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सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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पृष्ठ 58

श्रीनामदेवजी) (४३
सेवरा हराये वादी आये नृप पास ऊँचे, छात पर बैठि एक माया फन्द डार्यो है।
जल चढ़ि आयो नाव भाव लै दिखायो कहैं, 'चढ़ौं नहिं बूड़ो' आप कौतुक सौं धार्यो है।।१२५।।
आचारज कही यों चढ़ाओ इन सेवरानि, राजा ने चढ़ाये गिरे टूँक उड़ि गये हैं।
तबतौ प्रसन्न नृप पाँव पर्यो भाव भर्यो, कह्यो जोई कर्यो धर्म भागवत लये हैं।।
भक्ति ही प्रचार पाछे मायावाद डारि दीनौ, कीनौ प्रभु कह्यौ किते विमुखहू भये हैं।
आशय सो गँभीर सन्त धीर वह रीति जाने, प्रीति ही में साने हरिरूप गुन नये हैं।।१२६।।
श्रीनामदेवजी
नामदेव प्रतिज्ञा निर्वही ज्यौं त्रेता नरहरिदास की।।
बालदशा बीठल्य, पानि जाके पै पीयौ।
मृतक गऊ जिवाय, परचौ असुरन कौं दीयौ।।
सेज सलिल तें काढ़ि, पहिल जैसी ही होती।
देवल उलट्यो देखि, संकुचि रहे सबही सोती।।
पण्ढरनाथ कृत अनुग ज्यौं, छानि सुकर छाई घास की।
नामदेव प्रतिज्ञा निर्वही ज्यौं, त्रेता नरहरिदास की।। ४३।।
छीपा वामदेव हरिदेव जू का भक्त बड़ो, ताकी एक बेटी पतिहीन भई जानिये।
द्वादश बरष माँझ भयो तब कही पिता, सेवा सावधान मन नीके करि आनिये।।
तेरे जे मनोरथ हैं पूरन करन येई, जोपै दत्तचित्त ह्वै कैं मेरी बात मानिये।
करत टहल प्रभु वेगि ही प्रसन्न भये कीनी, काम-वासना सो पोषि उन मानिये।। १२७।।
विधवा को गर्भ ताकी बात चली ठौर-ठौर, दुष्ट सिरमौरनि की भई मन भाइयै।
चलत-चलत वामदेव जू के कान परी, करी निरधार प्रभू आप अपनाइयै।।
भयो जू प्रगट बाल नाम नामदेव धर्यौ, कर्यौ मनभायो सब सम्पत्ति लुटाइयै।
दिन-दिन बढ़्यो कछू औरे रंग चढ़यो भक्तिभाव, अंग मढ़यो कढ़यो रूप सुखदाइयै।। १२८।।
खेलत खिलौना रीति-प्रीति सब सेवा ही की, पट पहिरावैं पुनि भोग को लगावहीँ।
घण्टा लै बजावैं नीके ध्यान मन लावैं त्यौं-त्यौं, अति सुख पावैं नैन नीर भरि आवहीँ।।
बार-बार कहैं नामदेव वामदेव जू सौं, 'देवो मोहि सेवा माँझ अति ही सुहावहीं'।
'जाँऊ एक गाँव फिरि आऊँ दिन तीनि मध्य, दूध को पिवावौ मत पीवौ मोहि भावहीँ' ।। १२६ ।।