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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( १६१ )

बहुस्यां इत्यादि उसी की प्रकृति के वाचक हैं । “तत्” का सामानाधिकरण्य
“त्वं” पद भी अचित् विशिष्ट जीव शरीरी ब्रह्म का प्रतिपादक है ।
विभिन्न प्रकार के दो पदार्थों की एकार्थ बोधकता को ही सामानाधिकरण्य
कहते हैं । तत् और त्वं पद में यदि प्रकार गत भेद नहीं मानेंगे तो, प्रवृत्ति
निमित्तकता न होगी और भी सामानाधिकरण्य भी छोड़ना होगा, तथा
दोनों पदों में लक्षणा (गौणार्थ) करनी पड़ेगी । “यह वही देवदत्त है” इस
सुस्पष्ट वाक्य में भी लक्षणा नहीं की जाती, क्यों कि भूत और वर्त्तमान
काल में प्रतीतित एक ही व्यक्ति तो है, वह भिन्न स्थान में स्थित देखा
गया, पर एक ही समय में तो नहीं देखा गया, जिससे संशय हो सके ।
विभिन्न काल में दृष्ट होने से, संशय हो ही नहीं सकता । “तत्” पद का
यदि निर्विशेष अर्थ करेंगे तो “तदैक्षत बहुस्यां” इस उपक्रम श्रुति से
विरुद्धता होगी । एक विज्ञान से सर्व विज्ञान वाली प्रतिज्ञा भी संगत न
होगी । समस्त दोष रहित, कल्याण गुण संपन्न, सर्वज्ञ ज्ञान स्वरूप ब्रह्म
में अज्ञान और अज्ञान जन्य दोष भी संलग्न होंगे । यदि कहो कि-तत्
त्वं पदों का सामानाधिकरण्य, एकत्व बोधक नहीं, बाधार्थक है; तो तत्
त्वं पद के सर्वाधिष्ठान भूत परब्रह्म और जीव के, जीव भाव की निवृत्ति
के लिए लक्षणा करनी पड़ेगी, तथा सामानाधिकरण्य के कथित नियम
का भी उल्लंघन होगा, साथ ही प्रकरण विरोध आदि दोष होंगे ।
इयांस्तु विशेष:—नेदं रजतमितिवदप्रतिपन्नस्यैव वाधस्यागत्या
परिकल्पनम्, तत्पदेनाधिष्ठानातिरेकिधर्मानुपस्थापनेन वाधानु-
पत्तिश्च । अधिष्ठानंतु प्राक्तिरोहितस्वरूपं तत्पदेनोपस्थाप्यत इति
चेन्न, प्रागाधिष्ठानाप्रकाशे तदाश्रय भ्रमबाधयोरसंभवात् ।
भ्रमाश्रयमधिष्ठानमतिरोहितमिति चेत्, तदेवाधिष्ठान स्वरूपं
भ्रमविरोधीति तत्प्रकाशे सुतरां न तदाश्रय भ्रमबाधौ । अतोऽधि-
ष्ठानातिरेकि परमार्थिकधर्मतत्तिरोधानानभ्युपगमे भ्रांतिबाधौ
दुरुपपादौ । अधिष्ठाने हि पुरुषमात्राकारे प्रतीयमाने तदति-
रेकिणि पारमार्थिके राजत्वे तिरोहिते सत्येव व्याधात्वभ्रमः । राज-
त्वोपदेशेन च तन्निवृत्तिर्भवति, नाधिष्ठानमात्रोपदेशेन, तस्य
प्रकाशमानत्वेनानुपदेश्यत्वात् भ्रमानुपमर्दित्वाच्च ।

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एक विशेषता यह होगी कि-“यह रजत नही है” इस बाध्य
प्रतीति की तरह तत् त्वं पदों मे किसी प्रकार की बाधा न होते हुए भी
(अपने मत के प्रतिपादन के लिए) जबरन बाधा की परिकल्पना करनी
पड़ेगी । तत् पद से जिस चैतन्याधिष्ठान की प्रतीति होती है, उसमें
उससे भिन्न धर्म की उपस्थापना करने से बाधा उत्पन्न भी नही होती ।
यदि कहो कि-चैतन्याधिष्ठान के प्रथम अज्ञान तिरोहित रहता
है, बाद मे तत् पद से वह प्रकट हो जाता है; सो ऐसा नही है, बाधा
के पूर्व यदि अधिष्ठान प्रकाशित न रहेगा तो, आधार रहित भ्रम और
बाधा दोनों हो नही सकते । यदि कहो कि भ्रमाश्रय अधिष्ठान अतिरोहित
रहता है (केवल बाधा का आश्रय ही आवृत रहता है) सो भी असंभव
है, जब अधिष्ठान का स्वरूप ही भ्रम का विरोधी है तो वह अधिष्ठान
के प्रकाशित स्वरूप के समक्ष टिक भी कैसे सकता है । इससे सिद्ध होता
है, कि भ्रम और बाधा अधिष्ठान आश्रित नही हो सकते । उक्त वाक्य
में अधिष्ठान के अतिरिक्त किसी पारमार्थिक धर्म और उस धर्म के
तिरोधान को माने बिना भ्रम और बाधा का उपपादन करना सहज नही
है । पुरुष आकार वाले अधिष्ठान से भिन्न वास्तविक राजत्व के छिपे
रहने पर ही बाध्यत्व भ्रम होता है। राजत्व के उपदेश से ही उस
भ्रम की निवृत्ति होती है। केवल अधिष्ठान मात्र के उपदेश से नही
होती क्योंकि-अधिष्ठान तो प्रकाशित रहता ही है, उसके उपदेश
की अपेक्षा ही क्या' है उससे भ्रम की निवृत्ति हो भी नही सकती ।
जीवशरीर जगत्कारण ब्रह्मपरत्वे मुख्यवृत्तं पदद्वयं, प्रकार
द्वयविशिष्टैकवस्तुप्रतिपादनेन सामानाधिकरण्य च सिद्धम् । निरस्त
निखिलदोषस्यसमस्तकल्याणगुणात्मकस्य ब्रह्मणो जीवान्तर्यामित्व-
मप्यैश्वर्यमपरं प्रतिपादितं भवति । उपक्रमानुकूलता च । एक-
विज्ञानेन सर्वविज्ञानप्रतिज्ञोपपत्तिश्च, सूक्ष्मचिद्वस्तुशरीरस्यैव
ब्रह्मणः स्थूलचिदचिद्वस्तुशरीरत्वेन कार्यत्वात् “तमीश्वराणां
परममहेश्वरम्” पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयतो” अपहत पाप्मा...
सत्यकामसत्यसंकल्पः” इत्यादि श्रुत्यंतरा विरोधश्च ।
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जीव शरीरी, जगत के कारण परब्रह्म के मुख्यार्थ बोधक “तत्”
और “त्वं” दो पद हैं, एक ही विशिष्ट वस्तु दो प्रकारों से कही गई है,
यही इसका सिद्ध सामानाधिकरण्य है। समस्त दोष रहित कल्याणगुणा-
कर परब्रह्म की जीवान्तर्यामिता भी एक ऐश्वर्य है, उसका भी प्रतिपादन
किया गया है ऐसा मानने से ही उक्त प्रसंग का उपक्रम अनुकूल हो
सकता है तथा एक विज्ञान से सर्व विज्ञान की प्रतिज्ञा भी संगत हो सकती
है। सूक्ष्म जड़ चेतन वस्तु जैसे ब्रह्म का शरीर है स्थूल, जड़, चेतन भी
उसी प्रकार ब्रह्म का शरीर है, क्योंकि स्थूल, सूक्ष्म वस्तु का ही कार्य
रूप है। “ईश्वर सर्वश्रेष्ठ महेश्वर हैं” “परब्रह्म की अनेक शक्तियां
प्रसिद्ध हैं, वह निष्पाप, सत्यकाम, सत्यसंकल्प है” इत्यादि श्रुतियाँ भी
उक्त मान्यता से अविरुद्ध हैं।
‘तत्त्वमसि” इत्यत्रोद्देश्योपादेयविभागः कथमितिचेत् नात्र-
किंचिदुद्दिश्य किमपि विधीयते, ”ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्” इत्यनेनैव
प्राप्तत्वात्। अप्राप्ते हि शास्त्रमर्थवत्। इदं सर्वमिति सजीवं
जगन्निर्दिश्य ऐतदात्म्यमिति तस्यैषआत्मेति तत्र प्रतिपादित तत्र च
हेतुरुक्तः- “सन्मूलास्सौम्येमास्सर्वाः प्रजास्सदायतनास्सत्प्रतिष्ठाः”
इति, “सर्वं खल्विदंब्रह्म तज्जलानितिशान्तः” इतिवत् ।
यदि कहो कि-ऐसा मानने से “तत्त्वमसि” में उद्देश्य, विधेय का
विभाग कैसे होगा? सो यहाँ किसी के उद्देश्य से किसी की विधि नहीं
की गई है, “यह सब कुछ आत्म्य है” इस वाक्य से उक्त बात की पुष्टि
होती है। अप्राप्त विषय का प्रतिपादन करना ही शास्त्र का प्रयोजन
होता है। “इदं शरीरम्” से सजीव जगत का निर्देश करके ‘ऐतदात्म्यं’
से ब्रह्म को उसका आत्मा बतलाया गया है। “यह सब कुछ ब्रह्म स्वरूप
है, सब कुछ उसी से उत्पन्न, स्थित और विलीन है, उसी की शांतभाव
से उपासना करो” इस वाक्य में जैसे-साधक के शांतभाव अवलंबन के
लिए, ब्रह्म का सर्वमय भाव हेतु रूप से बतलाया गया है, वैसे ही वहीं-
“हे सौम्य ! सद् ब्रह्म ही समस्त जायमान पदार्थों का मूल आश्रय और
विलय स्थान है” इस वाक्य से हेतु द्वारा पूर्व विहित ब्रह्मात्मभाव का
समर्थन किया गया है।
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तथा श्रुत्यन्तराणि च ब्रह्मणस्तद्व्यतिरिक्तस्य चिदचिद्वस्तु-
नश्च शरीरात्मभावमेवतादात्म्यं वदंति—“अन्तः प्रविष्टः शास्ता
जनानांसर्वात्मा-“यः पृथिव्यांनिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न
वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवी अन्तरो यमयति स त आत्मा
ऽन्तर्याम्यमृतः”—“य आत्मनि तिष्ठन् नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद
यस्य आत्मा शरीरं य आत्मानमन्तरो यमयति स त आत्मा
अंतर्याम्यमृतः”—“यः पृथिवीमन्तरे संचरन्” इत्यारभ्य यस्यमृत्युः
शरीरम्, यं मृत्युनंवेद, एष सर्व भूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्यो
देव एको नारायणः” तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्, तदनुप्रविश्य
सच्चत्यच्चाभवत् इत्यादीनि ।
तथा अन्य श्रुतियां भी ब्रह्मातिरिक्त चित्‌जडात्मक वस्तु के
साथ ब्रह्म का शरीर शरीरी भाव रूप तादात्म्य बतलाती है—“सर्वात्मा
परमेश्वर अंतर्यामी रूप से जगत् का शासन करते हैं-“जो पृथिवी में
स्थित पृथिवी से भिन्न है, जिन्हें पृथिवी नहीं जानती, पृथिवी ही
जिनका शरीर है; जो अंतर्यामी रूप से पृथिवी का सयमन करते है, वही
अमृत अंतर्यामी तेरे आत्मा है। “जो आत्मा में स्थित आत्मा से
भिन्न हैं, आत्मा जिन्हें नहीं जानता, आत्मा जिनका शरीर है, जो
अंतर्यामी होकर आत्मा का संयमन करते है, वही अमृत अंतर्यामी
तेरे आत्मा हैं, जो कि पृथिवी में संचरण करते हैं”—यहाँ से प्रारम्भ
करके-“मृत्यु जिनका शरीर है, मृत्यु जिन्हें नहीं जानता, वह अंतर्यामी
निष्पाप दिव्य देव एक मात्र नारायण हैं”—“वह भूतों की सृष्टि करके
उनमें प्रविष्ट हो गए तथा कार्य कारण रूप से प्रकट हुए’, इत्यादि ।
अत्रापि “अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकर-
वाणि”इति ब्रह्मात्मकजीवानुप्रवेशेनैव सर्वेषां वस्तुत्वं शब्दवाच्यत्वं च
प्रतिपादितम् । “तदनु प्रविश्य सच्च त्यच्चाभवत् ‘ इत्यनेनैका-
र्थ्याज्जीवस्यापि ब्रह्मात्मकत्वं ब्रह्मानुप्रवेशादेवेत्यवगम्यते । अतश्चिच-
दश्चिदात्मकस्य सर्वस्यवस्तुजातस्यब्रह्मतादात्म्यात्मशरीरभावादेवेत्व-

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वगम्यते । तस्मात् ब्रह्मव्यतिरिक्तस्यकृत्स्नस्यतच्छरोरतवेनैव
वस्तुत्वात्तस्य प्रतिपादकोऽपि शब्दस्तत्पर्यन्तमेव स्वार्थमभिदधाति ।
अतः सर्वशब्दानां लोकव्युत्पत्यवगत तत्तत्पदार्थविशिष्ट ब्रह्माभि-
धायित्वसिद्धमिति "ऐतदात्म्यमिदं सर्वं" इति प्रतिज्ञातार्थस्य
"तत्त्वमसि" इति सामानाधिकरण्येन विशेष उपसंहारः ।

यहाँ भी-"इस जीव में आत्मरूप से प्रविष्ट होकर नाम और रूप
का विस्तार करूँ" इस वाक्य में ब्रह्मात्मक जीव के अन्तः करण के प्रवेश
से ही सभी वस्तुओं का अस्तित्व तथा शब्दवाच्यता बतलाई गई है।
"सत् च त्यत् च अभवत्" इस श्रुति के साथ उक्त श्रुति का अर्थसाम्य,
इसी अर्थ में होता है। जीव में ब्रह्म के अनुप्रवेश से ज्ञात होता है कि-
जीव ब्रह्मात्मक है। तथा यह भी ज्ञात होता है कि-चित् जड
सब कुछ ब्रह्म का शरीर है एवं ब्रह्म उन सब का आत्मा है, इस
शरीरात्मभाव से ही उनका तादात्म्य प्रतीत होता है। ब्रह्म से
भिन्न सब कुछ उसका शरीर है, इसीलिए उनकी सत्ता है उनके प्रति-
पादक वाक्य उक्त अर्थ के ही प्रतिपादक हैं, ऐसा मानना चाहिए।
लौकिक व्यवहारानुयायी व्युत्पत्ति के अनुसार लौकिक पदार्थ बोधक
शब्द तद्विशिष्ट ब्रह्म के ही प्रतिपादक होंगे। "ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्"
श्रुति से जो अर्थ प्रतिज्ञात होता हैं, "तत्त्वमसि "वाक्य में सामानाधि-
करण्य रूप विशेषण-विशेष्य भाव से उसी का उपसंहार हुआ है।

अतोनिर्विशेषवस्त्वैक्यवादिनो, भेदाभेद वादिन केवल भेद
वादिनश्च वैयधिकरण्येन सामानाधिकरण्येन च ब्रह्मात्मभावोपदेशाः
सर्वे परित्यक्ताः स्युः । एकस्मिन् वस्तुनि कस्य तादात्म्यमुपदिश्यते ?
तस्यैवेति चेत्, 'तत्त्व वाक्येनैवावगतमिति न तादात्म्योपदेशा-
वसेयमस्ति किंचित् । कल्पित निरसनमिति चेत्, तन्न सामानाधि-
करण्यतादात्म्योपदेशावसेयमित्युक्तम् । सामानाधिकरण्यं तु ब्रह्मणि
प्रकारद्वयप्रतिपादनेन् विरोधमेवाऽवहेत् । भेदाभेदवादे तु ब्रह्मण्ये-

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वोपाधिसंसर्गात् तत्प्रयुक्ता जीवगतादोषा ब्रह्मण्येव प्रादुःष्यु-
रिति निरस्तनिखिलदोषकल्याणगुणात्मकब्रह्मात्मभावोपदेशा हि
विरोधादेव परित्यक्तास्स्युः । स्वाभाविक भेदाभेदवादेऽपि
ब्रह्मणस्स्वत एव जीवभावाभ्युपगमात् गुणवद्दोषाश्च स्वाभाविका
भवेयुरिति निर्दोषब्रह्मतादात्म्योपदेशो विरुद्ध एव । केवल
भेदवादिनां चात्यन्तभिन्नयोः केनापि प्रकारेणैक्यासंभवादेव
ब्रह्मात्मभावोपदेशा न संभवंतीति सर्ववेदांत परित्यागस्स्यात् ।
स्वयं श्रुति ने ही जब, ब्रह्म को शरीरी तथा जगत को उसका
शरीर बतलाया है, तब चाहे सामानाधिकरण्यभाव से हों या वैधिकरण्य
भाव से हो, सारे ही ब्रह्मात्मभाव के उपदेश, निर्विशेषवस्त्वैक्यवादी,
भेदाभेदवादी और केवल भेदवादी, इन सभी के लिए त्याज्य है (अर्थात्
तीनों ही वाद उन उपदेश वाक्यों का सांमजस्य नही कर पाते)
जग विचार करें-एक ही (अद्वैत) वस्तु मे किसके तादात्म्य की
बात कही जा सकती है ? यदि उसी एक के ही तादात्म्य को मानें सो तो
ब्रह्म के स्वरूप बोधक “सत्यं ज्ञानमनंत ब्रह्म ”इत्यादि वाक्यो से ही ज्ञात
है, पुनः तादात्म्योपदेश फिर निष्प्रयोजन सिद्ध होगा । अज्ञानकल्पित भेद
के निराकरण के लिए तादाम्योपदेश किया गया है, ऐसा भी नही कह
सकते, क्योंकि-सामानाधिकरण्य या तादात्म्योपदेश से कल्पित भेद का
निराकरण संभव नही है। सामानाधिकरण्य तो ब्रह्म संभाव्य दो प्रकार
के प्रतिपादन संबंधी विरोध का परिहार करता है ।
जो भेदाभेदवादी ब्रह्म में उपाधिसंबंध बतलाते है और उस
उपाधि से ही जीव में जीवत्व की उपस्थिति स्वीकारते है तब तादात्म्य
संबंध मानने से जीवगत कामादि दोष भी ब्रह्म में संक्रामित होंगे । समस्त
दोष रहित कल्याण गुणात्मक ब्रह्मात्म भावोपदेश उक्त (औपाधिकभेदाभेद
वाद) मत से विरुद्ध ही पड़ते हैं । अतएव उक्त मत से परित्यक्त है ।
जो भेदाभेदवादी, ब्रह्म के जीवभाव को स्वाभाविक मानते है,
तो मानो वे जीवगत गुण और दोष दोनों को ही स्वाभाविक मानते
[email protected]

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है, ऐसे सदोष जीव के साथ, निर्दोष ब्रह्म का तादात्म्योपदेश सर्वथा
विरुद्ध है ।
जो केवल भेदवादी हैं, उनके मत से तो अत्यंत भिन्न तत्त्व जीव
और ब्रह्म के तादात्म्य का कोई प्रश्न ही नहीं हैं, उसमें तो ब्रह्मात्मभावो-
पदेश संभव ही नहीं है । अतएव तादात्म्यभाव संबंधी सारे ही वेदांत
वाक्य इन लोगों के मत से परित्यक्त हैं ।
निखिलोपनिषत्प्रसिद्धं कृत्स्नस्यब्रह्मशरीरभावमातिष्ठमानैः
कृत्स्नस्य ब्रह्मात्मभावोपदेशास्सर्वे सम्यगुपपादिता भवति ।
जातिगुणयोरिव द्रव्याणामपि शरीरभावेन विशेषणत्वेन "गौरश्वो-
मनुष्योदेवोजातः पुरुषः कर्मभि." इति सामानाधिकरण्यं लोक-
वेदयोर्मुख्यमेव दृष्टचरम् । जातिगुणयोरपि द्रव्यप्रकारत्वमेव
“षण्डो गौ” शुक्लः पट.” इति सामानाधिकरण्यनिबन्धनम्-
मनुष्यत्वादिविशिष्टपिण्डानाम्प्यात्मनः प्रकारतयैव पदार्थत्वात्
“मनुष्यः पुरुषः षण्डो योषिदात्मजात.” इति सामानाधिकरण्यं
सर्वत्रानुगतमिति प्रकारत्वमेव सामानाधिकरण्यनिबन्धनम्, न
परस्परव्यावृत्ता जात्यादयः । स्वनिष्ठानामेव हि द्रव्याणां कदा-
चित् क्वचिद् द्रव्यविशेषणत्वे मत्वर्थीय प्रत्ययोदृष्टः “दण्डी
कुण्डली” इति, न पृथक् प्रतिपत्तिस्थित्यनर्हाणां द्रव्याणां, तेषां
विशेषणत्वं सामानाधिकरण्यावमेयमेव ।
जो लोग सभी उपनिषदों में प्रसिद्ध समस्त वस्तुओं को ब्रह्म का शरीर
मानते हैं, उनके मत में ब्रह्मात्मभावोपदेश सही रूप में संगत होते हैं।
मनुष्य आदि जाति और शुक्लता आदि गुण जैसे विशेषण हैं, वैसे ही
सारे पदार्थ शरीर रूप से आत्मा के विशेषण हो सकते हैं। "कर्मानुसार
आत्मा, गाय घोड़ा, देव, मनुष्य आदि रूपों से होता है" ऐसा सामाना-
धिकरण्यघटित प्रयोग, लोक व्यवहार और वेद प्रयोग, सभी जगह
मुख्य रूप से प्रयुक्त होता है "सांड़ गाय" "श्वेत वस्त्र" इत्यादि में जो

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षण्डत्व जाति और शुक्लतागुण, गो और वस्त्र के विशेषण रूप से प्रयुक्त
होते हैं वह भी सामानाधिकरण्य के नियम से ही होते हैं। मनुष्य आदि
जाति विशिष्ट देह पिण्ड भी आत्मा के प्रकार या विशेषण ही हैं।
“आत्मा मनुष्य पुरुष षण्ड और स्त्री रूप से हुआ” इत्यादि वाक्यों में
किया गया आत्मा और देह पिण्ड का सामानाधिकरण्य व्यवहार, प्रकार
रूपी सामानाधिकरण्य संबंधी है। परस्परव्यावृत्त जातिगुण संबंधी नहीं
है। कहीं कही समस्त द्रव्य विशेषण रूप से अन्य द्रव्य के आश्रित होकर
मत्वर्थीय प्रत्यय के सहयोग से प्रयुक्त होते हैं, जैसे कि—“दण्डी कुण्डली”
इत्यादि। स्वतंत्रभाव से अवस्थित स्वतंत्रभाव से विभिन्न आकारों में
प्रतीत द्रव्यों की विशेषणता सामानाधिकरण्य से ही व्यवस्थापित होती है।
यदि “गौरश्वो मनुष्यो देवः पुरुषो योषित् षण्ड आत्मा कर्मभिः
जातः” इत्यत्र “षण्डो मुण्डो गौः शुक्ल पटः “कृष्ण पटः “इति जाति
गुणवदात्मप्रकारत्वं मनुष्यादिशरीराणामिष्यते, तर्हि जाति
व्यक्त्योरिव प्रकारप्रकारिणोः शरीरात्मनोरपि नियमेन सह प्रति-
पत्तिः स्यात्, न चैवं दृश्यते । नहि नियमेन गोत्वादिवदात्माश्रयत
यैवाऽत्मना सह मनुष्यादिशरीरं पश्यंति। अतो “मनुष्य आत्मा”
इति सामानाधिकरण्यं लाक्षणिकमेव। नैतदेवम्, मनुष्यादि
शरीराणां अपि आत्मैकाश्रयत्वम्, तदेक प्रयोजनत्वं, तत्प्रकारत्वं
च जात्यादि तुल्यम् । आत्मैकाश्रयत्वं आत्मविश्लेषे शरीरस्य
विनाशादवगम्यते। आत्मैकप्रयोजनत्वं च तत्कर्मफल भोगार्थ
तयैव सद्भावात् । तत्प्रकारत्वमपि “देवो मनुष्यः” इत्यात्म
विशेषणतयैत प्रतीतेः । एतदेव हि गवादि शब्दानां व्यक्ति पर्यन्तत्वे
हेतुः। एतस्स्वभावविरहादेव दंडकुंडलादीनां विशेषणत्वे “दंडी
कुंडली” इति मत्वर्थीय प्रत्ययः । देवमनुष्यादि पिंडानामात्मैका-
श्रयत्वतदेकप्रयोजनत्वतत्प्रकारत्व स्वभावात् “देवो मनुष्य
आत्मा” इति लोकवेदयोः सामानाधिकरण्येन व्यवहारः जाति-
व्यक्त्योर्नियमेन सह प्रतीतिरुभयोश्चाक्षुषत्वात्। आत्मनस्त्वचक्षुषत्वा-
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च्चक्षुषा शरीरग्रहणवेलायामात्मानं गृह्यते । पृथग्ग्रहण योग्यस्य
प्रकारतैकस्वरूपत्वं दुर्घटमिति मा वोचः जात्यादिवत् तदेकाश्रयत्व-
तदेकप्रयोजनत्वतद्विशेषणत्वैः शरीरस्यापि तत्प्रकारतैक स्वभाव-
त्वावगमात् । सहोपलम्भनियमस्त्वेकसामग्रीवेद्यत्वनिबंधन
इत्युक्तम् । यथा चक्षुषा पृथिव्यादेर्गंधरसादिसंबंधित्वं स्वाभा-
विकमपि न गृह्यते, एवं चक्षुषा गृह्यमाणं शरीरात्मप्रकारतैक-
स्वभावमपि न तया गृह्यते आत्मग्रहणे चक्षुषः सामर्थ्याभावात्
नैतावताशरीरस्य तत् प्रकारत्वस्वभावविरहः । तत्प्रकारतैकस्व-
भावत्वमेव सामानाधिकरण्य निबन्धनं, आत्मप्रकारतया प्रतिपादन
समर्थस्तु शब्दस्तथैव प्रकारतया प्रतिपादयति ।
आशंका होती है कि— 'गो, अश्व, मनुष्य, देव, स्त्री, पुरुष, षण्ड
आदि आत्मा कर्मों से होते हैं" इस वाक्य में "षण्ड मुण्ड गाय"
शुक्ल पट “कृष्ण पट" आदि जाति गुण की तरह, यदि मनुष्य आदि
शरीर की प्रकारता मानी जाय तो, विशेषण-विशेष्य भावापन्न मनुष्यत्व
आदि जाति और मनुष्य आदि व्यक्ति की तरह, प्रकार शरीर और
प्रकारी आत्मा की सह प्रतिपत्ति (एक साथ प्रतीति) होने लगेगी । जो
कि कहीं भी दृष्टिगत नहीं होती । गोत्व आदि जाति विशिष्ट रूप में जैसे-
गो आदि के शरीर का व्यवहार होता है, वैसे मनुष्य आदि के शरीर को
कोई, कभी आत्मनिष्ठ मानकर आत्मा से अभिन्न रूप से व्यवहार नहीं
करता । इसलिए 'मनुष्य आत्मा है" ऐसा सामानाधिकरण्य (आत्मा
शरीर का अभेद व्यवहार) लाक्षणिक (गौण) है ।
(समाधान) यह बात ऐसी नहीं है; जाति और गुण की तरह
मनुष्यादि शरीर भी एकमात्र आत्माश्रित, आत्मप्रयोजनीय और आत्मा
के प्रकार मात्र हैं । मनुष्यादि शरीर आत्माश्रित हैं, ऐसा, आत्मा के
विश्लेष होने पर शरीर के विनाश से ज्ञात होता है। आत्मकृति विशेष
कर्मों के भोग के लिए ही शरीर की सृष्टि या अस्तित्व होता है, यही
शरीर की आत्मैक प्रयोजनीयता है। देव मनुष्य आदि आत्मा के विशेषणों
से शरीर की प्रकारता प्रतीत होती है । गो आदि शब्द केवल आत्मा के
ही बोधक नहीं, व्यक्ति बोधक भी हैं। इसमें उक्त तीनों ही हेतु हैं।

( २०० )
ऐसा सम्बन्ध न होने से, दंड कुंडल आदि पद, विशेषण होते हुए भी,
मत्वर्थीय प्रत्यय के योग से दंडी कुंडली रूप विशेषण-विशेष्य भाव के
प्रयोग बनते हैं। देव मनुष्य आदि के शरीर स्वभावतः आत्मा के आश्रित,
आत्मा के प्रयोजन से प्रयोजित, तथा आत्मा के ही प्रकार होते हैं, इसी-
लिये लोक और वेद में देवात्मा, मनुष्य आत्मा आदि सामानाधिकरण्य
प्रयोग होते हैं। जाति और व्यक्ति (देह) दोनों का ही चाक्षुष प्रत्यक्ष
होता है, इसीलिए सदा दोनों की एक साथ प्रतीति होती है। आत्मा का
चाक्षुष प्रत्यक्ष होता नहीं, शरीर का ही एकमात्र प्रत्यक्ष होता है
(इसीलिए दोनों की सदा पृथक् प्रतीति होती है) पृथक् प्रतीतिगम्य
पदार्थों की प्रकारता संभव नहीं होती, ये नहीं कहा जा सकता, क्योंकि--
एकमात्र आत्मा के आश्रित एवं प्रयोजन साधक तथा आत्मा के विशेषण
जात्यादि की तरह, शरीर भी आत्मा का स्वाभाविक प्रकार प्रतीत होता
है। जहाँ दो का प्रत्यक्ष एक ही कारण से होता है, वहाँ सहोपलम्भ का
नियम (एक साथ प्रतीति) होता है ऐसा पहले भी कह चुके हैं। जैसे कि
पृथिवी के स्वाभाविक गुण, गंध आदि का, पृथिवी के प्रत्यक्ष काल में,
चाक्षुष प्रत्यक्ष नही होता; वैसे ही शरीर आत्मा का विशेषण है, पर
शरीर के प्रत्यक्ष के समय, आत्मा का प्रत्यक्ष नहीं होता, क्योंकि-नेत्रों में
आत्मा के प्रत्यक्ष का अभाव है। एक साथ प्रतीति न होने मात्र से,
शरीर की स्वाभाविक आत्म प्रकारता का अभाव नहीं हो सकता।
आत्म विशेषण होने से ही, शरीर आत्मा का अभेद व्यवहार होता है;
शब्द ही शरीर की आत्मविशेषणता का प्रतिपादन करने में समर्थ हैं,
शब्द ही शरीर को आत्मा का प्रकार बतलाता है।
ननु च शब्देऽपि व्यवहारे शरीरशब्देनशरीरमात्रं गृह्यत इति
नात्मपर्यन्तता शरीर शब्दस्य । नैवम् आत्मप्रकार भूतस्यैव शरीरस्य
पदार्थविवेक पदर्शनाय निरूपणान्निष्कर्षशब्दोऽयम्, यथा “गोर्द्रव्यं
शुक्लत्वमाकृतिर्गुणः” इत्यादि शब्दाः।
(शंका) शब्द व्यवहार में तो शरीर शब्द से केवल देह मात्र का
ही बोध होता है, शरीर शब्द का आत्मापर्यन्त बोध तो होता नहीं ?
(समाधान) नहीं; शरीर आत्मा का विशेषण है इसीलिये पदार्थ
कहलाता है (आत्मा के बिना शरीर का कोई अस्तित्व ही नहीं रहता)
[email protected]

( २०१ )
“शरीर” शब्द आत्मा का ही निष्कर्ष (परिचायक) है, जैसे कि-गोत्व
शुक्लता आदि आकृति गुण वाचक शब्द हैं ।
अतो गवादि शब्दवद्देवमनुष्यादिशब्दा आत्मपर्यन्ताः एवं
देवमनुष्यादि पिंडविशिष्टानां जीवानां परमात्मशरीरतया तत्प्रकार-
त्वात् जीवात्मवाचिनः शब्दाः परमात्मपर्यन्ताः । अतः परस्य ब्रह्मणः
प्रकारतयैव चिदचिद्वस्तुनः पदार्थत्वमिति तत्सामानाधिकरण्येन
प्रयोगः । अयमर्थो वेदार्थसंग्रहे समर्थितः । इदमेव शरीरात्मभाव
लक्षणं तादात्म्यं “आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राहयन्ति च” इति वक्ष्यति;
“आत्मेत्येव तु गृह्णीयात्” इति च वाक्यकारः ।
गो आदि शब्द की तरह देव मनुष्य आदि शब्द आत्मापर्यन्त अर्थ
के वाचक हैं । ऐसे ही देव मनुष्य आदि पिण्ड विशिष्ट जीव, परमात्मा के
शरीर होने से, उन्हीं के प्रकार हैं इसलिए जीवात्मा वाची शब्द परमात्मा
पर्यन्त अर्थ के वाचक हैं परब्रह्म के प्रकार होने से ही चिद् अचिद्
वस्तुओं की पदार्थता है, इसीलिए उनका परमात्मा के साथ सामानाधि-
करण्य (अभेद सम्बन्ध) भाव से प्रयोग होता है । इस विषय का हमने अपने
वेदार्थ संग्रह में समर्थन किया है । इसी शरीरात्मभाव लक्षण तादात्म्य
को सूत्रकार “आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राहयंति च” सूत्र में बतलाते हैं,
“आत्मेत्येवतु गृह्णीयात्” ऐसा वाक्यकार का भी कथन है ।
अत्रेदं तत्त्वम्-अचिद् वस्तुनः, चिद वस्तुनः परस्य च ब्रह्मणो,
भोग्यत्वेन, भोक्तृत्वेन, चेशितृत्वेन च स्वरूप विवेकमाहुः काश्चन
श्रुतयः “अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्त्तस्मिंश्चान्यो मायया सन्निरुद्धः”
“मायां तु प्रकृतिं विद्धि मायिनं तु महेश्वरम्” “क्षरं प्रधानममृताक्षरं
हरः क्षरात्मा नावीशते देव एकः”, अमृताक्षरं हर इति भोक्ता
निर्दिश्यते, प्रधानमात्मनो भोग्यत्वेन, हरतीति हरः। “स कारणं
कारणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः”, प्रधानं
क्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः”, पति विश्वस्यात्मेश्वरं शाश्वतं शिवमच्युतं”;
ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशनीशौ”; नित्यो नित्यानां चेतनः चेतनानां एको
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( २०६ )
बहूना यो विदधाति कामान् ", भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा",
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति", पृथगात्मानं
प्रेरितारं च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति", अजामेकां लोहित
शुल्क कृष्णां वह्वीं प्रजां जनयंतीं सरूपाम् अजोह्येको जुषमाणोऽ-
नुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यो", “समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नो
अनीशया शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य
महिमानं इति वीतशोकः" इत्याद्याः ।
यहाँ तत्त्व ये है कि-जगत् में तीन पदार्थ हैं, अचित् (जड़) चित्
(जीव) और परब्रह्म । जो कि क्रमशः भोग्य भोक्ता और परिचालक
(ईश्वर) है । ऐसा कुछ श्रुतियों ने स्वरूप विभाग किया है-“मायाधीश
इसको लेकर ही जगत की सृष्टि करते है, इस जगत में दूसरा आत्मा
जीव, माया से सान्नरुद्ध (मायाधीन) है । माया को प्रकृति तथा मायी
को महेश्वर जानो । क्षर सब माया है, अक्षर अमृत है एक देव क्षर अक्षर
का शासन करते हैं । “अमृताक्षरं हरः" में भोक्ता (जीव) का निर्देश है;
जो अपने लिए प्रधान भोग्य माया को हरण अर्थात् आयत्त करता है,
वही हर है "
वह सबका कारण, देह इन्द्रिय आदि के अधिपति जीव का भी
अधिपति है, इसका कोई भी जनक और स्वामी नहीं है । वह प्रधान
(माया) क्षेत्रज्ञ (जीव) और गुणों का स्वामी है । वह विश्वपति, आत्मा
का ईश्वर, नित्य एक रूप, कल्याणमय और अच्युत है । दो अजन्मा हैं,
उसमें एक ज्ञ (परमात्मा) दूसरा अज्ञ (जीव) है, एक ईश दूसरा अनीश
है । जो नित्यों का नित्य, चेतनों का चेतन, अकेला ही अनेक कामनाओं
का विधान करता है । भोक्ता (जीव) भोग्य जगत प्रेरिता ईश्वर को
जानकर ही। उन दोनों में एक सुस्वादु कर्मफल का आस्वाद करता है,
दूसरा आस्वाद न करके केवल देखता ही है । जीव अपने से पृथक् और
प्रेरक ईश्वर का मनन करके एवं उसका अनुग्रह प्राप्त कर अमृतत्व प्राप्त
करता है । अपने अनुरूप अनेक प्रकार की सृष्टि करने वाली, लाल श्वेत,
कृष्ण वर्णवाली, जन्म रहित प्रकृति का एक अज (जीव) प्रीति पूर्वक
अनुसरण करता है, दूसरा अज (मुक्तात्मा) यथोपयुक्त इसका भोग करके
परित्याग कर देता है । जीव, परमात्मा के साथ देह रूप एक ही वृक्ष पर
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( १०३ )
अवस्थित मोहित होकर शोक दुःख का भोग करता है। भक्तियुक्त जीव
जब अन्य परमात्मा का दर्शन करता है, तब वीत शोक होकर उसकी
महिमा को प्राप्त करता है।" इत्यादि।
स्मृतावपि— "अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे परां, जीवभूतां महाबाहो ययेदं
धार्यते जगत्। सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यांति ममिकाम्, कल्पक्षये
पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्। प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि
पुनः पुनः, भूतग्राममिमंकृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्। मयाऽध्यक्षेण
प्रकृतिः सूयते सचराचरम् हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद् हि परिवर्त्तते।
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि। ममयोनिर्महद् ब्रह्म
तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्, संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत।"
इति।
जगद् योनिभूतं महत् ब्रह्म मदीयं प्रकृत्याख्यं भूतसूक्ष्मं अचिद्
वस्तु यत्, तस्मिंश्चेताख्यं गर्भं यत् संयोजयामि ततो मत्कृतात्
चिदचिद् संसर्गात् देवाद स्थावरान्तानामचिन्मिश्राणां सर्वभूतानां
संभवो भवतीत्यर्थः।
स्मृति में भी ऐसा उल्लेख है—"पंच महाभूत मन, बुद्धि, अहंकार
आदि आठ विभागों में विभक्त प्रकृति को मेरी अपरा (बहिरंग) प्रकृति
समझो। इस प्रकृति से भिन्न मेरी एक परा प्रकृति भी है जो कि जीव
स्वरूपा है, उसी से यह जगत विधृत है। प्रलय के समय समस्त भूत मेरी
प्रकृति में लीन हो जाते हैं, सृष्टि के आदि में मैं उसे पुनः प्रकट कर देता
हूँ। अपनी प्रकृति की सहायता से पुनः पुनः सृष्टि करता हूं, यह सारे
भूत समुदाय प्रकृति के वशीभूत रहते हैं। मेरी अध्यक्षता में यह प्रकृति
जड़ चेतन सारे जगत का प्रसव करती है, इसी से जगत् का परिचालन
होता रहता है। प्रकृति और पुरुष दोनों को ही अनादि समझो। अपने
अभिव्यक्ति स्थान महद् ब्रह्म (व्यापक प्रकृति) में मैं गर्भ स्थापन करता
हूँ, उसीसे समस्त भूतों की उत्पत्ति होती है।" इत्यादि
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( २०४ )
अर्थात् मेरी प्रकृति नामक भूतसूक्ष्म रूप जो जड़ वस्तु है, उसीमें
मैं चेतनात्मक गर्भ संयोजन करता हूं, मेरे द्वारा सृष्ट चेतन, अचेतन के
संसर्ग से देव से स्थावर तक जड़ चेतन समन्वित समस्त भूतों की सृष्टि
होती है ।
एवं भोक्तृभोग्यरूपेणावस्थितयोः सर्वावस्थावस्थितयोः चिद-
चितोः परमपुरुष शरीरतया तन्नियाम्यत्वेन तदपृथक् स्थिति
परंपुरुषस्य चात्मत्वमाहुः काश्चन श्रुतयः— “यः पृथिव्यां तिष्ठन्
पृथिव्या अंतरो यं पृथिवीं न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवो
मंतरो यमयति “इत्यारभ्य” य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा
न वेद यस्यात्मा शरीरं य आत्मानमन्तरो यमयति स त आत्माऽन्त-
र्याम्यमृतः "इति । तथा- - “यः पृथिवीमन्तरे संचरन्यस्य पृथिवी
शरीरं यं पृथिवो न वेद ‘इत्यारभ्य” योऽक्षरमंतरे संचरन्यस्याक्षरं
शरीरं यमक्षरं न वेद, यो मृत्युमन्तरे संचरन्यस्य मृत्युः शरीरं य
मृत्युं न वेद एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्योदेव एको
नारायणः” अत्र मृत्यु शब्देन तमः शब्द वाच्यं सूक्ष्मावस्थं अचिद्-
वस्त्वभिधीयते । अस्यामेवोपनिषदि- - “अव्यक्तमक्षरे लीयते, अक्षरं
तमसिलीयते” इतिवचनात् । “अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानां
सर्वात्मा” इति च ।
चेतन जीव भोक्ता और अचेतन वस्तु भोग्य है, इस प्रकार भोक्ता
भोग्य रूप से अवस्थित सभी अवस्थाओं में सदा एक से स्थित चित् और
अचित् परम पुरुष भगवान के ही शरीर हैं और उसी के द्वारा परिचा-
लित हैं, इनमें पृथक् रूप से स्थित रहने का सामर्थ्य भी नहीं है, इसीलिए
श्रुतियां परमपुरुष को आत्मा रूप से निर्देश करती हैं— “जो पृथिवी में
रह कर भी पृथिवी से भिन्न है, जिसे पृथिवी नहीं जानती, पृथिवी ही
जिसका शरीर है, जो अन्तर्यामी रूप से उसका संयमन करता है ।” यहाँ
से प्रारम्भ करके- - “जो आत्मा में स्थित भी उससे पृथक है, आत्मा जिसे
नहीं जानता आत्मा ही जिसका शरीर है, जो अन्तर्यामी होकर आत्मा
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का संयमन करता है वही तेरा अन्तर्यामी अमृत आत्मा है।” तथा
—“जो पृथिवी के अन्दर विचरण करता है, पृथिवी जिसका शरीर है,
पृथिवी उसे नहीं जानती” यहाँ से प्रारंभ करके—“जो मृत्यु में विचरण
करता है, मृत्यु जिसका शरीर है, मृत्यु जिसे नहीं जानता, वही समस्त
भूतों के अंतरात्मा निष्पाप दिव्य देव एक नारायण हैं।” यहाँ तक। इस
प्रसंग में मृत्यु शब्द तमः शब्द वाच्य सूक्ष्मावस्थापन्न अचित् वस्तु का
वाचक है; उक्त उपनिषद् में ही इसे तम शब्द वाच्य कहा गया है—
“अव्यक्त अक्षर में लीन होता है, अक्षर तम में लीन होता है,” वह सभी
का शासक अन्तर्यामी आत्मा है” इत्यादि।
एवं सर्वावस्थावस्थितचिदचिद्वस्तुशरीरतया तत्प्रकारः
परमपुरुष एव कार्यावस्थाकारणावस्थजगद्रूपेणावस्थित इति
इममर्थं ज्ञापयितुं काश्चन श्रुतयः कार्यावस्थंकारणावस्थं च जगत्
स एवेत्याहुः--“सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तदैक्षत
बहुस्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत्” इत्यारभ्य “सन्मूलाः सोम्य
इमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः, ऐतदात्म्यमिदं सर्वं
तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो” इति। तथा “सोऽकामयत,
बहुस्यां प्रजायेयेति, स तपोऽतप्यत, स तपस्तप्त्वा इदंसर्वमसृजत”
इत्यारभ्य--“सत्यं चानृतं च सत्यमभवत्” इत्याद्याः।
इस प्रकार सभी अवस्थाओं में अवस्थित चिद् अचिद् सारे ही
पदार्थ उसी परमपुरुष के शरीर होने से उसी के प्रकार हैं। कारणावस्थ
और कार्यावस्थ समस्त चेतन अचेतन जगत में वह परमात्मा ही स्थित
रहता है, इसलिए कुछ श्रुतियाँ जगत की कारणावस्था और कार्यावस्था
को परमात्मा की ही अवस्था बतलाती है—“हे सौम्य ! यह सब सृष्टि
के पूर्व एक अद्वितीय सत् ही था, उसने इच्छा की, अनेक रूपों में प्रकट
हो जाऊँ, उसने तेज की सृष्टि की” यहाँ से प्रारंभ करके--“हे सौम्य !
सद्ब्रह्म ही समस्त जायमान पदार्थों का मूल कारण है, आश्रय और
विलय स्थान है, यह सारा जगत आत्म्य है, सब कुछ सत् है, वही आत्मा
है, हे श्वेतकेतु ! तुम भी वही आत्म्य हो।” तथा—“उसने कामना की
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बहुत होकर जन्म लूं, उसने तप करके सारे जगत की सृष्टि की" ऐसा
प्रारभ करके—"सत् स्वरूप ब्रह्म ही सत्य और असत्य हुआ" इत्यादि।
अत्रापि श्रुत्यन्तरसिद्धश्चिदचितोः परमपुरुषस्य च स्वरूप-
विवेक. स्मारितः—"हंताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनाऽत्म-
नाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि" इति—"तत्सृष्ट्वा तदेवानु
प्राविशत्, तदनु प्रविश्य सच्चत्यच्चाभवत् विज्ञानं चा विज्ञानं च
सत्यं चानृतं च सत्यमभवत्" इति च । "अनेन जीवेनात्मनानु
प्रविश्य" इति जीवस्य ब्रह्मात्मकत्वम्, "तदनु प्रविश्य सच्चत्य-
च्चाभवत्" विज्ञानं चाविज्ञानं च—' इति अनेनैकार्थ्यात् आत्म-
शरीरभावनिबंधनमिति विज्ञायते । एवंभूतमेव नामरूप व्याकरणं"
तद्वेदं तर्हि अव्याकृतमासीत्, तन्नामरूपाभ्यां व्याक्रियत "इत्यत्रा-
प्युक्तम् । अतः कार्यावस्थ.कारणावस्थश्च स्थूलसूक्ष्मचिदचिद्वस्तु
शरीरः परंपुरुष एवेति; कारणात् कार्यस्यानन्यत्वेन कारण-
विज्ञानेन कार्यस्य ज्ञाततयैक विज्ञानेन सर्वं विज्ञानं समीहितमुप-
पन्नतरम् । "अहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य
नामरूप व्याकरवाणि" इति "तिस्रो देवता" इति सर्वमचिद् वस्तु
निर्दिश्य तत्र स्वात्मक जीवानुप्रवेशेन नामरूप व्याकरणवचनात्
सर्वे वाचकाः शब्दाः अचिद् विशिष्ट जीवविशिष्ट परमात्मन
एव वाचका इति, कारणावस्थपरमात्मवाचिना शब्देन कार्यवाचिनः
शब्दस्य सामानाधिकरण्य मुख्यवृत्त, अतः स्थूलसूक्ष्मचिदचित्प्रकारं
ब्रह्मैव कार्यकारण चेति ब्रह्मोपादानं जगत् । सूक्ष्मचिदचिद् वस्तु
शरीरकं ब्रह्मैव कारणमिति ।
अन्य श्रुतियों मे जो परमपुरुष के जडचेतन स्वरूप का विवरण
किया गया है, उसका स्मरण उक्त प्रसग मे भी किया गया है—जैसे कि—
"मैं जीवात्मा रूप से इन तीनो भूतो के अन्दर प्रविष्ट होकर नाम रूप
अभिव्यक्ति करूँगा, उसने उसकी सृष्टि कर उसी में प्रवेश किया और
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सत् (परोक्ष) और त्यत् (अपरोक्ष) हुआ तथा विज्ञान चेतन) अविज्ञान
(जड़) एवं सत्य और अनृत हुआ ।” यहाँ “अनेन जीवेन” इत्यादि से
जीव की ब्रह्मात्मकता तथा “सच्चत्यच्चा”, विज्ञानंचाविज्ञानं इन दो
विभिन्नताओं से आत्मशरीर भाव निबंधन ज्ञात होता है । इसी प्रकार
नाम रूप की व्याकृति—‘‘सृष्टि के पूर्व यह अव्यक्त था, वही सृष्टि के
बाद नाम रूप में अभिव्यक्त हुआ” इस वाक्य में कही गई है । इससे ज्ञात
होता है कि-कार्यरूप और कारणरूप से स्थित स्थूल सूक्ष्म, जड़चेतन
वस्तु, परंपुरुष परमात्मा का ही शरीर है । कार्य कभी कारण से भिन्न
हो नहीं सकता, कारण स्वरूप परमात्मा को जान लेने से, कार्यरूप सारे
जगत का ज्ञान हो जाता है, इस प्रकार एक विज्ञान से सर्वविज्ञान की
बात भी संगत हो जाती है ।
“इन तीनों देवताओं में आत्मा रूप से प्रविष्ट होकर नामरूप को
अभिव्यक्त करूँगा” इस वाक्य में “तीनों देवता” पद से समस्त अचित्
(जड़) वस्तु का निर्देश करके, स्व स्वरूप जीवानुप्रवेश से नाम रूप की
अभिव्यक्ति कही गई है; इससे ज्ञात होता है कि-सारे ही वाचक
(अर्थबोधक) शब्द, अचिद् विशिष्ट और जीव विशिष्ट, परमात्मा के ही
वाचक है । इस प्रकार कारणावस्थ परमात्मा बोधक शब्द ‘तत्” के
साथ, कार्यावस्थ बोधक शब्द “त्वं” का सामानाधिकरण्य (अभेदोक्ति)
अबाधरूप से संपन्न होता है । इससे जानना चाहिए कि-स्थूल-सूक्ष्म,
जड़-चेतन सारा जगत ब्रह्म का प्रकार है, ब्रह्म स्वयं ही कारण और कार्य
रूप है एवं समस्त जगत का उपादान कारण है । सूक्ष्म जड़ चेतन शरीर
वाला ब्रह्म ही, स्थूल जड़चेतन का कारण है ।
ब्रह्मोपादानत्वेऽपि संघातस्योपादानत्वेन चिदचितोर्ब्रह्मणश्च
स्वभावासंकरोऽप्युपपन्नतरः । यथा शुक्लकृष्णरक्ततंतुसंघातोपादान-
त्वेऽपि चित्रपटस्य तत्तत्तंतुप्रदेश एव शौक्ल्यादि संबंध इति
कार्यावस्थायामपि भोक्तृत्वभोग्यत्वनियंतृत्वाद्यसंकरः । तंतुनांपृ-
थक्स्थितियोग्यानामेव पुरुषेच्छया कदाचित्संहतानां कारणत्वं
कार्यत्वं च । इहतु चिदचितोः सर्वावस्थयोः परमपुरुषशरीरत्वेन
तत्प्रकारतयैव पदार्थत्वात्तत्प्रकारः परमपुरुषः सर्वदा सर्वशब्दवाच्य
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इति विशेषः स्वाभावभेदः तदसंकरश्च तत्र चात्र न तुल्यः । एवं
च सति परस्य ब्रह्मणः कार्यानुप्रवेशेऽपि स्वरूपान्यथाभावादवि-
कृतत्वमुपपन्नतरम् । स्थूलावस्थस्य नामरूपविभागविभक्तस्य
चिदचिद्वस्तुन आत्मतयाऽवस्थानात्कार्यत्वमप्युपपन्नतरम् ।
अवस्थान्तरापत्तिरेव हि कार्यता ।
[शंका होती है कि, ब्रह्म यदि जगत का उपादान कारण है और
जगत उसी का परिणाम है तो दोनों के गुण परस्पर संक्रामित क्यों नहीं
हो जाते ? उसी का समाधान करते हैं]
ब्रह्म के उपादान होते हुए भी संघात (चेतन अचेतन समष्टि) ही
उपादान है, इसलिए जड़चेतन और ब्रह्म में परस्पर सांकर्य नहीं हो
पाता । ज से कि -: वेत, रक्त, श्याम तंतुओ के समूह, वस्त्र के उपादान है,
वस्त्र के भिन्न-भिन्न भागों में शुक्लादि वर्णों का संबंध दृष्टिगोचर होता
है, वर्णों का परम्पर साकर्य नहीं होता, इसी प्रकार चेतन, अचेतन और
ईश्वर इन तीनों की समष्टि सारे जगत के उपादान हैं । कार्यावस्था में
तीनो की भोक्ता, भोग्य और प्रेरिता रूप स्थिति पृथक्-पृथक् रहती है,
परस्पर सकर भाव नही होता । तंतुओ की पृथक् स्थिति, योग्य
(कलाकार) पुरुष की इच्छा पर निर्भर रहती है, कभी वह संहित होकर
कारण रूप और कभी कार्य रूप होती है । किन्तु चेतन, अचेतन वस्तुएं
सभी अवस्थाओं में, परमेश्वर की शरीर स्थानीय ही रहती हैं, परमपुरुष
के प्रकार के रूप में ही इनका सदा अस्तित्व रहता है, इसी परमात्मा को
सर्वदा सर्व शब्द से चिन्तन किया जाता है, स्वभाव भेद और असांकर्य
ये दो बातें तो, दोनों में ही (तंतुपट और चिदचिद् ब्रह्म) समान है !
ऐसा मानने से परब्रह्म की कार्यानुप्रवेश की स्वाभाविक अवस्थिति भी
सुमंगत हो जाती है, ब्रह्म के स्वरूप में किसी प्रकार का अन्यथा भाव या
विकार नहीं होता । स्थूलावस्था और नामरूप-विभागावस्था को प्राप्त
जड़ चेतन वस्तु के तादात्म्य रूप ब्रह्म की कार्यता भी उपपन्न हो जाती
है क्योंकि-अवस्थान्तर की प्राप्ति ही तो कार्यता है ।
निर्गुणवादाश्च परस्य ब्रह्मणो हेयगुणा संबंधादुपपद्यन्ते । “अप-
हतपाप्मा विजरोविमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः” इति हेयगुणान्

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प्रतिषिध्य “सत्यकामः संकल्पः” इति कल्याणगुणान्विदधती इयं
श्रुतिरेवान्यत्र सामान्येनावगतम् गुण निषेधं हेयगुण विषयं व्यवस्था-
पयति।
हेयगुणों के अभाव से, परब्रह्म को निर्गुण बतलाने वाले वाक्यों का
भी समाधान हो जाता है। “वह निष्पाप, जरा, मृत्यु, भूख प्यास रहित
है” इत्यादि हेयगुणों का प्रतिषेध करके “वह सत्यकाम सत्यसंकल्प है”
इत्यादि कल्याण गुणों की प्रकाशिका यह श्रुति ही विज्ञापन करती है
कि—अन्यत्र जो सामान्य रूप से ब्रह्म के गुणों का निषेध किया गया है,
वह हेय गुणों का ही है, गुणमात्र का नहीं है।
ज्ञानस्वरूपं ब्रह्मेतिवादश्च सर्वज्ञस्य सर्वशक्तेर्निखिलहेयप्रत्यनीक
कल्याणगुणाकरस्य ब्रह्मणः स्वरूपं ज्ञानैकनिरूपणीयं स्वयंप्रकाशतया
ज्ञानस्वरूपं चेत्यभ्युपगमादुपपन्नतरः। “यःसर्वज्ञः सर्ववित्”,
“परास्यशक्तिर्विविधैवश्रूयतेस्वाभाविकीज्ञानबलक्रिया च”,
“विज्ञातारमरे केन विजानीयात् इत्यादिकाः ज्ञातृत्वमावेदयन्ति।
“सत्यं ज्ञानं” इत्यादिकाश्च ज्ञानैकनिरूपणीयता स्वप्रकाशतया च
ज्ञान स्वरूपताम्।
जो श्रुतियां भगवान को ज्ञान स्वरूप बतलाती हैं उनका भी
तात्पर्य यह है कि-ब्रह्म स्वभावतः सर्वज्ञ, सर्वशक्ति और मंगलमय गुणों
के आश्रय हैं; ज्ञान के अतिरिक्त किसी अन्य रूप से उनके स्वरूप का
निर्देश नहीं किया जा सकता, ज्ञान की तरह वह स्वयं प्रकाश हैं,
इसीलिए उन्हें ज्ञान स्वरूप कहा गया है। “जो सर्वज्ञ और सर्वविद्
हैं—” “उनकी स्वाभाविकी पराशक्ति, ज्ञान, बल क्रिया आदि अनेक
नामों वाली हैं”—“अरे! उस विज्ञाता को कौन जान सकता है इत्यादि
श्रुतियां परमात्मा की ज्ञातृता का वर्णन करती हैं। “सत्यंज्ञानं” आदि
श्रुति, ज्ञानैकगम्यता और स्वप्रकाशता के आधार पर उनकी ज्ञान
स्वरूपता को बतलाती है।
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“सोऽकामयत बहुस्याम्, तदैक्षत बहुस्याम' “तन्नामरूपाभ्यां
व्याक्रियत” इति ब्रह्मैव स्वसंकल्पादविचित्र स्थिरत्रसरूपतया
नानाप्रकारमवस्थितमिति तत्प्रत्यनीक आब्रह्मात्मक वस्तुनानात्वमत
त्त्वमिति तत्प्रतिषिध्यते । “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव
पश्यति”, नेहनानास्ति किंचन”, यत्रहि द्वैतमिव भवति तदितर
इतरं पश्यति यत्र त्वस्यसर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्केन कं
विजानीयात् इत्यादिना । न पुनः “बहुस्यां प्रजायेय” इत्यादि
श्रुतिसिद्ध स्वसंकल्पकृतं ब्रह्मणो नानानामरूपभाक्त्वेन नानाप्रका-
रत्वमपि निषिध्यते । “यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्” इत्यादिनेषेध
वाक्यादौ च तत्स्थापितम् । “सर्वं तं परादाद्योऽन्यत्राऽत्मनः सर्वंवेद”,
तस्य ह वा एतस्य महतो भूतस्य विश्वसितमेतत यद् ऋग्वेदो
यजुर्वेदः” इत्यादिना ।
“उन्होंने कामना की बहुत हो जाऊँ”, ‘:उन्‍होंने विचारा बहुत हो
जाऊँ”, वे नाम रूप में अभिव्यक्त हुए “आदि श्रुति बतलाती है कि—एक
ही ब्रह्म अनेक स्थावर जंगम रूपो मे अभिव्यक्त होकर अनेक प्रकारो मे
अवस्थित है । उनसे विरुद्ध जो अब्रह्मात्मक वस्तुओं की विभिन्नता
बतलाई जाती है वह असत् है । अब्रह्मात्मक नानात्व का निषेध निम्न
वाक्यों से किया गया है—“जो इस जगत को विभिन्न रूपो वाला मानता
है, वह पुनःपुनः मृत्यु को प्राप्त करता है, इसमें कुछ भी विभिन्नता नही
है”, जब द्वैतबुद्धि होती है, तभी दूसरे को दूसरा देखता है, जब इस
जगत को आत्मस्वरूप देखता है, तब वह किसके द्वारा किसे देखा जा
सकता है ? किसके द्वारा किसे जान सकता है ? ” इत्यादि
“बहुत होकर जन्म लूं” इत्यादि श्रुतिसिद्ध, स्वसंकल्पकृत ब्रह्म की
जो अनेक रूपता है, उसका भी निषेध किया गया हो, ऐसा नही है ।
‘ जब यह सब कुछ आत्म स्वरूप हो जाता है” इस निषेध वाक्य से
नानात्व की विशेषता बतलाई गई है । “जो आत्मा से भिन्न सब वस्तुओं
का अस्तित्व मानता है, सारी वस्तुएं उसे प्रतारित करती हैं (अर्थात्
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