श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीविष्णुपुरीजी) (५१
चले भौन माँझ आरति मिटायवे कौं, गायवे कौं जोई रीति सोई कें बताइये।
नारि सौं कह्यो है तू सिंगार करि सेवा कीजै, लीजै यों सुहाग जामें वेगि प्रभु पाइये ।।१७१।।
चली यै सिंगार करि थार में प्रसाद लै कै, ऊँची चित्रसारी जहाँ बैठे अनुरागी हैं।
झनक-मनक जाइ जोरि कर ठाढ़ी रही, गही मति देखि-देखि न्यूनवृत्ति भागी है।।
कही युग सुई ल्यावो ल्याई दई लई हाथ, फोरि डारी आँखें 'अहो! बड़ी ये अभागी हैं'।
गई पति पास स्वांस भरत न बोलि आवै, बोली दुख पाय आय पाँय परे रागी हैं।।१७२।।
'कियो अपराध हम साधु कौं दुखायौं' अहो! बड़े तुम साधु हम नाम साधु धर्यो है।
रहौ अजू सेवा करौं करी तुम सेवा ऐसी जैसी नहीं काहू माँझ मेरो मन भर्यो है।।
चले सुख पाय दृग भूत से छुटाइ दिये हिये ही की आँखिन सौं अबै काम पर्यो है।
बैठे वनमध्य जाइ भूखे जानि आप आइ भोजन कराइ चलौ छाया दिन ढर्यो है।।१७३।।
चलै लै गहाय कर छाया घन तरु तर, चाहत छुटायो हाथ छोड़ैं कैसे? नीको है।
ज्यौं-ज्यौं बल करैं त्यौं-त्यौं तजत न ऐऊ अरे, लियोइ छुटाइ गह्यो गाढ़ो रूप हीको है।।
ऐसे ही करत वृन्दावन घन आइ लियो, पियो चाहैं रस सब जग लाग्यो फीको है।
भई उतकण्ठा भारी आये श्रीविहारीलाल, मुरली बजाइकै सु कियो भायो जीको है।।१७४।।
खुलि गये नैन ज्यौं कमल रवि उदै भये, देखि रूपरासि बाढ़ी कोटिगुनी प्यास है।
मुरली मधुर सुर राख्यो मद भरि मानो, ढरि आयो कानन में आनन में भास है।।
मानिकै प्रताप चिन्तामणि मन माँझ भई, 'चिन्तामणि जैति' आदि बोले रसरास है।
'करनामृत' ग्रन्थ हृदै ग्रन्थि कौं विदारि डारै, बाँधै रस ग्रन्थ-पन्थ युगल प्रकास है।।१७५।।
चिन्तामनि सुनी 'वन माँझ रूप देख्यो लाल', ह्वै गई निहाल आई नेह नातो जानिकैं।
उठि बहु मान कियो दियौं दूध-भात दोना, दै पठावैं नित हरि हितू जन मानिकैं।।
लियो कैसे जाइ तुम्हें भाय सौं दियो जो प्रभु, लैहौं नाथ हाथ सौं जो देहैं सनमानिकै।
बैठे दोऊजन कोऊ पावैं नहीं एक कन, रीझे श्यामघन दीनो दूसरो हूँ आनिकै।।१७६।।
श्रीविष्णुपुरीजी
कलि जीव जंजाली कारनै, विष्णुपुरी बड़ि निधि सँची।।
भगवत धर्म उतंग, आन धर्म आन न देखा।
पीतर पटतर विगत, निकष ज्यौं कुन्दन रेखा।।