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सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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पृष्ठ 48

श्वेतद्वीप के भक्त) (३३
जम्बूद्वीप के भक्त
मध्यदीप नवखण्ड में, भक्त जिते मम भूप॥
इलावर्त्त अधीस संकर्षण, अनुग सदाशिव।
रमनक मछ मनु दास, हिरण्य कूरम अर्जम इव॥
कुरु वराह भूभृत्य, वर्ष हरि सिंह प्रह्लादा।
किंपुरुष राम कपि, भरत नरायन बीना नादा॥
भद्राश्वग्रीवहय भद्रसव केतु काम कमला अनूप।
मध्यदीप नवखण्ड में, भक्त जिते मम भूप॥ २५॥
श्वेतद्वीप के भक्त
श्वेतदीप में दास जे, श्रवण सुनौ तिनकी कथा॥
श्रीनारायण वदन निरन्तर ताही देखें।
पलक परै जो बीच कोटि जमजातन लेखैं॥
तिनके दरशन काज गये तहँ वीणाधारी।
श्याम दई कर सैन उलटि अब नहिं अधिकारी॥
नारायण आख्यान दृढ़, तहँ प्रसंग नाहिन तथा।
श्वेतदीप में दास जे श्रवण सुनौ तिनकी कथा॥ २६॥
श्वेतदीपवासी सदा रूप के उपासी गये, नारद विलासी उपदेस आसा लागी है।
दई प्रभु सैन जिनि आवो इहि ऐन दृग, देखें सदा चैन मति गति अनुरागी है।।
फिरे दुख पाइ जाइ कही श्रीवैकुण्ठनाथ, साथ लिये चले लखो भक्ति अँग पागी है।
देख्यो एक सर खग रह्यो ध्यान धरि ऋषि, पूछैं कहो हरि कह्यो बड़ो बड़भागी है।। १०३।।
बरष हजार बीते भये नहीं चितचीते, प्यासोई रहत ऐपै पानी नहीं पीजिये।
पावै जो प्रसाद तब जीभ सौं स्वाद लेत, लेत नहीं और याकी मति रस भीजिये।।
लीजै बात मानि जलपान करि डारि दियो, लियो चोंच भरि दृग भरि बुधि धीजिये।
अचरज देखि चख लगै न निमेष किहूँ, चहुँदिसि फिर्यो अब सेवा याकी कीजिये।। १०४।।