स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः निष्यन्दः ३८३
'इत्थं तथा घटपटाद्याभास जगदात्मना ।
तिष्ठासोरेवमिच्छैव हेतुता कर्तृता क्रिया ।। ५३ ।।
स्वातन्त्र्यात्मा चितिशक्ति ही 'ज्ञान' 'क्रिया' और माया रूप होकर पशुदशा में
संकोच के प्रकर्ष से सत्व-रज एवं तम स्वभाव वाले चित्त के रूप में स्फुरित होता है ।१
'पशुवर्तिनी बन्धयित्री'— यह पारमेश्वरी क्रियात्मिका पराशक्ति भेदप्रत्यय के उद्भव से
उपपादित पारतन्त्र्य के पुरुष (जीव) में संक्रान्त होने पर जन्ममरण, सुखदुःखादि रूप
बन्धन प्रदान करती है । यह आत्मा को पशुत्व से बाँध देती है—'आ प्रबोधप्रत्युदयात्
पशुत्वेन बध्नाति'—इसीलिए कहा गया है—'पशुवर्तिनीबन्धयित्री' ।२
ज्ञाता = जान लिए जाने पर (‘शिवात्मकस्वभाव प्रत्यवमर्शक्रियारूपतया प्रत्यभि-
ज्ञाता सती’ ३)—(‘सिद्धियाँ प्रदान करती है ।) ॥
सिद्धयुपपादिका—'सिद्धि' क्या है ! सिद्धि है—आत्मैश्वर्याधिगमलक्षण रूपा
'परा' की एवं आनुषंगिक विविध विभूतियों के आविर्भाव रूप 'अपरा' सिद्धियों की
उपपादिका (संपादयित्री) । यह शक्ति 'पशुवर्तिनी' कब बनती है? 'प्रत्ययोद्भवरूप माया
वैभव से उद्भावित भेदों को जन्म देने पर यही शक्ति 'पशुवर्तिनी' कही जाती है ।४
किन्तु प्रत्युदित प्रबोध वाले साधक के अपने स्वात्मरूप में यथावस्थित होने से उसके
प्रत्यभिज्ञायमान होने के कारण यह शक्ति उसे समस्त सिद्धियाँ प्रदान करती है ।५
पशु = 'आहार निद्राभय मैथुनानि समानमेतद् पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि
तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनः पशुभिः समानः ।।'
स्वमार्गस्था = अपने आत्मीय (निजी) शिवस्वभावरूप मार्ग में स्थित और
तद्व्यतिरिक्त विषयान्तर से निवृत्त होकर स्वात्मस्थित ॥
एषा = परमेश्वरस्वरूप प्रकाशप्रत्यवमर्शमात्ररूपा 'पराशक्ति' जो वाणी के रूप में
सर्वत्र फैली हुई है—या सर्वव्याप्त है वह यह शक्ति ।
यही शक्ति इच्छा-ज्ञान-क्रिया आदि का रूप धारण कर लेती है—
‘या सा शक्तिर्जगद्धातुः कथिता समवायिनी ।
इच्छात्वं तस्य सा देवि सिसृक्षोः संप्रपद्यते ॥
सैकापि सत्यनेकत्वं यथागच्छति तच्छृणु ।
एवमेतदिति ज्ञेयं नान्यथेति सुनिश्चितम् ॥
(१) ज्ञान शक्ति = ज्ञापयन्ती जगत्यत्र ज्ञानशक्तिर्निगद्यते ।
एवं भवत्विदं सर्वमिति कार्योन्मुखी यदा ॥
(२) क्रियाशक्ति = जाता तदैव तत्तद्रूपकुर्वत्यत्र क्रिया मता ।
एवं यथा द्विरूपैव पुनर्भेदैरनेकताम् ।। आदि ॥६
१. क्षेमराजः 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (सूत्र ५) । २. रामकण्ठः स्पन्दकारिकावृत्ति ।
३. रामकण्ठाचार्य । ४. रामकण्ठ ।
५. स्पन्दकारिकाविवृति (रामकण्ठाचार्य) । ६. मालिनीविजय ।