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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 251, कुल 696 में से

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पृष्ठ 251

( १६१ )

बहुस्यां इत्यादि उसी की प्रकृति के वाचक हैं । “तत्” का सामानाधिकरण्य
“त्वं” पद भी अचित् विशिष्ट जीव शरीरी ब्रह्म का प्रतिपादक है ।
विभिन्न प्रकार के दो पदार्थों की एकार्थ बोधकता को ही सामानाधिकरण्य
कहते हैं । तत् और त्वं पद में यदि प्रकार गत भेद नहीं मानेंगे तो, प्रवृत्ति
निमित्तकता न होगी और भी सामानाधिकरण्य भी छोड़ना होगा, तथा
दोनों पदों में लक्षणा (गौणार्थ) करनी पड़ेगी । “यह वही देवदत्त है” इस
सुस्पष्ट वाक्य में भी लक्षणा नहीं की जाती, क्यों कि भूत और वर्त्तमान
काल में प्रतीतित एक ही व्यक्ति तो है, वह भिन्न स्थान में स्थित देखा
गया, पर एक ही समय में तो नहीं देखा गया, जिससे संशय हो सके ।
विभिन्न काल में दृष्ट होने से, संशय हो ही नहीं सकता । “तत्” पद का
यदि निर्विशेष अर्थ करेंगे तो “तदैक्षत बहुस्यां” इस उपक्रम श्रुति से
विरुद्धता होगी । एक विज्ञान से सर्व विज्ञान वाली प्रतिज्ञा भी संगत न
होगी । समस्त दोष रहित, कल्याण गुण संपन्न, सर्वज्ञ ज्ञान स्वरूप ब्रह्म
में अज्ञान और अज्ञान जन्य दोष भी संलग्न होंगे । यदि कहो कि-तत्
त्वं पदों का सामानाधिकरण्य, एकत्व बोधक नहीं, बाधार्थक है; तो तत्
त्वं पद के सर्वाधिष्ठान भूत परब्रह्म और जीव के, जीव भाव की निवृत्ति
के लिए लक्षणा करनी पड़ेगी, तथा सामानाधिकरण्य के कथित नियम
का भी उल्लंघन होगा, साथ ही प्रकरण विरोध आदि दोष होंगे ।
इयांस्तु विशेष:—नेदं रजतमितिवदप्रतिपन्नस्यैव वाधस्यागत्या
परिकल्पनम्, तत्पदेनाधिष्ठानातिरेकिधर्मानुपस्थापनेन वाधानु-
पत्तिश्च । अधिष्ठानंतु प्राक्तिरोहितस्वरूपं तत्पदेनोपस्थाप्यत इति
चेन्न, प्रागाधिष्ठानाप्रकाशे तदाश्रय भ्रमबाधयोरसंभवात् ।
भ्रमाश्रयमधिष्ठानमतिरोहितमिति चेत्, तदेवाधिष्ठान स्वरूपं
भ्रमविरोधीति तत्प्रकाशे सुतरां न तदाश्रय भ्रमबाधौ । अतोऽधि-
ष्ठानातिरेकि परमार्थिकधर्मतत्तिरोधानानभ्युपगमे भ्रांतिबाधौ
दुरुपपादौ । अधिष्ठाने हि पुरुषमात्राकारे प्रतीयमाने तदति-
रेकिणि पारमार्थिके राजत्वे तिरोहिते सत्येव व्याधात्वभ्रमः । राज-
त्वोपदेशेन च तन्निवृत्तिर्भवति, नाधिष्ठानमात्रोपदेशेन, तस्य
प्रकाशमानत्वेनानुपदेश्यत्वात् भ्रमानुपमर्दित्वाच्च ।