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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 696 में से

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पृष्ठ 256

( १६६ )
वोपाधिसंसर्गात् तत्प्रयुक्ता जीवगतादोषा ब्रह्मण्येव प्रादुःष्यु-
रिति निरस्तनिखिलदोषकल्याणगुणात्मकब्रह्मात्मभावोपदेशा हि
विरोधादेव परित्यक्तास्स्युः । स्वाभाविक भेदाभेदवादेऽपि
ब्रह्मणस्स्वत एव जीवभावाभ्युपगमात् गुणवद्दोषाश्च स्वाभाविका
भवेयुरिति निर्दोषब्रह्मतादात्म्योपदेशो विरुद्ध एव । केवल
भेदवादिनां चात्यन्तभिन्नयोः केनापि प्रकारेणैक्यासंभवादेव
ब्रह्मात्मभावोपदेशा न संभवंतीति सर्ववेदांत परित्यागस्स्यात् ।
स्वयं श्रुति ने ही जब, ब्रह्म को शरीरी तथा जगत को उसका
शरीर बतलाया है, तब चाहे सामानाधिकरण्यभाव से हों या वैधिकरण्य
भाव से हो, सारे ही ब्रह्मात्मभाव के उपदेश, निर्विशेषवस्त्वैक्यवादी,
भेदाभेदवादी और केवल भेदवादी, इन सभी के लिए त्याज्य है (अर्थात्
तीनों ही वाद उन उपदेश वाक्यों का सांमजस्य नही कर पाते)
जग विचार करें-एक ही (अद्वैत) वस्तु मे किसके तादात्म्य की
बात कही जा सकती है ? यदि उसी एक के ही तादात्म्य को मानें सो तो
ब्रह्म के स्वरूप बोधक “सत्यं ज्ञानमनंत ब्रह्म ”इत्यादि वाक्यो से ही ज्ञात
है, पुनः तादात्म्योपदेश फिर निष्प्रयोजन सिद्ध होगा । अज्ञानकल्पित भेद
के निराकरण के लिए तादाम्योपदेश किया गया है, ऐसा भी नही कह
सकते, क्योंकि-सामानाधिकरण्य या तादात्म्योपदेश से कल्पित भेद का
निराकरण संभव नही है। सामानाधिकरण्य तो ब्रह्म संभाव्य दो प्रकार
के प्रतिपादन संबंधी विरोध का परिहार करता है ।
जो भेदाभेदवादी ब्रह्म में उपाधिसंबंध बतलाते है और उस
उपाधि से ही जीव में जीवत्व की उपस्थिति स्वीकारते है तब तादात्म्य
संबंध मानने से जीवगत कामादि दोष भी ब्रह्म में संक्रामित होंगे । समस्त
दोष रहित कल्याण गुणात्मक ब्रह्मात्म भावोपदेश उक्त (औपाधिकभेदाभेद
वाद) मत से विरुद्ध ही पड़ते हैं । अतएव उक्त मत से परित्यक्त है ।
जो भेदाभेदवादी, ब्रह्म के जीवभाव को स्वाभाविक मानते है,
तो मानो वे जीवगत गुण और दोष दोनों को ही स्वाभाविक मानते
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