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श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

श्रीकील्हदेवजी) (४१
पयहारी के शिष्यगण
पयहारी परसाद तें, शिष्य सबै भये पारकर।।
कील्ह अगर केवल, चरण ब्रतहठी नारायण।
सूरज पुरुषां पृथु, तिपुर हरिभक्ति परायन।।
पद्मनाभ गोपाल, टेक टीला गदाधारी।
देवा हेम कल्यान, गंगा गंगासम नारी।।
विष्णुदास कन्हर रंगा, चाँद सबही गोविन्द पर।
पयहारी परसाद तें शिष्य सबै भये पारकर।।३६।।
श्रीकील्हदेवजी
गांगेय मृत्यु गंज्यो नहीं, त्यौं कील्ह करन नहिं कालवश।।
राम चरण चिन्तवनि, रहति निशिदिन लौं लागी।
सर्वभूत सिर नामित, सूर भजनानन्द भागी।।
सांख्ययोग मति सुदृढ़, कियो अनुभव हस्तामल।
ब्रह्मरन्ध्र करि गौन भये, हरि तन करनी बल।।
सुमेरदेव सुत जग विदित, भुवि विस्तार्यो विमल यश।
गांगेय मृत्यु गंज्यो नहीं त्यौं, कील्ह करन नहिं कालवश।।४०।।
श्रीसुमेर देव पिता सूबे गुजरात हुतें, भयो तनु पात सो विमान चढ़ि चले हैं।
बैठे मधुपुरी कील्ह मानसिंह राजा ढिंग, देखे नभ जात उठि कही भले-भले हैं।।
पूछे नृप 'बोले कासौँ?' कैसे के प्रकासौँ, कहौ, कह्यो हठ परे सुनि अचरज रले है।
मानुस पठाये सुधि ल्याये साँच आँच लागी, करी साष्टांग बात मानी भाग फले हैं।।१२१।।
ऐसे प्रभु लीन नहीं काल के अधीन बात, सुनिये नवीन चाहें रामसेवा कीजिये।
धरी ही पिटारी फूल-माला हाथ डार्यो तहाँ, ब्याल कर काट्यो कह्यो फेरि काटि लीजिये।।
ऐसे ही कटायो बार तीनि हुलसायो हियो, कियो न प्रभाव नेकु सदा रस पीजिये।
करिकै समाज साधु मध्य यों विराज प्रान, तजे, दसैँ द्वार योगी थके सुनि जीजिये।।१२२।।

४२) (श्री भक्तमाल)

श्रीअग्रदासजी
(श्री) अग्रदास हरिभजन बिन काल वृथा नहिं बित्तयो।।
सदाचार ज्यौं सन्त, प्राप्त जैसें करि आये।
सेवा सुमिरन सावधान, चरण राघव चित लाये।।
प्रसिध बाग सौं प्रीति, सुहथ कृत करत निरन्तर।
रसना निर्मल नाम, मनहुँ वर्षत धाराधर।।
कृष्णदास(कृपाकरि)भक्तिदत्त, मन वच क्रम करि अटल दयो।
(श्री) अग्रदास हरिभजन बिन काल वृथा नहिं बित्तयो।।४१।।

दरसन काज महाराज मानसिंह आयो, छायो बाग माँझ बैठे द्वार द्वारपाल हैं।
झारिकै पतौवा गये बाहिर लै डारिवे को, देखी भीर भार रहे बैठि ये रसाल हैं।।
आये देखि नाभा जू ने उठि साष्टांग करी, भरी जल आँखे चले अँसुवनि जाल हैं।
राजा मग चाहि हारि आनिकै निहारै नैन, जानी आप जानी भये दासनि दयाल है।।१२३।।

श्रीशंकराचार्यजी
कलियुग धर्मपालक प्रगट, आचारज शंकर सुभट।।
उत्शृंखल अज्ञान, जितें अनईश्वरवादी।
बौद्ध कुतर्की जैन, और पाखण्डहिं आदी।।
विमुखनि को दियों, दण्ड ऐंचि सन्मारग आने।
सदाचार की सीव, विश्व कीरतिहिं बखाने।।
ईश्वरांश अवतार महि, मरजादा माँडी अघट।
कलियुग धर्मपालक प्रगट, आचारज शंकर सुभट।।४२।।

विमुख समूह लैकें किये सनमुख श्याम, अति अभिराम लीला जग बिसतारी है।
सेवरा प्रबल बास केवरा ज्यौं फैलि रहे, गहे नहीं जाहिं वादी शुचि बात धारी है।।
तजिकै सरीर काहू नृप में प्रवेस कियो, दियो करि ग्रन्थ मोह–मुद्गर सुभारी है।
शिष्यानि सौं कह्यो कँभू देह में आवेस जानो, तबही बखानो आय सुनि कीजै न्यारी है।।१२४।।
जानिकै आवेस तन शिष्य नै प्रवेस कियो, रावले में देखि सो श्लोक लै उच्चार्यो है।
सुनतहिं तज्यो तन निज तन आय लियो, कियो यों प्रमान दासपन पूरो पार्यो है।।

श्रीनामदेवजी) (४३
सेवरा हराये वादी आये नृप पास ऊँचे, छात पर बैठि एक माया फन्द डार्यो है।
जल चढ़ि आयो नाव भाव लै दिखायो कहैं, 'चढ़ौं नहिं बूड़ो' आप कौतुक सौं धार्यो है।।१२५।।
आचारज कही यों चढ़ाओ इन सेवरानि, राजा ने चढ़ाये गिरे टूँक उड़ि गये हैं।
तबतौ प्रसन्न नृप पाँव पर्यो भाव भर्यो, कह्यो जोई कर्यो धर्म भागवत लये हैं।।
भक्ति ही प्रचार पाछे मायावाद डारि दीनौ, कीनौ प्रभु कह्यौ किते विमुखहू भये हैं।
आशय सो गँभीर सन्त धीर वह रीति जाने, प्रीति ही में साने हरिरूप गुन नये हैं।।१२६।।
श्रीनामदेवजी
नामदेव प्रतिज्ञा निर्वही ज्यौं त्रेता नरहरिदास की।।
बालदशा बीठल्य, पानि जाके पै पीयौ।
मृतक गऊ जिवाय, परचौ असुरन कौं दीयौ।।
सेज सलिल तें काढ़ि, पहिल जैसी ही होती।
देवल उलट्यो देखि, संकुचि रहे सबही सोती।।
पण्ढरनाथ कृत अनुग ज्यौं, छानि सुकर छाई घास की।
नामदेव प्रतिज्ञा निर्वही ज्यौं, त्रेता नरहरिदास की।। ४३।।
छीपा वामदेव हरिदेव जू का भक्त बड़ो, ताकी एक बेटी पतिहीन भई जानिये।
द्वादश बरष माँझ भयो तब कही पिता, सेवा सावधान मन नीके करि आनिये।।
तेरे जे मनोरथ हैं पूरन करन येई, जोपै दत्तचित्त ह्वै कैं मेरी बात मानिये।
करत टहल प्रभु वेगि ही प्रसन्न भये कीनी, काम-वासना सो पोषि उन मानिये।। १२७।।
विधवा को गर्भ ताकी बात चली ठौर-ठौर, दुष्ट सिरमौरनि की भई मन भाइयै।
चलत-चलत वामदेव जू के कान परी, करी निरधार प्रभू आप अपनाइयै।।
भयो जू प्रगट बाल नाम नामदेव धर्यौ, कर्यौ मनभायो सब सम्पत्ति लुटाइयै।
दिन-दिन बढ़्यो कछू औरे रंग चढ़यो भक्तिभाव, अंग मढ़यो कढ़यो रूप सुखदाइयै।। १२८।।
खेलत खिलौना रीति-प्रीति सब सेवा ही की, पट पहिरावैं पुनि भोग को लगावहीँ।
घण्टा लै बजावैं नीके ध्यान मन लावैं त्यौं-त्यौं, अति सुख पावैं नैन नीर भरि आवहीँ।।
बार-बार कहैं नामदेव वामदेव जू सौं, 'देवो मोहि सेवा माँझ अति ही सुहावहीं'।
'जाँऊ एक गाँव फिरि आऊँ दिन तीनि मध्य, दूध को पिवावौ मत पीवौ मोहि भावहीँ' ।। १२६ ।।

४४) (श्री भक्तमाल
कौन वह बेर ? जेहि बेर दिन फेर होय, फेर-फेर कहैं वह बेर नहीं आइये? ।
आई वह बेर लै कराही माँझ हेरि दूध, डार्यो युग सेर मन नीके कै बनाइये।।
चोपनि के ढेर लागि निपट औसेर दृग, आयो नीर घेरि जिनि गिरैं घूँटि जाइये।
माता कहै टेरि 'करी बड़ी तैं अबेर अब, करो मति झेर' अजू चित दै औंटाइये।।१३०।।
चल्यो प्रभु पास लै कटोरा छबिरास तामें, दूध सो सुबास मध्य मिसिरी मिलाइयै।
हिये में हुलास निज अज्ञता को त्रास, ऐपै करें जोपै दास मोहि महा सुखदाइयै।।
देख्यौ मृदुहास कोटि चाँदनी की भास कियौ, भाव को प्रकास मति अति सरसाइयै।
प्याइवे की आस करि ओट कछु भर्यो स्वास, देखिकै निरास कह्यो पीवौ जू अघाइयै।।१३१।।
ऐसैं दिन बीते दोय राखी हिये बात गोय, रह्यो निसि सोय ऐपैं नींद नहीं आवही।
भयो जू सवारो फिरि वैसे ही सुधार लियौ, हियौ कियौ गाढ़ौ जाय धर्यौ पियो भावही।।
बार-बार पीवो कहूँ अब तुम पीवो नाहिं, आवै भोर नाना गरे छूरी दै दिखावहीँ।
गहि लीयो 'कर जिनि कर ऐसी पीवौं मैं तो', पीवे कौ लगेई नेकु राखौ सदा पावही।।१३२।।
आये वामदेव पाछैं पूछैं नामदेव जू सौं, दूध को प्रसंग अति रंग भरि भाखियै।
मोसों न पिछाँनि दिन दोय हानि भई तब, मानि डर प्रान तज्यो चाहौं अभिलाषियै।।
पीयो सुख दीयो जब नेकु राखि लीयो मैं तो, जीयो सुनि बातें कही प्यायो कौन साखियै।
धर्यौ पै न पीयैं, अर्यो, प्यायौ सुख पायो नाना, यामें लै दिखायौ भक्तवश रस चाखियै।।१३३।।
नृप सो मलेच्छ बोलि कही 'मिले साहिब को, दीजिये मिलाय करामात दिखराइयै'।
होय करामात तोपै काहे को कसब करैं?, भरैं दिन ऐसैं बाँटि सन्तन सौं खाइयै।।
ताही के प्रताप आप इहाँ लौं बुलायो हमें, दीजिये जिवाय गाय घर चलि जाइयै।
दई लै जिवाय गाय सहज सुभाय ही मैं, अति सुख पाय पाँय पर्यो मन भाइयै।।१३४।।
'लेवो देस गाँव जाते मेरो कछु नांव होय', 'चाहिये न कछु' दई सेज मनिमई है।
धरि लई सीस 'देऊँ संग दस बीस नर,' नाहीं करि आये जल माँझ डारि दई है।।
भूप सुनि चौंकि पर्यो ल्यावो फेरि आये, कहौ कही नेकु आनिकै दिखावो कीजै नई है।
जल तैं निकालि बहु भाँति गहि डारी तट, लीजिये पिछानि देखि सुधि-बुधि गई है।।१३५।।
आनि पर्यो पाँय प्रभु पांश तें बचाय लीजै, 'कीजै एक बात कभूँ साधु न दुखाइये'।
लई यही मानि 'फेरि कीजियै न सुंधि मेरी', लीजियै गुननि गाय मन्दिर लौं जाइये।।
देखि द्वार भीर पगदासी कटि बाँधी धरि, कर सौं उछीर करि चाहै पद गाइये।
देखि लीनी वेई काहू दीनी पाँच सात चोट, कीनी धक्काधकी रिस मन में न आइयै।।१३६।।

श्रीनामदेवजी) (४५
बैठे पिछवारे जाइ कीनी जू उचित यह, लीनी जो लगाइ चोट मेरे मन भाइयै।
कान दै कैं सुनो अब चाहत न और कछु, ठौर मोकौं यही नित नेम पद गाइयै॥
सुनत ही आनि करि करुना विकल भये, फेर्यो द्वार इतै गहि मन्दिर फिराइयै।
जेतिक वे सोती मोती आब-सी उतरि गई, भई हिये प्रीति गहे पाँव सुखदाइयै॥१३७॥
औचक ही घर माँझ साँझ ही अगिनि लागी, बड़ो अनुरागी राहि गई सोऊ डारियै।
कहै अहो नाथ! सब कीजिये जु अंगीकार, हँसे सुकुमार हरि मोही कौं निहारियै॥
तुम्हरौ भवन और सकै कौन आइ इहाँ?, भये यों प्रसन्न छानि छाई आप सारियै।
पूछैं आनि लोग कौने छाई हो? छबाइ दीजै, लीजै जोई भावै 'तन-मन-प्रान वारियै'॥१३८॥
सुनौ और परचै जो आये न कवित्त माँझ, बाँझ भई माता क्यौं न? जौ न मति पागी है।
हुतो एक शाह तुलादान को उछाह भयो, दयो पुर सबै रह्यो नामदेव रागी है॥
'ल्यावौ जू बुलाइ' एक दोई तो फिराइ दिये, तीसरे सौं आये 'कहा कहो? बड़भागी है'।
'कीजिये जु कछु अंगीकार मेरो भलो होय', 'भयो भलो तेरो दीजै जोपै आसा लागी है'॥१३९॥
जाके तुलसी हैं ऐसे तुलसी के पत्र माँझ, लिख्यो आधो राम-नाम यासौँ तोल दीजियै।
कहा परिहास करो? ढरो ह्वै दयाल देखि, होत कैसो ख्याल याकौं पूरो करो रीझियै॥
ल्यायो एक काँटो लै चढ़ायो पात सोना संग, 'भयो' बड़ो रंग सम होत नाहिं छीजियै।
लई सो तराजू जासौँ तुलै मन पाँच सात, जाति-पाँतिहू को धन धर्यो पै न धीजियै॥१४०॥
पर्यो सोच भारी दुख पावें नर-नारी, नामदेव जू विचारी एक और काम कीजिये।
जिते व्रत दान और स्नान किये तीरथ में, करियै संकल्प यापै जल डारि दीजिये॥
करेऊ उपाय पात पला भूमि गाढ़े पाँय, रहे वे खिसाय कह्यो इतनोई लीजियै।
लैवैं कहाँ धरैं? सरवरहू न करें भक्तिभाव सौं लै भरैं हिये मति अति भीजिये॥१४१॥
कियो रूप ब्राह्मन कौं दूबरो निपट अंग, भयो हिये रंग व्रत परिचै को लीजियै।
भई एकादशी अन्न माँगत बहुत भूखो, आजु तो न दैहौं भोर चाहौ जितो लीजिये॥
कर्यो हठ भारी मिलि दोऊ ताको शोर पर्यो, समझवै नामदेव याको कहा खीझिये।
बीते जाम चारि मरि रहे यों पसारि पाँव, भाव पै न जानैं दई हत्या नहीं छीजिये॥१४२।
रचिकै चिता कौं विप्र गोद लैके बैठे जाइ, दियो मुसुकाय मैं परीच्छा लीनी तेरी है।
देखि सो सचाई सुखदाई मनभाई मेरे, भये अन्तर्धान परे पाँय प्रीति हेरी है॥
जागरन माँझ हरि भक्तन को प्यास लगी, गये लैन जल प्रेत आनि कीनी फेरी है।
फेंट तें निकांसी ताल गायो पद ततकाल, बड़ई कृपाल रूप धर्यो छबि ढेरी है॥१४३॥
मास परायण छठवाँ विश्राम

४६) (श्री भक्तमाल
श्रीजयदेवजी
जयदेव कवि नृप चक्कवै खंडमंडलेश्वर आन कवि।।
प्रचुर भयो तिहुँ लोक, गीतगोविन्द उजागर।
कोक काव्य नवरस, सरस सिंगार को आगर।।
अष्टपदी अभ्यास करै, तेहिं बुद्धि बढ़ावै।
(श्री) राधारमन प्रसन्न, सुनन निश्चय तहँ आवै।।
सन्त सरोरुहखण्ड कौं, पद्मापति सुखजनक रवि।
जयदेव कवि नृप चक्कवै खंडमंडलेश्वर आन कवि।।४४।।
नवाह परायण द्वितीय विश्राम
किन्दुबिल्व ग्राम तामें भये कविराज राज, भरयो रसराज हिये मन-मन चाखिये।
दिन-दिन प्रति रूख-रूखतर जाइ रहैं, गहैं एक गूदरी कमंडलु कौं राखिये।।
कही देवै विप्र सुता जगन्नाथदेव जू कौं, भयो जब समै चल्यो दैन प्रभु भाखिये।
'रसिक जैदेव नाम मेरोई सरूप ताहि देवौ, ततकाल अहो! मेरी कहो साखिये'।।१४४।।
चल्यो द्विज तहाँ-जहाँ बैठे कविराजराज, अहो महाराज! मेरी सुता यह लीजिये।
कीजिये विचार अधिकार बिसतार जाके, ताहि को निहारि सुकुमारि यह दीजिये।।
जगन्नाथदेव जू की आज्ञा प्रतिपाल करो, डरो मति धरो हिये ना तो दोष भीजिये।
उनको हजार सौहँ हमको पहार एक, ताते फिरि जावो तुम्हें कहा कहि खीजिये।।१४५।।
सुता सौं कहत 'तुम बैठि रहौ याही ठौर', आज्ञा सिरमौर मोपै नाहीं जात टारी है'।
चल्यौ अनखाइ समझाइ हारे बातनि सौं, 'मन! तू समझ कहा कीजै?' सोच भारी है।।
बोले द्विज बालकी सौं 'आप ही विचार करो, धरो हिये ध्यान मोपै जात न सँभारी है'।
बोली कर जोरि 'मेरो जोर न चलत कछू, चाहौ सोई होहु यह वारि फेरि डारी है'।।१४६।।
जानी जब भई तिया कियो प्रभु जोर मोपै, तोपै एक झोंपड़ी की छाया करि लीजिये।
भई तब छाया श्याम-सेवा पधराइ लई, 'नई एक पोथी मैं बनाऊँ' मन कीजिये।।
भयो जू प्रगट गीत सरस गोविन्द जू को, मान में प्रसंग 'सीस मंडन को दीजिये'।
यही एक पद मुख निकसत सोच पर्यो, धर्यो कैसे जात? लाल लिख्यो मति रीझिये।।१४७।।
नीलाचल धाम तामें पण्डित नृपति एक, करी यही नाम धरि पोथी सुखदाइयै।
द्विजन बुलाइ कही यही है, प्रसिद्ध करो, लिखि-लिखि पढ़ौ देस-देसनि चलाइयै।।

श्रीजयदेवजी) (४७
बोले मुसुकाइ विप्र क्षिप्र सो दिखाइ दई, नई यह कोऊ मति अति भरमाइयै।
धरी दोऊ मन्दिर में जगन्नाथदेव जू के, दीनी यह डारि वह हार लपटाइयै ।। १४८ ।।
पर्‍यो सोच भारी नृप निपट खिसानो भयो, गयो उठि सागर में बूड़ौ वही बात है।
अति अपमान कियो, कियो मैं बखान सोई, गोई जात कैसे? आँच लागी गात-गात है।।
आज्ञा प्रभु दई 'मत बूड़ै तू समुद्र माँझ, दूसरो न ग्रन्थ ऐसो वृथा तनु पात है।
द्वादस सुश्लोक लिखि दीजे सर्ग द्वादस में, ताहि संग चलै जाकी ख्याति पात-पात है' ।। १४६ ।।
सुता एक माली की जु बैंगन की वारी माँझ, तौरै वनमाली गावै कथा सर्ग पाँच की।
डौलैं जगन्नाथ पाछें-काछें अँग मिहीं झँगा, आछे कहि घूमैं सुधि आवै बिरहाँच की।।
फट्यौ पट देखि नृप पूछी 'अहो! भयो कहा?' 'जानत न हम' 'अब कहो बात साँच की'।
प्रभु ही जनाई 'मनभाई मेरे वही गाथा', ल्याये वही बालकी कौं पालकी मैं नाँच की।। १५० ।।
फेरी नृप डाँडी यह औंड़ी बात जानि महा, कहा राजा रंक पढ़ै नीकी ठौर जानिकैं।
अक्षर मधुर और मधुर स्वरनि ही सौं, गावैं जब लाल प्यारी ढिंगहि लैं मानिकैं।।
सुनी यह रीति एक मुगल ने धारि लई, पढ़ै-चढ़ै घोड़े आगे श्याम रूप ठानिकैं।
पोथी को प्रताप स्वर्ग गावत हैं देवबधू आप ही जु रीझि लिख्यो निज कर आनिकैं ।। १५१ ।।
पोथी की तो बात सब कही मैं सुहात हिये, सुनौ और बात जामें अति अधिकाइये।
गाँठि में मुहर मग चलत में ठग मिले 'कहो कहाँ जात?' 'जहाँ तुम चलि जाइये'।
जानि लई बात खोलि द्रव्य पकराइ दियो, लियो चाहो जोई-जोई सोई मोकौं ल्याइये।
दुष्टनि समुझि कही कीनी इन विद्या अहो! आवै जो नगर इन्हें वेगि पकराइये।। १५२।।
एक कहै 'डारौ मार भलो है विचार यही', एक कहै 'मारौ मत धन हाथ आयो है'।
'जोपै ले पिछान कहूँ कीजिये निदान कहा', हाथ-पाँव काटि बड़े गाढ़ पधरायो है।।
आयो तहाँ राजा एक देखिकै विवेक भयो, छायो उजियारो औ प्रसन्न दरसायो है।
बाहर निकालि मानो चन्द्रमा प्रकास राशि, पूछ्यो इतिहास कह्यो 'ऐसो तनु पायो है' ।। १५३ ।।
बड़ेई प्रभाववान सकै को बखान? अहो! मेरे कोऊ भूरि भाग दरसन कीजिये।
पालकी बिठाइ लिये किये सब ठूठ नीके, जी के भाये भये 'कछु आज्ञा मोहि दीजिये'।
'करौ हरि साधु-सेवा नाना पकवान मेवा, आवैं जोई सन्त तिन्हें देखि-देखि भीजिये'।
आये वेई ठग माला तिलक चिलक किये, किलकि के कही 'बड़े बन्धु लखि लीजिये' ।। १५४ ।।
नृपति बुलाइ कही हिये हरि भाय भरि, 'ढरे तेरे भाग अब सेवा फल लीजिये'।
गयो लै महल माँझ टहल लगाये लोग, लागे होन भोग जिय शंका तन छीजिये ।।

४८) (श्री भक्तमाल
माँगे बार-बार विदा राजा नहीं जान देत, अति अकुलाये कही स्वामी 'धन दीजिये'।
देकैं बहु भाँति सो पठाये संग मानस हूँ, 'आवौ पहुँचाय तब तुम पर रीझिये'।। १५५ ।।
पूछैं नृप नर 'कोऊ तुम्हरी न सरवर, जिते आये साधु ऐसी सेवा नहीं भई है।
स्वामी जू सौं नातौ कहा? 'कहौ हम खाँइ हा-हा', 'राखियो दुराइ यह बात अति नई है'।
हुते एकठौर नृप चाकरी में तहाँ इन कियोई बिगार मारि डारौ आज्ञा दई है।
राखे हम हितू जानिलै निदान हाथ-पाँव वाही के ऐसान अब हम भरि लई है'।। १५६ ।।
फाटि गई भूमि सब ठग वे समाइ गये, भये ये चकित दौरि स्वामी जू पै आये है।
कही जिती बात सुनि गात-गात काँपि उठे, हाथ-पाँव मीड़ैं भये ज्यौं के त्यौं सुहाये है।।
अचरज दोऊ नृप पास जा प्रकास किये, जिये एक सुनि आये वाही ठौर धाये हैं।
पूछैं बार-बार सीस पाँयनि पै धारि रहे, कहिये उघारि कैसे मेरे मनभाये हैं।। १५७ ।।
राजा अति अर गही कही सब बात खोलि, निपट अमोल यह सन्तन को वेश है।
कैसो अपकार करै तऊ उपकार करैं, ढरै रीति अपनी ही सरस सुदेश है।।
साधुता न तजैं कँभू जैसे दुष्ट दुष्टता न, यही जानि लीजै मिले रसिक नरेश है।
जान्यो जब नाव ठाँव रहो इहाँ बलि जाँव, भयो मैं सनाथ प्रेमभक्ति भई देश है।। १५८ ।।
गये जा लिवाय ल्याय कविराजराज तिया, कियो लै मिलाप आप रानी ढिग आई है।
मर्यो एक भाई वाकैं भई यों भौजाई सती, कोऊ अंग काटि कोऊ कूदि परी धाई है।।
सुनत ही नृपबधू निपट अचम्भो भयो, इनकैं न भयो फिरि कही समुझाई हैं।
प्रीति की न रीति यह बड़ी विपरीति अहो! छुटै तन जबै प्रिया प्रान छूटि जाई है।। १५६ ।।
'ऐसी एक आप' कहि राजा सौं लै बात कही, 'लैकैं जाओ बाग स्वामी नेकु देखौं प्रीति को'।
'निपट विचारी बुरी देत मेरे गरे छुरी' तिया हठ मानि करी वैसे ही प्रतीति को।।
आनि कहे आप पाये कही यही भाँति आय, बैठी ढिग तिया देखि लोटि गई रीति को।
बोली भक्तवधू 'अजू वे तौ हैं बहुत नीके, तुम कहा औचक ही पावति हौं भीति को' ।। १६० ।।
भई लाज भारी पुनि फेरिकै सँवारी दिन बीति गये कोऊ जब-तब वही कीनी है।
जानि गई भक्तवधू चाहति परीक्ष्छा लियो, कही 'अजू! पाये' सुनि तजी देह भीनी है।।
भयो मुख श्वेत रानी-राजा आये जानी यह, 'रचौं चिता जरौं मति भई मेरी हीनी है'।
भई सुधि आपकौं जु आये वेगि दौरि इहाँ, देखि मृत्युप्राय नृप कह्यो 'मेरी दीनी है' ।। १६१ ।।
बोल्यो नृप 'अजू! मोहिं जरई बनत अब, सब उपदेस लैकै धूरि में मिलायो है'।
कह्यो बहु भाँति ऐपै आवति न शान्ति किहूँ गाई अष्टपदी सुर दियो तन ज्यायो है।।

श्रीबिल्वमंगलजी) (४६
लाजनि को मार्यो राजा चाहे अपघात कियो, जियो नहीं जात ‘भक्ति लेशहूँ न आयो है’।
करि समाधान निज ग्राम आये किन्दुबिल्व, जैसो कछु सुन्यो यह परचो लै गायो है।। १६२।।
देवधुनि सोत हो अठारै कोस आश्रम तैं, सदाई असनान करें धरैं योग्यताई कौं।
भयो तन वृद्ध तऊँ छोड़ैं नहीं नित्यनेम, प्रेम देखि भारी निसि कही सुखदाई कौं।।
‘आवो जिनि ध्यान करौ, करौ मत हठ ऐसौ’, मानी नहीं ‘आऊँ मैं हीं’ ‘जानौ कैसे आई कौं’।
फूले देखौ कंज तब कीजियो प्रतीति मेरी, भई वही भाँति सेवैं अबलौं सुहाई कौं।। १६३।।
श्रीश्रीधराचार्यजी
श्रीधर श्रीभागौत में, परम धरम निरनै कियौ।।
तीन काण्ड एकत्व, सानि कोउ अज्ञ बखानत।
कर्मठ ज्ञानी ऐंचि, अर्थ कौ अनरथ बानत।।
परमहंस सहिंता, विदित टीका बिसतार्यौ।
षट्शास्त्रनि अविरुद्ध, वेद संमतहिं विचार्यौ।।
परमानन्द प्रसाद तें, माधौ सुकर सुधारि दियौ।
श्रीधर श्रीभागौत में परम धरम निरनै कियौ।। ४५।।
पंडित समाज बड़े-बड़े भक्तराज जिते, भागवत टीका करि आपस में रीझिये।
भयो जू विचार काशीपुरी अविनासी माँझ, सभा अनुसार जोई-सोई लिखि दीजिये।।
ताको सो प्रमान भगवान बिन्दुमाधौजी है, साधौ यही बात धरि मन्दिर में लीजिये।
धरे सब जाय प्रभु सुकर बनाय दियो, कियो सर्वोपरि लैकै, चल्यो मति धीजिये।। १६४।।
मास परायण सातवाँ विश्राम
श्रीबिल्वमंगलजी
कृष्ण कृपा कोपर प्रगट विल्वमंगल मंगलस्वरूप।।
‘करणामृत’ सुकवित्त, उक्ति अनुछिष्ट उचारी।
रसिकजनन जीवन, हृदय जै हारावलि धारी।।
हरि पकरायो हाथ, बहुरि तहँ लियो छुड़ाई।
कहा भयो कर छुटे, बदौं जो हिय तें जाई।।

५०) (श्री भक्तमाल
चिन्तामणि सँग पायकै, ब्रजवधू केलि बरनी अनूप।
कृष्ण कृपा कोपर प्रगट विल्वमंगल मंगलस्वरूप।। ४६।।
कृष्णवेना तीर एक द्विज मतिधीर रहै, ह्वै गयो अधीर संग चिन्तामनि पाइकै।
तजी लोकलाज हिये वाही को जु राज भयो, निसिदिन काज वहै रहै घर जाइकै।।
पिता को सराध नेकु रह्यो मन साधि, दिन शेष में आवेस चल्यो अति अकुलाइकै।
नदी चढ़ी रही भारी पैये न अवारी नाव, भाव भर्यो हियो जियो जात नधि जाइकै।। १६५।।
करत विचार वारि धार में न रहें प्रान, तातें भली धारि मित्र सनमुख जाइयै।
परे कूदि नीर कछु सुधि न सरीर की है, वही एक पीर कब दरसन पाइयै।।
पैयत न पार तन हारि भयो बूडिवे कौं, मृतक निहारि मानी नाव मन भाइयै।
लगेई किनारे जाय चले पग धाय चाय, आये पट लागे निसि आधी सो बिहाइये।। १६६।।
अजगर घूमि झूमि भूमि कौं परस कियो, लियोई सहारौ चढ़यो छत पर जायकै।
ऊपर किवार लगे पर्यो कूदि आँगन में, गिरयो यों गिरत रागी जागी शोर पायकै।।
दीपक बराइ जोपै देखै विल्वमंगल है, 'बड़ोई अमंगल तूँ कियो कहा आयकै'।
जल अन्हवाय सूखे पट पहिराय 'हाय! कैसे करि आयो जलपार द्वार धायकै'।। १६७।।
'नौका पठवाई द्वार लाव लटकाई देखि, मेरे मनभाई मैं तो तबै लई जानिकै।
'चलो देखौं अहो! यह कहा धौं प्रलाप करै', देख्यौ विषधर महा खीजी अपमानिकै।।
'जैसो मन मेरे हाड़-चाम सौं लगायो तैसो श्याम सौं लगावो तोपै जानियें सयानिकै।
मैं तो भये भोर भजौं युगलकिशोर अब तेरी तुही जानै चाहौ करौ मन मानिकै'।। १६८।।
खुलि गई आँखै अभिलाखैं रूपमाधुरी कौ, चाखैं रसरंग औ उमंग अंग न्यारियै।
बीन लै बजाई गाई विपिन निकुंज क्रीड़ा, भयो सुखपुंज जापै कोटि विषै वारियै।।
बीति गई राति प्रात चले आप आपकौ जू, हिये वही जाप दृग नीर भरि डारियै।
सोमगिरी नाम अभिराम गुरु कियो आनि, सकै को बखानि लाल भुवन निहारियै।। १६९।।
रहे सो बरस रससागर मगन भये, नये-नये चोज के श्लोक पढ़ि जीजिये।
चले वृन्दावन मन कहै कब देखौं जाइ, आइ मग माँझ एक ठौर मति भीजिये।।
पर्यो बड़ो शोर दृग कोरकैं न चाहै काहू, तहाँ सर तिया न्हाति देखि आखैं रीझिये।
लगे वाके पाछे काँछ काछै की न सुधि कछू, गई घर आछे रहे द्वार तन छीजिये।। १७०।।
आयो वाको पति द्वार देखे भागवत ठाढ़े, बड़ो भागवत पूछी बधू सौं जनाइये।
कही जू पधारो पाँव धारो गृह पावन कौं, पावन पखारौं जल धारौं सीस भाइये।।

श्रीविष्णुपुरीजी) (५१
चले भौन माँझ आरति मिटायवे कौं, गायवे कौं जोई रीति सोई कें बताइये।
नारि सौं कह्यो है तू सिंगार करि सेवा कीजै, लीजै यों सुहाग जामें वेगि प्रभु पाइये ।।१७१।।
चली यै सिंगार करि थार में प्रसाद लै कै, ऊँची चित्रसारी जहाँ बैठे अनुरागी हैं।
झनक-मनक जाइ जोरि कर ठाढ़ी रही, गही मति देखि-देखि न्यूनवृत्ति भागी है।।
कही युग सुई ल्यावो ल्याई दई लई हाथ, फोरि डारी आँखें 'अहो! बड़ी ये अभागी हैं'।
गई पति पास स्वांस भरत न बोलि आवै, बोली दुख पाय आय पाँय परे रागी हैं।।१७२।।
'कियो अपराध हम साधु कौं दुखायौं' अहो! बड़े तुम साधु हम नाम साधु धर्यो है।
रहौ अजू सेवा करौं करी तुम सेवा ऐसी जैसी नहीं काहू माँझ मेरो मन भर्यो है।।
चले सुख पाय दृग भूत से छुटाइ दिये हिये ही की आँखिन सौं अबै काम पर्यो है।
बैठे वनमध्य जाइ भूखे जानि आप आइ भोजन कराइ चलौ छाया दिन ढर्यो है।।१७३।।
चलै लै गहाय कर छाया घन तरु तर, चाहत छुटायो हाथ छोड़ैं कैसे? नीको है।
ज्यौं-ज्यौं बल करैं त्यौं-त्यौं तजत न ऐऊ अरे, लियोइ छुटाइ गह्यो गाढ़ो रूप हीको है।।
ऐसे ही करत वृन्दावन घन आइ लियो, पियो चाहैं रस सब जग लाग्यो फीको है।
भई उतकण्ठा भारी आये श्रीविहारीलाल, मुरली बजाइकै सु कियो भायो जीको है।।१७४।।
खुलि गये नैन ज्यौं कमल रवि उदै भये, देखि रूपरासि बाढ़ी कोटिगुनी प्यास है।
मुरली मधुर सुर राख्यो मद भरि मानो, ढरि आयो कानन में आनन में भास है।।
मानिकै प्रताप चिन्तामणि मन माँझ भई, 'चिन्तामणि जैति' आदि बोले रसरास है।
'करनामृत' ग्रन्थ हृदै ग्रन्थि कौं विदारि डारै, बाँधै रस ग्रन्थ-पन्थ युगल प्रकास है।।१७५।।
चिन्तामनि सुनी 'वन माँझ रूप देख्यो लाल', ह्वै गई निहाल आई नेह नातो जानिकैं।
उठि बहु मान कियो दियौं दूध-भात दोना, दै पठावैं नित हरि हितू जन मानिकैं।।
लियो कैसे जाइ तुम्हें भाय सौं दियो जो प्रभु, लैहौं नाथ हाथ सौं जो देहैं सनमानिकै।
बैठे दोऊजन कोऊ पावैं नहीं एक कन, रीझे श्यामघन दीनो दूसरो हूँ आनिकै।।१७६।।
श्रीविष्णुपुरीजी
कलि जीव जंजाली कारनै, विष्णुपुरी बड़ि निधि सँची।।
भगवत धर्म उतंग, आन धर्म आन न देखा।
पीतर पटतर विगत, निकष ज्यौं कुन्दन रेखा।।

५२) (श्री भक्तमाल
कृष्ण कृपा कहि बेलि, फलित सत्संग दिखायो।
कोटि ग्रन्थ को अर्थ, तेरह विरचन में गायो।।
महा समुद्र भागौत तें, भक्तिरतन राजी रची।
कलि जीव जंजाली कारनै, विष्णुपुरी बड़ी निधि सँची।।४७।।
जगन्नाथ क्षेत्र माँझ बैठे महाप्रभु जू वे, चहुँ ओर भक्त भूप भीर अति छाई है।
बोले 'विष्णुपुरी पुरी काशी मध्य रहें जाते, जानियत मोक्ष चाह नीकी मन आई है'।
लिखी प्रभु चीठी 'आपु मनिगन माला एक, दीजिये पठाइ मोहिं लागती सुहाई है'।
जानि लई बात निधि भागवत रत्नदाम, दइ पठै आदि मुक्ति खोदिकै बहाई है।।१७७।।
श्रीज्ञानदेवजी
विष्णुस्वामि सम्प्रदाय दृढ़, ज्ञानदेव गम्भीर मति।।
नाम तिलोचन शिष्य, सूर शशि सदृश उजागर।
गिरा गंग उनहारि, काव्य रचना प्रेमाकर।।
आचारज हरिदास, अतुल बल आनँददायन।
तेहिं मारग वल्लभ, विदित पृथु पधति परायन।।
नवधा प्रधान सेवा सुदृढ़, मन वच क्रम हरि चरन रति।
विष्णुस्वामि सम्प्रदाय दृढ़ ज्ञानदेव गम्भीर मति।। ४८।।
विष्णुस्वामि सम्प्रदाई बड़ेई गम्भीर मति, ज्ञानदेव नाम ताकी बात सुनि लीजिये।
पिता गृह त्यागि आइ ग्रहन संन्यास कियो, दियो बोलि झूठि तिया नहीं गुरु कीजिये।।
आई सुनि बधू पाछैं कह्यो जान्यो मिथ्यावाद, 'भुजनि पकरि मेरे संग करि दीजिये'।
ल्याई सो लिवाइ जाति अति ही रिसाइ दियो, पाँति में ते डारि रहें दूरि नहीं छीजिये।।१७८।।
भये पुत्र तीन तामें मुख्य बड़ो ज्ञानदेव, जाकी कृष्णदेव जू सौं हिये की सचाई है।
वेद न पढ़ावे कोऊ कहैं सब जाति गई, लई करि सभा अहो! कहा मन आई है।।
'बिनस्यो ब्रह्मत्व' कही 'श्रुति अधिकार नाहिं', बोल्यो यों निहारि 'पढ़ै भैंसा' लै दिखाई है।
देखि भक्तिभाव चाव भयो आनि गहैं पाँव, कियोई सुभाव वही गही दीनताई है।। १७६।।

श्रीत्रिलोचनजी) (५३
श्रीत्रिलोचनजी
भयें उभै शिष्य नामदेव श्री तिलोचनजू, सूर शशि नाईं कियो जग में प्रकास है।
नामा की तो बात कहि आये सुनो दूसरे की, सुनेई बनत भक्त कथा रसरास है॥
उपजे बनिककुल सेवें कुल अच्युत कौं, ऐपै नहिं बनै एक तिया रहे पास है।
टहलुवा न कोई 'साधु मन ही की जानि लेत', यही अभिलाष सदा दासनि को दास है॥१८०॥
आये प्रभु टहलुवा रूप धरि द्वार पर, फटी एक कामरी पन्हैयाँ टूटी पाँय हैं।
निकसत पूछैं 'अहो! कहाँ ते पधारे आप? 'बाप महतारी और देखिये न' गाय हैं॥
'बाप महतारी मेरे कोऊ नाहिं साँची कहौं गहौं मैं टहल जोपै मिलत सुभाय हैं'।
'अनमिल बात कौन? दीजिये जनाय वहू' 'पाऊँ पाँच सात सेर उठत रिसाय हैं'॥१८१॥
चारि हू बरन की जु रीति सब मेरे हाथ, साथ हू न चाहौं करौं नीके मन लाइकै।
भक्तन की सेवा सो तौ करत जनम गयो, नयो कछु नाहिं डारे बरस बिताइकै॥
अन्तरयामी नाम नेरो चेरो भयो तेरे! हौं तो, बोल्यो 'भक्तभाव खावौ निशंक अघाइकें'।
कामरी पन्हैयाँ सब नई करि दई और, मीड़िकै, न्हवायो तन मैल कौं छुटाइकै॥ १८२॥
बोल्यो घरदासी सौं 'तूँ रहै याकी दासी होइ, देखियो उदासी देत ऐसो नहीं पावनौ।
खाय सो खवावो सुख पावो नित-नित हिये, जियैं जग माहि जौलौं मिलि गुन गावनौ॥
आवत अनेक साधु भावत टहल हिये, लिये चाव दाबें पाँव सबनि लड़ावनौ।
ऐसे ही करत मास तेरह व्यतीत भये, गये उठि आपु नेकु बात को चलावनौ॥ १८३॥
एक दिन गई ही परोसिन कैं भक्तबधू, पूछि लई बात 'अहो! काहे कौं मलीन है'।
बोली मुसुकाय वे टहलुवा लिवाय ल्याये, क्योंहू न अघाय खोट पीसि तन छीन है॥
काहू सौं न कहौ यह गहौ मन माँझ एरी, 'तेरी सौं सुनैगो जोपै जात रहै भीन है'।
सुनि लई यही नेकु गये उठि हुती टेक, दुखहूँ अनेक जैसे जल बिन मीन है॥ १८४॥
बीते दिन तीनि अन्न-जल करि हीन भये, “ऐसो सो प्रवीन अहो! फेरि कहाँ पाइयें”।
बड़ी तू अभागी ! बात काहे कौं कहन लागी? रागी साधुसेवा में जु कैसे करि ल्याइयें॥
भई नभ वानी तुम खावो पीवो पानी यह, मैं ही मति ठानी मोकौं प्रीति रीति भाइयें।
मैं तो हौं अधीन तेरे घर ही में रहौं लीन, जोपै कहौ सदा सेवा करिवे कौं आइयें॥ १८५॥
कीने हरिदास मैं तौ दासहू न भयौं नेकु, बड़ो उपहास मुख जग में दिखाइयै।
कहैं जन भक्त कहा भक्ति हम करी कहो? अहो ! अज्ञताई रीति मन में न आइयै॥

५४) (श्री भक्तमाल
उनकी तो बात बनि आवै सब उनही सौं, गुन ही कौं लेत मेरे औगुन छिपाइये।
आये घर माँझ तऊ मूढ़ मैं न जानि सक्यौ, आवैं अब क्योंहूँ धाय पाँय लपटाइये ॥१८६॥
श्रीवल्लभाचार्यजी
हिये में सरूप सेवा करि अनुराग भरे, ढरे और जीवन की जीवनि कौं दीजिये।
सोई लै प्रकास घर-घर में विलास कियो, अति ही हुलास फल नैननि कौं लीजिये ॥
चातुरी अवधि नेकु आतुरी न होति किहूँ, चहुँ दिसि नाना राजभोग सुख कीजिये।
वल्लभ जू नाम लियो पृथु अभिराम रीति, गोकुल में धाम पानि सुनि मन रीझिये ॥१८७॥
गोकुल के देखिवे कौं गयौ एक साधु सूधो, गोकुल मगन भयो रीति कछु न्यारिये।
छोंकर के वृक्ष पर बटुवा झुलाय दियो, कियो जाय दरसन सुख भयो भारिये ॥
देखै आइ नाहीं प्रभु फेरि आप पास आयो, चिन्ता सौं मलीन देखि कही जा निहारिये।
वैसेई सरूप कई गई सुधि बोल्यो आनि, लीजिये पिछानि कह्यो सेवा नित धारिये ॥१८८॥
खुलि गईं आखें अभिलाखैं पहिचानि कीजै, दीजै जू बताइ मोहिं पाऊँ निज रूप है।
कही जावो वाही ठौर देखौ प्रेम लेखौ हिये, लिये भाव सेवा करौ मारग अनूप है॥
देखिके मगन भयो लयो उर धारि हरि, नैन भरि आये जान्यो भक्ति को स्वरूप है।
निसिदिन लग्यौ पग्यौ जग्यौ भाग पूरन हो पूरन चमत्कार कृपा अनुरूप है॥ १८६॥
मास परायण आठवां विश्राम
श्रीकुलशेखरजी
सन्त साखि जानें सबै, प्रगट प्रेम कलियुग प्रधान ॥
भक्तदास इक भूप, श्रवन सीताहर कीनों।
मार मार कर खड्ग, बाजि सागर में दीनौ॥
नरसिंह कौ अनुकरण, होइ हिरनाकुश मार्यो।
व्है भयौ दसरत्थ, राम बिछुरत तन डार्यो॥
कृष्ण दाम बाँधे सुने, तिहिं छन दीनो प्रान।
सन्त साखि जानें सबै, प्रगट प्रेम कलियुग प्रधान ॥४६॥
सन्त साखि जानें कलिकाल में प्रगट प्रेम, बड़ोई असत जाके भक्ति में अभाव है।
हुतो एक भूप रामरूप ततपर महा, राम ही की लीला गुन सुनैं करि भाव है॥
विप्र सौं सुनावै सीता चोरी कौ न गावै, हियो खरो भरि आवै वह जानत सुभाव है।
पर्यो द्विज दुखी निज सुवन पठाइ दियो, जानै न सुनायो भरमायो कियो घाव है ॥ १६०॥

प्रसादानिष्ठ श्रीपुरुषोत्तमजी नृपति) (५५
मार मार करि कर खड्ग निकासि लियौ, दियौ घोरौ सागर में सो आवेस आयो है।
'मारौं याहि काल दुष्ट रावन विहाल करौं, पाँवन को देखौं सीता' भाव दृग छायो है।।
जानकीरवन दोऊ दरसन दियो आनि, बोले 'बिन प्रान कियौ नीच फल पायो है'।
सुनि सुख भयो गयौ शोक हृदै दारुन जो, रूप की निहारनि यों फेरिकै जिवायो है।। १६१।।
श्रीलीलानुकरणजी, श्रीरतिवन्तीबाईजी
नीलाचल धाम तहाँ लीला अनुकर्न भयो, नरसिंह रूप धारि साँचै मारि डार्यो है।
कोऊ कहै द्वेष कोऊ कहत आवेस तोपै, करौ दसरथ कियो भाव पूरो पार्यो है।।
हुती एक बाई कृष्ण रूप सौं लगाई मति कथा में न आई सुत सुनी कह्यो धार्यो है।
'बाँधे जसुमति' सुनि औरै भई गति करि दई साँची रति तन तज्यो मानौ वार्यो है।। १६२।
सप्ताह परायण दूसरा विश्राम
प्रसाद अवज्ञा जानिकैं, पाणि तज्यौ एकै नृपति।।
हौं कहा कहौं बनाइ, बात सबही जग जानैं।
कर तैं दौना भयो, स्याम सौरभ मन मानैं।।
छपन भोग तैं पहिल, खीच करमा कौ भावैं।
सिलपिल्ले के कहत, कुँअरि पै हरि चलि आवैं।।
भक्तन हित सुत विष दियौ, भूप नारि प्रभु राखि पति।
प्रसाद अवज्ञा जानिकैं, पाणि तज्यौ एकै नृपति।। ५०।।
प्रसादानिष्ठ श्रीपुरुषोत्तमजी नृपति
प्रसाद की अवज्ञा तैं तज्यो नृप कर एक, करिकैं विवेक सुनौ जैसें बात भई है।
खेलै भूप चौपरि कौं आयो प्रभु-भुक्त-शेष, दाहिने में पासे बाँये छुयौ मति गई है।।
लै गये रिसायकैं फिराय महा दुख पाय, उठ्यो नरदेव गृह गयो सुनी नई है।
लियो अनसन 'हाथ तजौं याही छन तब, साँचौ मेरौ पन' बोलि विप्र पूछि लई है।। १६३।।
काटै हाथ कौन मेरो? रह्यो गहि मौन यातैं, पूछत सचिव कही विथा सो विचारियै।
आवै एक प्रेत मो दिखाई नित देत, निसि डारिकैं झरोखा कर शोर करै भारियै।।
'सोऊँ ढिंग आइ रहौं आपुकौं छिपाइ जब, डारैं पानि आनि तबही सुकाटि डारियै'।
कही नृप भलैं चौकी देत में घुमायो भूप, डार्यो उठि आइ छेद न्यारो कियौ वारियै।। १६४।।

५६) (श्री भक्तमाल

देखिकैं लजानौं 'कहा कियौं मैं अजानौं' ! नृप कही 'प्रेत मानौं यही हरि सौं बिगारियै' ।
कही जगन्नाथदेव 'लै प्रसाद जावो उहाँ, ल्यावो हाथ बोवै बाग' सोई उर धारियै ।।
चले तहाँ धाइ भूप आगे मिल्यो आइ हाथ, निकस्यो लगाइ हियै भयौ सुख भारियै।
ल्याये कर फूल ताके भये फूल दौना के जु, नितहीं चढ़त अंग गन्ध हरि प्यारियै ।। १६५ ।।

श्रीकर्माबाईजी

हुती एक बाई ताको करमा सुनाम जानि, बिना रीति भाँति भोग खिचरी लगावहीं।
जगन्नाथदेव आपु भोजन करत नीकैं, जिते लगैं भोग तामें यह अति भावहीं ।।
गयो तहाँ साधु मानि बड़ो अपराध करै, भरै बहु स्वांस सदाचार लै सिखावहीं।
भई यों अवार देखें खोलिकै किवार जोपै, जूठनि लगी है मुख धोये बिनु आवही ।। १६६ ।।
पूछी 'प्रभु! भयो कहा? कहिये प्रगट खोलि, बोलिहू न आवै हमें देखि नई रीति है।
'करमा सुनाम एक खिचरी खवावै मोहिं, मैं हूँ नित पाऊँ जाइ जानि साँचि प्रीति है ।।
गयो मेरो सन्त रीति भाँति सो सिखाइ आयो, मत मो अनन्त बिनु जाने यों अनीति है।
कही वही साधु सौं 'जु! साधि आवौ वही बात' जाइकै सिखाई हिय आई बड़ी भीति है ।। १६७ ।।

सिलपिल्ले भक्त उभयबाईजी

सिलपिल्ले भक्त उभै बाई सोई कथा सुनौ, एक नृपसुता एक सुता जिमींदार की।
आये गुरु घर देखि सेवा ढिंग बैठी जाइ, कही ललचाइ पूजा कीजै सुकुमार की ।।
दियो शिलाटूक लैके नाम कहि दियो वही, कीजिये लगाइ मन मति भवपार की।
करत-करत अनुराग बढ़ि गयो भारी, बड़ी ये विचित्र रीति यही सोभा सार की ।। १६८ ।।
पाछिले कवित्त माँझ दुहुँन की एकै रीति, अब सुनौ न्यारी-न्यारी नीके मन दीजिये ।
जिमींदार सुता ताके भये उभै भाई रहैं, आपुस में बैर गाँव मार्यो सब छीजिये ।।
तामें गई सेवा इन बड़ोई कलेस कियौ, जियो नाहिं जात खान-पान कैसें कीजिये।
रहे समुझाय याहि कछु न सुहाय तब, कही जाय ल्यावै तेरे दोऊ सम धीजिये ।। १६६ ।।
गई वाही गाँव जहाँ दूसरो जू भाई रहै, बैठ्यौ हो अथाई माँझ कही वही बात है।
'लेवो जू पिछानि तहँ बैठे एक ठौर प्रभु, बोलि उठ्यो कोऊ 'बोलि लीजैं प्रीति गात है' ।।
भई आँखि राती लागी फाटिवे कौं छाती, सो पुकारी सुत आरत सौं मानौं तन पात है।
हिये आइ लागे सब दुख दूर भागे कोऊ बड़े भाग जागे घर आई न समात है ।। २०० ।।
सुनौ नृपसुता बात भक्ति गात-गात पगी, भगी सब विषैवृत्ति सेवा अनुरागी है।
ब्याही ही विमुख घर आयो लैन वहै वर, खरी अरबरी कोऊ चित चिन्ता लागी है ।।

श्रीसुतों को विष दिया दो बाई) (५७
करि दई संग भरी अपने ही रंग चली, अलीहूँ न कोई एक वही जासौँ रागी है।
आयो ढिंग पति बोलि कियो चाहै रति वाकी, और भई गति मति आवै विथा पागी है।।२०१।।
‘कौन वह विथा? ताकौ कीजियै जतन वेगि, बड़ो उदवेग नेकु बोलि सुख दीजियै।
‘बोलिवो जौ चाहौ तौपै करौ हरिभक्ति हिये, बिन हरिभक्ति मेरो अंग जिन छीजियै।।
आयो रोष भारी तब मन में विचारी वा ‘पिटारी में जु कछु सोई लैकेँ न्यारो कीजियै’।
करी वही बात मूसि जल माँझ डारि दई, नई भई ज्वाला जियो जात नहीं खीजियै।।२०२।।
तज्यो जल-अन्न अब चाहत प्रसन्न कियो, होत क्यौँ प्रसन्न जाको सबरस लियो है।
पहुँचे भवन आइ दई सो जताइ बात, गात अति छीन देखि कहा हठ कियो है।।
सासु समुझावै कछु हाथ सौं खवावै याकौँ, बोलिहू न भावै तब धरकत हियो है।
‘कहै सोई करें अब पाँय तेरे परैं हम’, बोली ‘जब वेई आवैं तौही जात जियो है’।।२०३।।
आये वाही ठौर भौर आई तनु भूमि गिरयो, ढरयो जल नैन सुर आरत पुकारी है।
भक्तिवश श्याम जैसे कामवश कामी नर, धाइ लागे छाती सो जु संग सो पिटारी है।।
देखि पति सासु आदि जगत विवाद मिट्यो, वाद ही जनम गयो नेकु न सँभारी है।
किये सब भक्त हरि साधुसेवा माँझ पगे, जगे कोउ भाग घर बधू योँ पधारी है।।२०४।।
भक्तों के हित सुतों को विष दिया, दो बाईजी
भक्तन के हित सुत विष दियौ उभै बाई, कथा सरसाई बात खोलिकै बताइयै।
भयो एक भूप ताके भक्त हूँ अनेक आवैं, आयो भक्तभूप तासौँ लगन लगाइयै।।
नितहीँ चलत ऐपै चलन न देत राजा, बितयो बरष मास कहै भोर जाइयै।
गई आस टूटि तन छूटिवे की रीति भई, लई बात पूछि रानी सबै लै जनाइयै।।२०५।।
दियो सुत विष रानी जानी नृप जीवै नाहिं, सन्त हैं स्वतन्त्र सो इन्हेंहि कैसैं राखियै।
भये बिन भोर बधू शोर करि रोय उठी, भोय गई रावले में सुनी साधु भाषियै।।
खोलि डारी कटि पट भवन प्रवेस कियो, लियो देखि बालक कौँ नील तनु साषियै।
पूछ्यौ भूप तिया सौं ‘जू साँचे कहि कियो कहा?’ कही ‘तुम चाल्यौ चाहौ नैन अभिलाषियै’।।२०६।।
छाती खोलि रोये सन्त बोलिहूँ न आवै मुख, सुख भयो भारी भक्ति रीति कछु न्यारियै!
जानीऊँ न जाति जाति-पाँति को विचार कहा, अहो! रससागर सो सदा उर धारिये।।
हरिगुन गाय साखी सन्तन बताय दिये, बालक जिवाय लागी ठौर वह प्यारियै।
संग के पठाय दिये रहे वे जे भींजे हिये, बोले आप ‘जाऊँ जौ न मारिकेँ बिडारियै’।।२०७।।

५८) (श्री भक्तमाल
दूसरी बाईजी
सुनौ चित्तलाई बात दूसरी सुहाई हिये,जिये जग मांहि जौलौं सन्त संग कीजियै।
भक्त नृप एक सुता ब्याही सो अभक्त महा, जाके घर माँझ जन नाम नहीं लीजियै।।
पल्यो साधु सीथ सौं सरीर दृग रूप पले, जीभ चरनामृत के स्वाद ही सौं भीजियै।
रह्यौ कैसैं जाय अकुलाय न बसाय कछु, आवैं पुर प्यारे तब विष सुत दीजियै।। २०८ ।।
आये पुर सन्त आइ दासी ने जनाइ कही, कही कैसे जाइ सुत विष लैकेँ दियो है।
गये वाके प्रान रोय उठी किलकानि सब, भूमि गिरे आनि टूक भयो जात हियो है।।
बोली अकुलाय 'एक जीवै कौ उपाय जोपै, कियो जाय पिता मेरे कैयो बार कियो है'।
'कहै साईं करें' दृग भरैं 'ल्यावौ सन्तनि कौ कैसे होत सन्त?' पूछयो चेरी नाम लियो है।।२७९।।
चली लै लिवाय चेरी बोलिवौ सिखाय दियो, देखिकै धरनि परि पाँय गहि लीजियै।
कीनी वही रीति दृगधारा मानौ प्रीति सन्त, करी यों प्रतीति गृह पावन कौ कीजियै।।
चले सुख पाय दासी आगे ही जनाय जाय, आय ठाड़ी पौरि पाँय गहे मति भीजियै।
कही हरे बात 'मेरे जानौ पिता मात मैं तो, अंग में न माति आज प्रान वारि दीजियै।। २१०।।
रीझि गये सन्त प्रीति देखिकैं अनन्त कह्यो, 'होइगी जु वही सो प्रतिज्ञा तैं जो करी है।
बालक निहारि जानी विष निरधार दियो, दियो चरनामृत कौं प्रानसंज्ञा धरी है।।
देखत विमुख जाय पाँय ततकाल लिये, किये तब शिष्य साधुसेवा मति हरी है।
ऐसें भूप नारि पति राखी सब साखी जन, रहै अभिलाखी जोपै देखौ याही घरी है।। २११।।
मास परायणं नवाँ विश्राम
आशै अगाध दुहुँ भक्त को, हरितोषण अतिशै कियौ।।
रंगनाथ को सदन करन बहु बुद्धि विचारी।
कपट धर्म रचि जैन, द्रव्यहित देह बिसारी।।
हंस पकरनैं काज, बधिक बानौं धरि आये।
तिलक दाम की सकुच, जानि तिन आप बँधाये।।
सुत बध हरिजन देखिकै, दै कन्या आदर दियौ।
आशै अगाध दुहुँ भक्त को, हरितोषण अतिशै कियौ।।५१।।
मामा-भानजा
आशय अगाध दोऊ भक्त मामा-भानजे कौं, दियौ प्रभु तोष ताकी बात चित धारियै।
घर तें निकसि चले वन कौं विवेक रूप, मूरति अनूप बिन मन्दिर निहारियै।।

हंस भक्त) (५६
दक्षिण में रंगनाथ नाम अभिराम जाकौ, ताकौ ले बनावैं धाम काम सब टारियै।
धन के जतन फिरे भूमि पै न पायो कहूँ, चहुँ दिसि हेर देख्यो भयो सुख भारियै।। २१२।।
मन्दिर सराबगी कौं प्रतिमा सौं पारस की, आरस न कियो वेद न्यून हूँ बतायो है।
'पावैं प्रभु सुख हम नर्कहूँ गये तौ कहा?' धरक न आई तब कान लै फुकायो है।।
ऐसी करी सेवा जासौँ हरी मति केवरा ज्यौं, सेवरा समाज सबै नीके कैं रिझायो है।
दियो सौंपि भार तब लैवे को विचार करैं, हरैं कौन राह? भेद राजनि पैं पायो है।। २१३।।
मामा रह्यो भीतर औ ऊपर सो भानजो हो, कलस भँवरकली हाथ सौं फिरायो है।
जेबरी लै फाँसि दियो मूरति सो खैंचि लई, और बार बहु आप नीकैं चढ़ि आयो है।।
कियो हो जो द्वार तामें फूलि तन फँसि बैठ्यो, अति सुख पाय तब बोलिकै सुनायो है।
'काटि लेवौ सीस ईश भेष की न निन्दा करैं,' भरैं अँकवारि मन कीजियै सवायो है।। २१४।।
काटि लियो सीस ईश इच्छा कौ विचार कियो, जियौ नहीं जाय तऊ चाह मति पागी है।
जोपै तन त्याग करौं कैसें आस सिन्धु तरौं?, ढरौं वाही और आयो नींव खुदै लागी है।।
भयो शोक भारी हमें ह्वै गई अबारी काहू, और नै विचारी देखें वही बड़भागी है।
भरि अकँवारि मिले मन्दिर सँवारि झिले, खिले सुख पाइ नैन जानै जोई रागी है।। २१५।।
रां हंस भक्त रां
कोढ़ी भयो राजा, किये जतन अनेक ऐपैं, एकहूँ न लागै, कह्यो हँसनि मँगाइयै।
बधिक बुलाय कही, वेगि ही उपाय करौ, जहाँ-तहाँ ढूँढ़ि अहो, इहाँ लगि ल्याइयै।।
कैसे करि ल्यावै? वेतौ रहैं मानसर माँझ, ल्यावोगे छुटौगे तब जनैं चारि जाइयै।
देखत ही उड़ि जात, जाति को पिछानि लेत, साधु सौं न डरैं, जानि भेष लै बनाइयै।। २१६।।
गये जहाँ हँस, सन्त बानौ सो प्रशंस, देखि, जानिके बँधाये राजा पास लैके आये हैं।
मानि मत सार, प्रभु वैद को स्वरूप धारि, पूछिकें बजार लोग, भूप ढिंग ल्याये हैं।।
काहे कौ मँगाये पच्छी? आछी हम करैं देह, छोड़ि दीजै इन्हें, कही नीठ करि पाये हैं।
औषधि पिसाये, अँग-अंगनि मलाये, किये नीके, सुख पाये, कहि उनको छुटाये हैं।।२१७।।
लेवो भूमि गाऊँ, बलि जाऊँ या दयालुता की, भाल भाग ताकैं जाकौं दरसन दीजियै।
पायो हम सब, अब करौ हरि साधुसेवा, मानुष जनम ताकी सफलता कीजियै।।
करी लै निदेस, देशभक्ति विसतार भयो, हंस हितसार जानि, हिये धरि लीजियै।
बधिकनि जानी, जासौँ खगनि प्रतीति कीनी, ऐसो भेष छोड़िये न राख्योँ मति भीजियै।। २१८।।

६०) (श्री भक्तमाल
श्रीसदाव्रतीजी महाजन
महाजन सुनो सदाव्रती ताको भक्तपन, मन में विचार सेवा कीजै चित लायकै।
आवत अनेक साधु, निपट अगाध मति, साधि लेत जैसी आवै सुबुधि मिलायकै।।
सन्त सुख मानि, रहि गयो घर माँझ सदा, सुत सौं सनेह नित खेलै संग जायकै।
इच्छा भगवान मुख्य, गौन लोभ जानि मारि, डार्यो, धूरि गाड़ि, गृह आयो पछितायकै ।।२१६.।।
देखै महतारी, मग बेटा कहाँ पगि रह्यौ? बीते चारि जाम, तऊ धाम में न आयौ है।
फेरी पुर दौंड़ी, ताके संग सन्त लौंड़ी आय, कह्यौ यों पुकारि, सुत कौने बिरमायौ है।।
वेगि दै बताय दीजै, आभरन दिये लीजै, कही सो संन्यासी, एही मार्यौ मन लायौ है।
दई लै दिखाय देह, बोल्यो याको गहि लेहु, याही ने हमारौ पुत्र मार्यो नीके पायौ है ।। २२० ।।
बोल्यो अकुलाय, मैं तौ दियो है बताय मोंको, देहु जु छुटाय, नहीं झूठ कछु भाषियै।
लेवौ मति नाम साधु, जो उपाधि मेट्यौ चाहौ, जावौ उठि और कहूँ, मानी छोरि नाषियै।।
आयकै विचार कियौ, जानी सकुचायो सन्त, बोलि उठी तिया, सुता दै कैं नीके राखियै।
पर्यो बधू पाँय, तेरी लीजिये बलाय, पुत्र शोक को मिटाय, और खरी अभिलाषियै ।।२२१।।
बोलि लियौ सन्त, सुता कीजियै जू अंगीकार, दुख सो अपार, काहू विमुख कौं दीजियै।
बोल्यौ मुरझाय, मैं तौ मार्यौ सुत हाय ! मौपै जियौहू न जाय, मेरो नाम नहीं लीजियै।।
देखौ साधुताई, धरी सीस पै बुराई, जहाँ राईहूँ न दोष, कियौ मेरु सम रीझियै।
दई बेटी ब्याहि, कहि मेरो उर दाह मिटै, कीजियै निबाह जग माहिं जौलौं जीजियै ।। २२२ ।।
आये गुरु घर, सुनि दीजै कौन सर, बड़े सिद्ध सुखदाई, साधुसेवा लै बताई है।
कह्यो सुत कहाँ?, आजू ! पायौ कही कैसी भाँति, कैसे कैं बखानै, जग मीचु लपटाई है।।
प्रभु ने परीक्ष्या लई, सोई हमें आज्ञा दई, चलियै दिखावौं जहाँ देह कौं जराई है।
गये वाही ठौर, सिरमौर हरि ध्यान कियो, जियो चल्यो आयो दास कीरति बढ़ाई है ।। २२३ ।।
चारौ युग चतुर्भुज सदा, भक्त गिरा साँची करन।।
दारुमई तरवार, सारमय रची 'भुवन' की।
'देवा' हित सितकेश, प्रतिज्ञा राखी जन की।।
कमधुज के कपि चारु, चिता पर काष्ठ जु ल्याये।
जैमल के जुधि माँहि, अश्व चढ़ि आपुन धाये।