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सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 59

तृतीय पटल ] [ ५५
नारिकेलदलैर्वंशैश्छादयेत्तत्समन्ततः ।
द्वारेषु तोरणानि स्युः क्रमात् क्षीरमहोरुहाम् ।२३
उनको रजों से पूरित करना चाहिए । इसके अनन्तर इसके लिए
पायस अन्नों के द्वारा बलिका समाहरण करना चाहिए । यही वास्तु-
बलिका बतायी गयी है जो सभी की समृद्धि के प्रदान करने वाली
होती है ।१८। नक्षत्र, राशि और वारों के अनुकूल किसी शुभ दिन में
परम शुद्ध भूमि तल में जो तुष और अङ्गार आदि से रहित होवे
पुण्याह वाचन कराके परत शुभ एक मण्डप की रचना करनी चाहिए ।
वह मंडप पाँच-सात अथवा नौ हस्त के अन्तर वाला होना चाहिए ।१९-
२०। उस मंडप में सोलह स्तम्भ होने चाहिए उन सोलह स्तम्भों में से
चार स्तम्भ मध्य गत होने चाहिए। इन स्तम्भों की ऊँचाई आठ हाथ
की होवे । परस्परिक स्तम्भोंके सब ओर बारहस्तम्भ संस्थापित होवे ।
इनका प्रमाण पाँच हाथ का ही होना चाहिए । ये सब छिद्र रहित—
सीधे और शुभ संस्थापित करे । तन्त्र वेत्ता पुरुष को चाहिए कि उन
स्तम्भों का पाँचवा भाग भूमि में खोदकर रक्खे ।२१-२२। नारियल के
पत्तों से और बाँसों से सभी ओर से उसका छादन कर देवे । द्वारों में
क्रम से दूध वाले वृक्षों के तोरण होने चाहिए ।२३।
स्तम्भोच्छायाः स्मृतास्तेषां सप्तहस्तैः पृथक् पृथक् ।
दशांगुलप्रमाणेन तष्परीणाह ईरितः ।२४
तिर्यक्फलकमानं स्यात्स्तम्भानामर्द्धमानतः ।
शूलानि कल्पयेन्मध्ये तोरणे हस्तमानतः ।२५
दिक्षु ध्वजान्निवध्नीताल्लोकपालसमप्रभान् ।
वितानदर्भमालाद्यैरलङ्कुर्वीत मण्डपम् ।२६
सात हाथों से पृथक्-पृथक् उन स्तम्भों की छाया कही गयी है ।
दश अंगुल प्रमाण से उनका परीणाह (परिमाण) कहा गया है ।२४।
दोनों स्तम्भों के मध्य में देहली के रूप से जो ऊपर में तिरछा फलक
है उसका मान स्तम्भों के अर्ध मान से ही होना चाहिए । एक हाथ