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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

द्वितीय पटल ] [ ३६
सप्तधा दृश्यते तं तु दग्धं मन्येत मन्त्रवित् ।
अस्त्रं द्वाभ्यां त्रिभिः षड्भिरष्टाभिर्दृश्यतेऽक्षरैः ।८०
जो मन्त्र पाँच वर्णों वाला होवे और रेफ-इन्दु और अर्क से रहित
होवे उसे नेत्रहीन समझना चाहिए। वह दुःख, शोक और भय के देने
वाला हुआ करता है ।७६। आदि-मध्य और अवसान में चतुष्कल राव
भी हो तथा माया और नमामि -यह पद जिसमें नहीं है वह कीलित
कहा गया है । मध्य में एक-दो मूर्धा में जिसमें अस्त्र और पुरन्दर नहीं
होते हैं वह मन्त्र स्तम्भित और सिद्धि का रोधक होता है । जिस मन्त्र
के मूर्धा में वहिन वायु समायुक्त सात प्रकार से दिखलाई दिया करता
है, मन्त्रों के ज्ञाता उस मन्त्र को दग्ध मानते हैं। जो दो से अस्त्र और
तीन वकारों से ऐसे आठ से अक्षरों युक्त होता है ।७७-८०।
त्रस्तः सोऽभिहितो यश्य मुखे न प्रणवः स्थितः ।
शिवो वा शक्तिरथवा भीताख्यः स प्रकीर्तितः ।८१
आदिमध्यावसानेषु भवेन्तार्र्णचतुष्टयम् ।
यस्य, मन्त्रः स मलिनो मन्त्रवित्त विवर्जयेत् ।८२
गरु मध्ये दकारोऽथ (वा) क्रोधो वा मूर्द्धनि द्विधाः ।
अस्त्रं तिष्ठति मन्त्रः स तिरस्कृत उदाहृतः ।८३
भ्योद्वयं हृदये शीर्षे वषठ् वौषट् च मध्यतः ।
यस्यासौ भेदितो मन्त्रस्त्याज्यः सिद्धिषु सूरिभिः ।८४
त्रिवर्णे हंसहीनो यः सुषुप्तः स उदाहृतः ।
मन्त्रो वाऽप्यथवाविद्या सप्ताधिकसताक्षरः ।८५
जिसके मुख में प्रणव स्थित नहीं होता है वह मन्त्र त्रस्त समझना
चाहिए । शिव अथवा शक्ति न हो वह मन्त्र भीत कहा गया है ।८१।
जिसके आदि—मध्य और अवसान में मार्णव चतुष्टय हो अर्थात् चार
मवर्ण होवे वह मन्त्र मलिन होता है । मन्त्रों का ज्ञाता उसको वर्जित
कर देवे ।८२। जिसके मध्य में हुँकार हो अथवा मूर्धा में क्रोध होवे
और दो प्रकार से अस्त्र स्थित होता है वह मन्त्र तिरस्कृत कहागया है ।

४० ] [ श्री शारदा तिलक
।८३। भ्योद्वय हृदय में-शीर्ष में वषट् और मध्य में वौषट् होवे वह
मन्त्र भेदित होता है। सूरियों के द्वारा वह मन्त्र सिद्धियों में सर्वदा
त्याग करने के योग्य होता है ।८४। जो तीन वर्णों से युक्त और हंस
से हीन होता है वह मन्त्र सुषुप्त कहा गया है। मन्त्र हो अथवा विद्या
हो सत्रह अक्षरों वाला हो ।८५।
फट्कारञ्चकादिर्यो मदोन्मत्तः उदीरि (उदाहृ) तः ।
तद्वदस्त्वं स्थितं मध्ये यस्य, मन्त्रः स मूर्च्छितः ।८६
विरामस्थानगं यस्य हतवीर्य्यः स कथ्यते ।
आदौ मध्ये तथा मूर्द्धिन चतुरस्त्रयतो मनुः ।८७
ज्ञातव्यो हीन इत्येषु यः स्यादष्टादशाक्षरः ।
एकोनविंशत्वर्णो वा यो मनुस्तारसंयुतः ।८८
हल्लेखाङकुशबीजाद्य स्तत्प्रध्वस्तं प्रचक्षते ।
सप्तवर्णो मनुर्बालः कुमारोऽष्टाक्षरस्तु यः (स्मृतः) ।८६
षोडशार्णो युवा, प्रोक्तश्च वारिंशल्लिपर्मनुः ।
त्रिशवर्णश्चतृष्पष्टिवर्णी मन्त्रः शताक्षरः ।६०
जिसके आदि में फट्कार पञ्चक होवे वह मन्त्र मन्दोमत्त कहा
गया है। उसी भाँति जिसके मध्य में अस्त स्थित होवे वह मन्त्र
मूर्च्छित कहा गया है ।८६। जिसके विराम के स्थानमें गत हो वह मन्त्र
हतवीर्य्यक कहा जाता है। आदि में-मध्य में और मूर्धा में जो चतुः-
अस्त्रों से युक्त होवे वह मन्त्र हीन जानना चाहिए। जो अठारह अक्षरों
वाला होता है-अथवा जो मन्त्र उन्नीस अक्षरों वाला होवे और तार
से अर्थात् प्रणव से समन्वित होवे, जिसके आदि में रहने वाले हृल्लेखा-
अंकुश और बीज होवे उस मन्त्र को प्रध्वस्त कहा जाता है। सात
वर्णों वाला मन्त्र बाल होता है। आठ अक्षरों वाला मन्त्र कुमार कहा
गया है। सोलह वर्णों वाला युवा होता है तथा अड़तालीस का मन्त्र
प्रौढ़ दुरता है। तीस वर्णों वाला चौसठ वर्णों वाला शताक्षर मन्त्र-
वृद्ध होता है ।८७-६०।

द्वितीय पटल ] [ ४१
चतुः शताक्षरश्चापि वृद्ध इत्यभिधीयते ।
नवाक्षरो ध्रुवयुतो मनुर्निस्त्रिंश ईरितः । ६१
यस्यावसाने हृदयशिरोमन्त्रौ च मध्यतः ।
शिखा वर्म च न स्यातां वौषट् फट्कार एव च । ६२
शिवशक्त्यर्णहीनो वा स निर्वोज इति स्मृतः ।
एष स्थानेषु फट्कारः षोढा यस्मिन्प्रदृश्यते । ६३
स मन्त्रः सिद्धिहीनः स्यात्, मन्दः षड्वत्यक्षरो मनुः ।
कूट एकाक्षरो मन्त्रः स एवोक्तो निरंशुकः .६४
द्विवर्णः सत्वहीनः स्यात्, चतुर्वर्णस्तु केकरः ।
षडक्षरो बीजहीन, स्त्वर्द्धसप्ताक्षरो मनुः । ६५
और एक सौ चार अक्षरों वाला भी मन्त्र वृद्ध कहा गया है । नौ
अक्षरों वाला ध्रुवसे समन्वित मन्त्र निस्रिंश कहा गया है । ६१। जिसके
अवसान में हृदय और शिरोमन्त्र होवे-मध्यमें शिखा होवे और वर्म होवे
और वौषट् तथा भट्कार होवे और शिव भक्ति से हीन होवे वह् मन्त्र
निर्बीज कहा गया है । जिन स्थानों में छै बार फट्कार दिखलाई दिया
करता है वह मन्त्र सिद्धिहीन होता है और षडवत्यक्षर मन्त्र मन्द होता
है । एकाक्षर मन्त्र कूट होता है और वह ही निरंशुक कहा गया है ।
। ६२-६४। दो वर्णों वाला मन्त्र सत्व से हीन हुआ करता है और चार
वर्णों वाला मन्त्र केकर होता है । छै अक्षरों का मन्त्र बीज हीन होता
है । उसी भाँति अर्ध सात अक्षरों वाला है । ६५।
सार्द्धद्वादशवर्णो वा धूमितः स तु निन्दितः ।
सार्द्धवीसत्रयक्तद्वदेकविंशतिवर्णकः । ६६
विंशत्यर्ण स्त्रिंशवर्णो यः स्यादालिङ्गितस्तु सः ।
द्वात्रिंशदक्षरो मन्त्रो मोहितः परकीर्त्तितः । ६७
चतुर्विंशतिवर्णो यः सप्तविंशतिवर्णकः ।
क्षुधार्त्तः स तु विज्ञेयश्चतुर्विंशतिवर्णकः । ६८

४२ ] [ श्रीशारदा तिलक
एकादशाक्षरो वाऽपि पञ्चविंशतिवर्णकः ।
त्रयोविंशतिवर्णो वा मन्त्रो दृप्त उदाहृतः ।६६
षड्विंशत्यक्षरो मन्त्रः षट्त्रिंशद्वर्णक स्तथा ।
त्रिंशदेकोनवर्णो याऽप्यङ्गहीनोऽभिधीयते ।
अष्टाविंशत्यक्षरो वा एक त्रिंशदथापि वा ।१००
अथवा सार्ध द्वादश वर्णो वाला मन्त्र धूमित हुआ करता है वह
निन्दित होता है । अर्ध बीज त्रयस्के सहित और उसी भाँति इक्कीस
वर्णों वाला बीज वर्णों का तथा तीस वर्णों का जो मन्त्र होता हैं वह
मन्त्र आलिङ्गित होता है । बाईस अक्षरों वाला मन्त्र मोहित कहा गया
है । जो चौबीस वर्णों का ही और सत्ताईश वर्णों का मन्त्र ही उसे
क्षुधार्त समझना चाहिए । चौबीस वर्णों वाला-ग्यारह अक्षरों वाला
अथवा पच्चीस वर्णों का या तेईस वर्णों का मन्त्र होवे वह मन्त्र दृप्त
कहा गया है ।६६-६६। छब्बीस अक्षरों वाला मन्त्र तथा छत्तीस वर्णों
वाला मन्त्र अथवा उनतीस अक्षरों वाला मन्त्र अङ्गहीन कहा जाता
है । अट्ठाईस अक्षरों का अथवा इकतीस वर्णों का मन्त्र होवे ।१००।
अतिक्रुुद्धः स कथितो निन्दितः सर्वकर्मसु ।
त्रिंशदक्षरो मन्त्रा स्त्रयस्त्रिंशदथापि ।१०१
अतिक्रूरः स कथितो निन्दितः सर्वकर्मसु ।
चत्वारिंशन्मारभ्य त्रिषष्टियर्विदापयेत् । १०२
तावत्संख्यां निगदिता मन्त्राः सब्रीडसज्ञकाः ।
पञ्चषष्ठ्यक्षरा ये स्युर्मन्त्रांस्ते शान्तमानसाः ।१०३
एकोनशतपर्यन्त पञ्चषष्ठ्यक्षरादितः ।
ये मन्त्रास्ते निगदिता स्थानभ्रष्टाह्वया बुधैः ।१०४
त्रयोदशाक्षरा ये स्युर्मन्त्राः पञ्चदशाक्षराः ।
विकलास्तेऽभिधीयन्ते शतं सार्द्धं शतं तु वा (तथा) ।१०५
ऐसा मन्त्र अति क्रुद्र कहा गया है जो सभी कर्मों में निन्दित माना
गया है । तीस वर्णों वाला तथा तैंतीस वर्णों का मंत्र अति क्रुद्र कहा

द्वितीय पटल ] [ ४३
गया है और यह सभी कर्मों में निन्दित माना गया है। चालीस से
आरम्भ करके तिरेसठ वर्णों तक होवे तो इन संख्या वाले मंत्र सक्रीड़
संज्ञा वाले कहे गये हैं। जो मंत्र पैंसठ अक्षरों से संयुत होवे वे मंत्र
शान्त मानस होते हैं। पैंसठ अक्षरों से लेकर एक कम सौ अक्षरों वाले
जो मंत्र कहे गये हैं वे बुधों के द्वारा स्थान भ्रष्ट कहे गये हैं । जो मंत्र
तेरह अक्षरों से युत है और पन्द्रह अक्षरों वाले हैं वे सब विकल कहे
जाते हैं। शत (सौ) अथवा सार्धशत हों ।१०५-१०५।
शतद्वयं द्विनवतिरेकहीनाथवापि सा ।
शतत्रयं वा यत्संख्या निः स्नेहास्ते समीरिताः ।१०६
चतुः शतान्यथारंभ्य यावद्वर्णसहस्रकम् ।
अतिवृद्धः संयोगेषु परित्याज्यः सदा बुधैः ।१०७
सहस्रावर्णाधिका मन्त्रा दण्डकाः पीडिताह्वयाः ।
द्विसहस्राक्षरा मन्त्राः खण्डशः शतधा कृताः ।१०८
ज्ञातव्या स्तोत्ररूपास्ते तन्त्र एते यथास्थिताः ।
तथाविधाश्च बोद्धव्या मन्त्रिभिः काम्य कर्मसु ।१०६
दोषानिमानविज्ञाय यो मन्त्रान् भजते जडः ।
सिद्धिर्न जायते तस्य कल्पकोटिशतैरपि ।११०
दो-सौ-बानवें अथवा एक से हीन-अथवा तीन जो भी संख्या है,
ऐसे मन्त्र निःस्नेह कहे गये हैं ।१०६। चार सौ से आरम्भ करके एक
सहस्रवर्ण तक जो होते हैं वह संयोगों में अतिवृद्ध कहे गये हैं। बुधों को
सदा ही उन्हें परित्याग कर देना चाहिए ।१०७। एक सहस्र वर्णों से
भी अधिक वर्णों वाले मन्त्र दण्डक नाम से कहे गये है। यन्त्र पीड़ित
नाम वाले होते हैं। दो सहस्र अक्षरों वाले मन्त्र खण्डशः सौ प्रकार से
किये गये हैं। वे मन्त्र स्तोत्रों के ही रूप वाले समझने चाहिये । ये यथा
स्थित हैं। उस भाँति वाले सब मन्त्र धारण करने वालों के द्वारा
सभी कर्मों में समझ लेने चाहिए ।१०८-१०९। इन दोषों का ज्ञान प्राप्त

४४ ] [ श्रीशारदा तिलक
न करके जो जड़ पुरुष दूषित मन्त्रों का सेवन किया करता है उसको
करोड़ों कल्पों में भी सिद्धि नहीं होती है ।११०।
इत्यादिदोषोदुष्टांस्तान्मन्त्रानात्मनि योजयेत् ।
शोधयेदूर्ध्वपवनोबद्धया योनिमुद्रया ।१११
मन्त्राणां दश संस्काराः कथ्यन्ते सिद्धिदायिन
जननं जीवनं पश्चात्ताडनं बोधनं तथा । ११२
तथाभिषेको विमलीकरणाप्यायने पुनः ।
तर्पणं दीपनं गुप्तिर्दशै या मन्त्रसंस्क्रियाः ।११३
मन्त्राणां मातृकामध्यादुद्धारो जननं स्मृतम् ।
प्रणवान्तरितान्कृत्वा मन्त्रवर्णाञ्जपेत्सुधीः ।११४
एतज्जीवनमित्याहुर्मन्त्रविशारदाः ।
मन्त्रवर्णान् समालिख्य ताडयेच्चदनाम्भसा ।११५
इन उक्त दोषों से दूषित उन मन्त्रों को अपनी आत्मामें योजित
करना चाहिए । बद्धयोनिमुद्रा के द्वारा ऊर्ध्व पवन द्वारा उनका शोधन
करना चाहिए ।१११। मन्त्रों के दश संस्कार बतलाये गये हैं । जो सिद्धि
के देने वाले होते है । उनके नाम बतलाते हैं-जनन, जीवन, ताड़न,
बोधन, अभिषेक, विमली-करण, आप्यायन, तर्पण, दीपन और गुप्ति-
ये दश मन्त्रों के संस्कार होते हैं ।११२-११३। मन्त्रों का मातृका के
मध्य से उद्धार करना ही मन्त्रका जनन कहा गया है । प्रणवों को अन्त-
रित करके सुधी पुरुष मन्त्र के वर्णों का जाप करे, इसी को वे जीवन
संस्कार कहते हैं, जो मन्त्र-तन्त्र के विद्वान् होते हैं । मन्त्र के वर्णों को
भली भाँति लिखकर चन्दन के जल के द्वारा ताड़न करना चाहिए, यही
मन्त्र का ताड़न संस्कार होता है ।११४-११५।
प्रत्येकं वायुना मन्त्री ताडनं तदुदाहृतम् ।
विलिख्य यन्त्रन्तं मन्त्री प्रसूनैः करवीरकै ।११६
तन्मन्त्राक्षरसंख्यातैर्हन्याच्चैतेन बोधनम् ।
स्वतन्त्रोक्तविधानेनमन्त्री मन्त्रार्णसंख्ययाः।११७

द्वितीय पटल ] [ ४५
अश्वत्थपल्लवैर्मन्त्रमभिषिञ्चेद्विशुद्धये ।
सञ्चिन्त्य मनसा मन्त्र ज्योतिर्मन्त्रेण निदहेत् ।११५
मन्त्रे मलत्रयं मन्त्री विमलीकरणं त्विदम् ।
तारं व्योमाग्निमनुयुक् दण्डी ज्योतिर्मनुमतः ।११६
कुशोदकेन जप्तेन प्रत्यर्णं (प्रत्येकं) प्रोक्षणं मनोः ।
तेन मन्त्रेण विधिवदेतदाप्यायनं मतम् ।१२०
प्रत्येक को मन्त्रधारी ताड़न करे, ऐसा कहा गया है । मन्त्र को
लिखकर मन्त्रधारी उसका करवीर के प्रसूतों से जो उस मन्त्र के अक्षरों
की संख्या वाले होंवे उससे हनन करे उससे बोधन होता है । अपने
तन्त्र में कथित विधान के द्वारा मन्त्रधारी पुरुष मन्त्रके वर्णों की संख्या
से विशुद्धि के लिए अश्वत्थ के पत्तों के द्वारा अभिषिञ्जन करे, यही
अभिषेक संस्कार होता है । मन के द्वारा मन्त्र का चिन्तन करके ज्योति
मन्त्र के द्वारा निर्दग्ध करे जो कि मन्त्रमें तीन मल होते हैं-यही विमली
करण मन्त्र का संस्कार होता है । व्योम अग्नि मन्त्रसे युक्त प्रणव और
दण्डी, यही ज्योति मन्त्र कहा गया है । व्योम का अर्थ, हकार है । अग्नि
का अर्थ रेफ है । मनुका तात्पर्य रो है । दण्डीका अर्थ अनुस्वार से युक्त
होता है । अभिमन्त्रित किये हुए कुशोदक के द्वारा मन्त्र के प्रत्येक वर्ण
का प्रोक्षण उस मन्त्र से विधि पूर्वक करे यही आप्यायन नामक संस्कार
है ।११६-१२०।
मन्त्रेण वारिणा मन्त्रे तर्पणं स्मृतम् ।
तारमा यारमायोगे मनोर्दीपनमुच्यते ।१२१
जप्यमानस्य मन्त्रस्य गोपनञ्च प्रकाशनम् ।
संस्कार दश संप्रोक्ताः सर्वमन्त्रेषु गोपिताः ।१२२
यान् कृत्वा संप्रदायेन मन्त्री वाञ्छितमश्नुते ।
स्वताराराशिकोष्ठानातनुकूलं भलंतमनुम् ।१२३
प्राप लोभात्पटु म्प्राज्यं रुद्रस्यात्र (द्वि) रुरुष्करम् ।
लोकलोपटु प्रायः खलौद्योभेषु भेदिताः ।१२४

४६ ] [ श्री शारदा तिलक
वर्णाः क्रमात्स्वरान् यौतु रेवत्यंशगतौ तदा ।
जन्मसंपद्विपत्क्षेम प्रत्यरिः साधको बधः ।१२५
मन्त्र के मन्त्र द्वारा जल से तर्पण करना ही तर्पण सस्कार माना
गया है । तार, माया और रमा के योग से (तार, प्रणव, माया, शक्ति,
रमा, श्री) मन्त्र का दीपक कहा जाता है ।१२१। जप किये जाने वाले
मन्त्र का प्रकाशन न करना ही गोपन संस्कार होता है जिसे गुप्ति नाम
से कहा गया है। ये ही दश संस्कार होते हैं जो बतला दिये गये हैं ।
ये सभी मन्त्रों में गोपित है ।१२२। जिन संस्कारों को करके मन्त्रधारी
अपने वाञ्छितको प्राप्त किया करते हैं। अपनी नक्षत्र राशिऔर कोष्ठ
के अनुकूल ही मन्त्र का सेवन करना चाहिए ।१२३। इस श्लोक का
विशदर्थ यह है-प्रा २ य प १ लो ३, भा ४, प १, टुं १, प्रा २,
ज्यं १, रु २, द्र २, र्या १, त्र, रु, २, ष्क १, स्म २, । लो २,
प १, पट १, टु १, प्रा २, यः १, स ३, लो ३, द्यौ १—इस प्रकार से
कथित आद्यक्षरों में अश्विनी आदि जाननी चाहिए । रेवती के अंशगत
दो अन्य अन्त्य स्वरअं-अः । तब क्रमसे वर्ण है । ये जन्म-सम्पत्, विपद,
क्षेम, प्रत्यारि और साधक तथा वध है।१२५।
मित्रं परममित्रं च जन्मादीनि पुनः पुनः ।
काल गौरं खुरं शोण शमी शोभेति राशिषु ।१२६
क्रमेण भेदिता वर्णाः कन्यायां शादयः स्थिताः ।
लग्नं धन भ्रातृबन्धुपुत्रशत्रु कलत्रका ।१२७
मरणं धर्मकर्मार्यिव्यया द्वादश राशयः ।
चतुरस्रे लिखेद्वर्णंश्चतुष्कोष्ठसमन्विते ।१२८
अकारादिक्षकारान्तान्स्वनामाद्यक्षरादितः ।
सिद्धादीन्कल्पयेन्मन्त्री कुर्यात्सिद्धादिभिः पुनः ।१२६
सिद्धादीन् सिद्धिदः सिद्धो जपात्साध्यो हुतादिभिः ।
सुसिद्धः प्राप्तिमात्रेण साधकं भक्षयेदरिः ।१३०
मित्र और परम मित्र जन्म आदि वार बार होते हैं । राशियों में
काल, गौर, खुर, शोण, शमी और शोभा ये क्रम से वर्ण भेदित

द्वितीय पटल ] [ ४७
कन्या में आदि स्थित है। जन्म कुण्डलीमें बारह घर होते हैं उनमें प्रथम
गृह लग्न का होता है जिसमें शिशु का जनन हुआ करता है दूसरा गृह
धन का होता है। इसी से धन-सम्पदा आदि का विचार किया जाता
है। तीसरा गृह आदि भाई, बन्धु, पुत्र, शत्रु और कलत्रका होते हैं।
चार कोष्ठोंसे सनन्वित चौकोरमें वर्णोंको लिखना चाहिए ।१२६-१२७।
।१२८। अपने नाम के आदि में होने वाले अक्षर से अकार आदि से
अकार के अन्त तक वर्णों की लिखे। मन्त्रधारी पुन सिद्ध आदि के
द्वारा सिद्ध आदि की कल्पना करे ।१२६। सिद्ध आदि का लेखन या
विचार करे । मन्त्र सिद्धि का देने वाला सिद्ध हुआदि जप से साध्य हुआ
करता है। प्राप्ति मात्र ही सुसिद्ध होता है। एक आदि होता है जो
साध्य का भक्षण करता है ।१३०।
सिद्धार्णा बान्धवाः प्रोक्ताः साध्यास्ते सेवकाः स्मृताः ।
सुसिद्धाः पोषका ज्ञेयाः शत्रु वोघातका मताः ।
दीपस्थानं समाश्रित्य कृतं कर्म फलप्रदम् ।
चतुरस्रां भुव भित्त्वा कोष्ठानां नवकं लिखेत् ।°३२
पूर्वकोष्ठादि विलिखेत्सप्तवर्गाननुक्रमात् ।
लक्ष्मीशे मध्यकोष्ठे स्वरान्युग्मक्रमाल्लिखेत् ।१३३
दिक्षु पूर्वांदितोयत्र क्षेत्राख्याद्यक्षरं स्थितम् ।
मुखं तत्तस्य जानीयाद्धस्तावुभयतः स्थिते ।१३४
कोष्ठे कुक्षी उभे पादौ द्वे शिष्टं पुच्छमीरितम् ।
क्रमेणानेन विभजे न्मध्यस्थमपि भागतः ।१३५
सिद्ध वर्ण वाले बान्धव कहे गये हैं और जो साध्य हैं वे सेवक
बताये गये हैं। जो सुसिद्ध होते हैं वे पुत्र बतल यें गये हैं और जो
घातक हैं वे शत्रु बताये गये हैं ।१३१। दीप स्थान कां समाश्रय लेकर
किया हुआ कर्म फल प्रदान करने वाला हुआ करता है। चतुरस्रभू का
भेदन करके नौ कोष्ठों को लिखना चाहिए ।१३२। सात वर्णों को अनु-
क्रम से पूर्ण कोष्ठ आदि का लेखन करे। स्वरों को युग्मक्रमसे लक्ष्मीश

४८ ] [ श्रीशारदा तिलक
मध्यकोष्ठ में लिखे ।१३३। पूर्व आदि दिशाओं में जहां पर क्षेत्रादि अक्षर
स्थित होवे वह उसका मुख जानना चाहिए । दोनों और हस्त स्थित
होवे और कोष्ठ में दो कुक्षियाँ होवें-दो या एक को शिष्ट पुच्छ कहा
गया है । इस क्रम से भाग से साध्य में स्थित का भी विभाग करे ।
१३४=१,५।
मुखस्थो लभते सिद्धिं करस्थः स्वल्पजीवनः ।
उदासीनः कुक्षिसंस्थः पादस्थो दुःखमाप्नुयात् ।१३६
पुच्छस्थः पीडयते मन्त्री बन्धनोच्चाटनादिभिः ।
कूर्मचक्रमिदं प्रोक्तं मन्त्राणां सिद्धिसाधनम् ।१३७
पुण्यक्षेत्रं नदीतीरं गुहापर्वतमस्तकम् ।
तीर्थप्रदेशाः सिंधूनां सङ्गमः पावन वनम् ।१३८
उद्यानानि विविक्तानि बिल्वमूलं गिरेस्तटम् ।
देवतायतनं कूलं समुद्रस्य निज गृहम् ।१३६
साधनेषु प्रशस्यन्ते स्थानान्येतानि मन्त्रिणाम् ।
भैक्ष्यं हविष्यं शाकानि विहितानि फल पयः ।१४०
मूलं सक्तुर्यवोत्पन्नो भक्ष्याण्येतानि मन्त्रिणाम् ।
पुरुषार्थसमावाप्त्यै सच्छिष्यो गुरुमाश्रयेत् ।१४१
मुख में जो स्थित हो वह अवश्य ही सिद्धि को प्राप्त किया करता
हे--करमें जो स्थित होवे स्वल्प जीवन वाला होता है । कुक्षि में
जो स्थित होता है वह उदासीन हुआ करता है और जो पाद में स्थित
होवे वह दुःख प्राप्त किया करता है ।१३६। पुच्छ में स्थित मन्त्रधारी
पीड़ित हुआ करता है जो बन्धन और उच्चाटन आदिके द्वारा ही होता
है । यह मन्त्रों की सिद्धि का साधन स्वरूप कूर्मचक्र बतलाया जाता
है ।१३७। अब पुण्यस्थान साधनों के लिये बताये जाते हैं—कोई भी
पुण्य क्षेत्र-किसी सागर गामिनी नदी का तट, कोई गुफा, पर्वत का
शिखर, तीर्थ स्थल, नदियोंके सङ्गम होनेका स्थल, पावन, वन, एकान्त
उद्यान, विल्व वृक्ष का मूल पर्वत का किनारा, किसी भी देव का

द्वितीय पटल ] [ ४६
आयतन, समुद्र का तट और अपना गृह ये मन्त्रधारियों को साधन
के लिए स्थान, प्रशस्त हुआ करते हैं । भिक्षा से प्राप्त अन्न-हविष्य,
शाक-फलऔर दूध, मूल, यवों, का बनाया हुआ सक्तुये ही मन्त्रधारियों
के भक्ष्य होते हैं । पुरुषार्थ की समाप्ति के लिए अच्छे विषय को गुरुका
समाश्रय ग्रहण करना चाहिए ।१३८-१४१।
मातृतः पितृतः शुद्धः शुद्धभावो जितेन्द्रियः ।
सर्वागमानां सारज्ञः सर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित् ।१४२
परोपकारनिरतो जपपूजादितत्परः ।
अमोघवचनः शान्तो वेदवेदार्थपारगः ।१४३
योगमार्गानुसन्धायो देवताहृदयङ्गमः ।
इत्यादि गुणसम्पन्नो नुरुरागमसम्मतः । १४४
शिष्यः कुलीनः शुद्धात्मा पुरुषार्थपरायणः ।
अधीतवेदः कुशला दूरमुक्तमनोभवः । १४५
अब परम श्रेष्ठ गुरु के विषय में बतलाते हैं-मातृकुल और पितृ-
कुल से शुद्ध होवे, विशुद्ध भाव से समन्वित होवे, इन्द्रियों पर विजय
प्राप्त करने वाला होवे, सभी आगमों के सारका ज्ञाता होवे और समस्त
शास्त्रों के अर्थों ;के तत्वों का जानने वाला होवे । दूसरों की भलाई
करने में निरत रहने वाला होवे, जप और पूजा आदि में परायण रहने
वाला होवे, अमोघ, वचनों को कहने वाला हो, परम शान्त होवे, वेदों
के अर्थों का पारगामी विद्वान् होवे, योग मार्गके अनुसन्धान करने वाला
होवे, देवता का हृदयङ्गम करने वाला होवे, इत्यादि सुसम्पन्न गुरु ही
आगमोंके द्वारा सम्मत होता है । अब शिष्यके विषयमें बतलाता जाता
है कि शिष्यकैसा होना चाहिए । शिष्य अच्छे कुलमें समुत्पन्नहुआ होवे,
उसकी आत्मा सभी प्रकार के दोषोंसे रहित परम शुद्धि होनी चाहिए ।
शिष्य पुरुषार्थ करने में तत्पर रहने वाला होवे, उसने वेदों का अध्ययन
किया हो और वह कार्य कुशल होना चाहिए । शिष्य ऐसा ही होना

५० ] [ श्री शारदा तिलक
चाहिए जिसने काम-वासना का त्याग कर दिया होवे ।१४२-१४३।
१४५।
हितैषी प्राणिनां नित्यमास्तिकस्त्यक्तनास्तिकः ।
स्वधर्म्मनिरतो भक्त्या पितृमातृहितोद्यतः ।१४६
वाङ्मनः कायवसुभिर्गुरुशुश्रूषणे रतः ।
त्यक्ताभिमानो गुरुषु जातिविद्याधनादिभि ।१४७
गुर्वाज्ञापालनार्थं हि प्राणव्ययरतोद्यतः ।
विहत्य च स्वकार्याणि गुरुकार्यरतः सदा ।१४८
दासवान्निवसेद्यस्तु गुरौ भक्त्या सदा शिशुः ।
कुर्वन्नाज्ञां दिवारात्रौ गुरुभक्ति परायणः ।१४६
आज्ञाकारी गुरोः शिष्योमनोवाक्कायकर्मभिः ।
यो भवेत्स तदा ग्राह्यो नेतरः शुभकाङ्क्षया ।१५०
शिष्य समस्त प्राणियों के हित के चाहने वाला, नित्य ही हित
चिन्तक, आस्तिक अर्थात् वेदों और ईश्वर में परम आस्था रखने
वाला, जिसने नास्तिकों का सम्पर्क दूर कर दिया होवे अपने धर्म्ममें
निरत - भक्ति की भावना से अपने माता-पिता के हित सम्पादन करने
में समुद्यत होवे । वाणी मन और शरीर के द्वारा तथा धन से अपने
गुरुदेव की सेवा करने में रति रखने वाला होवे । जाति-विद्या और धन
आदि के द्वारा अपने गुरुदेवों के विषय में अभिमान के परित्याग कर
देने वाला होवे ।१४६-१४७। शिष्य ऐसा ही होना चाहिए जो अपने
गुरुदेव की आज्ञा का पालन करने के लिए अपने प्राणोंका व्यय कर देने
में भी उद्यत रहे । अपने कार्यों का विहनन करकेभीसदा गुरुदेवके कार्यों
के करने से रति रखने वाला हो ।१४८। जो गुरु के समीप से एक दास
की ही भाँति निवास करे और भक्ति भाव से सदा एक शिशु की ही
तरह रहे । दिन रात गुरु की आज्ञा को करते हुए गुरुदेव की भक्ति ही
में परायण रहे ।१४८-१४६। मन-वाणी और शरीर के द्वारा शिष्य को
गुरु की आज्ञा का पालन करने वाला ही होना चाहिए । ऐसा जो भी

द्वितीय पटल ] [ ५१
हो उसी को अपने शिष्य के रूप में ग्रहण करना चाहिए और शुभ की
आकाङ्क्षा से भी अन्य को कभी ग्रहण न करे ॥१५०॥
मन्त्रपूजारहस्यानि यो गोपयति सर्वदा ।
त्रिकालं यो नमस्कुर्यादागमाचारतत्ववित् ॥१५१
स एव शिष्यः कर्तव्यो नेतर' स्वल्पजीवनः ।
एतादृशगुणोपेतः शिष्यो भवति नापरः ॥१५२
एकाब्देन भवेद्योग्यो ब्राह्मणोऽब्दद्वयान्नृपः ।
वैश्यो वर्षैस्त्रिभिः, शूद्रश्चतुर्भिर्वत्सरैर्गुरोः ।
स शुश्रूषुः परिग्राह्यो दीक्षायागव्रतादिषु ॥१५३
जो मन्त्र-पूजा के रहस्यों का सदा गोपन किया करता है और
आचारों के तत्वों का ज्ञाता तीनों कालों में नमस्कार करे । वही अपना
शिष्य बनानाचाहिए और दूसरेस्वल्प जीवन वालेको शिष्य न करे । इस
प्रकार के गुणों से सयुत ही शिष्य होता है और अन्य नहीं होता है ।
१५१-१५२। ब्राह्मण एक वर्ष में योग्य होता है । दो वर्षमें क्षत्रिय तीन
वर्षों में वैश्य और शूद्र चार वर्षों में योग्य होता है । ऐसा ही गुरु को
दीक्षा-याग और व्रतादि में सुश्रुषु शिष्य ग्रहण करने योग्य है ॥१५३।
तृतीय पटल
ततो वक्ष्यामि दीक्षाङ्गं वास्तुयागपुरःसरम् ।
कृतेग येन मन्त्रज्ञो दीक्षायाः फलमश्नुते ॥१
राक्षस वास्तुनामानं हत्वाधिष्ठाय तत्तनुम् ।
स्थितास्त्रिपञ्चाशद्देवास्तेभ्यः पूर्वं वलि हरेत् ॥२
वलिमण्डलमेतेषां यथावदभिसीयते ।
पूर्वापरायतं सूत्रं विन्यसेदुक्तमानतः ॥३

सूत्र को उक्त नाप से विन्यस्त करना चाहिए । उससे मध्य में कुछ

५२ ] [ श्रीशारदा तिलक
तन्मध्यं किञ्चिदालम्ब्य मत्स्यौ द्वौ परितो लिखेत् ।
तयोर्मध्ये स्थितं सूत्रं विन्वसेद्दक्षिणोत्तरम् ।४
द्वाभ्यां द्वाभ्यां तथाऽग्राभ्यां कोणेषु मकारल्लिखेत् ।
मत्स्यमध्ये स्थिताग्राणि तत्र सूत्राणि पातयेत् ।५
चतुरस्रं भवेत्तत्र चतुष्कोष्ठसमन्वितम् ।
तत्पुनर्विभजेन्मन्त्री चतुः, षष्टिपदं यथा ।६
ईशानाद्राक्षसं यावद्यावदग्नेः प्रभञ्जनः ।
एवं सूत्रद्वयं दद्यात्कर्णसूत्रं समाहितः ।७
इसके उपरान्त वास्तु याग के पूर्वक दीक्षाङ्ग की बतलाया जायगा
जिसके किये जान से मन्त्र का ज्ञाता पुरुष दीक्षा के फलको प्राप्त किया
करता है ।१। अब वास्तु याग की उत्पत्ति बतलाई जातीं है-पूर्व में एक
महान् उग्र और समस्त प्राणियोंको भयंकर राक्षस जोदेवोके द्वारा निहत
हुआ था यही भूमि में वास्तु पुरुष कहा गया है । वास्तु नाम वाले
राक्षस का हनन करके उसके शरीर पर अधिष्ठित होकर तिरेपन देव
स्थित हैं । पहले उनके लिए वलिका हरण करना चाहिए ।२। इनका
वलिमण्डल ठीक-ठीक रीति से कहा जाता है—पूर्व और अपरमें आयत
सूत्र को उक्त नाप से विन्यस्त करना चाहिए । उससे मध्य में कुछ
आलम्बन करके दोनों ओर दो मत्स्यों में विन्यस्त करे ।३-४। दो-दो
अग्रभागों से एक-एक मत्स्य पूर्ववत् होता है । इसी प्रकार से दूसरी
ओर भी द्वितीय मत्स्य होता है । प्राची के सूत्रार्थ मित प्राची सूत्राणु
में स्थित सूत्र से ईशान और अग्नि कोण में अर्ध चन्द्र करना चाहिए ।
फिर उसी सूत्र से उत्तर सूत्राय में स्थित से ईशान और वायव्य कोण
में अर्ध चन्द्र लिखे । इस रीति से ईशान में मत्स्य उत्पन्न हो जाता है ।
पूर्व की ही भाँति पक्षिमार्र्ध स्थित सूत्र से वायव्य और नंऋंत्य कोण में
अर्ध चन्द्र बनावे । इस तरह से दोनों ही स्थलों में दो मत्स्य हो जाते
हैं ।५। वहाँ पर चार कोष्ठों से समन्वित चतुरस्र ( चौकोर ) होता है ।

तृतीय पटल ] [ ५३
उसको फिर मंत्रधारी चौंसठ पद वाला विभक्त करे ।६। ईशान से
राक्षस कोण तक और अग्नि से वायव्य कोण पर्यन्त परम सावधान
होकर इस प्रकार से सूत्रद्वय कोण सूत्र देवे । कोण सूत्र की कर्ण सूत्र
संज्ञा होती है ।७।
ब्रह्माणं पूजयेदादौ मध्ये कोष्ठचतुष्टये ।
दिक्‌चतुष्केषु पूर्वादि यजेदार्यमनन्तरम् ।८
विवस्वन्ततो मित्रं महीधरमतः परम् ।
कोणार्द्धकोष्ठद्वन्द्वेषु वहनयादिपरितः पुनः ।६
सावित्रं सवितारं च शक्रमिन्द्रजयं पुनः ।
रुद्रं रुद्रजय विद्वानापञ्चाथापवत्सकम् ।१०
तत्कर्णसूत्रोभयतः कोष्ठद्वन्द्वेषु देशिकः ।
शर्वं गृहं चार्यमणं जम्भकं पिलिपिच्छकम् ।११
चरकीं च विदारीं च पतनामर्चयेत्क्रमात्।
अर्चयेद्दिक्षु पूर्वादिसाद्धांर्च्यन्तदेष्विमान् ।१२
अष्टावष्टौविभागेन देवान्देशिकसत्तमः ।
क्रमादीशानपर्जन्यजयन्ताः शक्रभास्करौ ।१३
सत्यो वृषान्तरिक्षौ च दिशि प्राच्यामवस्थिताः ।
अग्निःपूषा च वितथो यमश्च गृह्रक्षकः ।१४
गन्धर्वो भृङ्गराजश्च मृगोदक्षिणदिग्गताः ।
निऋर्तिदौ वारिश्च सुग्रीववरुणौ ततः ।१५
पुष्पदन्तासुरौ शेषरोगौ प्रत्यग्दिशि स्थिताः ।
वायुनगिश्च मुख्यश्च सोमो भल्लाटएव च ।१६
अर्गलाख्यो दित्यदिता कुवेरस्य दिशि स्थिताः ।
उक्तानामपि देवानां पदान्य।पूर्य पञ्चभिः ।१७
समाहित होकर आदि के मध्य में चार कोष्ठों में ब्रह्माजीका पूजन
करे । पूर्वादि चारों दिशाओं में आर्य का यजन करना चाहिए । अर्थात्
आर्य का पूर्व दिशा में—विवस्वान् का दक्षिण दिशा में—मित्र का

५४ ] श्री शारदा तिलक
पश्चिम दिशा में और महीधर का उत्तर दिशा में पूजन करे । कोणार्ध
दो कोष्ठों में वह्नि आदिका पूजन करना चाहिए ।८-६। ऊर्ध्व कोष्ठमें
सावित्र का और अधः कोष्ठ में सविता का यजन करे । फिर विद्वान-
पुरुष शक्र, इन्द्र जय, रुद्र-रुद्र जय पाँच अववतसक का पूजन करे ।१०।
उस कोण सूत्र के दोनों ओर कोष्ठ द्वन्द्वों में आचार्य क्रम से शर्व-गुह

  • अर्यमा-जम्भक पिलि पिच्छक-तरक्षी-विहारी और पूतना का
    जमर्चन करे । पूर्वादि सार्ध आद्यन्त पदों में दिशाओं में इनका पूजन
    करना चाहिए ।११-१२। उत्तम आचार्य काम में आठ-आठ के विभाग
    से देवों का यजन करे । ईशान-मर्जन्य - अत्यन्त-शक्र-भास्कर -
    सत्य-वृष-अन्तरिक्ष जो प्राची दिशा में अवस्थित है । अग्नि -
    पूषा-वितथ-यम-गृह रक्षक-गन्धर्व-भृङ्गराज-मृग जो कि दक्षिण
    दिशा में अवस्थित है । निर्ऋति-दौवारिक-सुग्रीव-वरुण-पुष्पदन्त-
    असुर- शेष-रोग-जो प्रत्यग् दिशा में अवस्थित है । वायु-नाग-मुख्य-
    सोम-भल्लाट-दिति-अदिति जो कि कुवेर की दिशा में स्थित हैं । इन
    उक्त देवों के भी पदों को पाँचों से आपूरित करे ।१३-१७।
    रजोभिस्तेष्वथैतेभ्यः पायसान्नैर्बलिं हरेत् ।
    अयं वास्तुबलिः प्रोक्तः सर्वसम्पत्समृद्धिदः । १८
    नक्षत्रराशिवारणामनुकूले शुभेऽहनि ।
    ततो भूमितले शुद्धे तुषाङ्गारविवर्जिते ।१६
    पुण्याहं वाचयित्वा तु मण्डपं रचयेच्छुभम् ।
    पञ्चभिः सप्तभिर्हस्तैर्नवभिर्वामितान्तरम् ।२०
    षोडशस्तम्भसंयुक्तं चत्वारस्तेषु मध्यगाः ।
    अष्टहस्तसमुच्छायाः संस्थाप्या द्वादशाऽभितः ।२१
    पञ्चहस्तप्रमाणास्ते निश्छिद्रा ऋजवः शुभाः ।
    तत्पञ्चमांशं संन्यस्ये-(न्निखने) न्मेदिन्यां तन्त्रवित्तमः ।२२

तृतीय पटल ] [ ५५
नारिकेलदलैर्वंशैश्छादयेत्तत्समन्ततः ।
द्वारेषु तोरणानि स्युः क्रमात् क्षीरमहोरुहाम् ।२३
उनको रजों से पूरित करना चाहिए । इसके अनन्तर इसके लिए
पायस अन्नों के द्वारा बलिका समाहरण करना चाहिए । यही वास्तु-
बलिका बतायी गयी है जो सभी की समृद्धि के प्रदान करने वाली
होती है ।१८। नक्षत्र, राशि और वारों के अनुकूल किसी शुभ दिन में
परम शुद्ध भूमि तल में जो तुष और अङ्गार आदि से रहित होवे
पुण्याह वाचन कराके परत शुभ एक मण्डप की रचना करनी चाहिए ।
वह मंडप पाँच-सात अथवा नौ हस्त के अन्तर वाला होना चाहिए ।१९-
२०। उस मंडप में सोलह स्तम्भ होने चाहिए उन सोलह स्तम्भों में से
चार स्तम्भ मध्य गत होने चाहिए। इन स्तम्भों की ऊँचाई आठ हाथ
की होवे । परस्परिक स्तम्भोंके सब ओर बारहस्तम्भ संस्थापित होवे ।
इनका प्रमाण पाँच हाथ का ही होना चाहिए । ये सब छिद्र रहित—
सीधे और शुभ संस्थापित करे । तन्त्र वेत्ता पुरुष को चाहिए कि उन
स्तम्भों का पाँचवा भाग भूमि में खोदकर रक्खे ।२१-२२। नारियल के
पत्तों से और बाँसों से सभी ओर से उसका छादन कर देवे । द्वारों में
क्रम से दूध वाले वृक्षों के तोरण होने चाहिए ।२३।
स्तम्भोच्छायाः स्मृतास्तेषां सप्तहस्तैः पृथक् पृथक् ।
दशांगुलप्रमाणेन तष्परीणाह ईरितः ।२४
तिर्यक्फलकमानं स्यात्स्तम्भानामर्द्धमानतः ।
शूलानि कल्पयेन्मध्ये तोरणे हस्तमानतः ।२५
दिक्षु ध्वजान्निवध्नीताल्लोकपालसमप्रभान् ।
वितानदर्भमालाद्यैरलङ्कुर्वीत मण्डपम् ।२६
सात हाथों से पृथक्-पृथक् उन स्तम्भों की छाया कही गयी है ।
दश अंगुल प्रमाण से उनका परीणाह (परिमाण) कहा गया है ।२४।
दोनों स्तम्भों के मध्य में देहली के रूप से जो ऊपर में तिरछा फलक
है उसका मान स्तम्भों के अर्ध मान से ही होना चाहिए । एक हाथ

५६ ] [ श्रीशारदा तिलक
के मान से तोरण में मध्य में शूलों को कल्पना करे ।२५। दिशाओ में
लोक पालों के समान प्रभा वाली ध्वजाओं को बांध देवे । उस मण्डप
को वितान-दर्भ और मालाये आदि के द्वारा भली-भांति समलंकत
करना चाहिए ।२६।
तत्तिभागमिते क्षेत्रेऽरत्निमात्रसमन्विताम् ।
चतुरस्रां ततो वेदि मण्डलाय प्रकल्पयेत् । २७
प्रागेव दीक्षादिवसात्सप्तभिर्विधिवहितैः ।
सर्वमङ्गलसम्पत्यै विदध्यादङ्कुरार्पणम् ।२८
मण्डपस्योत्तरे भागे शालां पूर्वापरायताम् ।
मूढां कुर्यात्ततस्तस्यां मण्डलं रचयेत्सुधीः । २६
पञ्चहस्तप्रमाणानि पञ्चसूत्राणि पातयेत् ।
पूर्वापरायतान्येषामन्तरं द्वादशांगु लम् ।३०
दक्षिणोत्तासूत्राणि तद्वदेकादशार्पयेत् ।
पदानि तत्र जायन्ते चत्वारिंशत्प्रमार्जयेत् । ३१
षड्क्त्यावीथीश्चतस्रोऽतश्चतुष्कोभयपार्श्वयोः ।
वीथ्यौ द्वे च चतुष्कोष्ठत्रयमत्रावशिष्यते । ३२
उसके विभाग से परिमित क्षेत्र में अरत्नि मात्र से समन्वित चतु-
रस्र वेदी मण्डल के लिए कल्पित करे ।२७। दीक्षादि दिवस से पहिले
ही सात दिन में विधि के सहित सब प्रकार के मङ्गलों की सम्पत्ति के
लिए अंकुरों का आरोपण करना चाहिए ।२८। मण्डप के उत्तर भाग
में पूर्वापर में आयता गूढ़ डाला जनानी चाहिए । फिर उनके उपरान्त
उस शाला में सुधी व्यक्ति को चाहिए कि मण्डप की रचना करे ।२६।
फिर पाँच हाथों के प्रमाण वाले पाँच सूत्रों का पालन करे जो पूर्वा पर
आयत हों वे और जिनका अन्तर बारह अंगुल होवे ।३०। उसी भाँति
दक्षिण सूत्रों को ग्यारह वार करे । वहाँ पर चालीस पद उत्पन्न
होते हैं उसकी प्रमार्जित करना चाहिए । ३१। पांकुम चारों विधियों
का मार्जन करे । पूर्व से चार कोष्ठो वाली एकविधि आठ कोष्ठों वाली

तृतीय पटल ] [ ५७
दक्षिण विधि-फिर चार कोष्ठों वाली पश्चिम विधि-और आठ कोष्ठों
वाली उत्तर विधि का मार्जन करे । इस मण्डप में चतुष्कोष्ठ त्रय अव-
शिष्ट रहता है । ३२।
पदानि रञ्जयेत्तानि श्वेतपीतारुणासितैः ।
रजोभिः श्यामलेनाथ वीथीरापूरयेत्सुधीः । ३३
पात्राणि त्रिविधांयाहुरंकुरार्पणकर्मसु ।
पालिकाः पञ्च मुख्यश्च शरावाश्च चतुष्क्रमात् । ३४
प्रोक्ताः स्मृताः सर्वतन्त्रज्ञैर्हरिब्रह्मशिवात्मकाः ।
एषामुत्सेध (च्छाय) उन्नेयः षोडश द्वादशाष्टभिः । ३५
अंगुलैः क्रमशस्तानि शुभांयावेष्ट्य तंतुना ।
प्रक्षाल्य देशिकस्तेषु पदेष्वाहितशालिषु । ३६
सगन्धदर्भकूर्चेषु पश्चिमादि निवेशयेत् ।
करीषवालुकामृद्भिस्तानि पात्राणि पूरयेत् । ३७
उन पदों का श्वेत-पीत-अरुण और सितरज से तथा श्यामल रज
से सुधी पुरुष को विधि पूर्वक अपूरित करना चाहिए । ३३। अंकुरा-
र्पण कर्मों में तीन प्रकार के पात्र कहे गये हैं-पालिका-पाँच मुखी
और शराव ये क्रम से बताये गये हैं । ये सभी तन्त्रों के ज्ञाताओं के
द्वारा हरि ब्रह्मा और शिव के स्वरूप वाले कहे गये हैं । इनकी ऊँचाई
क्रम से षोड्श-द्वादश और अष्ट अंगुलों की समझनी चाहिए । वे शुभ
होती हैं । इनको तन्तु से आवेष्टित करके प्रक्षालन करके आचार्य
आहित शाली वाले गन्ध दर्भ कूर्च से युक्त उन पदों के पश्चिम आदि
निवेशित करना चाहिए । करीष बालुका-मृत्तिका से उन पात्रों को
पूरित कर देवे । ३४-३७।
सुधाबीजेन बीजानि दुग्धैः प्रक्षाल्य तन्त्रवित् ।
मूलमन्त्राभिजप्तानि पंचघोषपुरःसरम् । ३८
आशीर्वाग्भिर्द्विजातीनां मंगलाचारपूर्वकम् ।
निर्वपेत्तेषु पात्रेषु देशिको यतमानसः । ३६

५८ ] [ श्री शारदा तिलक
शालिश्यामाढकामुद्गतिलनिष्पावसर्षपाः ।
कुलत्थ कंगुमाषाश्च बीजान्यङ्.कुरर्मणि ।४०
हरिद्रद्भि समभ्युक्ष्य वस्त्रैराच्छाद्य देशिकः ।
बलिंत्रिविधपात्राणां दिक्षु पूर्वादिंतोहरेत् ।४१
प्रणवाद्यैर्नमोन्तैश्च रात्रौ रात्रीशनामभिः ।
भतानि पितरो यक्षा नागा ब्रह्मा शिवो हरिः ।४२
तन्त्रों का ज्ञाता सुधा बीज के द्वारा बीजों को दूध से प्रक्षालित
करके मूल मंत्र से अभिमंत्रित करे और पाँच घोषों के साथ-द्विजातियों
के आशीर्बचनों से मङ्गलाचार पूर्वक आचार्य संयत मंत्र वाला होकर
उन पात्रोंमें निर्वपन करे ।३८-३६। शाली, श्यामा, आढकी, मुद्ग, तिल,
निष्पाव, सर्षप कुलत्थ कङ्गु, मास, इनके बीजों को अंकुर, कर्म्म में
ग्रहण करना चाहिए । आचार्य हल्दी से सभ्युक्षण करके वस्त्रसे आच्छा-
दित कर देवे । पूर्वादि दिशाओं में त्रिविध पात्रों की बलि का समाहरण
करे ।४०-४१। यह बलि रात्रीशके नामों द्वारा देवे जिनके आदिमें प्रणव
होवे और अन्त में नमः'–यह पद होवे । भूत, पित्रगण, यक्ष, नाग,
ब्रह्मा, शिव ओर हरि ये सातों रात्रियों के देवता कहे गये हैं ।४२।
सप्तानामपि रात्रीणां देवताः समुदीरिताः :
भूतेभ्यः स्यलजतिलहरिद्रादधिसक्तवः ।४३
सान्नाः पितृभ्यः सतिलास्तण्डुलाः परिकीर्तिताः ।
करम्भलाजा यक्षेभ्यो नारिके लोदकान्वितम् ।४४
सक्तुपिष्टं च नागेभ्यो ब्रह्मणे पंकजाक्षताः ।
सापूपमन्नं शर्वाय विष्णवे च गुडौदनम् ।४५
ततो लोकेश्वरेश्भ्योऽपि वितरेद्विधिवत्बलिम् ।
दीक्षायामभिषेकेषु नववेश्मप्रवेशने ।४६
उत्सवेषु च संपत्यै (त्तौ) विदध्यादङ्कुरापंणम् ।
प्राक् प्रोक्ते मण्डपे बिद्वान्वेदिकाया बहिस्त्रिधा ।४७