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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 253, कुल 696 में से

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पृष्ठ 253

( १६३ )
जीव शरीरी, जगत के कारण परब्रह्म के मुख्यार्थ बोधक “तत्”
और “त्वं” दो पद हैं, एक ही विशिष्ट वस्तु दो प्रकारों से कही गई है,
यही इसका सिद्ध सामानाधिकरण्य है। समस्त दोष रहित कल्याणगुणा-
कर परब्रह्म की जीवान्तर्यामिता भी एक ऐश्वर्य है, उसका भी प्रतिपादन
किया गया है ऐसा मानने से ही उक्त प्रसंग का उपक्रम अनुकूल हो
सकता है तथा एक विज्ञान से सर्व विज्ञान की प्रतिज्ञा भी संगत हो सकती
है। सूक्ष्म जड़ चेतन वस्तु जैसे ब्रह्म का शरीर है स्थूल, जड़, चेतन भी
उसी प्रकार ब्रह्म का शरीर है, क्योंकि स्थूल, सूक्ष्म वस्तु का ही कार्य
रूप है। “ईश्वर सर्वश्रेष्ठ महेश्वर हैं” “परब्रह्म की अनेक शक्तियां
प्रसिद्ध हैं, वह निष्पाप, सत्यकाम, सत्यसंकल्प है” इत्यादि श्रुतियाँ भी
उक्त मान्यता से अविरुद्ध हैं।
‘तत्त्वमसि” इत्यत्रोद्देश्योपादेयविभागः कथमितिचेत् नात्र-
किंचिदुद्दिश्य किमपि विधीयते, ”ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्” इत्यनेनैव
प्राप्तत्वात्। अप्राप्ते हि शास्त्रमर्थवत्। इदं सर्वमिति सजीवं
जगन्निर्दिश्य ऐतदात्म्यमिति तस्यैषआत्मेति तत्र प्रतिपादित तत्र च
हेतुरुक्तः- “सन्मूलास्सौम्येमास्सर्वाः प्रजास्सदायतनास्सत्प्रतिष्ठाः”
इति, “सर्वं खल्विदंब्रह्म तज्जलानितिशान्तः” इतिवत् ।
यदि कहो कि-ऐसा मानने से “तत्त्वमसि” में उद्देश्य, विधेय का
विभाग कैसे होगा? सो यहाँ किसी के उद्देश्य से किसी की विधि नहीं
की गई है, “यह सब कुछ आत्म्य है” इस वाक्य से उक्त बात की पुष्टि
होती है। अप्राप्त विषय का प्रतिपादन करना ही शास्त्र का प्रयोजन
होता है। “इदं शरीरम्” से सजीव जगत का निर्देश करके ‘ऐतदात्म्यं’
से ब्रह्म को उसका आत्मा बतलाया गया है। “यह सब कुछ ब्रह्म स्वरूप
है, सब कुछ उसी से उत्पन्न, स्थित और विलीन है, उसी की शांतभाव
से उपासना करो” इस वाक्य में जैसे-साधक के शांतभाव अवलंबन के
लिए, ब्रह्म का सर्वमय भाव हेतु रूप से बतलाया गया है, वैसे ही वहीं-
“हे सौम्य ! सद् ब्रह्म ही समस्त जायमान पदार्थों का मूल आश्रय और
विलय स्थान है” इस वाक्य से हेतु द्वारा पूर्व विहित ब्रह्मात्मभाव का
समर्थन किया गया है।
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