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सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 511 में से

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द्वितीय पटल ] [ ४१
चतुः शताक्षरश्चापि वृद्ध इत्यभिधीयते ।
नवाक्षरो ध्रुवयुतो मनुर्निस्त्रिंश ईरितः । ६१
यस्यावसाने हृदयशिरोमन्त्रौ च मध्यतः ।
शिखा वर्म च न स्यातां वौषट् फट्कार एव च । ६२
शिवशक्त्यर्णहीनो वा स निर्वोज इति स्मृतः ।
एष स्थानेषु फट्कारः षोढा यस्मिन्प्रदृश्यते । ६३
स मन्त्रः सिद्धिहीनः स्यात्, मन्दः षड्वत्यक्षरो मनुः ।
कूट एकाक्षरो मन्त्रः स एवोक्तो निरंशुकः .६४
द्विवर्णः सत्वहीनः स्यात्, चतुर्वर्णस्तु केकरः ।
षडक्षरो बीजहीन, स्त्वर्द्धसप्ताक्षरो मनुः । ६५
और एक सौ चार अक्षरों वाला भी मन्त्र वृद्ध कहा गया है । नौ
अक्षरों वाला ध्रुवसे समन्वित मन्त्र निस्रिंश कहा गया है । ६१। जिसके
अवसान में हृदय और शिरोमन्त्र होवे-मध्यमें शिखा होवे और वर्म होवे
और वौषट् तथा भट्कार होवे और शिव भक्ति से हीन होवे वह् मन्त्र
निर्बीज कहा गया है । जिन स्थानों में छै बार फट्कार दिखलाई दिया
करता है वह मन्त्र सिद्धिहीन होता है और षडवत्यक्षर मन्त्र मन्द होता
है । एकाक्षर मन्त्र कूट होता है और वह ही निरंशुक कहा गया है ।
। ६२-६४। दो वर्णों वाला मन्त्र सत्व से हीन हुआ करता है और चार
वर्णों वाला मन्त्र केकर होता है । छै अक्षरों का मन्त्र बीज हीन होता
है । उसी भाँति अर्ध सात अक्षरों वाला है । ६५।
सार्द्धद्वादशवर्णो वा धूमितः स तु निन्दितः ।
सार्द्धवीसत्रयक्तद्वदेकविंशतिवर्णकः । ६६
विंशत्यर्ण स्त्रिंशवर्णो यः स्यादालिङ्गितस्तु सः ।
द्वात्रिंशदक्षरो मन्त्रो मोहितः परकीर्त्तितः । ६७
चतुर्विंशतिवर्णो यः सप्तविंशतिवर्णकः ।
क्षुधार्त्तः स तु विज्ञेयश्चतुर्विंशतिवर्णकः । ६८