सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 195 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 63

४८) (श्री भक्तमाल
माँगे बार-बार विदा राजा नहीं जान देत, अति अकुलाये कही स्वामी 'धन दीजिये'।
देकैं बहु भाँति सो पठाये संग मानस हूँ, 'आवौ पहुँचाय तब तुम पर रीझिये'।। १५५ ।।
पूछैं नृप नर 'कोऊ तुम्हरी न सरवर, जिते आये साधु ऐसी सेवा नहीं भई है।
स्वामी जू सौं नातौ कहा? 'कहौ हम खाँइ हा-हा', 'राखियो दुराइ यह बात अति नई है'।
हुते एकठौर नृप चाकरी में तहाँ इन कियोई बिगार मारि डारौ आज्ञा दई है।
राखे हम हितू जानिलै निदान हाथ-पाँव वाही के ऐसान अब हम भरि लई है'।। १५६ ।।
फाटि गई भूमि सब ठग वे समाइ गये, भये ये चकित दौरि स्वामी जू पै आये है।
कही जिती बात सुनि गात-गात काँपि उठे, हाथ-पाँव मीड़ैं भये ज्यौं के त्यौं सुहाये है।।
अचरज दोऊ नृप पास जा प्रकास किये, जिये एक सुनि आये वाही ठौर धाये हैं।
पूछैं बार-बार सीस पाँयनि पै धारि रहे, कहिये उघारि कैसे मेरे मनभाये हैं।। १५७ ।।
राजा अति अर गही कही सब बात खोलि, निपट अमोल यह सन्तन को वेश है।
कैसो अपकार करै तऊ उपकार करैं, ढरै रीति अपनी ही सरस सुदेश है।।
साधुता न तजैं कँभू जैसे दुष्ट दुष्टता न, यही जानि लीजै मिले रसिक नरेश है।
जान्यो जब नाव ठाँव रहो इहाँ बलि जाँव, भयो मैं सनाथ प्रेमभक्ति भई देश है।। १५८ ।।
गये जा लिवाय ल्याय कविराजराज तिया, कियो लै मिलाप आप रानी ढिग आई है।
मर्यो एक भाई वाकैं भई यों भौजाई सती, कोऊ अंग काटि कोऊ कूदि परी धाई है।।
सुनत ही नृपबधू निपट अचम्भो भयो, इनकैं न भयो फिरि कही समुझाई हैं।
प्रीति की न रीति यह बड़ी विपरीति अहो! छुटै तन जबै प्रिया प्रान छूटि जाई है।। १५६ ।।
'ऐसी एक आप' कहि राजा सौं लै बात कही, 'लैकैं जाओ बाग स्वामी नेकु देखौं प्रीति को'।
'निपट विचारी बुरी देत मेरे गरे छुरी' तिया हठ मानि करी वैसे ही प्रतीति को।।
आनि कहे आप पाये कही यही भाँति आय, बैठी ढिग तिया देखि लोटि गई रीति को।
बोली भक्तवधू 'अजू वे तौ हैं बहुत नीके, तुम कहा औचक ही पावति हौं भीति को' ।। १६० ।।
भई लाज भारी पुनि फेरिकै सँवारी दिन बीति गये कोऊ जब-तब वही कीनी है।
जानि गई भक्तवधू चाहति परीक्ष्छा लियो, कही 'अजू! पाये' सुनि तजी देह भीनी है।।
भयो मुख श्वेत रानी-राजा आये जानी यह, 'रचौं चिता जरौं मति भई मेरी हीनी है'।
भई सुधि आपकौं जु आये वेगि दौरि इहाँ, देखि मृत्युप्राय नृप कह्यो 'मेरी दीनी है' ।। १६१ ।।
बोल्यो नृप 'अजू! मोहिं जरई बनत अब, सब उपदेस लैकै धूरि में मिलायो है'।
कह्यो बहु भाँति ऐपै आवति न शान्ति किहूँ गाई अष्टपदी सुर दियो तन ज्यायो है।।