता हूँ।” उनकी बात सुनकर
महाप्रभुने कहा,—“आपने जो कहा, वह सत्य ही है,
क्योंकि गुरु और शिष्यके तर्कमें शिष्यकी ही पराजय
निश्चित है।” श्रीब्रह्मानन्द भारतीने कहा,—“यह नहीं,
बल्कि इसका अन्य कोई कारण है। यह आपका
स्वभाव है कि आप अपने भक्तोंसे सदा पराजित होते
हैं। इसके अतिरिक्त आप अपना एक और प्रभाव
सुनिये ॥ 172-174 ॥
अनुभाष्य—शिष्य-वाक्य सत्य होनेपर भी गुरु-वाक्य
ही शिष्यके ऊपर विजयी होता है। गुरु-वाक्य सब
समय ही शिष्य-वाक्यकी अपेक्षा अधिक आदरणीय है।
महाप्रभुने यह कहा,—उक्त न्यायके अनुसार श्रीब्रह्मानन्द
भारती ही गुरु हैं और महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्यने स्वयंको
उनका शिष्य माना, इसलिये ब्रह्मानन्दके वाक्योंकी ही
विजय हुई। किन्तु श्रीब्रह्मानन्दने इस विषयमें महाप्रभुके
द्वारा कहे गये गुरु-शिष्य-न्यायके आधारको ही उनकी
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