श्री हनुमान चालीसा, संकटमोचन हनुमानाष्टक एवं बजरंग बाण (महावीरी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Shri Hanuman Chalisa with Mahaviri Commentary
गोस्वामी तुलसीदास (व्याख्याकार: स्वामी रामचन्द्रदास 'महावीर') द्वारा
मंगलाचरण, दोहा 'श्रीगुरु चरन सरोज रज' एवं प्रथम १० चौपाइयाँ
गोस्वामी तुलसीदास विरचित
श्रीहनुमान्-चालीसा
महावीरी व्याख्या सहित
व्याख्याकार
जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी रामभद्राचार्य
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श्रीहनुमान्-चालीसा—महावीरी व्याख्या सहित
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श्रीहनुमान्-चालीसा
महावीरी व्याख्या सहित
(मूलपाठ, विशिष्टशब्दार्थ, सामान्यार्थ, व्याख्या,
पद्यार्धानुक्रमणी, और शब्दानुक्रमणी सहित
भक्तशिरोमणि गोस्वामी तुलसीदासकी सिद्ध रचना)
व्याख्याकार
पद्मविभूषण-विभूषित जगद्गुरु रामानन्दाचार्य
स्वामी रामभद्राचार्य
चतुर्थ संस्करण
जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्याङ्ग विश्वविद्यालय, चित्रकूट
विक्रम संवत् २०७८
प्रकाशक
जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्याङ्ग विश्वविद्यालय
कर्वी, चित्रकूट
उत्तरप्रदेश २१०२०४, भारत
चतुर्थ संस्करण (पाँच सहस्र प्रतियाँ): चित्रकूट, विक्रम संवत् २०७८
© विक्रम संवत् २०४१-२०७८ स्वामी रामभद्राचार्य
ISBN-13: 978-93-82253-07-5
आवरण-चित्र: भँवरलाल गिरधारीलाल शर्मा
© बी. जी. शर्मा आर्ट गैलरी, उदयपुर
आवरण-रूपरेखा: नित्यानन्द मिश्र
चाणक्य संस्कृत और Charis SILमें अक्षर-संयोजन: नित्यानन्द मिश्र
Ornaments from Vectorian Free Vector Pack by Webalys
www.vectorian.net
मुद्रक
Dhote Offset Technokrafts Pvt. Ltd.
C/203 Sintofine Industrial Estate
Vishweshwar Nagar Road, Goregaon (East)
Mumbai 400063, India
श्रीहनुमान्-चालीसाके प्रशस्त व्याख्याकार
धर्मचक्रवर्ती महामहोपाध्याय वाचस्पति कविकुलरत्न महाकवि
प्रस्थानत्रयीभाष्यकार श्रीचित्रकूटतुलसीपीठाधीश्वर
ऋतम्भराचक्षु पद्मविभूषण-विभूषित जगद्गुरु रामानन्दाचार्य
स्वामी रामभद्राचार्य
(१९५०–)
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संकेताक्षर-सूची
अ.को. अमरकोष
अ.रा. अध्यात्म-रामायण
अ.सं. अगस्त्य-संहिता
क. कवितावली
का.वा. कात्यायनवार्तिक
कि. किरातार्जुनीय
गी. गीतावली
त.सं. तर्कसंग्रह (अन्नम्भट्टकृत)
तै.उ. तैत्तिरीयोपनिषद्
दो. दोहावली
धा.पा. धातुपाठ (पाणिनिकृत)
प्रा.प्र. प्राकृतप्रकाश (वररुचिकृत)
भ.गी. भगवद्गीता
भा.पा.सू. भाष्य (पतञ्जलिकृत)में पाणिनीयसूत्र
भा.पु. भागवत-पुराण
म.भा. महाभारत
म.स्मृ. मनुस्मृति
मा.सु.सं. महासुभाषितसंग्रह
मु.उ. मुण्डकोपनिषद्
यो.सू. योगसूत्र
र.वं. रघुवंश
रा.च.मा. रामचरितमानस
रा.प्र. रामाज्ञाप्रश्न
रा.र.स्तो. रामरक्षास्तोत्र (बुधकौशिककृत)
वा.रा. वाल्मीकीय-रामायण
वि.प. विनयपत्रिका
वि.पु. विष्णु-पुराण
वै.सं. वैराग्यसंदीपनी
सं.ह.अ. संकटमोचन-हनुमन्-अष्टक
ह.चा. श्रीहनुमन्-चालीसा
ह.बा. श्रीहनुमन्-बाहुक
विषय-सूची
सम्पादकीय १
आमुख ३
महावीरी व्याख्या ११
व्याख्याकारका मङ्गलाचरण . . . . . . . . . . . . ११
मङ्गलाचरण दोहा १: श्रीगुरु-चरन-सरोज-रज . . . . . . . . १२
मङ्गलाचरण दोहा २: बुद्धि-हीन तनु जानिकै . . . . . . . . १५
चौपाई १: जय हनुमान ज्ञान-गुण-सागर . . . . . . . . . १७
चौपाई २: राम-दूत अतुलित-बल-धामा . . . . . . . . . १९
चौपाई ३: महाबीर बिक्रम बजरंगी . . . . . . . . . . २१
चौपाई ४: कंचन-बरन बिराज सुबेसा . . . . . . . . . २४
चौपाई ५: हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजै . . . . . . . . . २६
चौपाई ६: शंकर स्वयं केसरीनंदन . . . . . . . . . . २७
चौपाई ७: बिद्यावान गुणी अति चतुर . . . . . . . . . २९
चौपाई ८: प्रभु-चरित्र सुनिबे को रसिया . . . . . . . . . ३१
चौपाई ९: सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा . . . . . . . . . ३३
चौपाई १०: भीम रूप धरि असुर सँहारे . . . . . . . . . ३५
चौपाई ११: लाय सँजीवनि लखन जियाये . . . . . . . . ३९
चौपाई १२: रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई . . . . . . . . . ४०
चौपाई १३: सहसबदन तुम्हरो जस गावैं . . . . . . . . ४१
चौपाई १४: सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा . . . . . . . ४२
चौपाई १५: जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते . . . . . . . ४३
चौपाई १६: तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा . . . . . . . ४५
चौपाई १७: तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना . . . . . . . ४७
चौपाई १८: जुग सहस्त्र जोजन पर भानू . . . . . . . ४९
चौपाई १९: प्रभु-मुद्रिका मेलि मुख माहीं . . . . . . . ५२
चौपाई २०: दुर्गम काज जगत के जे ते . . . . . . . ५३
चौपाई २१: राम-दुआरे तुम रखवारे . . . . . . . ५४
चौपाई २२: सब सुख लहहिं तुम्हारी शरना . . . . . . . ५८
चौपाई २३: आपन तेज सम्हारो आपे . . . . . . . ५९
चौपाई २४: भूत पिशाच निकट नहिं आवै . . . . . . . ६१
चौपाई २५: नासै रोग हरै सब पीरा . . . . . . . ६२
चौपाई २६: संकट तें हनुमान छुड़ावै . . . . . . . ६३
चौपाई २७: सब-पर राम राय-सिरताजा . . . . . . . ६४
चौपाई २८: और मनोरथ जो कोइ लावै . . . . . . . ६५
चौपाई २९: चारिउ जुग परताप तुम्हारा . . . . . . . ६६
चौपाई ३०: साधु संत के तुम रखवारे . . . . . . . ६८
चौपाई ३१: अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता . . . . . . . ६९
चौपाई ३२: राम-रसायन तुम्हरे पासा . . . . . . . ७१
चौपाई ३३: तुम्हरे भजन राम को पावै . . . . . . . ७२
चौपाई ३४: अंत-काल रघुबर-पुर जाई . . . . . . . ७३
चौपाई ३५: और देवता चित्त न धरई . . . . . . . ७४
चौपाई ३६: संकट कटै मिटै सब पीरा . . . . . . . ७५
चौपाई ३७: जय जय जय हनुमान गोसाईं . . . . . . . ७६
चौपाई ३८: जो शत बार पाठ कर कोई . . . . . . . ७७
चौपाई ३९: जो यह पढ़ै हनुमान-चलीसा . . . . . . . . . . ७८
चौपाई ४०: तुलसीदास सदा हरि-चेरा . . . . . . . . . . ७९
उपसंहार दोहा: पवनतनय संकट-हरन . . . . . . . . . . ८०
व्याख्याकारका उपसंहार . . . . . . . . . . . . . ८०
पद्यार्धानुक्रमणी ८३
शब्दानुक्रमणी ८७
हनुमान्जीकी आरती ९३
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सम्पादकीय
महावीरी व्याख्याकी अनवरत बढ़ती माँगको देखते हुए इसका चतुर्थ
संस्करण प्रकाशित किया गया है। गुरुदेवके निर्देशानुसार चौपाई २९की
व्याख्यामें एक श्लोक जोड़ा गया है और एक-दो स्थानोंपर मूलपाठमें
साधारण सुधार (यथा चारों के स्थान पर चारिउ) किया गया है। शेष
सब तृतीय संस्करणका ही नया रूप है। मात्र एक दिनमें (१३–१४ मई,
१९८३ ई.) प्रणीत इस व्याख्याके विषयमें डॉ. रामचन्द्र प्रसादने लिखा
था—१
“श्रीहनुमानचालीसा की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या के लिए देखें महावीरी
व्याख्या, जिसके लेखक हैं प्रज्ञाचक्षु आचार्य श्रीरामभद्रदासजी।
श्रीहनुमानचालीसा के प्रस्तुत भाष्य का आधार श्रीरामभद्रदासजी
की ही वैदुष्यमंडित टीका है। इसके लिए मैं आचार्य-प्रवर का
ऋणी हूँ।”
महावीरी व्याख्याका चतुर्थ संस्करण सभी हनुमद्भक्तोंको समर्पित है।
मनीषकुमार शुक्ल नित्यानन्द मिश्र
अपरा एकादशी, वि.सं. २०७८
(६ जून २०२१ ई.)
१ Ram Chandra Prasad (2008) [1990]. Shri Ramacharitamanasa: The
Holy Lake of the Acts of Rama (2nd ed.). Delhi: Motilal Banarsidass, ISBN
978-81-208-0443-2, p. 849, footnote 1.
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आमुख
उद्यच्चण्डकराभभव्यभुवनाभ्यर्चाप्रदीप्तं वपु-
र्बिभ्रन्मञ्जुलमौञ्जसूत्रमनघं घर्मघ्नकान्तस्मितम्।
सीतारामपदारविन्दमधुपः प्रावृट्पयोदद्विषां
झञ्झावातनिभो भवाय भवतां भूयान्मुहुर्मारुतिः ॥
साहित्य-गगनके मरीचिमाली एवं कविता-कामिनी-यामिनीके
शारद निष्कलङ्क शशाङ्क, रामभक्ति-भागीरथी-सनाथित-हृदय-धरातल,
सकल-कविकुल-शेखर, वैष्णव-वृन्द-वृन्दारकेश, सीतारमण-पदपद्म-
पराग-परिमल-मकरन्द-मधुकर, कलिपावनावतार, प्रातःस्मरणीय,
परम आदरणीय श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजकी कृतियोंमें
श्रीहनुमान्-चालीसाको भी बहुचर्चित रूपमें स्थान प्राप्त है। गुणगृह्या
वचने विपश्चितः (कि. २-५) की दृष्टिसे यह विषय विशेष आलोचनीय
नहीं है, तथापि कुछ विचार करना अनुपयुक्त भी नहीं होगा। गोस्वामीजीके
ही द्वारा श्रीकाशीमें प्रतिष्ठित श्रीसंकटमोचन-हनुमान्जीके मन्दिरमें भी यह
हनुमान्-चालीसा स्तोत्ररत्न भित्तिपर लिखा हुआ लेख रूपमें आज भी
दृष्टिगोचर है। मानसजीके तथा गोस्वामीजीके अन्य सर्वमान्य ग्रन्थरत्नोंकी
प्रसंग-संगति भी इस ग्रन्थके प्रसंगोंसे एकवाक्यतापन्न हो जाती है।
यथा—लाय सँजीवनि लखन जियाये (ह.चा. ११), तुम उपकार
सुग्रीवहिं कीन्हा (ह.चा. १६), तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना (ह.चा.
१७) इत्यादि प्रसंग मानससे पूर्णतया मिलते हैं। श्रीहनुमान्-विभीषण-संवाद
श्रीमानसजीके अतिरिक्त गोस्वामीजीके अन्य किसी ग्रन्थमें शब्दतः चर्चित
आमुख महावीरी व्याख्या
नहीं है। पर मानसके इस गोपनीयतम प्रसंगरत्नकी चर्चा श्रीहनुमान्चालीसामें
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना (ह.चा. १७) कह कर सूत्ररूपमें कर दी
गई है। श्रीरामचरितमानसमें कथित प्रसंगोंकी गोस्वामीजीके अन्य ग्रन्थोंसे
संगति लगाई जाती है। इसीलिए द्वादश ग्रन्थ मानसजीके पूरक माने जाते
हैं। जैसे द्रोणाचलको लेकर श्रीअवधके ऊपर आते हुए हनुमान्जीको
भरतजीने बिना फरके बाणसे विद्धकर नीचे गिराया, यथा—परेउ मुरछि
महि लागत सायक (रा.च.मा. ६-५९-१)। पर पर्वतकी क्या दशा हुई,
इसका स्पष्टीकरण मानसमें न करके गोस्वामीजीने इसके पोषक गीतावली
ग्रन्थमें किया है—पर्यो कहि राम पवन राख्यो गिरि (गी. ६-१०-२)
अर्थात् हनुमान्जीने अपनेको गिरता हुआ जानकर द्रोणाचल पर्वतको
पवनके हाथ सौंप दिया। एवमन्यत्रापि। जैसे गोस्वामीजीके अन्य ग्रन्थ
मानसके प्रसंगोंके पूरक हैं, वैसे ही श्रीहनुमान्-चालीसा भी है। यथा
राघवने हनुमान्जीको मुद्रिका दी—
परसा शीष सरोरुह पानी।
करमुद्रिका दीन्ह जन जानी॥
—रा.च.मा. ४-२३-१०
पर इस मुद्रिकाको हनुमान्जी महाराजने कैसे एवं कहाँ सम्भाला, मानसके
इस निगूढ प्रसंगका स्पष्टीकरण श्रीहनुमान्-चालीसामें ही होता है। यथा—
प्रभु-मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
—ह.चा. १९
अतः इस परीक्षणमें भी यह ग्रन्थ खरा उतरा।
भाषा एवं शैलीकी दृष्टिसे भी यह निन्द्य नहीं कहा जा सकता। सामान्य
लोगोंके कल्याणार्थ गोस्वामीजीने सुरसरि सम सब कहँ हित होई
(रा.च.मा. १-१४-९) की मान्यताके अनुसार अति सरल ग्राम्य भाषामें
४
महावीरी व्याख्या आमुख
रचना करके मधुरतम शिष्ट एवं सुबोध ग्रामीण शब्दोंमें इसे सजाया है। यही
कारण है कि यह विद्वानोंकी भी हृदयतन्त्रीको झङ्कृत करता है एवं अति गँवार
निरक्षर महिलाओंके भी हृदय-श्रद्धा-सुमनका परम पावन मकरन्द होकर
ग्रामीण भारती मधुकरीको भी गुनगुनवाता रहता है। आज यह हनुमन्-
चालीसा हिमाचलसे कन्याकुमारीतक प्रत्येक भारतवासीके मनोमन्दिरका
देवता बना हुआ है, चाहे वह व्यक्ति किसी भी धर्म या संप्रदायका हो।
विदेशोंके भी ७५ प्रतिशत भागोंमें जय हनुमान ज्ञान-गुण-सागर (ह.चा.
१) का नारा बुलन्द हो रहा है। गोस्वामीजीके अतिरिक्त और किसी
मनीषीकी लेखनीमें ऐसी उत्कृष्ट लोकप्रियताका प्रवाह नहीं दृष्टिगोचर होता।
अन्य ग्रन्थों जैसी लोकप्रियता तुलसीकृत हनुमन्-चालीसामें विद्यमान है।
प्रत्येक सनातन-धर्मी श्रीमानसजीके पाठ-प्रारम्भ तथा पाठ-विश्राममें हनुमन्-
चालीसाका संपुट लगाता है।
यदि भाषापर विचार करें तो गोस्वामीजीके श्रीरामललानहछूसे सरल
हनुमन्-चालीसाकी भाषा नहीं है। गोस्वामीजीके अन्य ग्रन्थोंके समान इसमें
भी स्वभावतः अलंकार आए हैं। यथा—
कंचन-बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥
—ह.चा. ४
अतः भले ही यह हनुमन्-चालीसा तुलसीग्रन्थावलीमें न मुद्रित हो, पर
गोस्वामीजीकी रचना होनेमें किसी भी सहृदयको संदेह नहीं होगा। इसका
श्रद्धासे पाठ करनेपर बहुत-से लोगोंको सफलमनोरथ होते देखा एवं
सुना गया है। प्रायः भक्त महात्मा जन हनुमन्-चालीसाका उनचास(४९)-
दिवसीय तथा अष्टोत्तरशत(१०८)-दिवसीय अनुष्ठान किया करते हैं। भीषण
रोगसे आक्रान्त व्यक्ति भी इसका अनुष्ठान-विधिसे पाठ कर अति
शीघ्र लाभ पाते हैं। परम श्रद्धेय, ब्रह्मलीन, अनन्तश्रीविभूषित स्वामी
५
आमुख महावीरी व्याख्या
हरिहरानन्दजी सरस्वती (श्रीकरपात्रीजी महाराज) तो यहाँ तक कहते थे
कि श्रीहनुमान्-चालीसा आर्ष मन्त्रोंकी भाँति ही परमप्रमाण, सर्वशक्तिमान्,
तथा सर्ववाञ्छाकल्पतरु है। यह अवधी भाषामें उपनिबद्ध तैंतालीस छन्दोंमें
लिखा हुआ एक स्तोत्रकाव्य है, जिसे हम गोस्वामीजीकी सिद्ध रचना मानते
हैं। श्रीहनुमान्-चालीसाकी भाषा-शैली गोस्वामीजीके अन्य ग्रन्थोंसे मिलती-
जुलती है। श्रीहनुमान्-चालीसाकी सार्वभौमता एवं सर्वजन-सुलभताको
देखते हुए कोई भी सहृदय सन्त इसे अनार्ष नहीं मान सकता। गोस्वामीजीकी
द्वादश-ग्रन्थावलीके अन्तर्गत इस ग्रन्थका संग्रह न होना कोई विशेष
महत्त्वका नहीं है क्योंकि बहुत-से ऐसे पद श्रीगोस्वामीजीके नामसे मिलते
हैं जिनका संग्रह ग्रन्थावलीमें नहीं है, जबकि उनकी रचना-शैली क्वचित्-
क्वचित् गोस्वामीजीके संगृहीत पदोंसे भी अधिक रुचिकर लगती है। यथा—
ठुमुकि चलत रामचन्द्र बाजत पैजनियाँ॥
किलकि किलकि उठत धाय परत भूमि लटपटाय।
धाय मातु गोद लेत दशरथ की रनियाँ॥
अंचल रज अंग झारि बिबिध भाँति सौं दुलारि।
तन मन धन वारि वारि कहत मृदु बचनियाँ॥
विद्रुम से अरुण अधर बोलत मुख मधुर मधुर।
सुभग नासिका में चारु लटकत लटकनियाँ॥
तुलसिदास अति अनंद देख के मुखारबिंद।
रघुबर-छबि के समान रघुबर-छबि बनियाँ॥
अहो! इस पदमें उपस्थित की हुई राघव सरकारकी यह भुवनमोहन झाँकी
किस सहृदय मनको बालरूप श्रीरामभद्रकी ओर झटिति नहीं खींच लेती!
यह पद अलंकार, रस, भक्ति, तथा संगीतकी दृष्टिसे अनुपम होता हुआ भी
गोस्वामीजीके किसी भी ग्रन्थमें संगृहीत नहीं हो सका, पर ४०० वर्षोंसे चली
आ रही अविच्छिन्न परम्परामें अद्यावधि यह गोस्वामीजीकी गेय रचनाओंका
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