सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 195 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 61

४६) (श्री भक्तमाल
श्रीजयदेवजी
जयदेव कवि नृप चक्कवै खंडमंडलेश्वर आन कवि।।
प्रचुर भयो तिहुँ लोक, गीतगोविन्द उजागर।
कोक काव्य नवरस, सरस सिंगार को आगर।।
अष्टपदी अभ्यास करै, तेहिं बुद्धि बढ़ावै।
(श्री) राधारमन प्रसन्न, सुनन निश्चय तहँ आवै।।
सन्त सरोरुहखण्ड कौं, पद्मापति सुखजनक रवि।
जयदेव कवि नृप चक्कवै खंडमंडलेश्वर आन कवि।।४४।।
नवाह परायण द्वितीय विश्राम
किन्दुबिल्व ग्राम तामें भये कविराज राज, भरयो रसराज हिये मन-मन चाखिये।
दिन-दिन प्रति रूख-रूखतर जाइ रहैं, गहैं एक गूदरी कमंडलु कौं राखिये।।
कही देवै विप्र सुता जगन्नाथदेव जू कौं, भयो जब समै चल्यो दैन प्रभु भाखिये।
'रसिक जैदेव नाम मेरोई सरूप ताहि देवौ, ततकाल अहो! मेरी कहो साखिये'।।१४४।।
चल्यो द्विज तहाँ-जहाँ बैठे कविराजराज, अहो महाराज! मेरी सुता यह लीजिये।
कीजिये विचार अधिकार बिसतार जाके, ताहि को निहारि सुकुमारि यह दीजिये।।
जगन्नाथदेव जू की आज्ञा प्रतिपाल करो, डरो मति धरो हिये ना तो दोष भीजिये।
उनको हजार सौहँ हमको पहार एक, ताते फिरि जावो तुम्हें कहा कहि खीजिये।।१४५।।
सुता सौं कहत 'तुम बैठि रहौ याही ठौर', आज्ञा सिरमौर मोपै नाहीं जात टारी है'।
चल्यौ अनखाइ समझाइ हारे बातनि सौं, 'मन! तू समझ कहा कीजै?' सोच भारी है।।
बोले द्विज बालकी सौं 'आप ही विचार करो, धरो हिये ध्यान मोपै जात न सँभारी है'।
बोली कर जोरि 'मेरो जोर न चलत कछू, चाहौ सोई होहु यह वारि फेरि डारी है'।।१४६।।
जानी जब भई तिया कियो प्रभु जोर मोपै, तोपै एक झोंपड़ी की छाया करि लीजिये।
भई तब छाया श्याम-सेवा पधराइ लई, 'नई एक पोथी मैं बनाऊँ' मन कीजिये।।
भयो जू प्रगट गीत सरस गोविन्द जू को, मान में प्रसंग 'सीस मंडन को दीजिये'।
यही एक पद मुख निकसत सोच पर्यो, धर्यो कैसे जात? लाल लिख्यो मति रीझिये।।१४७।।
नीलाचल धाम तामें पण्डित नृपति एक, करी यही नाम धरि पोथी सुखदाइयै।
द्विजन बुलाइ कही यही है, प्रसिद्ध करो, लिखि-लिखि पढ़ौ देस-देसनि चलाइयै।।