स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
DevanagariHindipublished519 पृष्ठ
पृष्ठ 493, कुल 519 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 493संरुद्ध होकर 'पशु' बन जाती है और 'तद्भावात्'—उस पुर्यष्टक स्थूल सूक्ष्मरूप
३९२ स्पन्दकारिका
संरुद्ध होकर 'पशु' बन जाती है और 'तद्भावात्'—उस पुर्यष्टक स्थूल सूक्ष्मरूप
पुर्यष्टकों के विद्यमान होने से ('भाव से') और प्रबोधोदय न होने की स्थिति में
अनुच्छेदवश 'संसरेत्'—अनवरत रूप से नाना शरीर भोगवासना कर्म चक्र का अनुभव
करना चाहिए ।
देह-संरुद्ध पुरुष के प्रतिनियत सुखादिसंवेदनात्मक भोग में जो भोक्तृत्वाभिमान है
वही संसार (संसरण) का कारण है अतः इसका निरावरणस्वरूप स्थिति मात्र संसार के
विनाश का मूल कारण है। वृत्तिकार ने इसी भाव को इस प्रकार व्यक्त किया है—
(१) 'तन्मात्रोदय' (२) 'भुक्तेऽश्नाति परवशः ।'¹
तन्मात्र = सूक्ष्मपुर्यष्टक । तन्मात्रोदय = स्थूल पुर्यष्टक ॥ पशुभावस्थ 'शिव'
शब्दादिक पञ्च तन्मात्राओं के अनुभव वाले मन, अहङ्कार एवं बुद्धि—इन तीनों के द्वारा
परामर्श किए जाने वाले पुर्यष्टक के बन्धन में पड़ा है । पुर्यष्टक से ही सुखात्मक
दुःखात्मक संवेदनाओं का प्रादुर्भाव होता है ।²
अड़तालिसवीं कारिका यह प्रतिपादित करती है कि आत्मा को जब अपनी शक्ति
का बोध नहीं रहता तो उसकी यह अज्ञानता ही व्यक्ति को बन्धन में डाल देती है ।
आत्मबोध का यह अभाव प्रमाता को अधःपतन के गर्त में डाल देता है ।
बन्धन का हेतुत्व—उन्चासवीं कारिका में यह बताया गया है कि 'क्रियाशक्ति'
बन्धन का हेतु कैसे बनती है? 'पुर्यष्टक' के दो रूप हैं—(१) सूक्ष्म (आतिवाहिक) (२)
स्थूल (भौतिक) = भोग शरीर ।
पुर्यष्टक—सूक्ष्म शरीर (सूक्ष्म पुर्यष्टक) एवं स्थूल शरीर (स्थूल पुर्यष्टक)
स्थूलपुर्यष्टक = पाञ्चभौतिक स्थूल शरीर ।
सूक्ष्मपुर्यष्टक = कारण शरीर—स्थूल पुर्यष्टक ॥
तन्मात्र रूप = सूक्ष्म पुर्यष्टक । कारण शरीर ।
तन्मात्रोदय रूप = स्थूल पुर्यष्टक । षाट्कौशिक स्थूल शरीर ॥
इन्हीं शरीरों से आबद्ध (संरुद्ध) मानकर पुरुष परवश होकर उसमें उठने वाले
सुख दुःख आदि संवेदन रूप प्रत्ययों का उपभोग करता है । उन्हीं को अपना स्वरूप
स्वीकार करके वह शरीराभिमानी (शरीरात्मवादी) बनकर संसरण चक्र का अनुवर्ती बन
जाता है । स्पन्दप्रदीपिका में कहा गया है—'अपने प्रत्यय के अतिरिक्त संसार का अन्य
कारणान्तर नहीं है ।'
पुर्यष्टक और उसका स्वरूप—पुर्यष्टक के दो भेद हैं—
(१) सूक्ष्म पुर्यष्टक = कारण शरीर ॥ 'तन्मात्र'
(२) स्थूल पुर्यष्टक = पाँचभौतिक स्थूल शरीर ॥ 'तन्मात्र'
'पुर्यष्टकस्य किल द्वे रूपे—एकं सूक्ष्ममातिवाहिकाख्या तन्मात्रमभिलाषात्मकम् ।
१. रामकण्ठाचार्यः 'स्पन्दविवृति' । २. भट्टकल्लट—'स्पन्दकारिकावृत्ति' ।