श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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वह वस्तुओं से वंचित हो जाता है) “ये ऋग्वेद और यजुर्वेद स्वतः
सिद्ध महान् परमेश्वर के निःश्वास रूप हैं” इत्यादि वाक्यों से उक्त मत
की पुष्टि होती है।
एवं चिदचिदीश्वराणां स्वभावभेदं स्वरूपभेदं च वदंतीनां
कार्यकारणभावं कार्यकारणयोरनन्यत्वं च वदंतीनां सर्वासां श्रुती-
नामविरोधः चिदचितोः परमात्मनश्च सर्वदा शरीरात्मभावं
शरीरभूतयोः कारणदशायां नामरूपविभागानर्हं सूक्ष्मदशापत्तिं
कार्यदशायां च तदर्हं स्थूलदशापत्तिं वदंतीभिः श्रुतिभिरेव ज्ञायत
इति ब्रह्माज्ञानवादस्यौपाधिकब्रह्मभेदवादस्यान्यस्याप्यन्यायमूलस्य
सकलश्रुतिविरुद्धस्य न कथंचिदप्यवकाशोदृश्येत । चिदचिदीश्वरा-
णां पृथक् स्वभावतया तत्तच्छ्रुतिसिद्धानां शरीरात्मभावेन प्रकार-
प्रकारितया श्रुतिभिरेव प्रतिपन्नता श्रुत्यंतरेण कार्यकारणभाव
प्रतिपादनं कार्यकारणयोरैक्य प्रतिपादनं च ह्यविरुद्धम् । यथा-
आग्नेयादीन्षड्भागानुत्पत्तिवाक्यैः पृथगुत्पन्नान् समुदायानुवादि
वाक्यद्वयेन समुदायद्वयत्वमापन्नान् “दर्शपूर्णमासाभ्याम्” इत्यधिकार-
वाक्यं कामिनः कर्त्तव्यतया विदधाति, तथा चिदचिदीश्वरान्वि-
विक्तस्वरूपस्वभावान् “क्षरंप्रधानममृताक्षरंहरः क्षरात्मानावीशते
देव एकः”, पतिंविश्वस्यात्मेश्वरम्, “आत्मा नारायणः परः”,
इत्यादि वाक्यैः पृथक् प्रतिपाद्य “यस्य पृथिवी शरीरम्”, यस्यात्मा
शरीरम्, “यस्याव्यक्तं शरीरम्”, “यस्याक्षरंशरीरम्”, एवं
सर्वभूतांतरात्माऽपहतपाप्मा दिव्यो देव एको नारायणः “इत्यादि-
भिर्वाक्यैश्चिदचितोःसर्वावस्थावस्थितयोः परमात्मशरीरतां परमा-
त्मनस्तदात्मतां च प्रतिपाद्य शरीरीभूतपरमात्माभिधायिभिः
सद्ब्रह्म हि आत्मादिशब्दैः कारणावस्थःकार्यावस्थश्च परमात्मैक
एवेति पृथक् प्रतिपन्नं “सदेव सोम्येदमग्र आसीत्”, ऐतदात्म्यमिदं
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सर्वं “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” इत्यादि वाक्यं प्रतिपादयति । चिदचिद
वस्तुशरीरिणः परमात्मनः परमात्मशब्देनाभिधाने हि नास्ति
विरोधः, यथा मनुष्यपिण्डशरीरकस्यात्मविशेषस्य “अयमात्मा
सुखी” इत्यात्मशब्देनाभिधान इत्यलमतिविस्तरेण ।
चेतन, अचेतन और ईश्वर के स्वरूप और स्वभावगत भेद को
बतलाने वाले वाक्यों में भी जो कार्यकारणभाव और कार्यकारण की
अभिन्नता बतलाने वाले वाक्य हैं, उनमें परस्पर मतभेद प्रतीत होता
है, परंतु जड़चेतन का सदा परमात्मा से शरीरात्म भाव; जड़चेतन की,
कारणदशा में नामरूप विभाग रहित सूक्ष्मदशा; कार्यावस्था में नाम
विभाग वाली स्थूलदशा को बतलाने वाली श्रुतियों से उक्त मतभेद
का परिहार हो जाता है। ब्रह्मज्ञानवाद हो या औपाधिक ब्रह्म
भेदवाद हो, अथवा कोई भी वाद हो, वे सारे ही वाद अयुक्ति
मूलक श्रुति विरुद्ध हैं, उन सबका कुछ भी महत्व नहीं है। चेतन,
अचेतन और ब्रह्म स्वभावतः भिन्न है, यह श्रुतिसिद्ध बात है। “ईश्वर
आत्मा है, समस्त जडचेतन उसका शरीर है” इत्यादि धर्म-धर्मी बोधक
श्रुतियों से उक्त बात समर्थित है। अन्य श्रुतियों में इनका जो कार्यकारण
भाव और कार्यकारण अभेद बतलाया गया है वह अविरुद्ध ही सिद्ध
होता है ।
जैसे आग्नेय आदि ६ यज्ञ, पृथक उत्पत्ति वाक्यों से पृथक ही विहित
हैं, पुनः इन सबको दो वाक्यों द्वारा दो भागों में विभक्त कर दिया गया
है, और अन्त में “दर्श और पूर्णमास नामक यज्ञ करो” इस अधिकार
वाक्य द्वारा समस्त भाग को सकाम व्यक्ति के लिए कर्त्तव्य रूप से
कहा गया है; उसी प्रकार विभिन्न स्वरूप, विभिन्न स्वभाव वाले
जडचेतन ईश्वर को “प्रधान (जड) क्षर है, अमृत हर (जीव) अक्षर
है, क्षर अक्षर का आत्मा एक ईश्वर देव है”—“प्रधान, क्षेत्रज्ञ और गुणों
का वह ईश्वर है”—' उस विश्वपति और आत्मेश्वर—नारायण
परमात्मा को “इत्यादि वाक्यों से बतलाकर “पृथ्वी जिसका शरीर—
आत्मा जिसका शरीर-अव्यक्त जिसका शरीर अक्षर जिसका शरीर
है, ऐसे सर्वान्तर्यामी निष्पाप दिव्य देव एक नारायण हैं “इत्यादि
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वाक्यों से हर अवस्था वाले जडचेतन को परमात्मा का शरीर
और उनसे परमात्मा की तदात्मकता बतलाई गई चेतन अचेतन के
आत्मभूत परमात्मा के बोधक “सत्-ब्रह्म और आत्मा” शब्दों से कारणा-
वस्थ कार्यावस्थ परमात्मा की एकता को पृथक तीन वस्तुओं के रूप में
“यह सब कुछ सत् ही था”—यह सब कुछ आत्म्य है “—” यह सब ब्रह्म
है” प्रतिपादन किया गया है । चिदचिद् वस्तुशरीरी परमात्मा का,
परमात्मा शब्द से उल्लेख, विरुद्ध नहीं है । जैसे कि—मनुष्यपिण्ड शरीरी
आत्मा के लिए “यह सुखी आत्मा है” ऐसा प्रयोग किया जाता है । अब
इस प्रसंग को यही पूर्ण करते हैं, अधिक विस्तार नहीं करेंगे ।
यत्पुनरिदमुक्तम्-ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानेनैवाविद्यानिवृत्तिर्युक्ता इति,
तदयुक्तम्, बंधस्यपारमार्थिकत्वेन ज्ञाननिवर्त्यत्वाभावात्
पुण्यापुण्यरूपकर्मनिमित्तदेवादिशरीरप्रवेश तत्प्रयुक्त सुखदुःखानुभव
रूपस्य बंधस्य मिथ्यात्वं कथमिव शक्यते वक्तुम् । एवंरूपबंधनि-
वृत्तिर्भक्तिरूपापन्नोपासनप्रीतपरमपुरुषप्रसादलभ्येति पूर्वमेवोक्तम्।
भवदभिमतस्यैक्यज्ञानस्ययथावस्थितवस्तुविपरीतविषयस्य मिथ्या-
रूपत्वेन बंधविवृद्धिरेव फलं भवति । “मिथ्यैतदन्यद्द्रव्यं हि नैति
तद्द्रव्यतां यतः “इति शास्त्रात् ।” उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः “——”
पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा इति जीवात्मविजातीयस्य
तदंतर्यामिणोब्रह्मणोज्ञानं परमपुरुषार्थलक्षणमोक्षसाधनमित्यु-
पदेशाच्च ।
जो यह कहा कि—“ब्रह्म आत्मा की एकता के ज्ञान से अविद्या की
निवृत्ति होती है”, यह भी असंगत बात है, क्यों कि-बंधन जब पारमार्थिक
है तो उसका छुटकारा, ज्ञान द्वारा संभव नहीं है । पाप पुण्य कर्मों के
कारण देवादि शरीरों का प्रवेश, तदनुसार सुखदुःखादि की अनुभूति
रूप से होने वाला बंधन मिथ्या है, ऐसा कहना समीचीन नहीं है । ऐसे
बंधन की निवृत्ति तो भगवत् शरणागति रूप भक्ति उपासना से लब्ध
परमात्मा की कृपा से ही संभव है, ऐसा पहिले भी कह चुके हैं। आपके
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अभिमत अद्वैत ज्ञान से जब वस्तु की यथार्थ भेदस्थिति और मिथ्यात्व
का आभास होता है तो (मेरी समझ से) बंधन की वृद्धि ही होती है।"
एक वस्तु कभी अन्य वस्तु नहीं हो सकती, इसलिए (जीव की ब्रह्म
भावोक्ति) मिथ्या है" इस शास्त्र वाक्य से उक्त बात पुष्ट होती है।
“उत्तम पुरुष (परमात्मा) अन्य है”—“आत्मा और प्रेरिता को भिन्न
मानकर' इत्यादि वाक्यों में जीवात्मा से विलक्षण, अन्तर्यामी परब्रह्म के
ज्ञान को ही परम पुरुषार्थ मोक्ष का साधन बतलाया गया है।
अपि च भवदभिमतस्यापि निवर्त्तकज्ञानस्य मिथ्यारूपत्वा-
त्तस्य निवर्त्तकान्तरं मृग्यम्। निवर्त्तकज्ञानमिदं स्वविरोधि सर्वं
भेदजातं निवर्त्त्य क्षणिकत्वात्स्वयमेव नश्यतीति चेन्न, तत् स्वरूप
तदुत्पत्तिविनाशानां काल्पनिकत्वेन विनाशतत् कल्पनाकल्परूपा-
विद्याया निवर्त्तकांतरमन्वेषणीयम्। तद्विनाशो ब्रह्मस्वरूपमेवेति
चेत्, तथा सति निवर्त्तक ज्ञानोत्पत्तिरेव न स्यात्, तद्विनाशे
तिष्ठति तदुत्पत्त्यसंभवात्।
एक बात और भी है कि-आपका अभिमत अज्ञान निवर्त्तक
(अद्वैत) ज्ञान ही जब मिथ्या है (बुद्धि विज्ञान असत्य होता है) तो उस
मिथ्या निवर्त्तक ज्ञान की निवृत्ति के लिए किसी अन्य निवर्त्तक ज्ञान की
खोज करनी पड़ेगी। यदि यह निवर्त्तक ज्ञान अपने विरोधी भेद का क्षण
भर में निराकरण करके स्वयं विनष्ट हो जाता है, तब तो इस ज्ञान के
स्वरूप, उत्पत्ति और विनाश सब कुछ काल्पनिक सिद्ध होंगे, इसलिए
उसके निवारण के लिए अविद्या निवारक अन्य साधन की खोज ही
श्रेयस्कर है। अविद्या विनाश को ही यदि ब्रह्म स्वरूप कहा जाय तो
निवर्त्तक ज्ञान की उत्पत्ति ही नहीं हो सकती। उसके विनाश में उसी की
उत्पत्ति संभव नहीं है।
अपि च चिन्मात्रब्रह्मव्यतिरिक्तकृत्स्ननिषेधविषयज्ञानस्यै
कोऽयं ज्ञाता ? अध्यासरूप इतिचेत्, न, तस्य निषेध्यतया निवर्त्तक
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ज्ञान कर्मत्वात् तत्कर्त्तृत्वानुपपत्तेः । ब्रह्मस्वरूपमिति चेत्, ब्रह्मणो
निवर्त्तकज्ञानंप्रति ज्ञातृत्वं कि स्वरूपम्; उताध्यस्तम् । अध्यस्तं
चेत्, अयमध्यासस्तन्मूलविद्यांतरं च निवर्त्तकज्ञान विषयतया
तिष्ठत्येव । निवर्त्तकज्ञानान्तराभ्युपगमे तस्यापि त्रिरूपत्वात् ज्ञातृपेक्ष-
याऽनवस्था स्यात् । ब्रह्मस्वरूपस्यैव ज्ञातृत्वेऽस्मदीयएव पक्षः
परिगृहीतः स्यात् । निवर्त्तक ज्ञानस्वरूपंस्वस्य ज्ञाता च ब्रह्म व्यति-
रिक्तत्वेन स्वनिवर्त्यान्तर्गतमिति वचनं "भूतलव्यतिरिक्तं कृत्स्नं
देवदत्तेन छिन्नम्" इत्यस्यामेव छेदनक्रियायामस्य छेत्तुरस्याश्छेदन
क्रियायाश्चच्छेद्यानुप्रवेशवचनवदुपहास्यम्। अध्यस्तो ज्ञाता स्वनाश-
हेतुभूतनिवर्त्तकज्ञाने स्वयं कर्त्ता च न भवति । स्वनाशस्यापुरुषार्थ-
त्वात् । तन्नाशस्य ब्रह्मस्वरूपत्वाभ्युपगमे भेददर्शनतन्मूलाविद्यादीनां
कल्पनमेव न स्यात् । इत्यलमनेन दिष्टहतमुद्गराभिघातेन ।
एक बात और भी विचारणीय है कि- चिन्मात्र ब्रह्म से भिन्न
समस्त पदार्थों के निवारक ज्ञान का ज्ञाता कौन है ? अध्यास तो ज्ञाता
हो नहीं सकता, क्यों कि-वही तो प्रत्याख्यान का विषय है, वह तो
निवर्त्तक ज्ञान का कर्म ही हो सकता है, उसमें स्वयं ज्ञातृत्व नहीं हो
सकता । यदि ब्रह्मस्वरूप को ही ज्ञाता कहते हो तो अविद्या निवर्त्तक
ज्ञान संबंधी ब्रह्म की जो ज्ञातृता है वह उसका अपना स्वरूप है अथवा
अध्यस्त (अविद्याकल्पित) रूप है ? यदि अध्यस्तरूप है, तो अध्यास
और अध्यास की मूलकारण एक और अविद्या होगी, जो कि-निवर्त्तक
ज्ञान का विषय न होने से सदा बनी रहेगी। यदि उसके निवारण के
लिए एक और निवारक ज्ञान की कल्पना करते हो तो, उस ज्ञान को भी
ज्ञाता-ज्ञान और ज्ञेय इन तीनों में अन्तर्भूत करना होगा, फिर उसका
ज्ञाता कौन होगा ? फिर तो अनवस्था हो जायगी । यदि ब्रह्म के स्वरूप
की ज्ञातृता स्वीकारते हो तो, हमारा ही पक्ष स्वीकारते हो ।
ब्रह्म को अविद्या निवर्त्तक ज्ञान स्वरूप और उसका ज्ञाता मान-
कर, ब्रह्म से भिन्न स्वनिवर्त्त्य पदार्थ के अन्तर्गत मानें तो "देवदत्त ने
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पृथिवी को छोड़कर सब कुछ छेदन कर दिया" इस उदाहरण में छेदन
क्रिया का कर्त्ता स्वयं ही छिन्नकर्म भी है, इस उपहासास्पद उदाहरण की
तरह होगा । अध्यस्त ज्ञाता अपने नाश के, कारण निवर्त्तक ज्ञान का
स्वयं कर्त्ता नहीं हो सकता, अपना ही नाश कोई पुरुषार्थ नहीं है । यदि
अध्यस्त रूप के विनाश की ब्रह्मरूपता स्वीकारते हो तो, जागतिक भेद,
भेद प्रतीति और तन्मूला अविद्या आदि की कल्पना नहीं हो सकती ।
अस्तु भाग्य के मारे पर अब और अधिक मुसल प्रहार नहीं करेंगे, इतना
ही कथन बहुत है ।
तस्मादनादिकर्मप्रवाहरूपाज्ञानमूलत्वादबंधस्य तन्निबर्हण-
मुक्तलक्षणज्ञानादेव । तदुत्पत्तिश्चाहरह्रनुष्ठीयमानपरमपुरुषाराधन-
वेषात्मयाथात्म्यबुद्धिविशेषसंस्कृतवर्णाश्रमोचितकर्मलभ्या । तत्र
केवलकर्मणामल्पास्थिरफलत्वम्, अनभिसंहितफलपरमपुरुषाराधन-
वेषाणां कर्मणां उपासनात्मकज्ञानोत्पत्तिद्वारेणब्रह्म याथात्म्यानु-
भवरूपानन्तस्थिरफलत्वं च कर्मस्वरूपज्ञानादृते न ज्ञायते ।
केवलाकारपरित्यागपूर्वकं यथोक्तस्वरूपकर्मोपादानं च न संभवतीति
कर्मविचारानन्तरं तत एव हेतोः ब्रह्मविचारः कर्त्तव्य इति
“अथातः” इत्युक्तम् ।
अनादि कर्म प्रवाह रूप अज्ञान मूलक बंधन का निवारण उक्त
प्रकार के ज्ञान से ही हो सकता है । अहर्निश भगवदाराधन से होने वाली
आत्मविषयक यथार्थ बुद्धि विशेष से तथा परिष्कृत वर्णाश्रमोचित कर्म से
ही उक्त ज्ञान का उदय होता है । केवल कर्मानुष्ठान का फल अल्प और
अस्थायी होता है; फलवासना रहित, परम पुरुष की आराधनात्मक
कर्मों की उपासनात्मक ज्ञानोत्पत्ति से ब्रह्म का यथार्थ, अनंत और स्थिर
अनुभव होता है । कर्म का स्वरूप ज्ञान के बिना नही जाना जा सकता ।
ज्ञान रहित कर्मानुष्ठान के त्याग करने मात्र से, परम पुरुष के आराधना-
त्मक कर्म का अनुष्ठान नही हो सकता, इसलिए कर्म विचार के बाद
आराधना के मुख्य हेतु ब्रह्म का विचार आवश्यक है यही “अथातः” पद
का तात्पर्य है ।
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तत्र पूर्वपक्षवादी मन्यते-वृद्धव्यवहारादन्यत्रशब्दस्य बोधक-
त्वशक्त्यवधारणासंभवात्, व्यवहारस्य च कार्यबुद्धिपरत्वेन
कार्यार्थ एव शब्दस्य प्रामाण्यमिति कार्यरूप एव वेदार्थः । अतो न
वेदांताः परिनिष्पन्ने परे ब्रह्मणि प्रमाणभावमनुभवितुमर्हन्ति । न
च पुत्रजन्मादिसिद्धवस्तुविषयवाक्येषुहर्षहेतूनांकालत्रयवर्त्तिनां
अर्थानामानंत्यात् सुलग्नसुखप्रसवादिहर्षहेत्वर्थान्तरोपनिपात
संभावनया च प्रियार्थप्रतिपत्तिनिमित्तसुखविकासादिलिंगेनार्थ
विशेष बुद्धिहेतुत्व निश्चयः, नापिव्युत्पन्नेतरपादविभक्त्यर्थस्य
पदातरार्थ निश्चयेन प्रकृत्यर्थनिश्चयेन वा शब्दस्य सिद्धवस्तुन्यभि-
धान शक्ति निश्चयः, ज्ञातकार्याभिधायिपदसमुदायस्य, तदंशविशेष
निश्चयरूपत्वात्तस्य । न च सर्पाद् भीतस्य "नायं सर्पो रज्जुरेषा"
इति शब्द श्रवणसमनंतरं भयनिवृत्तिदर्शनेन सर्पाभावबुद्धिहेतुत्व
निश्चयः अत्रापि निश्चेष्टं निर्विशेषमचेतनमिदं वस्त्वित्याद्यर्थबोधेषु
बहुषुभयनिवृत्तिहेतुषुसत्सु विशेषनिश्चयायोगात् । कार्यबुद्धि
प्रवृत्त्याप्तिबलेन शब्दस्य प्रवर्त्तकार्थावबोधित्वमुपगतमिति सर्व-
पदानां कार्यपरत्वेन सर्वैः पदैः कार्यस्यैव विशिष्टस्य प्रतिपादनान्ना-
न्वितस्वार्थमात्रे पदशक्ति निश्चयः । इष्टसाधनताबुद्धिस्तु
कार्यबुद्धिद्वारेण प्रवृत्ति हेतुः, न स्वरूपेण, अतीतानागतवर्त्तमाने-
ष्टोपायबुद्धिषु प्रवृत्त्यनुपलब्धेः । 'इष्टोपायो हि मत्प्रयत्नादृते न
सिध्यति, अतोमत्कृतिसाध्यः, इतिबुद्धिर्यावन्न जायते, तावन्न
प्रवर्त्तते । अतः कार्यबुद्धिरेव प्रवृत्तिहेतुरिति प्रवर्त्तकस्यैव शब्दवाच्य-
तया कार्यस्यैव वेदवेद्यत्वात् परिनिष्पन्नरूप ब्रह्मप्राप्तिलक्षणानं-
तस्थिरफलाप्रतिपत्ते "अक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं
भवति" इत्यादिभिः कर्मणामेव स्थिरफलत्वप्रतिपादनाच्च कर्म
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फलाल्पास्थिरत्व ब्रह्मज्ञान फलानंतस्थिर-त्वज्ञान हेतुको ब्रह्मविचारा-
रम्भो न युक्तः—इति ।
सूत्रार्थ योजनारम्भः—पूर्व पक्षवादी कर्म मीमांसकों की मान्यता
है कि-वृद्ध व्यवहार (प्राचीनों के शब्द प्रयोग से) रहित शब्द की अव-
बोधन शक्ति का अवधारण संभव नहीं है (अर्थात् किस शब्द का क्या
अर्थ है, यह नहीं जाना जा सकता) वृद्ध व्यवहार कार्य बुद्धि (क्रियानु-
ष्ठान दृष्टि) के विना हो नहीं सकता । कार्य रूप में ही शब्द की
प्रामाणिकता है (वस्तुबोधन में शब्द की प्रामाणिकता नहीं है) अतः
यज्ञादि कर्मानुष्ठान का प्रतिपादन ही वेद का मुख्यार्थ स्वीकारना होगा ।
स्वतः सिद्ध परब्रह्म के प्रतिपादक वेदांत वाक्यों का प्रामाण्य नहीं माना
जा सकता । और न केवल पुत्रजन्मादि बोधक (पुत्रस्तेजातः इत्यादि)
हर्षोत्पादक वाक्यों की तरह ब्रह्म बोधक वेदांत वाक्यों की प्रामाणिकता
हो सकती है । त्रिकालवती हर्षोत्पादक अनंत और असंख्य कारणों में
विशेष शुभ लग्न शुभ प्रसव आदि हर्ष की संभावना तथा प्रिय संगठन
सूचक वक्ता के हर्षोल्लासपूर्ण मुख आदि को देखकर निश्चित किया
जाता है कि—कोई विशेष प्रसंग उपस्थित है [केवल कथनमात्र से पुत्रजन्म
की बात प्रामाणिक नहीं मानी जाती] अव्युत्पन्न (यौगिक अर्थ रहित)
शब्द की विभक्ति के अर्थ निर्धारण में, निकटस्थ दूसरे पद के अर्थ से
अथवा प्रकृति शब्द के अर्थ से, शब्द की सिद्ध वस्तुता की अभिधा शक्ति
का निश्चय होता है । पर उक्त प्रसंग में वह नियम भी लागू न होगा,
क्यों कि-यहाँ प्रसिद्ध कार्य बोधक सारे शब्द अंशविशेष (विभक्ति) से ही
अर्थ निश्चय करा देते हैं । और न, सर्प से भयभीत व्यक्ति को “यह सर्प
नहीं रस्सी है” इतना कहने मात्र से निर्भय देखा जाता है, केवल कहने
से, सर्प के प्रति अभाव बुद्धि नहीं हो सकती जिससे कि भीत व्यक्ति सर्पा-
भाव का निश्चय कर सके । निश्चेष्ट, निर्विष, अचेतन आदि अनेक
भय निवृत्ति कारक कारणों से यह निश्चय नहीं हो पाता कि यथार्थ क्या
है (यदि सर्प है तो निश्चेष्ट क्यों है ? संभवतः चुपचाप पड़ा हो, छूने से
काट लेगा तो विष चढ़ जायगा इत्यादि भ्रांतियाँ, रस्सी बतलाने पर भी
बनी रहती हैं)
[email protected]
[Page Header: ( २१६ )]
कार्यबुद्धि, प्रवृत्ति और व्याप्ति के बल से शब्द का प्रवर्त्तक
अर्थावबोध होता है, [अर्थात् शब्द मात्र की प्रवृत्ति को बतलाने वाले
रूप से अर्थावबोधकता होती है; कार्य विषयक ज्ञान और कार्य विषयक
प्रवृत्ति घटित अर्थावबोध से निश्चित होता है कि-] सारे ही शब्द
कार्यपरक एवं विशेष कार्य प्रतिपादक होते हैं। क्रिया संबंधी अर्थ
प्रतिपादन से ही समस्त शब्दों की शक्ति का निश्चय होता है [अर्थात्
क्रिया संपर्क रहित पद में अर्थावबोधकता नहीं होती] इष्ट साधनता
बुद्धि, जो कि प्रवृत्ति की मूलहेतु है, वह भी सीधे न होकर क्रिया बुद्धि
द्वारा ही होती है, इसीलिए अतीत, अनागत और वर्त्तमान में जो इष्ट
साधन रहते हैं, उनका ज्ञान रहते हुए भी प्रवृत्ति नहीं होती। "ये इष्ट
उपाय मेरे प्रयत्न के बिन सिद्ध नहीं हो सकते, ये मेरे प्रयास से ही
साध्य हैं, मुझे इसके लिए प्रयास करना चाहिए" ऐसी बुद्धि जब तक
नहीं होती, तब तक प्रवृत्ति हो नहीं सकती, इसलिए कार्यबुद्धि ही लोक
प्रवृत्ति की मूल हेतु है। लोक प्रवृत्ति का हेतु भूत अर्थ ही जब शब्द का
प्रकृत वाच्यार्थ है तो, कार्य को ही वेद का प्रतिपाद्य विषय माना जायगा
(सिद्ध वस्तु प्रतिपादन उसका विषय नहीं हो सकता) अतः स्वतः सिद्ध
ब्रह्म प्राप्ति रूप अनंत और नित्य फल, केवल प्रतीति या ज्ञान द्वारा नहीं
हो सकता। "चातुर्मास्य यज्ञ करने वाले पुण्यात्मा अक्षय फल पाते हैं"
इत्यादि कर्मों के प्रतिपादक श्रुतियों में स्थिर फल का प्रतिपादन किया
गया है। इसलिए यह कहना कि—कर्मफल अल्प और अस्थिर तथा ब्रह्म
ज्ञान फल अनन्त और स्थिर बतलाने वाला ब्रह्मविचारात्मक, प्रारंभ, इस
ग्रंथ में किया गया है, असंगत बात है।
अत्राभिधीयते-निखिललोकविदितशब्दार्थसंबंधावधारणप्रकारम-
पनुद्य सर्वशब्दानां अलौकिकैकार्थविबोधित्वावधारणं प्रमाणिका
न बहुमन्यन्ते। एवं किल बालाः शब्दार्थ संबंधमवधारयंति मातापितृ
प्रभृतिभिरम्बतातमातुलादीन् शशिपशुनरमृगपक्षिसर्वादींश्च "एनम-
वेहि इमं चावधारय" इत्याभिप्रायेण, अंगुल्यानिर्दिश्य तैस्तैः शब्दैस्ते-
षु तेष्वर्थेषु बहुशः शिक्षिताः शनैः शनैः तैस्तैरेव शब्दैःसंबन्धान्तरेषुतेष्व-
र्थेषु स्वात्मनां व्युत्पत्तिं दृष्ट्वा शब्दार्थयोस्सम्बन्धान्तरादर्शनात्
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सकेतयितृपुरुषाज्ञानाच्चतेष्वर्थेषु तेषांशब्दानां प्रयोगो बोधकत्वं
निबंधन इति निश्चिन्वंति । पुनश्च व्युत्पन्नेतर शब्देषु, “अस्यशब्द-
स्यायमर्थः” इति पूर्ववृद्धैः शिक्षिताः सर्वशब्दानामर्थमवगम्य पर-
प्रत्यायनाय तत्तदर्थविबोधि वाक्यजातं प्रयुंजते । प्रकारान्तरेणापि
शब्दार्थसंबंधावधारणं सुशकम् केनचित् पुरुषेण हस्तचेष्टादिना
“पितास्ते सुखमास्ते” इति देवदत्ताय ज्ञापयेति प्रेषितः कश्चित्
तज्ज्ञापने प्रवृत्तः “पितास्ते सुखमास्ते” इति शब्दं प्रयुङ्क्ते । पास्वं-
स्थोऽन्यो व्युत्पित्सुर्मूकवच्चेष्टाविशेषज्ञस्तज्ज्ञापने प्रवृत्तमिमं ज्ञात्वाऽ-
नुगतस्तज्ज्ञापनाय प्रयुक्तं इम शब्द श्रुत्वा “अयं शब्दस्तदर्थबुद्धि-
हेतुः” इति निश्चिनोति-इति कार्यार्थं एव व्युत्पत्तिरिति निर्बन्धो
निर्निबन्धनः । अतो वेदांताः परिनिष्पन्नं परंब्रह्म, तदुपासनं चाप-
रिमितफलं बोधयंतीति तन्निर्णयफलो ब्रह्मविचारः कर्त्तव्यः ।
इस पर उत्तर पक्ष का कथन यह है कि-सामान्यतः शब्द और अर्थ
सम्बन्धी ( वाच्य वाचक भाव ) अवधारण की प्रसिद्ध प्रणाली को
छोड़कर समस्त शब्दों की अलौकिक अर्थावबोध की प्रणाली का
प्रतिपादन प्रामाणिकों की दृष्टि में बहुमान्य नहीं हो सकता ।
अबोध बालक शब्द और अर्थ के सम्बन्ध को वे अपने माता पिता
आदि गुरुजनों से “मां, पिता, मामा आदि, चन्द्र, पशु, नर, मृग,
पक्षी, सर्प आदि को अंगुली के निर्देश से इनको जानो और याद रक्खो”
शिक्षा प्राप्त करते हैं; इस प्रकार उन-उन शब्दों का वही वही अर्थ अनेक
बार बतलाने पर धीरे-धीरे उन उन शब्दों का उन्हीं अर्थों में प्रयोग
करते देखकर तथा उन शब्दों को किसी अन्य अर्थ में प्रयुक्त होते न
देखकर, संकेत करने वाले व्यक्ति के बिना भी वे बालक अपनी बुद्धि से
उन शब्दों की उन्हीं अर्थों में प्रयोग बोधकता निश्चित कर लेते है ।
अव्युत्पन्न शब्दों में “इस शब्द का यह अर्थ है” अपने पूर्वजों से जानकर
दूसरों को प्रबोधित करने के लिये और स्वतः भी भिन्न भिन्न अर्थ बोधक
वाक्यों का प्रयोग करते हैं ।
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अन्य प्रकारों से भी शब्दार्थ सम्बन्ध का अवधारण किया जा
सकता है। “तुम्हारे पिता सुख पूर्वक हैं, ऐसा देवदत्त से कह देना” ऐसा
हाथ से चेष्टा पूर्वक किसी व्यक्ति के बतलाने पर कोई व्यक्ति उस
समाचार को बतलाने में “तुम्हारे पिता सुख से है” ऐसा प्रयोग करता
है। मूक की तरह चेष्टा या हस्त संकेत मात्र से समझने वाला कोई
अन्य व्यक्ति, जो कि उस वार्ता को देख रहा था, जानने की इच्छा से
संदेशवाहक व्यक्ति के पीछे पीछे जाकर, संदेश में प्रयुक्त उन्हीं शब्दों को
सुनकर अपनी धारणा बनाता है कि—यह शब्द उस आदिष्ट अर्थ बोध का
कारण है। इसलिए-कार्य बोधक वाक्य से ही व्युत्पत्ति (शब्दार्थ सम्बन्ध
ग्रहण) हो—ऐसा आग्रह निराधार है। इससे निश्चित होता है कि—वेदांत
वाक्य, स्वतःसिद्ध परब्रह्म और उनकी उपासना तथा उस उपासना के
अपरिमित फल के बोधक है; इसलिए वेदांतार्थ के निर्णय के लिए ब्रह्म
विचार कर्त्तव्य है।
कार्यार्थत्वेऽपि वेदस्य ब्रह्मविचारः कर्त्तव्य एव। कथम
“आत्मा वा अरे दृष्टव्यः श्रोतव्यो, मंतव्यो निदिध्यासितव्यः”,
सोऽन्वेष्टव्यः विजिज्ञासितव्यः”, विज्ञाय प्रज्ञांकुर्वीत”; दहरोऽस्मिन्नंतर
आकाशः तस्मिन् यदंतः तदन्वेष्टव्यंतद्वाव विजिज्ञासितव्यम्”,
“तत्रापि दहरं गगनं विशोकः तस्मिन्यदंतः तदुपासितव्यम्”—
इत्यादिभिः प्रतिपन्नोपासनविषयकार्याधिकृतफलत्वेन “ब्रह्मविद
आप्नोति परम्” इत्यादिभिः ब्रह्मप्राप्ति श्रूयत इति ब्रह्मस्वरूप
तद्विशेषणानां दुःखसंभिन्नदेशविशेषरूप स्वर्गादिवत्, रात्रिसत्र-
प्रतिष्ठादिवत्, अपगोरणशतयातनासाध्यसाधनभाववच्च, कार्योप-
योगितयैव सिद्धेः।
वेद की कार्यार्थता स्वीकारने पर भी ब्रह्म विचार ही कर्त्तव्य है।
यदि पूछें कि कैसे ? तो सुनिये—“अरे आत्मा ही देखने सुनने, मनन
करने और चिंतन करने योग्य है”, वही अन्वेषणीय और जिज्ञास्य है,
“उसे जानकर धारणा बनाओ”, इसमें जो सूक्ष्म आकाश है, उसके अन्दर
( २२२ )
वाला अन्वेषणीय है, उसे ही विशेष रूप से जानने की इच्छा करनी
चाहिए, वहां पर भी जो दुःख रहित सूक्ष्म आकाश है उसके अन्दर
स्थित की उपासना करनी चाहिये" इत्यादि श्रुतियों में जो उपासना
विहित है "ब्रह्मवेत्ता परब्रह्म को प्राप्त होता है" इत्यादि श्रुतियो मे,
उसी उपासना के निश्चित फल ब्रह्म प्राप्ति का, उल्लेख किया गया है ।
दुःख संपर्क शून्य स्थान विशेष स्वर्ग की तरह, रात्रि सत्र से प्राप्त
प्रतिष्ठा की तरह, तथा अपगोरण (ब्राह्मण) और शत यातना के साध्य
साधन भाव की तरह, यहाँ भी कार्य विशेष के उपयोगी ब्रह्म के स्वरूप
और गुणों का अस्तित्व स्वतः सिद्ध हो जाता है ।
“गामानय” इत्यादिष्वपि वाक्येषु न कार्यार्थे व्युत्पत्तिः
भवदभिमत कार्यस्य दुर्निरूपत्वात् । कृतिभावभाविकृत्युद्देश्यं
हि भवतः कार्यम् । कृत्युद्देश्यं च कृतिकर्मत्वम् । कृतिकर्मत्वंच
कृत्याप्राप्तुमिष्टतमत्वम् । इष्टतमं च सुखं वर्त्तमान दुःखस्य
तन्निवृत्तिर्वा । तत्रेष्टसुखादिना पुरुषेण स्वप्रयत्नात् ऋते यदि
तदासिद्धिः प्रतीता, ततः प्रयत्नेच्छुः प्रवर्त्तते पुरुष इति न क्वाचि-
दपि इच्छायाविषयस्य कृत्यधीन सिद्धत्वमंतरेण कृत्युद्देश्यत्वं नाम
किंचिदप्युपलभ्यते । इच्छाविषयस्य प्रेरकत्वं च प्रयत्नाधीनसि-
द्धित्वमेव तत एव प्रवृत्तेः न च पुरुषानुकूलत्वं कृत्युद्देश्यत्वं, यतः
सुखमेव पुरुषानुकूलम् । न च दुःखनिवृत्तेः पुरुषानुकूलत्वं
“पुरुषानुकूलं सुखं तत्प्रतिकूलं दुःखम्” इति हि सुखदुःखयोः
स्वरूप विवेकः । दुःखस्य प्रतिकूलतया तन्निवृत्तिरिष्टा भवति,
नानुकूलतया । अनुकूल प्रतिकूलान्वयविरहे स्वरूपेणावस्थितिर्हि
दुःखनिवृत्तिः अतः सुखव्यतिरिक्तस्य क्रियादेः अनुकूलत्वं न
सम्भवति । न सुखार्थतया तस्याप्यनुकूलत्वम्, दुःखात्मकत्वातस्य ।
सुखार्थंतयाऽपि तदुपादानेच्छामात्रमेव भवति । न च कृतिप्रति
शेषित्वं कृत्युद्देश्यत्वम्, भवत्पक्षेशेषित्वस्यानिरूपणत्वात् ।
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( २२३ )
“गाय लाओ” इत्यादि वाक्यों में भी कार्यार्थक व्युत्पत्ति नहीं है।
आपके अभिमत, कार्य का, कौन सा रूप, उक्तवाक्य में निहित है,
यह समझ में नहीं आता। पुरुष की चेष्टा के अस्तित्व में ही
जिसका अस्तित्व है तथा पुरुष की चेष्टा ही जिसका उद्देश्य
है वही तो आपके कार्य का स्वरूप होगा। चेष्टा के उद्देश्य का तात्पर्य
है, चेष्टा का कार्य या विषय। चेष्टा के कर्म का तात्पर्य है, चेष्टा द्वारा
प्राप्त अभिलषित इष्ट। सुख या उपस्थित दुःख की निवृत्ति ही तो
मनुष्य का अभिलषित इष्ट होता है। इष्ट सुख प्राप्ति के इच्छुक व्यक्ति
को यह आभास होता है कि—अपने स्वतः प्रयास के बिना, इष्टसिद्धि
संभव नहीं है, इसलिए प्रयास की इच्छा से वह कार्य में प्रवृत्त होता है।
इच्छित विषय के प्रयत्नाधीन हुए बिना प्रयत्न उद्देश्यता, कभी देखी नहीं
जाती [अर्थात् बिना प्रयास के उद्देश्य की प्राप्ति किसी को होती नहीं]।
‘यह अभीष्ट विषय मेरे प्रयास के अधीन है’ ऐसा भान होने के बाद ही
कार्य में प्रवृत्ति होती है, इसी को प्रयत्नाधीन सिद्धि कहते हैं। सुख ही
जब मनुष्य का अनुकूल विषय है तो कृति के उद्देश्य (चेष्टा के विषय)
को पुरुष के अनुकूल नहीं कहा जा सकता, और न दुःख की निवृत्ति ही
पुरुषानुकूलता है। सुख मनुष्य का अनुकूल तथा दुःख प्रतिकूल होता
है, यही सुख दुःख संबंधी विवेक है। प्रतिकूल होने के कारण ही दुःख
की निवृत्ति इष्ट होती है, न कि अनुकूल होने से। अनुकूल और प्रतिकूल
संबंध शून्य स्वरूपावस्थिति ही तो दुःख निवृत्ति कहलायेगी [अर्थात् दुःख
निवृत्ति ही सुख नहीं है, दुःख निवृत्ति की अवस्था में न सुख रहता है न
दुःख] सुख रहित क्रियाओं में अनुकूलता हो नहीं सकती, और न सुखार्थ
साधन होने से ही उन्हें अनुकूल कहा जा सकता है, क्योंकि सारे साधन
प्रायः दुःखात्मक ही होते हैं। सुखार्थक तो वे तभी हो सकते हैं, जब उन्हें
अपनी इच्छा से सुख के साधन बनाया जाय [अर्थात् दुःख की निवृत्ति में
जो स्थिति होती है, उसे शान्ति कहा जा सकता है, वह शान्ति सुख का
साधन तो है, पर जभी है जब कि मनुष्य, साधन रूप उस शान्ति को,
साध्य रूप चिर शांति बनाये रखने के लिए, अनवरत प्रयास करता रहे,
अन्यथा वह शांति भी खलने लगेगी]। क्रिया के शेष को भी क्रिया का
उद्देश्य नहीं कहा जा सकता, क्योंकि आपका ही मत है कि—शेषिता
अनिरूपणीय तत्त्व है।
( २२४ )
न च परोद्देशप्रवृत्तकृतिव्याप्यर्हत्वंशेषत्वमिति तत् प्रति-
संबंधी शेषीत्यवगम्यते । तथासति कृतेरशेषत्वेन तां प्रति
तत्साध्यस्य शेषित्वाभावात् । न च परोद्देशप्रवृत्त्यर्हतायाशेषत्वेन
परः शेषी, उद्देश्यत्वस्यैव निरूप्यमाणत्वात् प्रधानस्यापि भृत्योद्देश-
प्रवृत्त्यर्हत्वदर्शनाच्च । प्रधानस्तु भृत्यपोषणेऽपि स्वोद्देशेन प्रवर्त्तत
इति चेन्न, भृत्योऽपि हि प्रधानपोषणे स्वोद्देशेनैव प्रवर्त्तते; कार्य-
स्वरूपस्यैवानिरूपणात् “कार्यप्रतिसंबंधी शेषः, तत्प्रतिसम्बन्धी शेषी”
इत्यप्यसंगतम् ।
दूसरे फल के उद्देश्य से प्रारंभ किये गये प्रयास के अनुगत विषय
को शेष तथा उसके संपर्कित विषय को शेषी नहीं कहा जा सकता ।
क्योंकि—कृति (प्रयत्न) ही जब शेष नहीं हो सकता, तो उससे संपर्कित
साध्य विषय ही, शेषी कैसे हो सकता है । परोद्देश्य प्रवृत्ति योग्य को
शेष तथा पर को शेषी कहें, ऐसा भी असंभव है, क्योकि-पर वस्तु की
उद्देश्यत्ता ही निरूपित हो सकती है । प्रधान की भृत्य के प्रति प्रवृत्त
कराने की क्षमता देखी जाती है [प्रधान स्वयं भृत्य के शासन में प्रवृत्त
होता नहीं देखा जाता] यदि कहो कि—प्रधान भृत्य का पोषण, अपने
उद्देश्य से ही करता है, सो ऐसा नही, भृत्य भी तो प्रधान की सेवा अपने
उद्देश्य से करता है । इस प्रकार कार्य के स्वरूप का निरूपण ही जब
दुरूह है, तो कार्य प्रतिसंबंधी शेष और उसके प्रतिसंबंधी शेषी का ऐसा
निर्देश भी असंगत है ।
नापि कृतिप्रयोजनत्वं कृत्युद्देश्यत्वम्, पुरुषस्य कृत्यारम्भ
प्रयोजनमेव हि कृतिप्रयोजनम् । स चेच्छाविषयः । तस्मादिष्ट-
त्वातिरेकिकृत्युद्देश्यत्वानिरूपणात् कृतिसाध्यताकृति प्रधानत्वरूपं
कार्यं दुर्निरूपमेव ।
कृति (प्रयत्न) के प्रयोजन को ही कृत्युद्देश्य नहीं कह सकते ।
मनुष्य के कार्यारम्भ का प्रयोजन ही वस्तुतः कृति का प्रयोजन होता है,
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( २२५ )
वह पुरुष की इच्छा का विषय होता है। इसलिए जब कि इष्टता
(इच्छाविषता) से भिन्न कृत्युद्देश्यता नही हो सकती तो कृति साध्य
(यत्ननिष्पाद्य) कृति प्रधान विषय को ही कार्य कहना कठिन है।
नियोगस्याप साक्षादिषिविषयभूत सुखदुःखनिर्वृत्तिभ्यामन्यत्वा
तत्साधतयैवेष्टत्वं कृतिसाध्यत्वं च। अत एव हि तस्य क्रियाति-
रिक्ता, अन्यथा क्रियैव कार्यं स्यात्; स्वर्गकामपदसमभिव्याहारा-
नुगुण्येन लिङादिवाच्यं कार्यं स्वर्गसाधनमेवेतिक्रणभंगिकर्मातिरेकि
स्थिरं स्वर्गसाधनमपूर्वमेव कार्यमिति स्वर्गसाधनतोल्लेखेनैव हि
अपूर्व व्युत्पत्तिः। अतः प्रथमनमन्यार्थतया प्रतिपन्नस्य कार्यस्यान-
न्यार्थत्वनिर्वहणायापूर्वमेव पश्चात् स्वर्गसाधन भवतीत्युपहास्यम्।
स्वर्गकामपदान्वितकार्याभिधायिपदेन प्रथमप्यनन्यार्थतानभिधानात्
सुखदुःखनिर्वृत्ति तत्साधनेभ्यो अन्यस्यानन्यार्थस्याकृतिसाध्यता
प्रतीत्यनुपपत्तेश्च।
सुखदुःख निवृत्ति दोनों ही इच्छा के विषय हो सकते है (विधि-
वाक्यगत) नियोग, सुख दुःख निवृत्ति से पृथक् वस्तु है। नियोग के
विषय में जो इच्छा होती है, वह सुख दुःख निवृत्ति विषयक ही होती है,
तथा उसके साधन रूप नियोग की इष्टता और कृति साध्यता भी होती
है; इसी से उसकी, क्रिया से भिन्नता होती है, अन्यथा क्रिया ही कार्य
हो जाय (अर्थात् अनुष्ठान और फल एक हो जाय) स्वर्गकाम पद के
साथ एक योग में संबंधित "लिंग" आदि विभक्ति से जो कार्य प्रतीत
होता है, वही स्वर्ग का साधन है। इससे ज्ञान होता है कि-क्षणभंगुर
याग आदि कर्मों से पृथक् एवं चिरस्थायी स्वर्ग साधन, "अपूर्व" (पाप-
पुण्यरूप अदृष्ट) ही कार्य है। स्वर्ग साधनोल्लेख से "अपूर्व शब्द के अर्थ
की ही प्रतीति होती है। इस प्रकार" अपूर्व "और" कार्य "जब एक
ही वस्तु है तब दोनों की अभिन्नता के लिए पहिले उसे "अपूर्व" कह कर
उसे ही स्वर्ग साधन बतलाना उपहासास्पद बात है। "स्वर्गकाम" पद के
साथ संबद्ध कार्य बोधक पद, पहिले भी अभिन्नता अर्थ का प्रतिपादन
नहीं करता, क्यों कि-सुखदुःख निवृत्ति और उन दोनों के साधन से
भिन्न "अनन्यता" अर्थ कभी कृतिसाध्यता ज्ञान से उत्पन्न नहीं हो
सव ता [तात्पर्य यह है कि-स्वर्गकामः अश्वमेधेन यजेत" यह विधिवाक्य
पहिले “लिगं” विभक्ति से यज्ञ की कर्त्तव्यता बतलाता है पुनः
“स्वर्गकाम” से संबद्ध होकर यज्ञ की स्वर्गसाधनता का अर्थ प्रतिपादन
करता है। यज्ञ एक अल्प कालीन क्रिया मात्र है, इससे कालांतरभावी
स्वर्ग साधन होना संभव नही है इसलिए यज्ञ के अतिरिक्त “अपूर्व”
नामक यज्ञ फल को स्वीकारना पड़ता है। यज्ञ के उपयुक्त फल न होने
तक वह “अपूर्व” रहता है, फलावाप्ति कराकर वह समाप्त हो जाता
है। स्वर्ग सुख की स्वाभाविक लालसा होती है, उस सुख की प्राप्ति के
लिए ही लोगो की यज्ञ की ओर प्रवृत्ति होती है। इसलिए “अपूर्व” और
“कार्य” पहिले अभिन्न रूप से माने जाये बाद मे स्वर्ग के साधन माने
जाये, यह बात समझ मे नही आती]
अपि च किमिदं नियोगस्य प्रयोजनत्वम् ? सुखवन्नियोगस्या-
प्यनुकूलत्वमेवेति चेत्; किं नियोगस्सुखम्, सुखमेव हि अनुकूलम् ।
सुखविशेषवन्नियोगापरपर्यायं विलक्षणं सुखान्तरमिति चेत्; किं तत्र
प्रमाणमिति वक्तव्यम् स्वानुभवश्चेत्, न, विषयविशेषानुभवसुख-
वन्नियोगानुभवसुखमिदमिति भवताऽपि नानुभूयते । शास्त्रेण
नियोगस्य पुरुषार्थतया प्रतिपादनात् पश्चात्तु भोक्ष्यत इति चेत्,
किं तन्नियोगस्य पुरुषार्थत्ववाचिशास्त्रम् । न तावल्लौकिकं वाक्यं
तस्यदुःखात्मकक्रियाविषयत्वात् तेन सुखादिसाधनतयैव कृतिसाध्य-
तामात्र प्रतिपादनात् । नापि वैदिकं, तेनापिस्वर्गादि साधनतयैव
कार्यस्य प्रतिपादनात् । नापिनित्यनैमित्तिकशास्त्रम् तस्यापि तद-
भिधायित्वं स्वर्गकामवाक्यस्थापूर्वव्युत्पत्तिपूर्वकमित्युक्तरीत्या तेनापि
सुखादिसाधनकार्याभिधानमवर्जनीयम् । नियतैहिक फलस्य
कर्मणोऽनुष्ठितस्य फलत्वेन तदानीमनुभूयमानान्नाद्यरोगतादि व्यति-
रेकेण नियोगरूप सुखानुभवानुपलब्धेश्च नियोगः सुखमित्यत्र न
[किंचन प्रमाणमुपलभामहे अर्थवादादिष्वपि स्वर्गादिसुख प्रकार-
कीर्त्तनवन्नियोगरूपसुख प्रकारकोर्त्तनं भवताऽपि न दृष्टचरम् ।
( २२७ )
मैं पूछता हूँ कि- इस विधिवाक्यस्थ नियोग की प्रयोजकता क्या
है ? यदि सुख की तरह अनुकूलता ही नियोग की प्रयोजकता है, तो क्या
सुख ही नियोग है ? क्योंकि सुख ही एकमात्र अनुकूल होता है । यदि
सुख विशेष की तरह नियोग को भी एक प्रकार का सुख ही मानते हो
तो इसका तात्पर्य हुआ कि नियोग, सुख का नामांतर मात्र है; इसबात
को भी प्रमाणित करना पड़ेगा । अपने अनुभव को ही प्रमाण नहीं कह
सकते, विषय विशेष के अनुभूत सुख की तरह “नियोगानुभव में सुख
हुआ” ऐसा तो आप भी नहीं कह सकते । यदि शास्त्र से, नियोग का
पुरुषार्थ रूप से प्रतिपादन करने से उसकी भोग्यता (सुखरूपता) निश्चित
होती है तो नियोग को पुरुषार्थ बतलाने वाले वे शास्त्र वाक्य कौन
से हैं ? लौकिक वाक्यों को तो (नियोगवाची) कह नहीं सकते, क्यों
कि-उनमें प्रायः दुःखात्मक क्रिया का ही वर्णन है, जिससे सुखादि साधन
रूप से ही कर्त्तव्यता का प्रतिपादन होता है । वैदिक वाक्यों को भी
(नियोगवाची) नहीं कह सकते उनमें भी प्रायः स्वर्ग साधनरूप से
कार्य का प्रतिपादन होता है । नित्य नैमित्तिक क्रिया विधायक शास्त्र
भी (नियोगवाची) नहीं कहे जा सकते, क्यों कि-“स्वर्गकामः यजेत्”
से जिस “अपूर्व” शक्ति की कल्पना की जाती है, उसके अनुसार ही नित्य
नैमित्तिक क्रिया विधायक वाक्यों की अर्थ बोधकता कल्पित होती है;
इस प्रकार उनसे भी सुखादि साधन रूप कार्य का ही प्रतिपादन होता है,
जो कि अनिवार्य है । जिन कर्मों का फल इस लोक में ही निश्चित है,
उन कर्मों का अनुष्ठान करने पर, फलस्वरूप अनुभूत, असन, वसन
निरोगता आदि के अतिरिक्त, “नियोग” जन्य किसी विशेष सुख की
उपलब्धि तो होती नहीं; जिससे नियोग को सुख कहा जाय, अतः
“नियोग” का सुख मानने में कोई भी प्रमाण नहीं है ।
अर्थवाद आदि वाक्यों में भी स्वर्गादि सुख के जो प्रकार कहे
गए हैं, उनकी तरह, नियोग रूप सुख के प्रकार का वर्णन तो संभवतः
आपको भी किसी शास्त्र में दृष्टिगत न हुआ होगा ।
अतो विधिवाक्येष्वपि धात्वर्थस्य कर्त्तृव्यापार साध्यतामात्रं
शब्दानुशासनसिद्धमेव लिंगादेर्वाच्यमित्यध्यवसीयते । धात्वर्थस्य च
यागादेरग्न्यादि देवतान्तर्यामिपरंपुरुषसमाराधनरूपता, समाराधि-
...न्तरात् पुरुषात्फलसिद्धिश्चेति "फलमत उपपत्तेः" इत्यत्र प्रति-
पादयिष्यते । अतोवेदान्ताः परिनिष्पन्नं परंब्रह्म बोधयन्तीति
ब्रह्मोपासनफलानन्त्यंस्थिरत्वं च सिद्धम् । चातुर्मास्यादि
कर्मस्वपि केवलस्यकर्मणः क्षयिफलत्वोपदेशादक्षयफलश्रवणं "वायु-
श्चांतरिक्षं चैतदमृतम्" इत्यादिवदापेक्षिकं मंतव्यम् ।
अतः केवलानां कर्मणामल्पास्थिरफलत्वात् ब्रह्मज्ञानस्य
चानंतस्थिरफलत्वात् तन्निर्णयफलो ब्रह्मविचारारम्भोयुक्त इति
स्थितम् ।
इससे सिद्ध होता है कि-विधिवाक्यों में कर्त्ता की कार्य साध्यता
मात्र ही, लिंग आदि धातु का शब्दानुशासन (व्याकरण) सिद्ध सही
वाच्यार्थ है । अग्नि आदि देवताओं के भी अन्तर्यामी परमपुरुष भगवान
की सम्यक् आराधना तथा आराधित परमपुरुष से होने वाली फलसिद्धि
ही, यागादि शब्द वाच्य "यज्" धातु का मुख्यार्थ है; "फलमत उपपत्तेः"
सूत्र में इसी तथ्य का प्रतिपादन किया जायगा। वेदांत वाक्य स्वतः सिद्ध
परं ब्रह्म का ही प्रतिपादन करते हैं, उसी से ब्रह्मोपासना की अनंत और
स्थिर फलता भी सिद्ध होती है। चातुर्मास्य आदि कर्मों में भी केवल
कर्म के फल को नाशवान् बतलाया गया है । "वायु और अंतरिक्ष दोनों
अमृत हैं" इस वाक्य में जैसे "अमृत" का अर्थ आपेक्षिक है (अर्थात्
अन्यों की अपेक्षा चिरस्थायी है) वैसे ही चातुर्मास्यादि व्रतों का फल
आपेक्षिक है ।
इससे स्पष्ट होता है कि ज्ञान संबंध रहित केवल कर्मों का फल
अल्प और अस्थिर तथा ब्रह्म ज्ञान का फल अनंत और स्थिर है, अतः
ब्रह्म ज्ञान के स्वरूप निरूपण के लिए ब्रह्म विचार करना आवश्यक है,
यही मत निश्चित होता है ।
२ जन्माद्यधिकरण-
किं पुनस्तद्ब्रह्म, यज्जिज्ञास्यमुच्यते, इत्यत्राहः-
जिसे जिज्ञास्य कहा गया है, वह ब्रह्म कैसा है ? इसी आकांक्षा का
समाधान करते हैं ।
[email protected]
( २२६ )
जन्माद्यस्य यतः १।१।२—
जन्मादीति, सृष्टिस्थितिप्रलयम् तद्गुण संविज्ञानो बहुव्रीहिः ।
अस्याचिन्त्यविविधविचित्ररचनस्यनियतदेशकालफलभोग ब्रह्मादिस्त-
म्बपर्यन्तक्षेत्रज्ञमिश्रस्य जगतः । यतः—यस्मात् सर्वेश्वरान्निखिल-
हेयप्रत्यनीकस्वरूपात्सत्यसंकल्पाद्ज्ञानानंदाद्यनंतकल्याणगुणात् सर्व-
ज्ञात् सर्वशक्तेः परमकारुणिकात् परस्मात् पुंसः सृष्टिस्थितिप्रलयाः
वर्त्तन्ते; तत् ब्रह्मेति सूत्रार्थः ।
जन्मादि का अर्थ है, सृष्टि, स्थिति और प्रलय । यहाँ तद्गुण
संविज्ञान बहुव्रीहि समास है । अस्य का अर्थ; अचिन्त्य, विविध, विचित्र
रचनात्मक, नियमित देश-काल-फलोपभोग संपन्न, ब्रह्म से लेकर स्तम्ब
पर्यन्त, जीवों से युक्त जगत् है । यतः का तात्पर्य है--जिस, हीन दोष
रहित, सत्यसंकल्प, ज्ञानआनंदादि अनंत कल्याणमय गुणवाले, सर्वज्ञ,
सर्वशक्तिमान्, परमकारुणिक, सर्वेश्वर, परब्रह्म, परमात्मा, से सृष्टि-
स्थिति-प्रलय का प्रवर्त्तन होता है, वही ब्रह्म है । यही सूत्रार्थ है ।
पूर्वपक्षः—भृगुर्वैवारुणिः, वरुणं पितरमुपससार, अधीहिभगवो
ब्रह्म"—यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति,
यत् प्रयन्त्यभिविशन्ति, तद्विजिज्ञासस्व, तद्ब्रह्म"—इति श्रूयते ।
तत्र संशयः किमस्माद्वाक्यात् ब्रह्मलक्षणतः प्रतिपत्तुं शक्यते, नवा
इति । किं प्राप्तं ? न शक्यमिति, न तावज्जन्मादयो विशेषणत्वेन
ब्रह्म लक्षयन्ति, अनेकविशेषणव्यावृत्तत्वेन ब्रह्मणोऽनेकत्वप्रसक्तेः,
विशेषणत्वंहि व्यावर्तकत्वम् ।
"वरुण पुत्र भृगु, वरुण के निकट जाकर कहते हैं —भगवन् !
मुझे ब्रह्म का उपदेश दें"—जिससे यह सारा भूत-समुदाय उत्पन्न होता है,
जिसके आधार पर जीवित रहता है, तथा प्रयाण के समय जिनमें लीन
हो जाता है, उसी को जानने की चेष्टा करो वही ब्रह्म है—"ऐसा श्रुति
प्रमाण है । यहाँ संशय होता है कि— इस वाक्य से ब्रह्म का लक्षण जाना
जा सकता है या नहीं ? कह सकते हैं कि— नहीं जान सकते, क्यों कि—
उक्त वाक्य में जन्म आदि विशेषणों वाले ब्रह्म का व्याख्यान है, अनेक
[email protected]
( २३० )
विशेषणों से युक्त मानने से ब्रह्म में अनेकता आजायगी । विशेषणता का
अर्थ ही पार्थक्य साधक होता है ।
ननु “देवदत्तः श्यामो युवा लोहिताक्षः समपरिमाणः” इत्यत्र
विशेषणबहुत्वेऽप्येक एव देवदत्तः प्रतीयते । एवमत्राप्येकमेव ब्रह्म
भवति । नैवम्—तत्र प्रमाणान्तरेणैक्यप्रतीतेः एकस्मिन्नेव विशेषणा-
नामुपसंहारः । अन्यथा तत्रापि व्यावर्तकत्वेनानेकत्वमपरिहार्यम् ।
अत्र त्वनेनैवविशेषणेन लिलक्षयिषितत्वात् ब्रह्मणः प्रमाणान्तरेणै-
क्यमनवगतमिति व्यावर्तकभेदेन ब्रह्मबहुत्वमवर्जनीयम् ।
(तर्क) “देवदत्त श्यामवर्ण का युवा, लालनेत्रों वाला सुडौल
व्यक्ति है” इस वर्णन में, अनेक विशेषणों वाला एकही व्यक्ति कहा गया
है, वैसे ही उपर्युक्त ब्रह्मलक्षण बोधक श्रुति वाक्य में अनेक विशेषणों वाले
एक ही ब्रह्म का वर्णन है [वितर्क] ऐसी बात नही है क्यों कि- देवदत्त के
वर्णन में तो, प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से एक देवदत्त की स्पष्ट प्रतीति होती
है, इसलिए अनेक विशेषणों का समन्वय हो जाता है, यदि स्पष्ट प्रतीति
न होती तो, विशिष्टता ज्ञापक पार्थक्य से अनेकता अनिवार्य हो जाती ।
ब्रह्म के प्रसंग में तो, विशेषणों द्वारा ही लक्षण बतलाने की चेष्टा की गई
है, किसी अन्य प्रमाण से तो उसकी एकता ज्ञात होती नही, इसलिए
विभिन्न विशेषताओं से ब्रह्म की अनेकता अनिवार्य हो जाती है ।
ब्रह्मशब्दैक्यादाप्यैक्यं प्रतीयेत् इति चेत् न, अज्ञातगो व्यक्तेः
जिज्ञासो पुरुषस्य “षण्डो मुण्डः पूर्णशृंगो गौः” इत्युक्ते गोपदैक्येऽपि
षण्डत्वादि व्यावर्तकभेदेन गोव्यक्तिबहुत्वप्रतीतेः ब्रह्मव्यक्तयोऽपि
बह्व्यः स्युः । अतएव लिलक्षयिषिते वस्तुनि एषां विशेषणानां
संभूय लक्षणत्वमप्यनुपपन्नम् ।
ब्रह्म शब्द एक है, इसलिए सारे विशेषण भी एक होंगे ऐसा भी
नहीं कह सकते; जैसे-जो व्यक्ति गौ को नही जानता, वह उसे जानना
चाहता है, यदि उससे कहा जाय कि-“षण्ड-मुंड बड़ी सींगों वाली गौ होती
है” तो उसे एक गौ के विशेषणों के पार्थक्य से अनेक गो रूपों की प्रतीति
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