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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 696 में से

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पृष्ठ 267

( २०७ )
सत् (परोक्ष) और त्यत् (अपरोक्ष) हुआ तथा विज्ञान चेतन) अविज्ञान
(जड़) एवं सत्य और अनृत हुआ ।” यहाँ “अनेन जीवेन” इत्यादि से
जीव की ब्रह्मात्मकता तथा “सच्चत्यच्चा”, विज्ञानंचाविज्ञानं इन दो
विभिन्नताओं से आत्मशरीर भाव निबंधन ज्ञात होता है । इसी प्रकार
नाम रूप की व्याकृति—‘‘सृष्टि के पूर्व यह अव्यक्त था, वही सृष्टि के
बाद नाम रूप में अभिव्यक्त हुआ” इस वाक्य में कही गई है । इससे ज्ञात
होता है कि-कार्यरूप और कारणरूप से स्थित स्थूल सूक्ष्म, जड़चेतन
वस्तु, परंपुरुष परमात्मा का ही शरीर है । कार्य कभी कारण से भिन्न
हो नहीं सकता, कारण स्वरूप परमात्मा को जान लेने से, कार्यरूप सारे
जगत का ज्ञान हो जाता है, इस प्रकार एक विज्ञान से सर्वविज्ञान की
बात भी संगत हो जाती है ।
“इन तीनों देवताओं में आत्मा रूप से प्रविष्ट होकर नामरूप को
अभिव्यक्त करूँगा” इस वाक्य में “तीनों देवता” पद से समस्त अचित्
(जड़) वस्तु का निर्देश करके, स्व स्वरूप जीवानुप्रवेश से नाम रूप की
अभिव्यक्ति कही गई है; इससे ज्ञात होता है कि-सारे ही वाचक
(अर्थबोधक) शब्द, अचिद् विशिष्ट और जीव विशिष्ट, परमात्मा के ही
वाचक है । इस प्रकार कारणावस्थ परमात्मा बोधक शब्द ‘तत्” के
साथ, कार्यावस्थ बोधक शब्द “त्वं” का सामानाधिकरण्य (अभेदोक्ति)
अबाधरूप से संपन्न होता है । इससे जानना चाहिए कि-स्थूल-सूक्ष्म,
जड़-चेतन सारा जगत ब्रह्म का प्रकार है, ब्रह्म स्वयं ही कारण और कार्य
रूप है एवं समस्त जगत का उपादान कारण है । सूक्ष्म जड़ चेतन शरीर
वाला ब्रह्म ही, स्थूल जड़चेतन का कारण है ।
ब्रह्मोपादानत्वेऽपि संघातस्योपादानत्वेन चिदचितोर्ब्रह्मणश्च
स्वभावासंकरोऽप्युपपन्नतरः । यथा शुक्लकृष्णरक्ततंतुसंघातोपादान-
त्वेऽपि चित्रपटस्य तत्तत्तंतुप्रदेश एव शौक्ल्यादि संबंध इति
कार्यावस्थायामपि भोक्तृत्वभोग्यत्वनियंतृत्वाद्यसंकरः । तंतुनांपृ-
थक्स्थितियोग्यानामेव पुरुषेच्छया कदाचित्संहतानां कारणत्वं
कार्यत्वं च । इहतु चिदचितोः सर्वावस्थयोः परमपुरुषशरीरत्वेन
तत्प्रकारतयैव पदार्थत्वात्तत्प्रकारः परमपुरुषः सर्वदा सर्वशब्दवाच्य
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