श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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ऐसा सम्बन्ध न होने से, दंड कुंडल आदि पद, विशेषण होते हुए भी,
मत्वर्थीय प्रत्यय के योग से दंडी कुंडली रूप विशेषण-विशेष्य भाव के
प्रयोग बनते हैं। देव मनुष्य आदि के शरीर स्वभावतः आत्मा के आश्रित,
आत्मा के प्रयोजन से प्रयोजित, तथा आत्मा के ही प्रकार होते हैं, इसी-
लिये लोक और वेद में देवात्मा, मनुष्य आत्मा आदि सामानाधिकरण्य
प्रयोग होते हैं। जाति और व्यक्ति (देह) दोनों का ही चाक्षुष प्रत्यक्ष
होता है, इसीलिए सदा दोनों की एक साथ प्रतीति होती है। आत्मा का
चाक्षुष प्रत्यक्ष होता नहीं, शरीर का ही एकमात्र प्रत्यक्ष होता है
(इसीलिए दोनों की सदा पृथक् प्रतीति होती है) पृथक् प्रतीतिगम्य
पदार्थों की प्रकारता संभव नहीं होती, ये नहीं कहा जा सकता, क्योंकि--
एकमात्र आत्मा के आश्रित एवं प्रयोजन साधक तथा आत्मा के विशेषण
जात्यादि की तरह, शरीर भी आत्मा का स्वाभाविक प्रकार प्रतीत होता
है। जहाँ दो का प्रत्यक्ष एक ही कारण से होता है, वहाँ सहोपलम्भ का
नियम (एक साथ प्रतीति) होता है ऐसा पहले भी कह चुके हैं। जैसे कि
पृथिवी के स्वाभाविक गुण, गंध आदि का, पृथिवी के प्रत्यक्ष काल में,
चाक्षुष प्रत्यक्ष नही होता; वैसे ही शरीर आत्मा का विशेषण है, पर
शरीर के प्रत्यक्ष के समय, आत्मा का प्रत्यक्ष नहीं होता, क्योंकि-नेत्रों में
आत्मा के प्रत्यक्ष का अभाव है। एक साथ प्रतीति न होने मात्र से,
शरीर की स्वाभाविक आत्म प्रकारता का अभाव नहीं हो सकता।
आत्म विशेषण होने से ही, शरीर आत्मा का अभेद व्यवहार होता है;
शब्द ही शरीर की आत्मविशेषणता का प्रतिपादन करने में समर्थ हैं,
शब्द ही शरीर को आत्मा का प्रकार बतलाता है।
ननु च शब्देऽपि व्यवहारे शरीरशब्देनशरीरमात्रं गृह्यत इति
नात्मपर्यन्तता शरीर शब्दस्य । नैवम् आत्मप्रकार भूतस्यैव शरीरस्य
पदार्थविवेक पदर्शनाय निरूपणान्निष्कर्षशब्दोऽयम्, यथा “गोर्द्रव्यं
शुक्लत्वमाकृतिर्गुणः” इत्यादि शब्दाः।
(शंका) शब्द व्यवहार में तो शरीर शब्द से केवल देह मात्र का
ही बोध होता है, शरीर शब्द का आत्मापर्यन्त बोध तो होता नहीं ?
(समाधान) नहीं; शरीर आत्मा का विशेषण है इसीलिये पदार्थ
कहलाता है (आत्मा के बिना शरीर का कोई अस्तित्व ही नहीं रहता)
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