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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 479, कुल 519 में से

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पृष्ठ 479

३७८ स्पन्दकारिका
आवरण डालकर उन्हें दिग्भ्रान्त करती रहें किन्तु ये ही शक्तियाँ शिव भूमिका (पति-
भूमिका) पर जहाँ कि शक्ति का अर्हविमर्शात्मिका स्पन्दना स्थित है और पूर्ण स्वातन्त्र्य
उल्लसित है वहाँ वे स्वरूप गोपन की क्रिया करके स्वरूपावरण नहीं करतीं क्योंकि शक्ति
जब तक माया की भूमिका पर आरूढ़ होकर बहिर्मुखी नहीं होती तब तक स्वरूपावरण
नहीं करती किन्तु मायाशक्ति का रूप धारण करते ही वह स्वरूपगोपनात्मिका क्रीड़ा प्रारंभ
कर देती है इसीसे इसे 'स्वरूपगोपन व्यग्रा' कहा जाता है—
स्वरूप गोपन क्रीडा— 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' (सूत्र १२) में आचार्य क्षेमराज कहते
हैं—(१) 'भगवती चिति शक्ति ही विश्व का वमन या बहिः प्रकाशन करने के कारण या
संसार रूप वाम (विपरीत) आचरण करने के कारण 'वामेश्वरी' का रूप ग्रहण करती
हुई, 'खेचरी' 'गोचरी' 'दिक्‍चरी' तथा 'भूचरी' रूप प्रमाता । अन्तःकरण, बाह्य
करण एवं वस्तु स्वभाव रूप में स्फुरित होती है ।'¹
(२) 'पशु भूमिका में शून्य पद ग्रहण करके पारमार्थिकी 'चिद्गगनचरी' का स्वरूप
छिपाकर, किंचित्कर्तृत्वादिरूप कला आदि शक्त्यात्मक खेचरी चक्र रूप में प्रकाशित
होती हैं ॥'
(३) 'अभेद निश्चयादिरूप पारमार्थिक स्वरूप छिपाकर, भेद निश्चय भेदाभिमान
एवं भेदकल्पना प्रधान अंतःकरणों की देवी रूप 'गोचरी चक्र' के रूप में प्रकाशित
होती है ।'²
(४) 'अभेद प्रथात्मक पारमार्थिक जिसमें आवृत्त है तथा भेद का आलोचन आदि
जिसमें प्रधान हैं—ऐसी बाह्य करणों की देवी स्वरूप दिक्चरी चक्र के रूप में भी वही
चिति उदित होती है तथा सर्वात्मरूप को छिपाकर भेदाभास स्वभाव, प्रमेय रूप
'भूचरीचक्र' के रूप में पशु हृदयों को मूढ़ बनाती हुई शोभित होती है ।'³
स्वरूप गोपन-क्रीड़ा और उसके साधन
'मल' (अज्ञान) विकल्पज्ञान
आणवमल मायीयमल कार्ममल अष्ट शक्तियाँ
ब्राह्मी माहेश्वरी कौमारी वैष्णवी वाराही ऐन्द्री चामुण्डा महालक्ष्मी
(क वर्ग) (च वर्ग) (ट वर्ग) (त वर्ग) (प वर्ग) (य वर्ग) (श वर्ग) (अ वर्ग)
'पतिभूमिका में तो सर्वकर्तृत्वदि शक्तिरूप—'चिद्गगनचरी' अभेदनिश्चयादिरूप
गोचरी । भेदालोचनाद्यात्मक दिक्चरी और निजांगस्वरूप अद्वैतप्रथासारभूत
प्रमेयात्मक 'भूचरी' रूप से पति-हृदय को विकसित करती हुई स्फुरित होती है ।'⁴
१. राजाचनक क्षेमराज—'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' । २. 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' ।
३. 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' । ४. 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' ।