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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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४८ ] [ श्रीशारदा तिलक
मध्यकोष्ठ में लिखे ।१३३। पूर्व आदि दिशाओं में जहां पर क्षेत्रादि अक्षर
स्थित होवे वह उसका मुख जानना चाहिए । दोनों और हस्त स्थित
होवे और कोष्ठ में दो कुक्षियाँ होवें-दो या एक को शिष्ट पुच्छ कहा
गया है । इस क्रम से भाग से साध्य में स्थित का भी विभाग करे ।
१३४=१,५।
मुखस्थो लभते सिद्धिं करस्थः स्वल्पजीवनः ।
उदासीनः कुक्षिसंस्थः पादस्थो दुःखमाप्नुयात् ।१३६
पुच्छस्थः पीडयते मन्त्री बन्धनोच्चाटनादिभिः ।
कूर्मचक्रमिदं प्रोक्तं मन्त्राणां सिद्धिसाधनम् ।१३७
पुण्यक्षेत्रं नदीतीरं गुहापर्वतमस्तकम् ।
तीर्थप्रदेशाः सिंधूनां सङ्गमः पावन वनम् ।१३८
उद्यानानि विविक्तानि बिल्वमूलं गिरेस्तटम् ।
देवतायतनं कूलं समुद्रस्य निज गृहम् ।१३६
साधनेषु प्रशस्यन्ते स्थानान्येतानि मन्त्रिणाम् ।
भैक्ष्यं हविष्यं शाकानि विहितानि फल पयः ।१४०
मूलं सक्तुर्यवोत्पन्नो भक्ष्याण्येतानि मन्त्रिणाम् ।
पुरुषार्थसमावाप्त्यै सच्छिष्यो गुरुमाश्रयेत् ।१४१
मुख में जो स्थित हो वह अवश्य ही सिद्धि को प्राप्त किया करता
हे--करमें जो स्थित होवे स्वल्प जीवन वाला होता है । कुक्षि में
जो स्थित होता है वह उदासीन हुआ करता है और जो पाद में स्थित
होवे वह दुःख प्राप्त किया करता है ।१३६। पुच्छ में स्थित मन्त्रधारी
पीड़ित हुआ करता है जो बन्धन और उच्चाटन आदिके द्वारा ही होता
है । यह मन्त्रों की सिद्धि का साधन स्वरूप कूर्मचक्र बतलाया जाता
है ।१३७। अब पुण्यस्थान साधनों के लिये बताये जाते हैं—कोई भी
पुण्य क्षेत्र-किसी सागर गामिनी नदी का तट, कोई गुफा, पर्वत का
शिखर, तीर्थ स्थल, नदियोंके सङ्गम होनेका स्थल, पावन, वन, एकान्त
उद्यान, विल्व वृक्ष का मूल पर्वत का किनारा, किसी भी देव का