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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 481, कुल 519 में से

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पृष्ठ 481

३८० स्पन्दकारिका
मायीय आवरणों के द्वारा आच्छादित होने के कारण शिव अपने ही अंगभूत वेद्य
पदार्थों को अपने स्वरूप से भिन्न समझने के सङ्कोच की परवशता में पड़ जाता है।
'शब्दानुवेध' शब्द ध्यातव्य है। वृत्तिकार ने ठीक ही कहा है कि 'शब्दरहितस्य
प्रत्ययस्य ज्ञानस्य नास्त्येव कस्यचिदुद्भवः ॥' विश्व के प्रत्येक पदार्थ के साथ उसके
वाचक शब्द का शाश्वत सम्बन्ध जुड़ा है। इसे ही कहा गया है कि—'प्रत्येक अर्थ (ज्ञेय
पदार्थ) प्रकाशरूप है।' शब्द ही प्रत्येक अर्थ को ज्ञान के रूप में (उसको) सत्ता प्रदान
करता है क्योंकि विश्व में ऐसा कोई अर्थ या उसका ज्ञान नहीं है जिसके साथ
शब्दानुवेध न हो। 'शब्द' एवं अर्थ का साहचर्य शिव शक्ति का यामल है—
'वागार्थाविवसंपृक्तौ पार्वतीपरमेश्वरौ' (कालिदास)
शिव की क्रियात्मिका शक्ति के कार्य—
सेयं क्रियात्मिका शक्तिः शिवस्य पशुवर्तिनी ।
बन्धयित्री स्वमार्गस्था ज्ञाता सिद्धयुपपादिका ॥ ४८ ॥
शिव की यह क्रियात्मिका शक्ति स्वयं शिव को पशुत्व प्रदान करती है और उसके
लिए बन्धयित्री बन जाती है। ज्ञात होने पर स्वात्म की ओर गतिशील यह शक्तिमुक्ति
रूपी सिद्धि प्रदान करती है ॥ ४८ ॥

  • सरोजिनी *
    क्रियात्मिका शक्ति—'क्रियाशक्तिस्तु, रौद्रीयं वैखरी विश्वविग्रहा।' (यो०ह०)
    सेयं = (सा इयं) = वह यह ! शिवस्य = स्वस्वभाव परमेश्वर शिव की। क्रियात्मिका
    = तत्स्वरूपप्रत्यवमर्शलक्षणव्यापारशरीरा। शक्तिः = सामर्थ्यरूप अव्यभिचारीधर्म। इयं
    = प्रतिपादित प्रसररूपा शक्ति अद्वयचिन्मात्रस्वभावप्रत्यवमर्शिनी पारमेश्वरी शक्ति। पशु
    = जीव। 'पशु'—
    (१) 'शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् ।
    कलाविलुप्तविभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥'१
    (२) 'स्वाङ्गरूपेषु भावेषु प्रमाता कथ्यते पतिः ।
    मायातो भेदिषु क्लेशं कर्मादिक्लुषः पशुः ॥'२
    (३) 'भेदग्रन्थिविभेदे हि कर्मात्मैक्यं प्रपद्यते ॥
    सोऽविज्ञातः पशुः प्रोक्तो विज्ञातः पतिरेव सः ॥'३
    (४) 'बाह्यादिशक्ति चक्रस्य कलाभिः ककाराद्यक्षरैर्विलुप्तविभवो हतमहाव्याप्तिः
    स्वभावात् प्रच्यावितोऽत एवास्य भोग्यतां गतः सन् पुरुषः पशुरुच्यते अज्ञत्वात् ॥'४
    पशु—वर्णसमुदाय ही 'शब्दराशि' है। अकार से क्षकार पर्यन्त समस्त मातृकायें ही
    १. स्पन्दकारिका (श्लोक ४५)। २. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा।
    ३. ऐश्वर्यदशायां प्रमाता विश्वं शरीरतया पश्यन् 'पतिः' पुंस्त्वावस्थायां तु रागादि-
    क्लेशकर्मविकाशायैः परीतः पशुः (प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति : उत्पलदेव)।
    ४. स्पन्दप्रदीपिका (उत्पलदेव)।