स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
३७६ स्पन्दकारिका
दूसरा कार्य, एक स्रष्टा है दूसरा सृष्टि एवं कारण है तो दूसरा कार्य है। शब्द की गोद में
उसके अर्थ—खंग, उदक, आदर्श (दर्पण) आदि पदार्थ—स्थित हैं—ये पदार्थ 'शब्द'
के अवभास मात्र हैं—
'स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुरन्यथा ।
प्रकाशोऽर्थोपरक्तोऽपि स्फटिकादिजडोपमः ॥' (प्रत्यभिज्ञा)
अन्यत्र भी कहा गया है—
'न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगं विना ।
अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते ॥'
और वह सर्वाच्छेद-विरहित-विशुद्ध-चित्रप्रकाशात्मक मुख्यार्थनिष्ठ होकर प्रत्यव-
मर्श कहलाता है—'स च सर्वाच्छेदविरहितविशुद्ध चित्रप्रकाशात्मक मुख्यार्थनिष्ठः सन्
प्रत्यवमर्श इत्युच्यते ॥'
'विकल्प' क्या है? जाति गुण क्रिया आदि अभिधानादिक विविध विशेषावच्छिन्न
भिन्नरूपात्मक विश्वात्मकार्थावभासनिष्ठ ही विविध कल्पनात्मक होने के कारण
'विकल्प' कहलाते हैं—
'जाति गुण क्रियाभिधानादिविविध विशेषावच्छिन्नभिन्नरूपविश्वात्मकार्थावभासनिष्ठ-
स्तु, विविधकल्पनात्मकत्वात् विकल्प इत्युच्यते ॥' वही शब्द का मुख्य रूप है—'तदेव
शब्दस्य मुख्यं रूपं ।' उसके संकेतत्व द्वारा व्यवस्थित, श्रोत्रग्राह्य ध्वनिविशेषात्मक अर्थ
ही प्रायः 'शब्द' के नाम से व्यवहियत किया जाता है—
'तत्संकेतत्वेन व्यवस्थितः श्रोत्रग्राह्यो, ध्वनिविशेषात्मकोऽर्थ एव प्रायेण शब्द इति
व्यवहियत े ॥'
अतः शब्दरूपतापन्न, एवं प्रत्ययोद्भवप्राणभूत शक्तियाँ ही इस स्वरूपावरण करने
के कार्य में सदोद्युक्त रहा करती हैं—'तस्माच्छब्दरूपतामापन्नाः प्रत्ययोद्भवप्राणभूताः
शक्तय एवास्य स्वरूपावरणे सदोद्युक्ता' ।
पशु = 'शक्तिवर्गस्य भोग्यतां गतः सन् पशुः स्मृतः ॥'
कहा भी गया है—स्वरूपस्य स्वस्वभावस्याच्छादने ॥'१
स्वरूपावरण : बन्धन—(१) ब्राह्मी आदि शब्दाधिष्ठात्री शक्तियाँ जीवों के
स्वरूप पर आवरण डालने हेतु सदैव उद्यत रहती है 'स्वरूपावरणे चास्य शक्तयः
सततोत्थिताः' ।
(२) 'शब्दानुवेध' (प्रत्ययों में शब्दानुस्यूतता) के बिना प्रत्ययों का आविर्भाव
संभव ही नहीं है—'यतः शब्दानुवेधेन न बिना प्रत्ययोद्भवः ॥'
भट्टकल्लट की व्याख्या—'स्पन्दसर्वस्व' में वृत्तिकार कहते हैं कि—'स्वरूप'
अर्थात् स्वभाव के आच्छादन में पुरुष की ब्राह्मी आदि शक्तियाँ सदैव उद्यत रहती हैं।
१. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दविवृति' ।
तृतीयः निष्यन्दः ३७७
शब्द-शून्य प्रत्यय (ज्ञान) का आविर्भाव हो ही नही सकता। सारांश यह कि प्रत्ययों का
मूल शब्द है अतः शब्द शून्य ज्ञान संभव नहीं है।
स्वरूप = स्वभाव। आवरण = आच्छादन। चास्य = च + अस्य = और इस
पुरुष की। शक्तयः = पूर्वोक्त ब्राह्मी आदि अष्ट वर्गाधिष्ठात्री शक्तियाँ। उत्थिता = उद्यत
रहती हैं। यतः = क्योंकि 'शब्दानुवेधेन न विना' = शब्दों की अनुस्यूतता के बिना।
प्रत्ययोद्भवः = किसी भी प्रत्यय या ज्ञान का आविर्भाव नहीं हो सकता।
आत्मा का स्वरूपावरण—ब्राह्मी आदि शाब्दी शक्तियाँ पुरुष (जीव) के
'स्वभाव' पर आवरण डालने के लिए निरन्तर उद्यत रहती हैं।
प्रत्ययोद्भव = स्व शक्ति के विरोध के कारण विकल्प शून्य स्वरूप में ज्ञेय
विषयों से सम्बद्ध विकल्पात्मक ज्ञानों के उदित होने को 'प्रत्ययोद्भव' कहा गया है।
शब्द की सहायता (सहकारिता) के अभाव में किसी भी प्रत्यय (विकल्पात्मक ज्ञान) का
आविर्भूत होना कथमपि संभव नहीं है।
स्वरूपावरण—इस कारिका में पुरुष के स्वरूप पर जो आवरण पड़ जाता है
उसकी विवेचना की गई है।
आचार्य क्षेमराज ने 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में इसका सुन्दर विवेचन किया है। वे
कहते हैं—
'जब चिदात्मा परमेश्वर अपनी (स्वातन्त्र्य शक्ति से) स्वतन्त्रतापूर्वक अभेद-व्याप्ति
को संकुचित करके भेद व्याप्ति का अवलम्बन ग्रहण करते हैं तब उनकी इच्छादिक
शक्तियाँ असंकुचित होने पर भी संकुचित प्रतीत होती हैं। तभी यह मलों से आवृत
होकर संसारी हो जाता है।'
'यदा चिदात्मा परमेश्वरः स्वस्वातन्त्र्यात् अभेद व्याप्तिं विमृज्य भेद व्याप्तिं अव-
लम्बते तदा 'तदीया इच्छादिशक्तयः' असंकुचिता अपि संकोचवत्यो भान्ति, तदानीमेव च
अयं मलावृतः संसारी भवति॥' चाहे 'पतिभूमिका' हो चाहे 'पशुभूमिका' हो सभी
भूमिकायें चिदात्मा भगवान् की स्वातन्त्र्य शक्ति द्वारा अवभासित हैं—सभी भूमिकाओं में
एक ही आत्मा व्याप्त है—
'एकस्यैव चिदात्मनो भगवतः स्वातन्त्र्यावभासिता सर्वा इमा।
भूमिका ..... अतएव एक एव एतावद्व्याप्तिक आत्मा॥'
(क) स्वरूपावरण की एक शक्ति तो ब्राह्मी आदि शाब्दी अष्ट शक्तियाँ हैं। ये
शब्दानुविद्ध ज्ञान द्वारा स्वरूपावरण करती है। इनके स्वरूपावरण का साधन है :
शब्दानुविद्ध प्रत्यय॥ इसी लिए तो कहा गया है—'ज्ञानं बन्धः' (शिवसूत्र)॥
(ख) स्वरूपावरण का दूसरा साधन है—'मलत्रय' अर्थात् 'आणवमल'
'मायीय मल' 'कार्ममल'॥ 'ज्ञानंबन्धः' का ज्ञान 'विकल्पज्ञान' है न कि आत्मज्ञान॥
यह विकल्प ज्ञान भी स्वरूपावरण का कारण है।
शक्तियोँ का यह स्वभाव है कि वे प्रतिक्षण जीवों की आत्मा पर मायिक
३७८ स्पन्दकारिका
आवरण डालकर उन्हें दिग्भ्रान्त करती रहें किन्तु ये ही शक्तियाँ शिव भूमिका (पति-
भूमिका) पर जहाँ कि शक्ति का अर्हविमर्शात्मिका स्पन्दना स्थित है और पूर्ण स्वातन्त्र्य
उल्लसित है वहाँ वे स्वरूप गोपन की क्रिया करके स्वरूपावरण नहीं करतीं क्योंकि शक्ति
जब तक माया की भूमिका पर आरूढ़ होकर बहिर्मुखी नहीं होती तब तक स्वरूपावरण
नहीं करती किन्तु मायाशक्ति का रूप धारण करते ही वह स्वरूपगोपनात्मिका क्रीड़ा प्रारंभ
कर देती है इसीसे इसे 'स्वरूपगोपन व्यग्रा' कहा जाता है—
स्वरूप गोपन क्रीडा— 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' (सूत्र १२) में आचार्य क्षेमराज कहते
हैं—(१) 'भगवती चिति शक्ति ही विश्व का वमन या बहिः प्रकाशन करने के कारण या
संसार रूप वाम (विपरीत) आचरण करने के कारण 'वामेश्वरी' का रूप ग्रहण करती
हुई, 'खेचरी' 'गोचरी' 'दिक्चरी' तथा 'भूचरी' रूप प्रमाता । अन्तःकरण, बाह्य
करण एवं वस्तु स्वभाव रूप में स्फुरित होती है ।'¹
(२) 'पशु भूमिका में शून्य पद ग्रहण करके पारमार्थिकी 'चिद्गगनचरी' का स्वरूप
छिपाकर, किंचित्कर्तृत्वादिरूप कला आदि शक्त्यात्मक खेचरी चक्र रूप में प्रकाशित
होती हैं ॥'
(३) 'अभेद निश्चयादिरूप पारमार्थिक स्वरूप छिपाकर, भेद निश्चय भेदाभिमान
एवं भेदकल्पना प्रधान अंतःकरणों की देवी रूप 'गोचरी चक्र' के रूप में प्रकाशित
होती है ।'²
(४) 'अभेद प्रथात्मक पारमार्थिक जिसमें आवृत्त है तथा भेद का आलोचन आदि
जिसमें प्रधान हैं—ऐसी बाह्य करणों की देवी स्वरूप दिक्चरी चक्र के रूप में भी वही
चिति उदित होती है तथा सर्वात्मरूप को छिपाकर भेदाभास स्वभाव, प्रमेय रूप
'भूचरीचक्र' के रूप में पशु हृदयों को मूढ़ बनाती हुई शोभित होती है ।'³
स्वरूप गोपन-क्रीड़ा और उसके साधन
'मल' (अज्ञान) विकल्पज्ञान
आणवमल मायीयमल कार्ममल अष्ट शक्तियाँ
ब्राह्मी माहेश्वरी कौमारी वैष्णवी वाराही ऐन्द्री चामुण्डा महालक्ष्मी
(क वर्ग) (च वर्ग) (ट वर्ग) (त वर्ग) (प वर्ग) (य वर्ग) (श वर्ग) (अ वर्ग)
'पतिभूमिका में तो सर्वकर्तृत्वदि शक्तिरूप—'चिद्गगनचरी' अभेदनिश्चयादिरूप
गोचरी । भेदालोचनाद्यात्मक दिक्चरी और निजांगस्वरूप अद्वैतप्रथासारभूत
प्रमेयात्मक 'भूचरी' रूप से पति-हृदय को विकसित करती हुई स्फुरित होती है ।'⁴
१. राजाचनक क्षेमराज—'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' । २. 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' ।
३. 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' । ४. 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' ।
तृतीयः निष्यन्दः ३७१
जो शाब्दी शक्तियाँ पशुप्रमाताओं को बन्धन में डालती हैं वे सदैव बन्धन का
कारण ही नहीं बनती प्रत्युत्—
'पूर्णप्रमाता, परिमितप्रमाता तथा उसके अन्तःकरण, बाह्यकरण एवं प्रमेयगत
वामेश्वरी आदि शक्तियाँ ज्ञात होने पर मुक्ति देने वाली और अज्ञात होने पर बन्धन प्रद
बन जाती है— 'पूर्णावच्छिन्नमात्रन्तर्बहिष्करणभावगाः ।
वामेशाद्याः परिज्ञानाज्ञानात् स्युर्मुक्तिबन्धदाः ॥'१
निखिलजगदात्मा एवं संविदात्मा महेश्वर अपनी स्वरूप गोपन क्रीड़ा द्वारा 'अणु'
बन जाता है—
'इत्थं सर्वशक्तियोगेऽपि आभिर्मुख्याभिः शक्तिभिरुच्यते, स च भगवान् स्वातन्त्र-
शक्ति महिम्ना स्वात्मानं संकुचितमिव आभासयत अणुः इति ॥'२
'मायीयमल'–स्वरूपावरण को ही शब्दान्तर में 'मायीय मल' भी कहते हैं—
'जब ज्ञान शक्ति क्रमश संकुचित होकर भेद दशा में, सर्वज्ञता से अल्पज्ञत्व प्राप्त करती
है और अन्तःकरण तथा ज्ञानेन्द्रियता की प्राप्ति के साथ अत्यन्त संकोच ग्रहण करती है
तब उसको देहादिक भिन्न-भिन्न का वेद्यों का विकास रूप 'मायीय मल' कहते हैं'—
(१) 'ज्ञानशक्तिः क्रमेण संकोचात् भेदे सर्वज्ञत्वस्य किंचिज्ज्ञत्वाप्तेः अन्तःकरण-
बुद्धीन्द्रियतापत्ति पूर्वं अत्यन्तं संकोचग्रहणेन भिन्नवेद्यप्रथाप्रथारूपं मायीयं मलम् ॥'३
(२) उत्पलदेवाचार्य 'प्रत्यभिज्ञाकारिका' में कहते हैं—
'भिन्नवेद्य प्रथात्रैव मायाख्यं जन्मभोगदम्' ।४
'भिन्नवेद्यजुषां मायामलं विद्येश्वरायश्च ते ॥'५
'कर्तृत्वयोगेऽपि बोधानां कार्मोत्तीर्णानां विद्येश्वराख्यानां भिन्नवेद्यभाक्त्वेन माया
मलम् ॥'६
'मायीयमल' एवं 'आणवमल' में भेद है कि—'जब चिदात्मा परमेश्वर अपने
स्वातन्त्र्य से अभेद व्याप्ति को संकुचित करके भेद व्याप्ति का अवलम्बन ग्रहण करते
हैं तब उनकी इच्छादिक शक्तियाँ असंकुचित होने पर भी संकुचित प्रतीत होती हैं तभी
यह मलों से आवृत होकर संसारी हो जाता है और अप्रतिहत स्वातन्त्र्यरूप इच्छाशक्ति
संकुचित होकर अपूर्णामन्यतात्मक आणवमल कही जाती है ।'—
'यदा चिदात्मा परमेश्वरः स्वस्वातन्त्र्यात् अभेदव्याप्तिं निमज्ज्य भेदव्याप्तिम्
अवलम्बते, तदा 'तदीया इच्छाशक्तयः' असंकुचिता अपि संकोचवत्यो भान्ति, तदानीमेव
च अयं मलावृतः संसारी भवति तथा च अप्रतिहत स्वातन्त्र्यरूपा इच्छाशक्ति संकुचिता
सती अपूर्णाम्मन्यतारूपम् आणवं मलम् ॥'७
१. 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' (भट्टदामोदर का उद्धरण) । २. 'जन्ममरणविचार'—वामदेव।
३. क्षेमराज—'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' । ४. 'प्रत्यभिज्ञाकारिका' ।
५. 'प्रत्यभिज्ञाकारिका' । ६. 'प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति' ।
७. 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्'
३८० स्पन्दकारिका
मायीय आवरणों के द्वारा आच्छादित होने के कारण शिव अपने ही अंगभूत वेद्य
पदार्थों को अपने स्वरूप से भिन्न समझने के सङ्कोच की परवशता में पड़ जाता है।
'शब्दानुवेध' शब्द ध्यातव्य है। वृत्तिकार ने ठीक ही कहा है कि 'शब्दरहितस्य
प्रत्ययस्य ज्ञानस्य नास्त्येव कस्यचिदुद्भवः ॥' विश्व के प्रत्येक पदार्थ के साथ उसके
वाचक शब्द का शाश्वत सम्बन्ध जुड़ा है। इसे ही कहा गया है कि—'प्रत्येक अर्थ (ज्ञेय
पदार्थ) प्रकाशरूप है।' शब्द ही प्रत्येक अर्थ को ज्ञान के रूप में (उसको) सत्ता प्रदान
करता है क्योंकि विश्व में ऐसा कोई अर्थ या उसका ज्ञान नहीं है जिसके साथ
शब्दानुवेध न हो। 'शब्द' एवं अर्थ का साहचर्य शिव शक्ति का यामल है—
'वागार्थाविवसंपृक्तौ पार्वतीपरमेश्वरौ' (कालिदास)
शिव की क्रियात्मिका शक्ति के कार्य—
सेयं क्रियात्मिका शक्तिः शिवस्य पशुवर्तिनी ।
बन्धयित्री स्वमार्गस्था ज्ञाता सिद्धयुपपादिका ॥ ४८ ॥
शिव की यह क्रियात्मिका शक्ति स्वयं शिव को पशुत्व प्रदान करती है और उसके
लिए बन्धयित्री बन जाती है। ज्ञात होने पर स्वात्म की ओर गतिशील यह शक्तिमुक्ति
रूपी सिद्धि प्रदान करती है ॥ ४८ ॥
- सरोजिनी *
क्रियात्मिका शक्ति—'क्रियाशक्तिस्तु, रौद्रीयं वैखरी विश्वविग्रहा।' (यो०ह०)
सेयं = (सा इयं) = वह यह ! शिवस्य = स्वस्वभाव परमेश्वर शिव की। क्रियात्मिका
= तत्स्वरूपप्रत्यवमर्शलक्षणव्यापारशरीरा। शक्तिः = सामर्थ्यरूप अव्यभिचारीधर्म। इयं
= प्रतिपादित प्रसररूपा शक्ति अद्वयचिन्मात्रस्वभावप्रत्यवमर्शिनी पारमेश्वरी शक्ति। पशु
= जीव। 'पशु'—
(१) 'शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् ।
कलाविलुप्तविभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥'१
(२) 'स्वाङ्गरूपेषु भावेषु प्रमाता कथ्यते पतिः ।
मायातो भेदिषु क्लेशं कर्मादिक्लुषः पशुः ॥'२
(३) 'भेदग्रन्थिविभेदे हि कर्मात्मैक्यं प्रपद्यते ॥
सोऽविज्ञातः पशुः प्रोक्तो विज्ञातः पतिरेव सः ॥'३
(४) 'बाह्यादिशक्ति चक्रस्य कलाभिः ककाराद्यक्षरैर्विलुप्तविभवो हतमहाव्याप्तिः
स्वभावात् प्रच्यावितोऽत एवास्य भोग्यतां गतः सन् पुरुषः पशुरुच्यते अज्ञत्वात् ॥'४
पशु—वर्णसमुदाय ही 'शब्दराशि' है। अकार से क्षकार पर्यन्त समस्त मातृकायें ही
१. स्पन्दकारिका (श्लोक ४५)। २. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा।
३. ऐश्वर्यदशायां प्रमाता विश्वं शरीरतया पश्यन् 'पतिः' पुंस्त्वावस्थायां तु रागादि-
क्लेशकर्मविकाशायैः परीतः पशुः (प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति : उत्पलदेव)।
४. स्पन्दप्रदीपिका (उत्पलदेव)।
तृतीयः निष्यन्दः ३८१
शब्दों की जननी हैं ('शब्दानां राशिः शब्दराशिः वर्णसमूहो मातृका अकारादिक्षकारान्ता
शब्दजननी')—क्योंकि समस्त शक्तियाँ वर्णात्मिका हैं। जगत् कादिवर्गात्मक शब्द समूह
से उत्पन्न है। उन्हीं से अर्थात् चाहे ककारादि अक्षर के रूप से या चाहे ब्राह्मी आदि शक्ति
रूप चक्र की कलाओं से—अर्थात् ककारादि अक्षरों से श्रवण एवं उच्चारण द्वारा—'पुरुष'
अपने वैभव को खो देता है। अपनी महाव्याप्ति को विस्मृत कर देता है और अपने
सर्वव्यापक एवं तात्त्विक स्वभाव से च्युत हो जाता है। परिणामतः वह जिन शक्तियों का
स्वामी होता है उन्हीं का भोग्य बनकर पुरुष के स्थान पर 'पशु' बन जाता है। 'ईश्वर-
प्रत्यभिज्ञा' में भी कहा गया है कि—सभी भाव अपनी गोद में अपनी अंगचेष्टा के समान
हैं। उनका स्वामी प्रमाता, संवित् या 'शिव' के नाम से अभिहित किया जाता है।
किन्तु जब वह उन्हीं भावों का दास बनकर फँस जाता है तब कर्म के पंक से लथपथ होकर
'पशु' कहा जाने लगता है। ठीक भी है—'वस्तुतः भेदग्रंथि स्वतः छिन्न-भिन्न है। उसके
छिन्न-भिन्न होने का ज्ञान होने पर द्वैत है ही नहीं। इस बात को जो नहीं जानता वही 'पशु'
है और जो उसे जान लेता है वही 'पशुपति' है। १ 'क्रियात्मिका शक्तिः'—शिव की अनन्त
शक्तियाँ हैं उन्हीं से एक क्रियाशक्ति भी है। उनकी मुख्य शक्तियाँ पाँच हैं—(१) प्रकाश-
रूप 'चित् शक्ति' (२) स्वातन्त्र्यरूप 'आनन्दशक्ति' (३) उपभोगात्मक चमत्कार रूप
'इच्छाशक्ति' (४) आमर्शात्मक अर्थात् वेद्य के प्रति उन्मुखता स्वरूप 'ज्ञान शक्ति' (५)
सर्वाकारयोगित्व रूप 'क्रियाशक्ति'। इस शक्ति के दो कार्य हैं—(१) बन्धन (२) मोक्ष।
(१) प्रकाशरूपता चिच्छक्तिः २ (२) स्वातन्त्र्यं आनन्दशक्तिः ३ (३) तच्चमत्कारः
इच्छाशक्तिः ४ (४) आमर्शात्मकता ज्ञान शक्तिः ५ (५) सर्वाकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः ६
('जन्ममरणविचार' : वामदेव भट्टाचार्य) ॥
चिदानन्दघन परमशिव विश्वरूपात्मिका क्रीड़ा के आरंभ में—'इच्छा' 'ज्ञान' एवं
'क्रिया' नामक अपनी शक्तियों द्वारा शिव तत्त्व से लेकर पृथ्वीपर्यन्त निखिल सृष्टि-चक्र
का प्रवर्तन करते हैं। शिव उस सार्वभौम नृपति की भाँति लीला करते हैं जो अपनी
पैदल, वायु, सामुद्र आदि चतुरंगिणी सेना के कार्यों के साथ एकीभूत होकर युद्ध क्रीड़ा
किया करता है—
यथा नृपः सार्वभौमः प्रभावामोदभावितः ॥ ३७ ॥
क्रीडन् करोति पादातधर्मांस्तद्धर्मधर्मतः ।
तथा प्रभुः प्रमोदात्मा क्रीडत्येवं तथा तथा ॥ ३८ ॥
इत्थं शिवो बोधमयः स एव परनिर्वृतिः ।
सैव चोन्मुखतां याति सेच्छाज्ञानक्रियात्मताम् ॥ ३९ ॥७
वे शिव अपने शिवत्व को विस्मृत किये हुए से 'पशु' आदि प्रमाताओं एवं नील
सुखादि प्रमेयों का भेद अंगीकार करते हैं। व्यवहारदशा में स्वरूपविस्मृत, सुखदुःखादि
अनेक संवेदनों से समाकुल, समल एवं संकुचित चित्त 'पशु' (जीव) को स्वरूपाभिज्ञान
१. स्पन्दप्रदीपिका । २-६. तन्त्रसार (आ० १)।
७. शिवदृष्टि (प्र० आ०)।
३८२ स्पन्दकारिका
की आवश्यकता होती है क्योंकि इसके बिना वह अपनी पूर्ववर्ती स्वातन्त्र्य या
आनन्दशक्ति से रहित होकर संतप्त रहता है और इसी संताप को दूर करने एवं निज
वैभव प्राप्त कर पाने हेतु ही प्रत्यभिज्ञाशास्त्र का उपदेश दिया गया है—
तैस्तैरप्युपयाचितैरुपन्नतस्तन्व्याः स्थितोऽप्यन्तिके,
कान्तो लोक समान एवमपरिज्ञातो न रन्तुं यथा।
लोकस्यैष तथानवेक्षितगुणः स्वात्माऽपि विश्वेश्वरो,
नैवालं निजवैभवाय तदियं तत्प्रत्यभिज्ञोदिता ॥ १
क्रियाशक्ति—परमात्मा अपने स्वप्रकाश रूप स्वरूप में जिस शक्ति के द्वारा
विश्वात्मक भाव से विभिन्न पदार्थों का भेदावभासन करता है उसी 'भासना' को 'क्रिया-
शक्ति' कहा जाता है—'भासना च क्रियाशक्तिरिति शास्त्रेषु कथ्यते।
यया विचित्रतत्त्वादिकलना प्रविभज्यते ॥ २
सर्वाकार योगित्व ही क्रिया शक्ति है (सर्वाकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः ।) ३
विश्वस्फार ही क्रियाशक्ति का स्वरूप है। ४
पाँचशक्तियों से समवेत होने पर भी शक्तिमान शिव विश्वाभास में निम्न तीन
शक्तियों का ही उपयोग करते हैं—(१) इच्छा शक्ति (२) ज्ञान शक्ति (३) क्रिया
शक्ति—'एवं मुख्याभिः शक्तिभिः युक्तोऽपि वस्तुतः इच्छा-ज्ञान-क्रियाशक्तियुक्तः
अनवच्छिन्नः प्रकाशो निजानन्दविश्रान्तः शिवरूपः ॥' ५
'चितशक्ति' (प्रकाश = स्वरूप परामर्श) एवं 'आनन्दशक्ति' (विमर्श =
स्वातन्त्र्य शक्ति) शक्ति के पूर्ण स्वरूप की अवस्थायें हैं। स्वातन्त्र्य रूप 'विमर्श' का
स्वरूपपरामर्श रूप 'प्रकाश' ही उसकी चिकीर्षा रूप 'इच्छाशक्ति' है और यह इच्छाशक्ति
ही अपनी उच्छूनावस्था में ज्ञानशक्ति एवं क्रियाशक्ति बन जाता है 'इच्छाशक्तिश्च
उत्तरोत्तर उच्छूनस्वभावतया क्रियाशक्तिपर्यन्ती भवति ॥' ६ आचार्य क्षेमराज ने इसकी
व्याख्या करते हुए कहा है कि—एक ही स्वातन्त्र्यरूप इच्छाशक्ति जगदाभास क्रम में
तरतमभाव से ज्ञान और क्रिया शक्ति के नाम से जाने जाते हैं ७— चिद्रूपु, स्वतन्त्र
परमशिव की कर्तृतारूपा कारणता या चिकीर्षा ही 'क्रियाशक्ति' है—'चिद्रूपुषः स्वतन्त्रस्य
विश्वात्मना कर्तुमिच्छैव जगत्प्रति कारणता कर्तृतारूपा सैव क्रियाशक्तिः ॥ एवं चिद्रूपस्य
एकस्य कर्तुरिव चिकीर्षाख्या क्रिया मुख्या ॥' ८ 'प्रत्यभिज्ञाकारिका' में कहा गया है—
१. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका । २. मालिनीविजयवार्तिक (१।९०) ।
३. तन्त्रसार ।
४. क्रिया शक्तेरेव अयं सर्वो विस्फारः (ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी भाग-२ पृ० ४२) ।
५. तन्त्रसार ।
६. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (भाग-१ पृ० १७) ।
७. एकस्या अपि इच्छायाः सूक्ष्मरूप ज्ञानक्रियाशक्तिसंभेदेन त्रित्वात् (स्वच्छन्दतन्त्र
टीकाः भाग ६।१०७) ।
८. उत्पलदेवाचार्य—प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति (२।५३) ।
तृतीयः निष्यन्दः ३८३
'इत्थं तथा घटपटाद्याभास जगदात्मना ।
तिष्ठासोरेवमिच्छैव हेतुता कर्तृता क्रिया ।। ५३ ।।
स्वातन्त्र्यात्मा चितिशक्ति ही 'ज्ञान' 'क्रिया' और माया रूप होकर पशुदशा में
संकोच के प्रकर्ष से सत्व-रज एवं तम स्वभाव वाले चित्त के रूप में स्फुरित होता है ।१
'पशुवर्तिनी बन्धयित्री'— यह पारमेश्वरी क्रियात्मिका पराशक्ति भेदप्रत्यय के उद्भव से
उपपादित पारतन्त्र्य के पुरुष (जीव) में संक्रान्त होने पर जन्ममरण, सुखदुःखादि रूप
बन्धन प्रदान करती है । यह आत्मा को पशुत्व से बाँध देती है—'आ प्रबोधप्रत्युदयात्
पशुत्वेन बध्नाति'—इसीलिए कहा गया है—'पशुवर्तिनीबन्धयित्री' ।२
ज्ञाता = जान लिए जाने पर (‘शिवात्मकस्वभाव प्रत्यवमर्शक्रियारूपतया प्रत्यभि-
ज्ञाता सती’ ३)—(‘सिद्धियाँ प्रदान करती है ।) ॥
सिद्धयुपपादिका—'सिद्धि' क्या है ! सिद्धि है—आत्मैश्वर्याधिगमलक्षण रूपा
'परा' की एवं आनुषंगिक विविध विभूतियों के आविर्भाव रूप 'अपरा' सिद्धियों की
उपपादिका (संपादयित्री) । यह शक्ति 'पशुवर्तिनी' कब बनती है? 'प्रत्ययोद्भवरूप माया
वैभव से उद्भावित भेदों को जन्म देने पर यही शक्ति 'पशुवर्तिनी' कही जाती है ।४
किन्तु प्रत्युदित प्रबोध वाले साधक के अपने स्वात्मरूप में यथावस्थित होने से उसके
प्रत्यभिज्ञायमान होने के कारण यह शक्ति उसे समस्त सिद्धियाँ प्रदान करती है ।५
पशु = 'आहार निद्राभय मैथुनानि समानमेतद् पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि
तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनः पशुभिः समानः ।।'
स्वमार्गस्था = अपने आत्मीय (निजी) शिवस्वभावरूप मार्ग में स्थित और
तद्व्यतिरिक्त विषयान्तर से निवृत्त होकर स्वात्मस्थित ॥
एषा = परमेश्वरस्वरूप प्रकाशप्रत्यवमर्शमात्ररूपा 'पराशक्ति' जो वाणी के रूप में
सर्वत्र फैली हुई है—या सर्वव्याप्त है वह यह शक्ति ।
यही शक्ति इच्छा-ज्ञान-क्रिया आदि का रूप धारण कर लेती है—
‘या सा शक्तिर्जगद्धातुः कथिता समवायिनी ।
इच्छात्वं तस्य सा देवि सिसृक्षोः संप्रपद्यते ॥
सैकापि सत्यनेकत्वं यथागच्छति तच्छृणु ।
एवमेतदिति ज्ञेयं नान्यथेति सुनिश्चितम् ॥
(१) ज्ञान शक्ति = ज्ञापयन्ती जगत्यत्र ज्ञानशक्तिर्निगद्यते ।
एवं भवत्विदं सर्वमिति कार्योन्मुखी यदा ॥
(२) क्रियाशक्ति = जाता तदैव तत्तद्रूपकुर्वत्यत्र क्रिया मता ।
एवं यथा द्विरूपैव पुनर्भेदैरनेकताम् ।। आदि ॥६
१. क्षेमराजः 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (सूत्र ५) । २. रामकण्ठः स्पन्दकारिकावृत्ति ।
३. रामकण्ठाचार्य । ४. रामकण्ठ ।
५. स्पन्दकारिकाविवृति (रामकण्ठाचार्य) । ६. मालिनीविजय ।
३८४ स्पन्दकारिका
परमात्मा की अघटनघटनापटीयसी सर्वकर्तृत्व शक्ति, 'कर्तुं-अकर्तुं—अन्यथा
कर्तुं। करने की स्वतन्त्र शक्ति ही क्रिया शक्ति है । यह सिसृक्षारूपा है ।
इस श्लोक का मूल उद्देश्य बन्धन एवं मोक्ष के स्वरूप का विश्लेषण करना है
इसीलिए रामकण्ठाचार्य ने कहा है—'तत्स्वरूपाप्रत्यभिज्ञामात्र निबन्धनौ बन्धमोक्षौ
प्रतिपादयितुमाह' अर्थात् (१) आत्मप्रत्यभिज्ञा रूप 'मोक्ष' एवं (२) आत्मप्रत्यभिज्ञाभाव
रूप 'बन्धन' का प्रतिपादन करने हेतु ही यह श्लोक 'सेयं क्रियात्मिका शक्तिः' लिखा
गया है ।
जीवों (पशुओं) की कलाओं की द्विविध सन्तानें हैं—(१) ज्ञानरूपा कला (२)
क्रियारूपा कला । ज्ञानरूप कलासंतान—अन्तःकरण = ३ अंग ॥ क्रियारूपा कला-
संतान = बहिष्करणात्मक । स्वभावस्थ प्राणशक्ति सहित एकादशविध ॥ (१) ज्ञान रूपा
संतान = ३ (२) क्रियारूपा संतान = ११, ३ + ११ = १४ ॥ जीवकला संतान चतु-
र्दशविध है । संतानद्वयवर्तिनी जो—जीवकलायें हैं—वे वस्तुतः हैं ही नहीं—केवल अव-
भासित होती हैं—'इत्थं प्रसृत्य अवभासते, तत्त्वतो नास्ति अस्याः ततो भेद इत्यर्थः ।'—
'संतानद्वयवर्तिनी जीवस्यात्मनः कला सा न काचित् संभवति इति शेषः ॥'—
'न सा जीवकला काचित्संतानद्वयवर्तिनी ।
व्याप्नी शिवकला यस्मादधिष्ठात्री न विद्यते ॥'
देश काल आदि से अनवच्छिन्न वैभवों की अधिष्ठात्री 'शिव कला' वेद्यत्व आदि
से सभी को अधिष्ठित करके एवं सभी को आत्म परतन्त्र बनाकर स्थित है । वस्तुतः यह
परमात्मा की कला या पराशक्ति जिस प्रकार अवभासित होती है वैसी है नहीं प्रत्युत् सत्य
तो यह है कि इस रूप में उसकी सत्ता ही नहीं है प्रत्युत् वह ऐसा अवभासित होती है—
'पराशक्तिः उक्तरूपा न विद्यते सत्तां व्यभिचरति । सैव इत्थमवभासते' ।१ जहाँ तक इसके
विश्वरूप में परिणत होकर दिखाई पड़ने की बात है तो यह भी एक अवभास है क्योंकि
शक्ति के अतिरिक्त किसी भी पदार्थ की सत्ता ही नहीं है—'वैश्वरूप्येऽपि अवभास-
लक्षणस्य सामान्यरूपस्य शिवधर्मस्य' । अपरा शक्ति—स्थूलक्रियारूपा है । इस प्रकार
शक्ति के 'पर' एवं 'अपर' जो दो रूप हैं उन दोनों में पारमार्थिक दृष्टि से अभेद है ।
'ज्ञानगर्भ' में भी इसी की पुष्टि की गई है—
बहिष्करणबुद्ध्यहंकृतिमनाः सुषुम्नाश्रया, च्चतुर्दशसु चण्डिके पथिषु येन येन व्रजेत् ।
कला शिवनिकेतनं जननि तत्र तत्र स्म ते, दशोंदयति दुर्लभा जगति या सुरैरप्यहो ॥'
अर्थात् (१) श्रोत्रादिपंचक (२) वागादिपंचक १० प्रकार का 'बहिष्करण' है । (३)
बुद्धि अहंकार, एवं मन के भेद से अन्तःकरण त्रिविध है । (४) मन एक है = कुल
योग १४ । इस प्रकार 'कला' अर्थात् चिदात्मिका शक्ति के चौदह भेद हैं । उनके अपने
इतने प्रसरणमार्ग भी है । उनके मध्य में से एकतमण पथ से यह कला शिवनिकेतन में
प्रविष्ट होनी चाहिए ।
१. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकावृत्ति' ।
तृतीयः निष्यन्दः ३८५
शिवनिकेतन में इस पारमार्थिक कला की यात्रा या लय रूप व्यापार स्वयमेव एक
'सिद्धि' ('सिद्ध्युपपादिका') है ।
'न दुःखं न सुखं' के लक्षणों से समलंकृत अपने निजास्पद शिवधाम में यह
'शैवीकला' एक 'सिद्धि' है जोकि शिवधाम में ही उदित भी होती है । वहाँ पर कृतकृत्य
होकर अन्त में यह आन्तर प्रदेश में प्रविष्ट होकर (सागर में सरिता के मिलन की तरह)
समरसीभूत होती है और मध्य में भी प्रवेश करने पर (बुद्धि आदि आन्योन्य भिन्न
प्रसरणरूप में होकर) नाना रूप से अवभासित होने पर भी वह चिदात्मकत्व का त्याग
नहीं करती और अपने शिव स्वभाव को कभी नहीं छोड़ती किन्तु फिर भी माया शक्ति से
व्यामोहित होने के कारण यह वैसी पहचानी नहीं जा पाती उसकी इस रूप में प्रत्यभिज्ञा
नहीं हो पाती ।
पशुवर्तिनी बन्धयित्री = भेदप्रत्यय से उद्भूत होने के कारण परतन्त्र (बन्धन
ग्रस्त) जीव (पशु) में वर्तमान यह शिवकला बन्धनकारिणी (जन्मादि 'पशु' = सर्वतो
व्यवच्छिन्न आत्मा । यह शैवी कला व्यवच्छिन्न आत्मा की आबोधप्रत्ययोदय पशुत्व से
बाँध देती है ।)¹
स्वमार्गस्था—यह परा पारमेश्वरी शक्ति 'परा' 'पश्यन्ती' 'मध्यमा' एवं
'वैखरी'—अपने सभी प्रसरणों में भी 'स्वमार्गस्थत्व' का त्याग नहीं करती । ठीक भी है
क्योंकि समस्त सृष्टि शब्द तत्त्व का ही विवर्त है—
'अनादि निधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् ।
विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥'²
यह पराशक्ति ही 'स्वमार्गस्था' के रूप में ज्ञात होने पर समस्त सिद्धियाँ प्रदान
करती है । यह बैखरी रूप में अभिव्यक्त होकर 'स्थूलाक्रियाशक्ति' बन जाती है किन्तु
इसके पूर्व तो वह 'मध्यमा वाक्' के रूप में 'इच्छाशक्ति' को व्यक्त करती है और इसके
पूर्व वह अपने 'पश्यन्तीवाक्' के रूप में अपने 'ज्ञान-शक्ति' को ही प्रस्तुत करती है ।
'शिवस्य क्रियात्मिका शक्ति'—शक्ति को 'शिव की शक्ति' क्यों कहा? इसलिए
कहा क्योंकि शक्ति को विश्व की अपेक्षा रहती है ।³
अभिन्नमातृकात्मक शब्दराशि रूप क्रियाशक्ति-प्रधान ऐश्वर्य विग्रह ही इस शक्ति
का आश्रय है । इस शक्ति का जो वाक्यरूप विस्तार है वह भी द्विविधात्मक है—(१)
मन्त्रात्मक एवं (२) लौकिक व्यवहार विषयक लौकिक वाक्यात्मक । मन्त्रात्मक रूप
नित्य एवं लौकिकवाक्यात्मक रूप अनित्य है ।
इस प्रकार परमेश्वर की शक्ति के रूप में प्रत्यभिज्ञायमाना होने पर यह शिवकला
—यह वाङ्मयीविभूति परसिद्धिप्रदा है किन्तु पशु से संबंधित होने पर अवच्छिद्यमान
उसका यह स्वरूप बन्धन का कारण है—एवं परमेश्वरशक्तित्वेन प्रत्यभिज्ञायमाना एषा
वाङ्मयी विभूतिः परसिद्धिप्रदा, नानापशुसंबंधतया तु अवच्छिद्यमाना बन्धहेतुर्भवति ।⁴
१. रामकण्ठाचार्य । २-४. स्पन्दकारिकावृत्ति ।
स्पं० २५
३८६ स्पन्दकारिका
शब्दाद्वयवाद में शब्द एवं अर्थ दोनों को शक्तिप्रसार माना गया है और इसे शक्ति
का विवर्त कहा गया है—
'अथायमान्तरो ज्ञाता सूक्ष्मे वागात्मनि स्थितः ।
व्यक्तये स्वस्य रूपस्य शब्दत्वेन विवर्तते ॥'
'अनादि निधनं ब्रह्म' द्वारा शब्द तत्त्व को 'ब्रह्म' कहकर शब्द की पारमेश्वर रूपता
को ही प्रतिपादित किया गया है । यह परा शक्ति ही स्वमार्गस्था रूप में परिज्ञात होने पर
सम्यक् प्रतिपन्न स्वभावा होकर संपूर्ण सिद्धियों को प्रदान करती है ।१ इसी शक्ति के
विषय में कहा गया है—
'सा चेयं क्रियात्मिका क्रियास्वभावा' ।
सांख्य दर्शन एवं स्पन्दशास्त्र : एक तुलना—
(१) पुरुषोऽस्ति भोक्तृभावात् कैवल्यार्थं प्रवृत्तेश्च ॥
(२) पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य ।
(३) प्रति पुरुषविमोक्षार्थं स्वार्थ इव परार्थ आरंभः ॥
(४) पुरुषविमोक्षनिमित्तं तथा प्रवृत्तिः प्रधानस्य ॥
(५) पुरुषस्य विमोक्षार्थं प्रवर्तते तद्व्यक्तम् ॥
(६) रंगस्य दर्शयित्वा निवर्तते नर्तकी यथा नृत्यात् ।
पुरुषस्य तथाऽत्मानं प्रकाश्य निवर्तते प्रकृतिः ॥
(७) रूपैः सप्तभिरेव तु बध्नात्यात्मानमात्मना प्रकृतिः ।
सैव च पुरुषार्थं प्रति विमोचयत्येकरूपेण ॥२
'प्रकृति' या 'शक्ति' द्वारा—(१) बन्धन एवं (२) मोक्ष दोनों कार्य निष्पादित ।
क्रियाशक्ति बन्धन और मोक्ष दोनों का उपाय है—'क्रिया शक्ति' के दो रूप—
इस कारिका में कारिकाकार ने भगवान् की 'क्रियाशक्ति' के दो रूपों का विवेचन किया
जो निम्नानुसार हैं । इनका पूर्ण परिचय इस प्रकार देखिए ।
भगवान् शिव की शक्तियाँ (मुख्य शक्तियाँ)
┌──────────┬──────────┬──────────┬──────────┐
चित्शक्ति आनन्दशक्ति इच्छाशक्ति ज्ञानशक्ति क्रियाशक्ति
(प्रकाशरूपा) (स्वातन्त्र्यरूपा) (उपभोगात्मक (आमर्शात्मक (सर्वाकार
चमत्कार रूपा) वेद्य के प्रति योगित्व)
उन्मुख)
क्रियाशक्ति—(१) प्रकाशरूपता चिच्छक्तिः ॥३
१. रामकण्ठाचार्यः स्पन्दकारिका वृत्ति । २. सांख्यकारिका ।
३. तन्त्रसार ।
तृतीयः निष्यन्दः ३८७
(२) प्रकाशश्च अनन्योन्मुखविमर्शः अहमिति । (प्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी) ।१
(३) स्वातन्त्र्य आनन्दशक्तिः (तन्त्रसार) ।२
(४) तच्चमत्कार इच्छाशक्तिः (तन्त्रसार) ।३
(५) ज्ञानशक्तिः 'आमर्शात्मकता ज्ञान शक्ति' (तन्त्रसार)४ 'आमर्शश्च ईषत्तया
वेद्योन्मुखता' ।
(६) सर्वाकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः (तन्त्रसार) ।५
'तस्य प्रकाशरूपता चिच्छक्तिः' स्वातन्त्र्यम् आनन्दशक्ति तच्चमत्कारः इच्छाशक्तिः
आमर्शात्मकता ज्ञानशक्तिः सर्वाकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः । इत्थं सर्वशक्तियोगेऽपि
आभिर्मुख्याभिः शक्तिभिरूपचर्यते स च भगवान् ।।६
क्रियाशक्ति और बन्धन—
'क्रिया शक्ति' के भेद—
┌───────────────┴───────────────┐
पशुवर्तिनी क्रियाशक्ति शिववर्तिनी क्रियाशक्ति
(बन्धयित्री) (सिद्धयुपपादिका)
कार्ममल—कार्ममल एवं क्रियाशक्ति—'सेयं क्रियात्मिका शक्तिः शिवस्य पशु
वर्तिनी । बन्धयित्री स्वमार्गस्था ज्ञाता सिद्धयुपपादिका' 'कार्ममल'—'भेददशा में जब क्रिया-
शक्ति की सर्वकर्तृता शक्ति अल्पकर्तृत्व प्राप्त करती है तथा कर्मेन्द्रिय रूप संकोच ग्रहण
करके अत्यन्त परिमित हो जाती है तब उसे ही शुभाशुभ कर्ममय 'कार्ममल' कहा जाता है ।
'क्रियाशक्तिः क्रमेण सर्वकर्तृत्वस्य किंचित्कर्तृत्वाप्तेः कर्मेन्द्रियरूपसंकोचग्रहण-
पूर्वम् अत्यन्तं परिमिततां प्राप्ता शुभाशुभानुष्ठानमयं कार्म मलम् ।।'—(क्षेमराज : 'प्रत्य-
भिज्ञाहृदयम्') ।।
भेद दशा में 'क्रियाशक्ति' की अपनी सर्वकर्तृत्व शक्ति अल्पकर्तृत्व में रूपान्तरित
हो जाती है—'क्रिया शक्तिः क्रमेण भेदे सर्वकर्तृत्वस्य किंचित्कर्तृत्वाप्तेः ।।' (प्रत्य०हृ०)
यही 'कला' कहलाती है । यह अल्पकर्तृत्व में रूपान्तरित हो जाती है—
'सम्पूर्णकर्तृत्ताद्या बह्वयः सन्त्यस्य शक्तयस्तस्य ।
संकोचात्संकुचिताः कलादिरूपेण रूढयन्त्येनम् ।।'७
आकारादिक्षपर्यन्ताः कलास्ताः शब्दकारणम् ।
मातरः शक्तयो देव्यो रश्मयश्च कलाः स्मृताः ।।८
कला
┌───────┬───────┬───────┐
विद्या राग नियति काल
१. प्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी । २-५. तन्त्रसार ।
६. वामदेव भट्टाचार्य—'जन्ममरणविचार' । ७. षट्त्रिंशत्तत्त्वसन्दोह ।
८. शिवसूत्रवार्तिक ।
३८८ स्पन्दकारिका
आणवमल के भेद—बोध की स्वातन्त्र्य-हानि स्वातन्त्र्य का अबोध 'स्वस्वरूप
की हानि'।
कार्ममल—'तत्रापि कार्ममेवैकं मुख्यं संसार कारणम्। (उत्पलदेव)
कार्ममल—इसका सम्बन्ध क्रियाशक्ति के सङ्कोच से है।
इसका स्वरूप निम्नानुसार है—'अहेतूनामपि कर्मणां जन्मादिहेतु भावेन विपर्या-
सादबोधात्मककर्तृत्वगतं कार्मं ।।' (३।१६)१
'कर्तव्यबोधे कार्मं तु ।।' (३।१६)२
'पशुवर्तिनी क्रिया' बन्धन में डालने वाली है और क्रियाशक्ति का यही रूप
'कार्ममल' भी है।
शिव सम्बन्धिनी क्रियाशक्ति शैवी क्रियाशक्ति है जो सर्वकर्तृत्वशालिनी है।
विमर्शनमयी स्पन्दना ही इसका स्वस्वरूप है। यही है पारमेश्वरी निर्माण शक्ति—
किन्तु निर्माणशक्तिः साप्येवं विदुष ईशितुः।
तथा विज्ञातृ विज्ञेयभेदो यदवभास्यते ॥ (ई०प्र०)
यही वह शाक्त स्पन्दना है जो कि देशक्रम एवं क्रियाभेद से जन्य कालक्रम से
उपलक्षित, अनन्त प्रकार के शून्य, प्राण, पुर्यष्टक आदि प्रमाताओं और उनके नील,
सुख आदि ज्ञेय विषयों को स्वरूप से एक दूसरे से भेदरूप में अवभासित करती है।
अनन्त वैभिन्यों से युक्त विश्व का अवभासन ही 'निर्माणशक्ति' (क्रियाशक्ति) है।
स्वातन्त्र्य इच्छा से ही सृष्टि होती है। परमात्मा समस्त क्रियाओं का स्वतन्त्र कर्ता है।
परमात्मा का ज्ञाता के रूप में विस्फुरण ही उसकी क्रिया है।
शिववर्तिनी क्रियाशक्ति किसी क्रम की अपेक्षा नहीं रखती। यह अक्रमा है
'ईश्वरस्यापि' ईशे, भासे, स्फुुरामि, घूर्णे, प्रत्यवमृशामि' इत्येवं रूपं यदिच्छात्मकं
विमर्शनम् 'अहम्' इत्येतावन्मात्रतत्त्वं न तत्र कश्चित् क्रमः।३
शिव की 'क्रियाशक्ति' पाशवी क्रियाशक्ति से इसलिए भी भिन्न है क्योंकि पशुओं
की इच्छा-ज्ञान-क्रिया तीनों पृथक्-पृथक् हैं जब कि यह शिव की इच्छा-ज्ञान-क्रिया तीनों
में अभेद है। उसका ज्ञान ही क्रिया है—'यतश्च तन्निर्मितं ज्ञातृज्ञेयक्रियावैचित्र्यभेदम्
असौ विद्वान् वेत्ति अविरतं तत्रैव हि तत् स्फुरति ततोऽपि तस्य सा क्रियाशक्तिः ।।'
'मैं स्फुरित होऊँ' मैं घूर्णित होऊँ,—यह केवल अहं रूपात्मक इच्छास्पन्द है।
भगवान् की स्फुरणा = इच्छात्मक स्फुरण = विश्व की स्फुरणा है ।। स्वस्वरूप
का विमर्शन = आत्मानन्द का आस्वादन = विश्वामर्शन ।। शिववर्तिनी क्रियाशक्ति =
विमर्शात्मक स्पन्दना।
१. प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति ।
२. प्रत्यभिज्ञाकारिका—उत्पलदेव ।
३. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (अभिनवगुप्तपाद)।
४. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (२.१.८)।
तृतीयः निष्यन्दः ३८९
परमेश्वर का विमर्श एवं अभिलाषात्मकता का अभिन्न साहचर्य है। 'परावाक्' के
स्तर 'अ' से 'क्ष' पर्यन्त ध्वनि समुदाय का रूप ही 'अहंविमर्श' है।
क्रमहीन शिववर्तिनी क्रियाशक्ति ही सृष्टिप्रसार के समय सक्रम पशुवर्तिनी क्रिया
शक्ति के रूप में रूपान्तरित हो जाती है। अक्रमस्वरूपा शैवी क्रियाशक्ति → सक्रमा
पशुवर्तिनी क्रियाशक्ति॥
शैवी क्रिया शक्ति एवं पाशवी क्रिया शक्ति—अन्तर्सम्बन्ध—
(१) शिव की क्रिया शक्ति एवं पशुगता क्रियाशक्ति का प्राथमिक उदय इच्छाशक्ति
के स्तर पर होता है और वहाँ दोनों में क्रम नहीं होता।
(२) पशु भी वही करता है जो इच्छा के स्तर पर उदय होता है और परमेश्वर
भी वही करता है जो उसके इच्छास्तर पर उदित होता है।
(३) शिव की अक्रमा एवं सर्वकर्तृत्वशालिनी क्रियाशक्ति ही पशुओं के स्तर
पर सक्रमा एवं अल्पकर्तृत्वशालिनी क्रियाशक्ति के रूप में परिणत होती है।
(४) मानसिक संवेदन के स्तर पर उदित क्रियाशक्ति इच्छात्मक स्पन्दन के रूप में
ही होती है और वहाँ सक्रमता का नियम भी नहीं रहता।
(५) पशुस्तर पर भी क्रियाशक्ति सूक्ष्म से स्थूल की ओर बढ़ती है और उसी
प्रकार शिव स्तर पर भी यथा—निर्गुण शिव → सगुणशिव-शिव-शक्ति → सदाशिव
→ ईश्वर आदि सूक्ष्मतम से सूक्ष्म की ओर यात्रा है और—परावाक् से विकसित होते
हुए वैखरी वाक् की यात्रा = सूक्ष्म से स्थूल का विकास है।
(६) शैवीक्रियाशक्ति एवं पाशवीक्रियाशक्ति दोनों का अपना मूल स्रोत एक ही है।
(७) दोनों में भेद यह है कि एक 'कारण' है दूसरा 'कार्य', एक नित्य है दूसरा
अनित्य, एक प्रयत्नज है दूसरा सहज या स्वयंभू है, एक निरपेक्ष है दूसरा सापेक्ष, एक
उपादान सापेक्ष है दूसरा निरपेक्ष, एक स्वतन्त्र है दूसरा अस्वतन्त्र, एक सूक्ष्म है दूसरा
स्थूल, एक पाप-पुण्य से अप्रभावित है दूसरा इनसे प्रभावित, एक तृष्णामूलक है दूसरा
इच्छातीत है।
अहं विमर्श से युक्त परावाक् ही आगे चलकर 'पश्यन्ती', 'मध्यमा' की भूमियों
पर आरूढ़ होती हुई वैखरी की भूमि पर स्थूल वर्ण समूह बन जाती है। शिव की
क्रियाशक्ति ही बहिर्मुखी प्रसार की ओर उन्मुख होकर पशुवर्तिनी क्रियाशक्ति के रूप में
रूपान्तरित हो जाती है। दोनों का स्वस्वरूप शिवत्व है। दोनों शिव में उत्पन्न, शिव में
स्थित एवं शिव में विश्रान्त होते हैं।
भट्टकल्लट ने इस कारिका की व्याख्या इस प्रकार की है—'सा चेयं
क्रियास्वभावाभगवतः पशुवर्तिनी शक्तिः। यदुक्तम्—
'न सा जीवकला काचित् सन्तानद्वयवर्तिनी।
व्याप्त्री शिवकला यस्यामधिष्ठात्री न विद्यते॥
इति। सैव च बन्धकारणम् अज्ञाता। ज्ञाता सा च पुनः परापर सिद्धिप्रदा भवति
पुंसाम्॥' (स्पन्द का०वृत्ति) ॥
३९० स्पन्दकारिका
अर्थात् यह (मातृका) वस्तुतः भगवान् की क्रियात्मक स्वभाव वाली शक्ति ही है
जो कि पशुवर्तिनी बन गई है । जैसा कि कहा भी गया है—'दो सन्तानों के रूप में
चलने वाली ऐसी कोई भी जीवकला नहीं है जिसमें शिवकला अधिष्ठात्री बनकर व्याप्त
न हों ॥' अतः वही क्रिया शक्ति ही अज्ञात होने की स्थिति में बन्धन का कारण बन
जाती है किन्तु वही जान ली जाने पर पुरुषों को सिद्धि प्रदान करती है ।
'जीव कला' की दो सन्तानें निम्नांकित हैं—
(क) 'ज्ञानसन्तान' (ख) 'क्रियासन्तान'
ज्ञानसन्तान—मन, बुद्धि, अहङ्कार (अन्तःकरण) ।
क्रियासन्तान—५ ज्ञानेन्द्रियाँ, ५ कर्मेन्द्रियाँ, प्राण शक्ति = ११ की समष्टि ।
(स्पन्द० का० ४।१८)
संसरण के कारण और पुर्यष्टक की भूमिका—
तन्मात्रोदयरूपेण मनोऽहंबुद्धिवर्तिना ।
पुर्यष्टकेन संरुद्धस्तदुत्थंप्रत्ययोद्भवम् ॥ ४९ ॥
भुङ्क्ते परवशो भोगं तद्भावात् संसरेदतः ।
संसृतिप्रलयस्यास्य कारणं संप्रचक्ष्महे ॥ ५० ॥
(पशुभावस्थ शिव) तन्मात्रों के स्वरूप वाले और (सूक्ष्म और उनके कार्यरूप
स्थूल) मन, अहङ्कार एवं बुद्धि—द्वारा परामृष्ट पुर्यष्टक के द्वारा बन्धनग्रस्त है । उससे ही
(पुर्यष्टक से ही) प्रत्ययोद्भव हुआ करता है । (वह) दूसरे का वशवर्ती बनकर सांसारिक
भोगों का भोग करता है और उसी की विद्यमानता के कारण संसरण करता है अतः
(उसके) संसरण के समुच्छेद के उपायों पर प्रकाश डालेंगे ॥ ४९-५० ॥
* सरोजिनी *
पुर्यष्टक के दो रूप हैं—(१) सूक्ष्म आतिवाहिक शरीर, अभिलाषात्मक एवं
तन्मात्रात्मक (२) स्थूल भौतिक भोग शरीर । सूक्ष्मशरीर से आबद्ध—अपने को उससे
घिरा हुआ—मानने वाला पुरुष । यह परवश होकर उसमें उठने वाले सुखदुःखादिक
संवेदनरूप प्रत्ययों का उपभोग करता है । वस्तुतः वह शब्दादिक के अनुभव द्वारा ही
प्रकट होता है और उतना ही उसका रूप है, मन, अहङ्कार, बुद्धि, अन्तःकरण । उसी को
अपना स्वरूप मानकर वह शरीरी हो जाता है और संसार प्राप्त करता है । मेरा कथन यह
है कि जन्ममरण एवं संसार-प्रलय के प्रवाह का यही कारण है । अपने प्रत्यय के
अतिरिक्त संसार का अन्य कारण नहीं है ।¹
पतिस्वभाव वाले आत्मतत्त्व का अपनी माया से अवभासित पशुत्व का प्रतिपादन
करके अब पशु में विद्या के आविर्भाव होने से अपने मार्ग पर स्थित हो जाने के कारण
१. उत्पलदेवाचार्य : स्पन्दप्रदीपिका ।
तृतीयः निःष्यन्दः ३९१
अभिज्ञायमाना यह परा शक्ति, पतित्व की अभिव्यक्ति का आवाहन करती हुई संसार-
विच्छेद का कारण बनती है 'अस्य' = उक्त वक्ष्यमाणरूप वाले पशु के । जो 'संसृति
प्रलयः' अर्थात् संसार का क्षय । उसका 'कारणं' = हेतु । 'संप्रचक्ष्महे' = कहता हूँ ।
सम्यक् प्रकर्ष के साथ कहता हूँ । यहाँ व्यधिकरण से षष्ठी मानकर अर्थ करना चाहिए ।
किस कारण? क्योंकि यह 'पशु' 'पुर्यष्टकेन संरुद्धः' पुर्यष्टकों से आच्छादित होकर भोग
का भोग करता है । पुर्यष्टक = 'पुर्यां सूक्ष्मे शरीरे'—सूक्ष्मशरीर में तन्मात्रपंचक एवं
गुणत्रय दोनों स्थित हैं । स्थूलशरीर के कारणभूत आठ अंगों से युक्त जो पुर्यष्टक है
उसका कार्य ही स्थूल शरीर है और 'तत्' शब्द से पुर्यष्टक ही अभिप्रेत है और स्थूल
शरीर-सूक्ष्म शरीर दोनों को सूचित करता है ।
संरुद्धः—उसके द्वारा 'संरुद्ध' उतने को ही आत्मा मानने वाला अपनी सर्वात्मकता
एवं स्वसामर्थ्य आदि को भूलकर परिबद्ध (बन्धनग्रस्त) हो जाता है अतएव परवशः—
समस्तशक्ति स्वभाव से व्यतिरिक्तकारणान्तराधीन समस्त समीहितों के असिद्ध रहने से
अस्वतन्त्र रहने के कारण भोगं = मायावभासित अनादि निज कर्मोपचित वासनानु-गुण
सुखादिकसंवेदनात्मक स्वविषयों को भुङ्क्ते = 'अनुभव करता है।' भोग करता है ।
'अनुभवति' ॥
किस प्रकार का? तदुत्थं = उस पुर्यष्टक से उत्थित (उद्भूत) ॥ उस किस भोग
को? 'प्रत्ययोद्भवं' । प्राग्व्याख्यात स्वरूपनियत स्वविषय ज्ञानोत्पाद रूप अर्थात् स्व-
विषयमात्रभोक्तृत्वाभिमानरूप प्रत्यय का उत्पाद रूप भोग ॥
भट्टकल्लट की व्याख्या—तन्मात्रोदयः, तन्मात्राणां शब्दादीनाम् अनुभवरूपेण,
मनोऽहंकारबुद्धिभिः इति त्रिभिः परामृश्यमानेन पुर्यष्टकेन बद्धः, तदुत्थं तस्मादुद्भूतं
सुखदुःख-संवेदनरूप तदा ॥—स्पन्दकारिकावृत्ति ।
किस प्रकार के पुर्यष्टक से संरुद्ध?—तन्मात्रोदयरूपेण—'तन्मात्रा स्थूलभूत-
कारणभाव द्वारा ईश्वरेच्छा मात्र से अवभासित सूक्ष्म शब्दादिक । उदय = उनका उदय
—स्थूल शरीर भाव से परिणत आकाश आदि के रूप में अभिव्यक्ति ॥
तन्मात्रायें—(१) शब्दतन्मात्रा—आकाश (२) स्पर्शतन्मात्रा—वायु (३) रूप
तन्मात्रा—अग्नि (४) रसतन्मात्रा—जलतत्त्व (५) गन्धतन्मात्रा—पृथ्वी ॥
तन्मात्रोदय पंचविध है—(१) शब्दतन्मात्रा का उदय—आकाश (२) स्पर्शतन्मात्रा
का उदय—वायु तत्त्व (३) रूपतन्मात्रोदय—अग्नितत्त्व (४) रसतन्मात्रोदय—जलतत्त्व
(५) गन्धतन्मात्रा का उदय—पृथ्वी तत्त्व । गुणों के उदय को संकेतित करने हेतु
ग्रन्थकार कहता है—'मनोऽहंबुद्धिवृत्तिना' ।
इस अनुभूयमान का आत्मलाभ एवं अनुभव अन्तःकरणनिष्ठ है । यथा—मन में
रजोगुण के उदय से, अहंकार में तमोगुण के उदय से, बुद्धि में सत्वगुणोदय रूप वृत्ति
की अवस्थिति से अनेक आन्तरभाव उत्पन्न होते हैं । बद्ध प्राणी इस प्रकार के पुर्यष्टक से
१. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दविवृति'
३९२ स्पन्दकारिका
संरुद्ध होकर 'पशु' बन जाती है और 'तद्भावात्'—उस पुर्यष्टक स्थूल सूक्ष्मरूप
पुर्यष्टकों के विद्यमान होने से ('भाव से') और प्रबोधोदय न होने की स्थिति में
अनुच्छेदवश 'संसरेत्'—अनवरत रूप से नाना शरीर भोगवासना कर्म चक्र का अनुभव
करना चाहिए ।
देह-संरुद्ध पुरुष के प्रतिनियत सुखादिसंवेदनात्मक भोग में जो भोक्तृत्वाभिमान है
वही संसार (संसरण) का कारण है अतः इसका निरावरणस्वरूप स्थिति मात्र संसार के
विनाश का मूल कारण है। वृत्तिकार ने इसी भाव को इस प्रकार व्यक्त किया है—
(१) 'तन्मात्रोदय' (२) 'भुक्तेऽश्नाति परवशः ।'¹
तन्मात्र = सूक्ष्मपुर्यष्टक । तन्मात्रोदय = स्थूल पुर्यष्टक ॥ पशुभावस्थ 'शिव'
शब्दादिक पञ्च तन्मात्राओं के अनुभव वाले मन, अहङ्कार एवं बुद्धि—इन तीनों के द्वारा
परामर्श किए जाने वाले पुर्यष्टक के बन्धन में पड़ा है । पुर्यष्टक से ही सुखात्मक
दुःखात्मक संवेदनाओं का प्रादुर्भाव होता है ।²
अड़तालिसवीं कारिका यह प्रतिपादित करती है कि आत्मा को जब अपनी शक्ति
का बोध नहीं रहता तो उसकी यह अज्ञानता ही व्यक्ति को बन्धन में डाल देती है ।
आत्मबोध का यह अभाव प्रमाता को अधःपतन के गर्त में डाल देता है ।
बन्धन का हेतुत्व—उन्चासवीं कारिका में यह बताया गया है कि 'क्रियाशक्ति'
बन्धन का हेतु कैसे बनती है? 'पुर्यष्टक' के दो रूप हैं—(१) सूक्ष्म (आतिवाहिक) (२)
स्थूल (भौतिक) = भोग शरीर ।
पुर्यष्टक—सूक्ष्म शरीर (सूक्ष्म पुर्यष्टक) एवं स्थूल शरीर (स्थूल पुर्यष्टक)
स्थूलपुर्यष्टक = पाञ्चभौतिक स्थूल शरीर ।
सूक्ष्मपुर्यष्टक = कारण शरीर—स्थूल पुर्यष्टक ॥
तन्मात्र रूप = सूक्ष्म पुर्यष्टक । कारण शरीर ।
तन्मात्रोदय रूप = स्थूल पुर्यष्टक । षाट्कौशिक स्थूल शरीर ॥
इन्हीं शरीरों से आबद्ध (संरुद्ध) मानकर पुरुष परवश होकर उसमें उठने वाले
सुख दुःख आदि संवेदन रूप प्रत्ययों का उपभोग करता है । उन्हीं को अपना स्वरूप
स्वीकार करके वह शरीराभिमानी (शरीरात्मवादी) बनकर संसरण चक्र का अनुवर्ती बन
जाता है । स्पन्दप्रदीपिका में कहा गया है—'अपने प्रत्यय के अतिरिक्त संसार का अन्य
कारणान्तर नहीं है ।'
पुर्यष्टक और उसका स्वरूप—पुर्यष्टक के दो भेद हैं—
(१) सूक्ष्म पुर्यष्टक = कारण शरीर ॥ 'तन्मात्र'
(२) स्थूल पुर्यष्टक = पाँचभौतिक स्थूल शरीर ॥ 'तन्मात्र'
'पुर्यष्टकस्य किल द्वे रूपे—एकं सूक्ष्ममातिवाहिकाख्या तन्मात्रमभिलाषात्मकम् ।
१. रामकण्ठाचार्यः 'स्पन्दविवृति' । २. भट्टकल्लट—'स्पन्दकारिकावृत्ति' ।
तृतीयः निष्यन्दः ३९३
द्वितीयं स्थूलं भौतिकं भोगाख्यम् ॥' (स्पन्दप्रदीपिका) 'पुर्यां सूक्ष्मे शरीरे तन्मात्रपञ्चकं
गुणत्रयम् इति स्थूलशरीरकारणभूतमष्टकम् यत् संनिविष्टं, तन्मुखं पुर्यष्टकम् ।
'तत्कार्यत्वात् स्थूलमपि शरीरं तच्छब्देन इह पुर्यष्टकम् इत्युच्यते ॥'
(स्पन्दका०वि०)
भट्टकल्लट ने 'स्पन्दसर्वस्व' में इसकी व्याख्या करते हुए कहा है—'तन्मात्रो-
दयः, तन्मात्राणाम् शब्दादीनाम् अनुभवरूपेण, मनोऽहङ्कारबुद्धिभिः इति त्रिभिः परामृश्य-
मानेन पुर्यष्टकेन बद्धः ॥' तदुत्थं = उससे उद्भूत । 'प्रत्ययोद्भवम्' सुखदुःखसंवेदन
रूप । सूक्ष्मशरीर (कारण)—स्थूल शरीर (कार्य) पशुभूमिका में अवस्थित शिव तन्मात्रों
के रूप वाले 'सूक्ष्मशरीर' एवं उससे उत्पन्न (कार्यरूप) 'स्थूल शरीर' (मन, बुद्धि,
अहङ्कार आदि अन्तःकरण चतुष्टय के माध्यम से परामर्श करने वाले स्थूल शरीर) के
बन्धनावरण से आच्छादित है । इसी 'पुर्यष्टक' के द्वारा ही 'प्रत्ययोद्भव' का आविर्भाव
होता है ।
पुर्यष्टक—जन्म-मरण (आवागमनचक्र)
तन्मात्र = सूक्ष्म पुर्यष्टक
तन्मात्रोदय = स्थूल पुर्यष्टक
पुर्यष्टक—सुखात्मक, दुखात्मक संवेदना ॥
पशु शब्दादिक तन्मात्रों के अनुभव के रूप वाले तथा मन अहङ्कार, बुद्धि इन
तीनों के द्वारा परामर्श किए जाने वाले पुर्यष्टक' के बन्धन से आबद्ध है ।
सूक्ष्म शरीर के अवयव (सांख्यदर्शन) (१८ अंग)
मन | बुद्धि | अहङ्कार | ज्ञानेन्द्रिय | कर्मेन्द्रिय | पञ्चतन्मात्रा
१ | १ | १ | ५ | ५ | ५
सूक्ष्मपुर्यष्टक—सू०शरीर—लिंगशरीर = सूक्ष्मशरीर
पूर्वोत्पन्नमसक्तं, नियतं, महदादिसूक्ष्मपर्यन्तम् ।
संसरति निरुपभोगं भावैरधि वासितं लिंगम् ॥
चित्र यथाऽऽश्रयमृते, स्थाण्वादिभ्यो विनायथाच्छाया ।
तद्वद्विनाऽविशेषैर्न तिष्ठति निराश्रयं लिंगम् ।१
इनके ग्राह्य विषय क्या हैं?—
'एषां ग्राह्यो विषयः सूक्ष्मः प्रविभागवर्जितो यः स्यात् ।
तन्मात्रपञ्चकं तत् शब्दः स्पर्शो मही रसो गंधः ॥ (प०सा०)
सूक्ष्मशरीर = मन, बुद्धि, अहङ्कार (अन्तःकरण) + इनके संवेद्य—शब्द, स्पर्श,
रूप, रस, गन्ध (सूक्ष्म तन्मात्रायें) ॥
१. ईश्वरकृष्ण : सांख्यकारिका ।
३९४ स्पन्दकारिका
तन्मात्रोदय = 'तन्मात्रा' क्या है? जिसमें केवल (तत् + मात्रा) उसी की मात्रा
मात्र हो। पञ्चीकरण-प्रक्रिया में क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर आदि तत्त्वों में सभी
तत्त्वों का समावेश नहीं होता प्रत्युत् सभी का समावेश होता है किन्तु 'तन्मात्रा' मात्र
अपनी ही मात्राओं का समुच्चय होता है, अन्य का नहीं। पञ्चीकरण में तन्मात्र स्थिति
नहीं रहती यथा—
(१) आकाश —————— शब्द ।
(२) वायु = आकाश+वायु । = शब्द+स्पर्श ।
(३) तेज = आकाश+वायु+तेज । = शब्द+स्पर्श+रूप ।
(४) जल = आकाश+वायु+तेज+जल । = शब्द+स्पर्श+रूप+रस ।
(५) पृथ्वी = आकाश+वायु+तेज+जल+पृथ्वी = शब्द+स्पर्श+रूप+रस+गन्ध ।
(१) = १/८ (वायु+अग्नि+जल+पृथ्वी) + १/२ = आकाश (= पञ्चीकृत स्थूलाकाश)
(२) = १/८ (अग्नि+जल+आकाश+पृथ्वी) + १/२ = पञ्चीकृत स्थूल वायु ।
(३) = १/८ (आकाश+वायु+जल+पृथ्वी) + १/२ = अग्नि पञ्चीकृत स्थूल अग्नि ।
(४) = १/८ (आकाश+वायु+अग्नि+पृथ्वी) + १/२ = जल = पञ्चीकृत स्थूल पृथ्वी ।
(५) = १/८ (आकाश+वायु+अग्नि+जल) + १/२ पृथ्वी = पञ्चीकृत स्थूल पृथ्वी ।
प्रकृति—महत् (बुद्धि)—'अहङ्कार'—ज्ञानेन्द्रिय+कर्मेन्द्रिय+मन+तन्मात्रा (तन्मात्रा)
—क्षिति, जल, पावक, समीर, गगन ॥ प्रत्येक महाभूत में अन्य भूतों के १/८ अंश
स्थित हैं।
'वेदान्त दर्शन' के अनुसार सूक्ष्मशरीर (पुर्यष्टक) १७ अंग होते हैं—
५ ज्ञानेन्द्रियाँ + ५ कर्मेन्द्रियाँ + ५ वायु + १ बुद्धि + १ मन = १७
समष्टिरूप सूक्ष्म शरीर = 'सूत्रात्मा' 'प्राण' 'हिरण्यगर्भ' = सूक्ष्म शरीरों की समष्टि
से आच्छादित चैतन्य ।
शरीर (वेदान्त के अनुसार)
स्थूल शरीर सूक्ष्म शरीर
उद्भिज अण्डज स्वेदज जरायुज व्यष्टिरूप समष्टिरूप
सूक्ष्मशरीर सूक्ष्मशरीर
तन्मात्रा—'तन्मात्रोदय, पद में 'तन्मात्रा' शब्द का क्या अर्थ है? उसका स्वरूप क्या
है। सांख्य दर्शन के अनुसार अहङ्कार के तामस अंश से तन्मात्राओं का जन्म होता है।
तृतीयः निष्यन्दः ३९५
अहंकार
सात्त्विक अहंकार राजस अहंकार तामस अहंकार
११ इन्द्रियाँ, शब्द स्पर्श रूप रस गंध
तन्मात्रा त० त० त० त०
'तदेव इति तन्मात्रम्' = वही ।
तत् = वह । मात्रा = मात्र ॥ तन्मात्रा = वही मात्र (उसके अतिरिक्त अन्य कोई
नहीं ॥ शब्द तन्मात्रा = शब्द ही । शब्द मात्र)
शब्द तन्मात्रा—आकाश । स्पर्शतन्मात्रा—वायु । रूप तन्मात्रा—अग्नि । रस
तन्मात्रा—जल, गंध तन्मात्रा—पृथ्वी ॥ (पंचभूत) सूक्ष्म भूत = तन्मात्रा । स्थूल
महाभूत = पृथ्वी आदि पंचभूत ॥
तन्मात्रावस्था—यह शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध (पंच महाविषय की सामान्यावस्था
है । इस स्थिति में किसी वैशिष्ट्य, विशेषता व्यावर्तक धर्म की अनुस्यूतता नहीं रहती)—
(१) 'अनुद्भिन्न विशेषतया स गंधादिरेव केवलस्तन्मात्र इत्युक्तम्' (तं०वि०)
(२) पृथिव्यां सौरभान्यादिविचित्रे गंधमण्डले ।
यत्सामान्यं हि गन्धत्वं गंधतन्मात्र नाम तत् ॥ (तं०)
उदा०—'गन्धतन्मात्रा' गंध की उस सामान्यावस्था की आख्या है जिसमें किसी
भी सुगंध या दुर्गंध या तीव्र-मन्द-विशिष्ट गंध आदि शब्दों का इस स्तर पर प्रयोग नहीं
किया जा सकता क्योंकि इस स्तर पर चम्पा, चमेली, गुलाब, कमल, रजनीगंधा केवड़ा
आदि विशिष्ट गंधों को पृथक्-पृथक् रूप से नहीं पाया जा सकता, क्योंकि इस स्तर पर
प्रयोग नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस स्तर पर इनमें गंधों के मध्य व्यावर्तक रेखायें
नहीं होतीं ।
इस सामान्य स्तर पर सामान्य गंधत्व मात्र का अवस्थान होता है न कि गंधों की
पृथकता का । गंधों में पार्थक्य का अभी श्रीगणेश भी नहीं होता । इस स्तर पर विशिष्ट
धर्मों, विशिष्ट धर्मों आदि से शून्य शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गंध की अवस्थिति रहती
है ।
पुर्यष्टक ही आत्मा का बन्धन—तन्मात्ररूप में स्थित शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं
गंध का ऐन्द्रिय ग्रहण संभव नहीं हो पाता बल्कि विशिष्ट धर्मों से युक्त होने पर ही
इन्द्रियाँ इनको ग्रहण कर सकती हैं । क्या है 'सूक्ष्मपुर्यष्टक'? तन्मात्र शब्द, स्पर्श, रूप,
रस, गंध एवं अंतःकरण त्रय से निर्मित 'वासना पिण्ड' ही 'सूक्ष्म पुर्यष्टक' कहलाता है ।
'स्थूल शरीर' गुणत्रय, मन, बुद्धि अहंकार (अंतःकरणत्रय) तथा इनके संवेद्य विषय
तन्मात्रों के कार्यस्वरूप ५ स्थूल महाभूतों के मिश्रण से निर्मित है ।