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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 478, कुल 519 में से

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पृष्ठ 478

तृतीयः निष्यन्दः ३७७
शब्द-शून्य प्रत्यय (ज्ञान) का आविर्भाव हो ही नही सकता। सारांश यह कि प्रत्ययों का
मूल शब्द है अतः शब्द शून्य ज्ञान संभव नहीं है।
स्वरूप = स्वभाव। आवरण = आच्छादन। चास्य = च + अस्य = और इस
पुरुष की। शक्तयः = पूर्वोक्त ब्राह्मी आदि अष्ट वर्गाधिष्ठात्री शक्तियाँ। उत्थिता = उद्यत
रहती हैं। यतः = क्योंकि 'शब्दानुवेधेन न विना' = शब्दों की अनुस्यूतता के बिना।
प्रत्ययोद्भवः = किसी भी प्रत्यय या ज्ञान का आविर्भाव नहीं हो सकता।
आत्मा का स्वरूपावरण—ब्राह्मी आदि शाब्दी शक्तियाँ पुरुष (जीव) के
'स्वभाव' पर आवरण डालने के लिए निरन्तर उद्यत रहती हैं।
प्रत्ययोद्भव = स्व शक्ति के विरोध के कारण विकल्प शून्य स्वरूप में ज्ञेय
विषयों से सम्बद्ध विकल्पात्मक ज्ञानों के उदित होने को 'प्रत्ययोद्भव' कहा गया है।
शब्द की सहायता (सहकारिता) के अभाव में किसी भी प्रत्यय (विकल्पात्मक ज्ञान) का
आविर्भूत होना कथमपि संभव नहीं है।
स्वरूपावरण—इस कारिका में पुरुष के स्वरूप पर जो आवरण पड़ जाता है
उसकी विवेचना की गई है।
आचार्य क्षेमराज ने 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्' में इसका सुन्दर विवेचन किया है। वे
कहते हैं—
'जब चिदात्मा परमेश्वर अपनी (स्वातन्त्र्य शक्ति से) स्वतन्त्रतापूर्वक अभेद-व्याप्ति
को संकुचित करके भेद व्याप्ति का अवलम्बन ग्रहण करते हैं तब उनकी इच्छादिक
शक्तियाँ असंकुचित होने पर भी संकुचित प्रतीत होती हैं। तभी यह मलों से आवृत
होकर संसारी हो जाता है।'
'यदा चिदात्मा परमेश्वरः स्वस्वातन्त्र्यात् अभेद व्याप्तिं विमृज्य भेद व्याप्तिं अव-
लम्बते तदा 'तदीया इच्छादिशक्तयः' असंकुचिता अपि संकोचवत्यो भान्ति, तदानीमेव च
अयं मलावृतः संसारी भवति॥' चाहे 'पतिभूमिका' हो चाहे 'पशुभूमिका' हो सभी
भूमिकायें चिदात्मा भगवान् की स्वातन्त्र्य शक्ति द्वारा अवभासित हैं—सभी भूमिकाओं में
एक ही आत्मा व्याप्त है—
'एकस्यैव चिदात्मनो भगवतः स्वातन्त्र्यावभासिता सर्वा इमा।
भूमिका ..... अतएव एक एव एतावद्व्याप्तिक आत्मा॥'
(क) स्वरूपावरण की एक शक्ति तो ब्राह्मी आदि शाब्दी अष्ट शक्तियाँ हैं। ये
शब्दानुविद्ध ज्ञान द्वारा स्वरूपावरण करती है। इनके स्वरूपावरण का साधन है :
शब्दानुविद्ध प्रत्यय॥ इसी लिए तो कहा गया है—'ज्ञानं बन्धः' (शिवसूत्र)॥
(ख) स्वरूपावरण का दूसरा साधन है—'मलत्रय' अर्थात् 'आणवमल'
'मायीय मल' 'कार्ममल'॥ 'ज्ञानंबन्धः' का ज्ञान 'विकल्पज्ञान' है न कि आत्मज्ञान॥
यह विकल्प ज्ञान भी स्वरूपावरण का कारण है।
शक्तियोँ का यह स्वभाव है कि वे प्रतिक्षण जीवों की आत्मा पर मायिक